Thursday 9 April 2009

जीवन की पुनर्रचना

अन्य कथेतर गद्य विधाओं में जीवनी सर्वाधिक प्राचीन है। पश्चिम में जीवनी लेखन बहुत पहले से शुरू हो गया था। युनानी जेनोफोन और प्लूटार्क तथा रोमन टैसिटस और सेयेटोनियस जैसे जीवनीकार वहां 1800 वर्ष पहले हो गए थे। आरंभ में जीवनियां विशिष्ट व्यक्तियों-राजाओं और धर्मगुरुओं की लिखी जाती थीं, लेकिन उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में इसमें बदलाव हुए। अब जीवनियां सामान्य व्यक्तियों की भी लिखी जाती हैं। भारतीय परंपरा में भी जीवनी राजप्रशस्ति, चरित वर्णन आदि रूपों में बहुत पहले से विद्यमान है। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजी साहित्य के संपर्क-संसर्ग के बाद यहां भी आधुनिक जीवनी लेखन की शुरुआत हुई। पश्चिम में जीवनी अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है।

जीवनी का आशय और अर्थ तय करने का काम स्वयं जीवनीकारों ने भी किया है और आलोचकों ने भी। दरअसल यह इतना स्पष्ट साहित्य रूप है कि इस संबंध में कोई खास विवाद नहीं है। जीवनी किसी व्यक्ति विशेश के जीवन का वृत्तांत है। अंग्रेजी में इसके लिए लाइफ और बायोग्राफी शब्दों का प्रयोग होता है। जीवनी में किसी व्यक्ति विशेश के व्यतीत जीवन की पुनर्रचना होती है। हैरी हुडनी, एडगर एलन पो आदि विख्यात लोगों के जीवनीकार कैनेथ सिल्वर मेन ने जीवनी को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ´´किसी अन्य व्यक्ति के जीवन की विश्वसनीय प्रमाणों वाली आख्यानात्मक नाटकीय प्रस्तुति की जीवनी कह सकते है।´´ कुछ साहित्य आलोचक जीवनी को साहित्य रूप मानने के विरुद्ध है। उनके अनुसार इसमें तथ्य और पत्रकारीय शैली का इस्तेमाल होता है। जीवनी का रूप जीवनीकार और लक्ष्य जीवन के संबंध पर निर्भर करता है। जीवनीकार जब जीवनी शुरू करता है, तो उसे खुद पता नहीं होता कि यह आगे जाकर क्या रूप ग्रहण करेगी। विख्यात जीवनीकार माइकेल हॉलरॉयड का कहना था कि ´´जीवनी एक ऐसी विधा है, जिसमें जीवनीकार आरंभ में चरित नायक से शादी तो कर लेता है, पर उसकी निभेगी कि नहीं, यह जीवनीकार को भी पता नहीं होता।´´ जीवनी की परिभाषा देने का काम हिंदी में भी हुआ है। बाबू गुलाबराय ने जीवनी में चरित्र वर्णन में कलात्मकता पर खास तौर पर जोर दिया है। उनके अपने शब्दों में ´´जीवनी लेखक अपने चरित नायक के अंतर-बाह्य स्वरूप का चित्रण कलात्मक ढंग से करता है। इस चित्रण में वह अनुपात और शालीनता का पूरा ध्यान रखता हुआ सहृयता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ अपने चरित नायक के गुण दोष मय सजीव व्यक्तित्व का एक आकर्षक शैली में उद्घाटन करता है।´´ इस तरह जीवनी किसी व्यक्ति विशेश के जीवन पर एकाग्र ऐसा साहित्य रूप है, जिसमें तथ्य, इतिहास, कला, कल्पना आदि सभी का योग रहता है।

जीवनकार लक्ष्य व्यक्ति के जीवन में जब कुछ खास देखता है, तभी वह उसे जीवनी के रूप में ढालने के लिए पे्ररित होता है। आम तौर पर लोगों का जीवन कमोबेश एक जैसा होता है। उनके दैनंदिन जीवन में कोई खास बात नहीं होती, लेकिन फिर भी मनुश्य मन के भीतर के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा जीवनकारों को जीवनी लिखने के लिए प्रवृत्त करती है। कथाकार अरुणप्रकाश के शब्दों में कहें तो ´´एक मनुष्य हर तरह का जीवन एक जन्म में नहीं जी सकता, इसीलिए वह दूसरों के जीवनानुभव में शिरकत करना चाहता है, क्योंकि वह यह भी जानता है कि रोजमर्रापन की पुनरावृत्ति के बावजूद हर मनुश्य में कुछ न कुछ विशिश्ट होता है। हर जीत और हार का रंग अलग-अलग होता है और रंग एक भी हुआ, तो रंगआभा अलग-अलग होती है।´´ दुनिया के सब लोगों की जीवनियां नहीं होती, और जिन लोगों के जीवनियां लिखी जाती हैं वे खास होते हैं। उनका जीवन समृद्ध और खास, मतलब लीक से हटकर होता है। वे पारंपरिक जीवन से हटकर अपने जीवन में कुछ ऐसा नया जोड़ते हैं, जो दूसरों के दैनंदिन जीवन से अलग और खास होता है।

