Monday 31 March 2008

हिंदी दैनिक पत्रों के क्षेत्रीय परिशिष्ट

गत सदी के अंतिम दशकों में संचार क्रांति और आर्थिक सुधारों के कारण हिंदी दैनिक पत्रों की रीति-नीति बदल गई। विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया के तहत दैनिक पत्रों ने महानगरों से निकलकर पहले छोटे शहरों और फिर गांव-कस्बों की राह पकड़ी। यहां अपनी पहुंच और प्रभाव का दायरा बढ़ाने के लिए इन्होंने जिलेवार क्षेत्रीय परिशिष्टों का प्रकाषन शुरू किया। एक जिले की भौगोलिक सीमाओं में होने वाली राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आपराधिक गतिविधियों को कवर करने वाले इन परिषिश्टों की हैसियत अपने क्षेत्रों में अब स्वतंत्र समाचार पत्रों की हो गई है। इनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में निकलने वाले छोटे क्षेत्रीय दैनिक इनसे प्रतिस्पर्धा में पिछड़कर दम तोड़ रहे हैं। इन परिशिष्टों के व्यापक प्रसार और लोकप्रियता से हिंदी पत्रकारिता का पहले से थोड़ा अलग, नया रूप उभरकर सामने आ रहा है।
क्षेत्रीय परिशिष्टों में प्रकाशित सामग्री पर विचार करने से पहले प्रबंधन द्वारा इनके प्रकाशन के लिए उपलब्ध करवाए गए संसाधनों और सुविधाओं का जायजा लेना ठीक रहेगा। खास बात यह है कि इस संबंध में शुरूआत से ही प्रबंधन का जोर समाचार लेखन-संपादन की गुणवत्ता के बजाय मुद्रण और मार्केटिंग पर है। क्षेत्रीय परिशिष्टों का मुद्रण नवीनतम तकनीक से हो रहा है। समाचार प्रेषण के लिए भी इनमें आधुनिक सुविधाएं प्रयुक्त हो रही हैं और इनमें देर रात्रि तक के ताजा सचित्र समाचार प्रकाषित हो रहे हैं। इनके प्रसार के लिए आक्रामक मार्केटिंग हो रही है। प्रबंधंन द्वारा इसके लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, पाठको को लुभाने के लिए क्षेत्र में लोकप्रिय कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं और पाठकों की प्रतिक्रिया और अभिरुचि जानने के लिए घर-घर जाकर सर्वेक्षण किए जा रहे हैं। इनमें उपेक्षा ‘शुरूआत से ही समाचार लेखन और संपादन कर्म की हुई है। क्षेत्रीय प परिशिष्टों के लिए समाचार लेखन का काम गांव-कस्बों में अधिकांशत: अल्पशिक्षित वितरण एजेंटों को दे दिया गया हैं। इनके लिए समाचार लेखन और संपादन का काम करने वाले जिला स्तरीय ब्यूरो केन्द्रों के अधिकांश कार्मिक अप्रशिक्षित हैं और इनका पारिश्रमिक बहुत कम और कार्य समय बहुत ज्यादा है ।
विज्ञप्ति, ज्ञापन और प्रायोजित समाचार
क्षेत्रीय आधार पर निकलने वाले इन परिशिष्टों का लगभग 60 प्रतिशत विज्ञप्तियों और ज्ञापनों पर आधारित समाचारों से भरा रहता है। परिशिष्ट के चार पृश्ठों में से प्राय: तीन पृष्ठ क्षेत्र विषेश के समाचारों और शेष एक पृष्ठ आसपास के समाचारों के लिए तय रहते हैं। विज्ञापनों के कारण प्रतिदिन औसतन दो पृश्ठों की सामग्री क्षेत्र विषेश से संबंधित होती है। इन पृश्ठों में से एक डेढ़-पृष्ठ प्रतिदिन विज्ञप्तियों और ज्ञापनों से भर जाता है। विज्ञप्तियां मुख्यतया जिला मुख्यालय स्थित सरकारी जनसंपर्क कार्यालय द्वारा जारी होती है। क्षेत्रीय परिशिष्टों की लोकप्रियता ने शहरी ग्रामीण मध्यवर्ग में भी समाचारों में बने रहने के लिए प्रेस नोट जारी करने का नया शौौक पैदा कर दिया है। शहरी और ग्रामीण निकायों के पदाधिकारी, स्वैच्छिक संगठन, सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों के प्रबंधक या अध्यापक, धार्मिक संगठनों के पदाधिकारी, गली-मोहल्लों के संगठनों के नेता, क्षेत्रीय राजनेता आदि अपनी गतिविधियों से संबंधित प्रेस नोट जारी करते हैं। ब्यूरो स्तर पर इन विज्ञप्तियों में मामूली काट-छांट होती है और फिर इन्हें प्रकाशनार्थ भेज दिया जाता है। शहर-कस्बों में होने वाले आयोजनों के समाचारों के लिए उनकों कवर करने की जहमत अब कोई नहीं उठाता। आयोजक प्रेस नोट के साथ अपने व्यय पर फोटो भी उपलब्ध करवा देते है। ज्ञापनों के लिए भी इन परिशिष्टों में पर्याप्त जगह रहती है। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के विस्तार से जनसाधारण में षिकायत करने, मांग करने, चेतावनी देने आदि की प्रवृत्ति बढ़ी है। ब्यूरो कार्यालय में ऐसे ज्ञापनों को आंषिक संपादन के बाद समाचार की शक्ल दे जाती है। ऐसे ज्ञापन अक्सर स्थानीय सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों के होते हैं। इनमें से ज्यादातर ज्ञापन प्रशासनिक और थाना-कोतवाली स्तर के अधिकारियों के विरुद्ध अन्याय आदि से संबंधित होते हैं।
अब समाचार पत्र पर सबसे पहले व्यवसाय हैं और उसके बाद कुछ और। जाहिर है, अब सारा ध्यान विज्ञापनों पर हो गया है। क्षेत्रीय परिशिष्टों में एक नयी प्रकार की विज्ञापन संस्कृति अस्तित्व में आ रही है। ब्यूरो स्तर पर संपादन और विज्ञापन विभाग तालमेल रखकर काम करते हैं। प्रतिष्ठा महोत्सव हो , किसी अतिथि का आगमन हो, कोई उद्घाटन-समापन हो , कोई भजन या सांस्कृतिक संध्या हो, विज्ञापन और समाचार दोनों एक साथ बनाकर दे दीजिए। विज्ञापन के आकार और प्रकार के आधार पर समाचार का रूप भी तय हो जाएगा। स्थानीय निकायों के चुनावों में सभी समाचार पत्रों के क्षेत्रीय परिशिष्ट जमकर विज्ञापन व्यवसाय करते हैं। प्रत्याशी, पार्षद, पंच, सरपंच, सदस्य, प्रधान सब विज्ञापन देते है और साथ में इस हाथ दे और उस हाथ ले वाली शैली में इनके महिमा मंडन के समाचार भी बनाए और लगाए जाते हैं। विज्ञापनदाता प्रत्याषियों की चुनावी सभाओं को विषेश रूप से कवर किया जाता है।
धरना-प्रदर्शन और क्षेत्रीय नेताओं के कार्यक्रम
शहरी और ग्रामीण निकायों की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं ने शहर कस्बों में धरना-प्रदर्शन की नयी संस्कृति विकसित की है। खास तौर पर जिला और तहसील मुख्यालयों पर धरना- प्रदर्शन या रैली होना अब आम बात हो गई है। जिला मुख्यालय पर कलेक्टर कार्यालय के बाहर हमेषा ही कोई धरना-प्रदषZन होता रहता है। राजनीतिक दल केन्द्रीय निर्देषों की अनुपालना में अक्सर जिला या तहसील मुख्यालयों पर धरना-प्रदर्शन करते हैं। आजकल एक नया चलन और ‘ाुरू हुआ है। दूर-दराज के ग्रामीण कोई भी समस्या होने पर ट्रैक्टर-ट्रोली पर सवार होकर जिला या तहसील मुख्यालय पर ज्ञापन देने पहुंच जाते हैं। पुलिस के अन्याय या अत्याचार के विरुद्ध भी अब ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों में जागरूकता आई है। अक्सर लोग जिला और तहसील मुख्यालयों पर इसके लिए धरने देते है। क्षेत्रीय नेता इन धरनों में सहानुभूति प्रदर्षित करने पहुंचते हैं और वहां भाशण आदि भी हो जाता है। ये धरने-प्रदषZन भी इन परिषिश्टों का राषन-पानी हैं। अक्सर इन धरनों-प्रदषZनों के नेता कार्यकर्ता ही प्रेस नोट बनाकर ब्यूरो कार्यालय में पहुंचा देते हैं।
क्षेत्रीय सांसद, विधायक, जिला प्रमुख, प्रधान आदि अपने क्षेत्रों के दौरे पर निकलते है तो इस दौरान होने वाले कार्यक्रमों के समाचार परिषिश्टों में प्रमुखता से प्रकाषित किए जाते हैं। क्षेत्रीय नेताओं के साथ यात्रा पर जाने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता ही इस तरह के कार्यक्रमों के प्रेस नोट बनाते हैं। क्षेत्रीय परिषिश्टों में इस तरह के प्रेस नोट पर आधारित को समाचारों को प्रमुखता नेता की हैसियत के अनुसार दी जाती है। सांसद, विधायक और जिला प्रमुख से संबंधित समाचार परिषिश्टों में आम तौर पर आमुख कथाओं के रूप में प्रकाषित किए जाते हैं। प्रधान, पालिकाध्यक्ष आदि को भी कभी मुखपृष्ठ तो कभी मध्यवर्ती पृष्टों पर जगह मिल जाती है।