आम तौर पर जीवनी में किसी व्यक्ति का संपूर्ण जीवन होता है, पर इसके अपवाद भी मिलते हैं। अक्सर जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को जीवनी के दायरे में लेता है। वह उसके जन्म और जन्म से पहले की परिस्थितियों से आरंभ करता है और क्रमश: उसके निधन और बाद के हालतों तक जाता है। इस तरह उसका लक्ष्य अपने चरित नायक के संपूर्ण जीवन की पुनर्रचना होता है। लेकिन यह कोई नियम नहीं है। जीवनी कई बार लक्ष्य व्यक्ति के जीवन काल में लिखी जाती है, तब उसमें संपूर्ण जीवन की पुनर्रचना संभव नहीं होती। कभी-कभी लक्ष्य व्यक्ति के जीवन का कोई भाग या खंड भी जीवनी का रूप ले लेता है। आरंभिक दौर में जीवनियों में व्यवस्था और अनुशासन होता था। जीवनीकार व्यक्ति के समग्र जीवन को रूपायित करते थे, लेकिन अब हालात बदल गए है। जीवनीकार अब लक्ष्य व्यक्ति के जीवन की पुनर्रचना में स्वच्छंद रहते हैं। वे व्यक्ति के जीवन के किसी एक या एकाधिक खंडों और पहलुओं को जीवनी का आधार बनाते हैं। नयी जीवनियों में लक्ष्य व्यक्ति का जीवन भी क्रमश: विकसित नहीं होता। अब कई जीवनीकार व्यक्तित्व को पहले प्रस्तुत कर फिर घटनाओं के संस्मरणों से उसे पुश्ट करते हैं। स्पष्ट है कि जीवनी में संपूर्ण जीवन आए, ऐसा कोई नियम नहीं है। यह जीवनीकार की दृष्टि और विवेक पर निर्भर है कि वह लक्ष्य व्यक्ति के जीवन से क्या ले और क्या छोड़ दे।

जीवनी में वस्तुपरकता बहुत आवश्यक तत्त्व है। जीवनी इस कारण इतिहास के निकट लगती है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन को तथ्यों को आधार पर गढ़ता है। तथ्यों पर निर्भरता ही जीवनी को विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाती है। अन्य साहित्यिक विधाओं में कल्पना का सहारा लिया जा सकता है, लेकिन जीवनी में वस्तुपरकता के बिना काम नहीं चलता। वस्तुपरकता तथ्यों से आती है इसलिए तथ्यों की अवहेलना या उनके साथ छेड़छाड़ से जीवनी की प्रमाणिकता संदिग्ध हो जाती है। कथाकार अरुणप्रकाश के अनुसार ´´वस्तुपरकता ही अच्छी जीवनी का सबसे बड़ा निकश है, जिसका निर्वहन प्रमाण, तर्क और प्रस्तुति में संतुलन के जरिए किया जाता है।´´ यह सही है कि जीवनी कुछ हद तक इतिहास है और उसकी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के लिए वस्तुपरकता जरूरी है, लेकिन अंतत: जीवनी एक साहित्य रूप है इसलिए इसे नीरस नहीं होना चाहिए। जीवनी में कुछ अंश तक कल्पना या कथातत्त्व भी चाहिए, लेकिन यह तथ्य के इदगिर्द ही रहे, तो अच्छा है। तथ्य जीवनी की रीढ है, लेकिन ´´केवल तथ्य किसी चरित नायक को जीवंत नहीं बना सकते। बल्कि कोरे तथ्य जीवनी को उबाउ बनाएंगे। इसके लिए जीवनीकार कुछ तथ्यों को छोड़ता ही नहीं, तथ्यों के अंबार में से सटीक तथ्य चुनता भी है। वह तथ्यों के क्रम में भी हेर-फेर करता है।´´