अपराध और दुर्घटनाएं
क्षेत्रीय परिशिष्टों का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा हमेशा आपराधिक और दुर्घटना विषयक समाचारों से भरा रहता है। आपराधिक समचारों में चोरी, डकैती, धोखाधड़ी, मारपीट और झगडों आदि से संबंधित समाचार होते हैं। दुर्घटनाओं में सर्वाधिक समाचार वाहन दुर्घटनाओं के होते हैं। इसके अतिरिक्त चोरी-चकारी और मारपीट के समाचारों के लिए भी पर्याप्त जगह रहती है। इस तरह के समाचार अक्सर पुलिस स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं से बनाए जाते है। शाम सात और आठ बजे के बीच क्षेत्र की सभी थाना-कोतवालियों से फोन पर उस दिन दर्ज मुकदमों की जानकारी ली जाती है और फिर इन्हें समाचारों के रूप देकर प्रकाशित कर दिया जाता है। इन समाचारों में बाकायदा समाचार स्रोत के रूप पुलिस के छोटे से बड़े अधिकारियों के नामोल्लेख रहते हैं। स्थान भरने के लिए मामूली मारपीट और झगड़ों को भी समाचार की शक्ल दी जाती है। इन आपराधिक समाचारों को न तो और स्रोतों से पुश्ट किया जाता है और न ही इन्हें पुलिस से भिन्न से स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं से विस्तृत किया जाता है। आपराधिक समाचारों में कभी कभार हुए बलात्कार, छेड़छाड़ और भागने-भगाने के मामलों को खास तरजीह दी जाती है।
पर्व-त्योहार और धार्मिक प्रवचन
त्योहारों और धार्मिक पर्वों से संबंधित गतिविधियों को क्षेत्रीय परिशिष्टों में प्रमुखता और विस्तार से कवर किया जाता है। होली, दिवाली, ईद, रक्षाबंधन, षिवरात्रि, नवरात्रि, हनुमान जयंती आदि पर्व-तिथियों पर विस्तृत समाचार कथाएं प्रकाषित होती हैं। पर्व-त्योहार के एक दिन पहले होने वाले आयोजनों का विवरण दिया जाता है और पर्व त्योहार के दिन संपन्न कार्यक्रमों पर आमुख कथाएं होती हैं। इस तरह की आमुख कथाएं मुख्यालय की तिथि रेखा से समेकित इंट्रो के साथ एकाधिक स्थानों के समाचारों को जोड़कर तैयार होती हैं। इस तरह की समाचार कथाओं के तय रूप है। श्रद्धा और परंपरागत ढंग से मना होली का त्योहार, ईद अकीदत से मनाई, मंदिरों में हुआ शंखनाद, बहनों ने भाइयों की कलाई पर बांधीं राखियां आदि इस तरह के समाचारों के लोकप्रिय शीर्षक हैं। ऐसी समाचार कथाओं के साथ मंदिरों की साज-सज्जा, मूर्तियों के श्रंृगार, गली-मोहल्लों में निकले जुलूसों और शोभा यात्राओं के ताजा चित्र प्रकाषित किए जाते हैं। इस तरह की कथाओं में कोई खास नवीनता नहीं होती। कथा यदि किसी धार्मिक पर्व से संबंधित है तो क्षेत्र के मंदिरों के नाम हर बार वहीं रहेंगे। श्रद्धालु उमड़े, जयघोश और शंखनाद हुआ, आरती हुई, प्रसाद और फूल-पत्र चढ़ाए गए आदि पंक्तियां थोडे़ बदले हुए रूप में सभी धार्मिक पर्वों की समाचार कथाओं में मिल जाएंगी। धार्मिक पर्व-तिथियों पर क्षेत्रीय ज्योतिषियों या पंडितों के अभिमत आधारित समाचारों कथाओं का प्रकाशन भी इन परिशिष्टों में प्राय: होता है। आसाराम, मोरारी बापू, कृपाराम आदि बडे़ प्रवचनकारों के साथ-साथ क्षेत्र में प्रवचन-व्याख्यान देने वाले छोटे संत-महात्माओं के समाचार भी इनमें सचित्र प्रकाषित किए जाते हैं। कभी-कभी इनमें संत-महात्माओं के साक्षात्कार भी प्रकाषित किए जाते है। संत-महात्माओं के इन व्याख्यानों के कवरेज की जरूरत अमूमन नहीं पड़ती। संत-महात्माओं के सहयोगी या कार्मिक प्रेस नोट बनाकर ब्यूरो कार्यालय में भेज देते हैं। धार्मिक प्रवचन-व्याख्यान से संबंधित इन समाचारों में महिमा मंडन खूब होता है। इनकी शब्दावली दुरुह और वाक्य-रचनाएं जटिल होती हैं। इनमें विषिश्ट रूढ़ धार्मिक शब्दावली का बहुतायत से प्रयोग होता है। खास तौर पर जैन मुनियों के व्याख्यानों के समाचारों में इस तरह की रूढ़ शब्दावली जमकर प्रयुक्त होती है।
मिथ, इतिहास और यथार्थ
पर्याप्त शिक्षा और समझ के अभाव मे क्षेत्रीय परिशिष्टों में मिथ, इतिहास और यथार्थ आपस धुलमिल रहें है। परिशिष्टों में पर्व-त्योहारों, मंदिरों, लोक देवताओं आदि पर पर्याप्त सामग्री रहती है। इनमें किंवदंतियों या जन श्रुतियों को इतिहास और यथार्थ की तरह पेष किया जाता है। अक्सर गांव-कस्बों के पाठकों को से जोड़ने के लिए नीति के तहत इन में लोक देवताओं और धर्म स्थलों पर विषेश कथाएं करवाई जाती हैं। ये विषेश कथाएं अति मानवीय चमत्कारों और अंध-विष्वासों से बुनी जाती हैं। जाति-समाजों की परंपरओं के वर्णन में भी मिथों और अति मानवीय तत्वों का सहारा लिया जाता है। लोक देवताओं और धर्म स्थलों से जुड़े चामत्कारिक प्रसंगों का हकीकत की तरह वर्णन किया जाता है। अक्सर ऐसी कथाएं ग्रामीण पृश्ठभूमि के संवाददाता ठेठ गांव से आधी-अधूरी जानकारी के साथ बनाकर भेजते हैं। इनकों ब्यूरो और डेस्क स्तर पर आंषिक संपादन के बाद यथावत प्रकाषित कर दिया जाता है। विषेशज्ञों का सहयोग लेने का चलन क्षेत्रीय परिषिश्टों में लगभग नहीं है। ब्यूरों या डेस्क स्तर पर इन जानकारियों में इतिहास, मिथ और यथार्थ को अलग करने की जहमत कोई नहीं उठाता। क्षेत्र में घटी कुछ असाधारण घटनाओं को चामत्कारिक रूप दने का नया चलन भी इन परिषिश्टों में शुरू हुआ है। ग्रीश्मकाल के दौरान किसी नदी में गीली रेत में पानी देखकर किसी ने गड्ढ़ा खोदा, तो थोड़ा-बहुत पानी सतह पर आ गया। हो गई गंगा प्रकट। बिना किसी वैज्ञानिक जांच-पड़ताल या अभिमत के यह दूसरे दिन आमुख समाचार के रूप में सभी समाचार पत्रों के में प्रकाशित हो जाता है।
भाषा की अराजकता और अतिरंजना
परिनिश्ठितऔर शुद्ध भाशा इन क्षेत्रीय परिशिष्टों की प्राथमिकताओं में नहीं है। इस मामले में इनमें पूरी स्वच्छंदता और अराजकता है। यह पाठकों के सरोकारों में शामिल नहीं है, इसलिए संपादन और प्रबंधन भी इस संबंध में चिंतित नहीं है। अपर्याप्त शैक्षिक स्तर के अप्रशिक्षित संवाददाताओं की लिखी हुईं रिपोर्ट्स फैक्स या मोडेम तकनीक से ब्यूरो कार्यालयों में पहुंचाती है। ब्यूरो कार्यालयों में अप्रशिक्षित लोग इनमें यथास्थान काट-छांट कर इनको तत्काल डीटीपी ऑपरेटर को थमा देते हैं। समय के दबाव में डेस्क काम करती है और कॉपी जैसी है, उससे थोड़ी बेहतर होकर सुबह तकनीक कमाल से प्रभावी ढंग से मुद्रित होकर पाठकों को मिल जाती है। सरकारी जनसंपर्क विभाग से जारी होने वाली विज्ञप्तियों में सरकारी भाशायी `जार्गन´ प्रमुख रहता है। कई बार तो यह डेस्क के संपादनकर्मियों के भी पल्ले नहीं पड़ता। शेष अधिकांश विज्ञप्तियां स्कूली हिन्दी अध्यापक लिखते ह,ैं जिनकी वाक्य रचनाएं बहुत जटिल होती हैं। कभी-कभी तो इनके वाक्य 20 या 22 पंक्ति लंबे हो जाते हैं। इन वाक्यों का अर्थ अक्सर जलेबी हो जाता है। आपराधिक समाचारों की भाशा इन परिशिष्टों में बहुत यांत्रीक हो गई है। अक्सर एफआईआर में दर्ज भािशक रूप ही समाचारों में भी प्रयुक्त किए जाते है। परिशिष्टों में व्याकरण, भाषा अभिव्यक्ति आदि की बारीकियों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। सबकी प्राथमिकता यह है कि जैसा है वह हर हालत में 8 या 9 बजे पहले डेस्क पर और फिर सुबह चार या पांच बजे तक मुद्रित होता लोगों तक पहुंच जाए। अतिरंजना क्षेत्रीय परिशिष्टों में प्रकाशित समाचारों का खास लक्षण है। इनमें मान लिया गया है कि वस्तुस्थिति को जब तक अतिरंजित रूप न हीं दिया जाए, यह समाचार नहीं है। होली पर होने वाली सामान्य मारपीट के लिए शीर्षक दिया जाएगा होली का त्योहार रंगों के बजाए खून से। क्षेत्र में पेयजल संकट है तो लिखा जाएगा कि पानी के लिए कभी भी सड़कों पर गृहयुद्ध छिड़ सकता है। किसी छोटी-मोटी हलचल को भी हडकंप का रूप देकर प्रस्तुत किया जाएगा। क्षेत्र में दो तीन पीलिया या एड्स के रोगी मिल जाए तो बिना किसी आधार के तमाम क्षेत्र को रोगग्रस्त घोषित कर दिया जाएगा। क्षेत्र के गली मोहल्लों में हाने वाले सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों के वर्णन में अतिशयोक्ति भी इन परिशिष्टों में आम है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय परिशिष्टों के कारण छोटे शहरों और गांव-कस्बों में धीरे-धीरे हिन्दी पत्रकारिता का थोड़ा अलग चेहरा अस्तित्व में आ रहा है। क्षेत्रीय परिषिश्ट हिंदी पत्रकारिता और पाठकीय सरोकारों में कुछ आधारभूत तब्दीलियां कर रहे हैं। फिलहाल हालात उठापटक और संक्रमण की है। कुछ बन रहा है, तो कुछ बिगड़ भी रहा है। क्षेत्रीय परिशिष्टों के कारण हिंदी पत्रकारिता के चरित्र और पाठकीय सरोकारों में हो रहे कुछ सकारात्मक परिवर्तन इस प्रकार हैं :-
1. हिंदी दैनिक पत्रों की पहुंच और प्रभाव का दायरा बढ़कर ठेठ दूरदराज के ग्रामीण इलाकों तक हो गया है।
2. दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में होने वाली गतिविधियों और घटनाओं को क्षेत्रीय परिषिश्टों से नयी पहचान मिली है।
3 .ये लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं मजबूत करने में कारगर सिद्ध हो रहे हैं। अन्याय, उत्पीड़न, भ्रश्टाचार आदि के विरुद्ध स्वर मुखर करनाण आसान हो गया है।
4. बहत्तर मुद्रण तकनीक और संसाधनों के कारण क्षेत्रीय परिशिष्टों मे सामग्री की प्रस्तुति और मुद्रण की गुणवत्ता बढ़ गई है।
5. क्षेत्रीय परिशिष्टों के कारण भाषा का लोकतंत्रीकरण संभव हुआ है। इनमें ऐसी भाषा काम में ली जा रही है जो दूरदराज के गांव कस्बों में आम-तौर पर बोली और समझी जाती है।
क्षेत्रीय परिशिष्टों की लोकप्रियता के कारण हिंदी दैनिक पत्रों की प्रसार संख्या में अभूतपूर्व वृिद्ध हुई है, लेकिन इनकी नई रीति-नीति से क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता में कुछ ध्यानाकर्षक नकारात्मक परिवर्तन भी हुए हैं, जो इस प्रकार हैं:
1 .क्षेत्रीय परिशिष्टों के कारण पाठकों के सरोकार बहुत सीमित हो गए हैं। गांव-कस्बों के पाठक अपने से संबंधित क्षेत्रीय समाचारों के अलावा कुछ नहीं पढ़ते। यहां तक कि वे अपने क्षेत्र से सटे हुए इलाकों के समाचार भी नहीं पढ़ते।
2. विज्ञप्तियों और ज्ञापनों पर निर्भरता के कारण क्षेत्रीय परिशिष्ट वस्तुस्थिति की सही तस्वीर पेष करने मे पिछड रहे हैं। इनमें अनावश्यक महिमा-मंडन या सराहना को बढ़ावा मिल रहा है। ज्ञापनों में होने वाले आरोप-प्रत्यारोप के कारण कस्बाई और ग्रामीण सौहार्द और सद्भावनाएं समाप्त हो रही हैं। इनसे अनावश्यक मनमुटाव और झगड़ों को बढ़ावा मिल रहा है।
3. अपुष्ट और अभिमतविहीन समाचारों के कारण क्षेत्रीय परिशिष्टों में यथार्थ का विकृत रूप सामने आ रहा है। इनमें अतिरंजना यथार्थ और उसकी व्यंजक भाषा को भ्रष्ट कर रही है।
4.क्षेत्रीय परिशिष्टों में यथार्थ, इतिहास और मिथ का अंतर समाप्त हो रहा है। वैज्ञानिक चेतना और समझ के विकास में जो भूमिका दैनिकों की होनी चाहिए, वह इस कारण अवरुद्ध है।
5.व्यावसायिक दबाव के कारण क्षेत्रीय परिशिष्ट अधिकतम विज्ञापन प्राप्त करने के साधन हो गए हैं। इससे समाचारों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
6. क्षेत्रीय परिशिष्टों में विज्ञप्तियों, ज्ञापनों और प्रायोजित समाचारों में निरंतर बढ़ोतरी के कारण संवाददाता, संपादन आदि की पारंपरिक भूमिका सिमट रही है।
7. क्षेत्रीय परिशिष्टों में भाषा के परिनिष्ठित या मानक होने की अवधारणा समाप्त हो रही है और `पाठक के समझ में आना चाहिए´ वाला आग्रह सर्वोपरि हो गया है।

Wednesday 19 March 2008

भूमंडलीकरण, सांस्कृतिक संक्रमण और समकालीन कविता

संस्कृति एक मानसिक अवधारणा है, जो किसी समाज के जीवन-चर्या संबंधी विश्वासों के समूह से बनती है। समाज इन विश्वासों-आस्थाओं को धीरे-धीरे अभ्यास और अनुभव से अर्जित करता है। इनके संस्कार-परिष्कार की प्रक्रिया भी समाज में नामालूम ढंग से निरंतर चलती रहती है। समाज की वर्गीय संरचना भी अक्सर संस्कृति को प्रभावित करती है। उच्चवर्गीय समाजों की संस्कृति के बरक्स निम्नवर्गीय किसान-मजदूर समाजों की अपनी पृथक् संस्कृति का भी विकास होता है। अलबत्ता वर्चस्व की स्थिति में होने के कारण उच्च वर्गीय समाज अपनी संस्कृति को ही तमाम समाज की संस्कृति की तरह ही प्रचारित करते हैं। संस्कृति स्थिर और एकरूप कभी नहीं रहती- इसमें परिवर्तन और संवर्धन की प्रक्रियाएं हमेशा जारी रहती है। एक समाज जब दूसरे समाज के संपर्क में आता है तो दोनों की ही संस्कृतियों में बहुत कुछ जुड़ता-घटता है। किसी समाज के अपने भीतर होने वाले नवाचार भी संस्कृति को निरंतर गतिशील और जीवन बनाए रखते हैं। कविता स्वयं एक सांस्कृतिक प्रक्रिया हैं, अत: किसी समाज के सांस्कृतिक संक्रमण से उसका गहरा संबंध होना लाजमी है। कविता इस सांस्कृतिक संक्रमण को स्वयं जीती और धारण करती है। यह आत्मसचेत रहकर इस संक्रमण को समझती-परखती है और इसके आत्मसातीकरण और प्रतिरोध का स्टैंड लेती है। सांस्कृतिक संक्रमण कविता के लिए खाद-पानी का काम करते है। यह इनसे पुनर्नवा होती है। हमारे यहां भक्ति आंदोलन के कवियों की अदभुत और असरदार कविता इस सांस्कृतिक संक्रमण से होने वाले आत्मसंघर्ष् की ही पैदाइश हैं।
गत सदी के अंतिम दो दशकों में हुई संचार क्रांति से पहले हालात दूसरी तरह के थे। विकसित संचार माध्यमों के अभाव में पहले सांस्कृतिक संक्रमण से होने वाले प्रतिरोध और आत्मसातीकरण में अक्सर समाज के सभी तबके शामिल नहीं होते थे। अक्सर समाज के कुछ तबकों में परिवर्तन हो जाते, धीरे-धीरे उन्हें स्वीकृति भी मिल जाती और मामूली प्रतिरोध के बाद उन्हें संस्कृति का हिस्सा भी मान लिया जाता था। मंद गति से होने वाले इस सांस्कृतिक संक्रमण से संस्कृतियों की पहचान को भी कोई खास नुकसान नहीं होता था। छोटे-मोटे झटके यदा-कदा लगते, लेकिन अक्सर संस्कृतियां उन्हें झेल जाती थीं। उसी पहचान के भीतर प्रतिरोध और आत्मसातीकरण धीमी गति और नामालूम ढंग से चलता रहता था। इस तरह का संक्रमण कविता की प्रकृति के अनुरूप था। दरअसल कविता का बुनियादी आवयविक संगठन बहुत प्राचीन है इसलिए इसे परिवर्तनों के आत्मसात करने में समय लगता है। अक्सर यह सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता के अनुरूप अपने को बदलने-ढालने में पिछड़ जाती है। अब तक सांस्कृतिक संक्रमण धीमी गति से होता था, इसलिए कविता भी धीरे-धीरे अपने को तदनुरूप ढाल लेती थी। लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। संचार क्रांति के विस्फोटक वस्तार से यह संतुलन बिगड़ गया है।
महायुद्धों से पूर्व की वैज्ञानिक उपलब्धियों से जैसे औद्योगिक क्रांति संभव हुई, वैसे ही, युद्धोत्तर काल के तकनीकी विकास ने संचार क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया। विकसित संचार प्रौद्योगिकी के बल पर दुनिया के विकसित देश व्यापार, वित्त, निवेश आदि का भूमंडलीकरण कर अपने उत्पादों को बचने के लिए एक सकल विश्व बाजार बनाने की मुहिम में जुट गए। तकनीक के विकास से संचार की धीमी गति अचानक तीव्र हो गई। संचार आसान और सर्वसुलभ हो गया। इस सबने भिन्न पहचान वाले संस्कृति समूहों में संपर्क और संवाद को अचानक तीव्र और सघन करने में मदद की। संचार प्रौद्योगिकी पर विकसित देशों का एकाधिकार और वर्चस्व था, इसलिए इन देशों की संस्कृति विकासशील और अविकसित देशों में पहुंच गई। फिलहाल यह संक्रमण इतना अचानक, तीव्र और प्रभावी है कि इससे संस्कृतियों की पृथक् पहचानों के एकरूपीकरण का डर लगने लगा है। विश्व बैंक के अध्यक्ष ने कुछ वषोZं पहले बर्लिन में साफ कहा कि हमें भूमंडलीकृत विश्व में संस्कृति की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हम संस्कृति के एकरूपीकरण के जिस भय के संबंध में पढ़ते-सुनते हैं, वह भय वास्तविक है। हमारे यहां भी गत सदी के अंतिम दशक के आरंभ में आर्थिक सुधारों की घोषणा के तत्काल बाद हुई संचार क्रांति ने सांस्कृतिक संक्रमण की प्रक्रिया को एकाएक तेज कर दिया है। इस तीव्र आक्रमण और सांस्कृतिक संक्रमण के साथ तालमेल बिठाने में कविता गड़बड़ा गई लगती है। सांस्कृतिक संक्रमण में अधिक उजली और धारदार होकर निकलने वाली कविता इस बार असमंजस से घिरी हुई हतप्रभ लग रही है। अधिक प्रभावी और चकाचौंध वाले नए संचार माध्यम इसकी जगह काबिज हो गए हैं। इसके प्रभाव और पहुंच का दायरा सिमटकर कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित रह गया है। तालमेल बिगडने से यह नए यथार्थ को उस तरह चरितार्थ नहीं कर पा रही, जिस तरह इसे करना चाहिए। संक्रमण के प्रतिरोध की इसकी रणनीति भी ज्यादातर पलायन की है।
आत्म सजगता कवि कर्म की बुनियादी शर्त है। खास तौर पर सांस्कृतिक संक्रंमण के दौरान कवि के लिए आत्मसचेत रहकर परिवर्तनों की थाह लेना जरूरी है। परिवर्तनों की यह समझ ही उसे प्रतिरोध या आत्मसातीकरण का स्टैंड लेने की समझ भी देती है। सांस्कृतिक प्रक्रियाएं अक्सर इतने नामालूम ढंग से समाज में होती है, कि उनके भीतर होकर, उनके प्रति आत्मसचेत रहना बहुत मुिश्कल काम होता है। नए सांस्कृतिक संक्रमण की खासियत यह है कि यह आकिस्मक और तीव्र होने के साथ साथ नयी संचार प्रौद्योगिकी के पंखों पर सवार होकर सम्मोहक प्रभाव के साथ होता है। यह प्रभाव इतना निर्णायक और सघन होता है कि इसमें आत्मविस्मरण स्वाभाविक है। समकालीन कविता का कवि भी इस सम्मोहन का िशकार है। नयी संस्कृति के बाजारवाद और उपभोक्तावाद ने उसके रहन-सहन, खान-पान और जीवन मूल्यों को बहुत हद तक बदल दिया है। वह उन लक्षित 70 करोड़ मध्यवर्गीय भारतीयों में शामिल है जिन्हें लुभाने-रिझाने के लिए विश्व की सभी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। उसके लिए इस सबसे अपने को अलग-थलग और अछूता रखना अब संभव नहीं रह गया। वह भी आम मध्यवर्गीय उपभोक्ता की तरह येन-केन प्रकारेण जल्दी से कुछ पाने की अंतहीन और अंधी दौड़ में शामिल हो गया है। यह दौड़ ऐसी है, जिसमें अपने आत्म को सचेत रखना संभव नहीं है। यही कारण है कि समकालीन कविता में आत्ममुखरता कम हो गई है। उसमें उपभोक्तावाद, बाजारवाद और नए साम्राज्यवाद के ब्यौरे तो बहुत आने लगे हैं, लेकिन ये ब्यौरे कवि के अपने आत्मसंघर्स की पैदाइश नहीं लगते। कवि को साफ-साफ दो अलग-अलग भूमिकाओं में देखा जा सकता है। एक में वह कवि है जहां वह संक्रमण के प्रतिरोध का स्टैंड ले रहा है और दूसरी में वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का टारगेट उपभोक्ता है जो जल्दी से कुछ पाने की हड़बड़ी में है।
कविता सांस्कृतिक संक्रमण के दौरान हमेशा प्रतिरोध या आत्मसातीकरण का स्टैंड लेती है। मध्यकाल में इस्लाम संबंधी सांस्कृतिक संक्रमण के दौरान कबीर और उनके समानधर्मा कवियों ने आत्मसातीकरण और प्रतिरोध का मिलाजुला स्टेंड लिया था। यूरोपीय संस्कृति की प्रतिक्रिया में भी कविता ने स्टेंड लिया था, लेकिन तत्काल स्टेंड लेने वाली इस कविता की ऐतिहासिक समझ बाद में ठीक नहीं पायी गई। नये सांस्कृतिक संक्रमण को लेकर आम तौर पर समकालीन कविता का स्टेंड प्रतिरोध का है। लेकिन प्रतिरोध के लिए उसकी रणनीति ज्यादातर पलायन की है। भूमंडलीकरण, बाजार, उपभोक्तावाद आदि की अपसंस्कृति से त्रस्त होकर अक्सर कवि अपने घर गांव और बचपन की स्मृतियों में लौट कर राहत की सांस लेता है। चला जाउंगा वापस, भूख और प्यास की दुनिया में, गले में गमछा डाले, जहां धूलभरे रास्तों पर, घूम सकता हूं बेरोक-टोक, इधर लिखी जाने वाली हर तीसरी-चौथी कविता का स्वर कुछ ऐसा ही है। आश्चर्य यह है कि इस अभूतपूर्व सांस्कृतिक संकट के समय ज्यादातर कविता का केंद्रीय सरोकार स्मृति है। भूमंडलीकरण से पीछे नहीं लौटा जा सकता इसलिए बाजार का वर्चस्व अब हकीकत है। इसकी मौजूदगी को स्वीकार करके ही इसके प्रतिरोध की कोई कारगर और व्यावहारिक रणनीति बन सकती है। डंकल, गेट, रेफ्रीजिरेटर और आइसक्रीम का प्रतिरोध लो मटके की रणनीति से नहीं हो सकता। यह साफ साफ पलायन है। बाजार की संरचना बेहद जटिल है इसका सम्मोहन और प्रभाव भी बहुत निर्णायक है। इसका प्रतिरोध पलायन, अवसाद और नॉस्टेलेजिया से नहीं, व्यावहारिक और कारगर रणनीति से संभव है। यह रणनीति आत्मसचेत कवि के अंतसंघ से निकलती है, जो फिलहाल कविता में दिखाई नहीं पड़ रही।
सांस्कृतिक संक्रमण के दौरान कविता प्रतिरोध का हथियार है, लेकिन साथ-साथ यह आत्मसातीकरण की प्रक्रिया भी है। नये सांस्कृतिक संक्रमण में बहुत कुछ ऐसा भी है जो हमारे काम का हो सकता है। आखिर आज हमारे पास जो कुछ भी प्रगतिशील और मूल्यवान है वो पिश्चम की ही देन है। बाजार में बहुत सारी बुराइयां है, लेकिन एक धूमिल संभावना यह भी है कि शायद कभी यहीं हमारी जाति आधारित समाज संरचना और रूिढवादी जीवन मूल्यों के ध्वंस का कारगर हथियार साबित हो। लेकिन दुभाZग्य से इस तरह के संकेत भी समकालीन कविता में नहीं दिखते।
कविता स्वयं भी एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है, इसलिए सांस्कृतिक संक्रमण के दौरान संस्कृति के दूसरे रूपों की तरह यह भी पुनर्नवा होती है, यह नए यथार्थ को धारण करने के लिए अपने पुराने औजारों को छोड़कर, नये औजारों का आविष्कार करती है या पुराने औजारों को ही नयी धार देती है। पहले यथार्थ के बदलने की प्रक्रिया इतनी तेज नहीं थी, इसलिए छोटे-मोटे रद्दोबदल से ही काम चल जाता था लेकिन भूमंडलीकरण और त्वरित संचार प्रौद्योगिकी ने जो स्थितियां पैदा की हैं वे एकदम नयी और अभूतपूर्व हैं। अब केवल पुराने औजारों को धार देने से काम नहीं चलेगा। इनकी समझ और परख के लिए एकदम नए औजारों की जरूरत पड़ेगी। समकालीन कविता में इस संबंध में कोई अंतर्संघषZ व्यापक रूप से चल रहा हो, ऐसा नहीं लगता। कविता उन्हीं घिसी-पिटी मुद्राओं और मुहावरों से हो रही है। भूमंडलीकरण, बाजार, उपभोक्तावाद, अपसंस्कृति आदि के ब्यौरे तो इसमें है, लेकिन मुहावरा ज्यादातर आठवें-नवें दशक का घर-गांव, पेड़, चिडिया और अबूतर- कबूतरवाला ही है।
यह सब बातें ऐसी हैं, जो समकालीन कविता की नकारात्मक तस्वीर पेश करती है। रिवाज यह है कि बहुत सी नकारात्मक चीजों के साथ कुछ थोड़ी सकारात्मक चीजें रखकर बात समाप्त की जाए। ऐसा भी किया जा सकता है, लेकिन इससे क्या होगा। बहुत सारी खराब चीजों के साथ जुड़ी हुई थोडी-सी अच्छी चीजों का भी कोई खास मूल्य नहीं होता। अलबत्ता उनसे हम अपने मन को तसल्ली भर दे सकते हैं। फिलहाल वक्त तसल्ली देने का नहीं, गहरे आत्मान्वेषण का है।