जीवनी में चरित्र-चित्रण का बहुत महत्व है। जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के अंतर्बाह्य, दोनों रूपों को उजागर करता है। यह आवश्यक है कि जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के शरीर, मुद्रा आदि के साथ उसमें अंतर्निहित भय, उर्जा, उल्लास और अवसाद को भी चित्रित करे। जीवनी में चरित्र का क्रमिक विकास होता है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के विभिन्न चरणों का क्रमश: इस तरह से वर्णन करता है कि उसका चरित्र निरंतर विकसित होकर अपनी अंतिम परिणति तक पहुंचता है। जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति की चारित्रिक विशेशताओं की केवल नामोल्लेख नहीं करता। वह घटनाओं के वर्णन से इन चरित्रिक विशेशताओं को उजागर करता है। पहले जीवनियां केवल महान् और सकारात्मक चरित्रों की लिखी जाती थी और जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति की लघुता और दोशों पर नहीं जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। जीवनीकार अब महानता के झांसे में नहीं आता, वह चरित नायक का शिकार करता है। आस्कर वाइल्ड ने जीवनीकारों के दृष्टिकोण में आए इस बदलाव की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि ´´पहले हम अपने नायकों को मानक बनाकर पेश किया करते थे। आधुनिक तरीका उन्हें अश्लील सिद्ध करने का है।´´ जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के चरित्र निर्धारण में कभी-कभी मनोविश्लेशण का तरीका काम में लेता है। शरतचंद्र के जीवन पर आधारित आवारा मसीहा में विष्णु प्रभाकर कहीं-कहीं ऐसा ही करते हैं।

स्व विवेक और स्वेच्छा से लिखी गई जीवनियां दबाव से लिखी गई जीवनियों की तुलना में अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय होती हैं। मध्यकाल और उससे पहले राजा, सामंत आदि अपने आश्रित रचनाकारों से अपनी प्रशस्तिपरक जीवनियां लिखवाते थे। यह काम लोभवश दबाव में होता था, इसलिए इनमें सच्चाई कम, अतिरंजना ज्यादा होती थीं। रासो और चरित रचनाएं इसी श्रेणी की रचनाएं हैं। स्व विवेक या स्वेच्छा से लिखी रचनाएं भी मध्यकाल और उससे पहले की कई हैं और इनका सम्मान भी खूब होता है। नाभादास की भक्तमाल ऐसी ही रचना है, जो मध्यकालीन संत-भक्तों के जीवन के संबंध में आधारभूत सामग्री उपलब्ध करवाती है। दबाव में जीवनी लिखने का काम अभी भी जारी है। राजनेता, उद्योगपति, क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म अभिनेता आदि की जीवनियां स्वविवेक से कम, दबाव में अधिक लिखी गई हैं।

लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के संबंध में जानकारी के स्रोत जितने ज्यादा और विविध होंगे, जीवनी उतनी ही असरदार बनेगी। जीवनीकार अक्सर इस संबंध में प्रकाशित अन्य पुस्तकों और लेखों का सहयोग लेता है। वह लक्ष्य व्यक्ति की डायरी, पत्राचार आदि का भी उपयोग करता है। वह उसके मित्र-परिचितों से साक्षात्कार-भेंट करता और उससे संबंधित नगरों-स्थानों आदि का भ्रमण करता है। यह लक्ष्य व्यक्तित्व पर निर्भर करता है कि उससे संबंधित सामग्री कहां मिलेगी। राजनीतिक व्यक्तित्वों का जीवन सार्वजनिक होता है इसलिए उनसे संबंधित दस्तावेज खूब मिल जाते हैं। गांधी- नेहरू के जीवन के संबंध में हमारे यहां दस्तावेज खूब मिलते हैं। साहित्यकारों का जीवन रहस्यमय होता है और उनके व्यक्तिगत जीवन के संबंध में जानकारियां कम मिलती हैं। जीवनीकार से यह अपेक्षित है कि वह अपनी स्रोत सामग्री का इस्तेमाल बहुत ध्यानपूर्वक करे। इसमें अनेक मोन सत्य और मुखर झूठ भरे होते है, जिनकी निर्ममता से छानबीन बहुत जरूरी है। अमृतराय ने कलम का सिपाही और विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा में स्रोत सामग्री की छानबीन और शोध बहुत अच्छी तरह से की। इसका उपयोग भी इन्होंने बहुत कौशल और रचनात्मक ढंग से किया है।

पश्चिम में जीवनी लेखन और उसकी स्वीकार्यता को लेकर हमेशा से माहौल उत्साह का रहा है, जबकि हमारे यहां इस संबंध में शुरू से ही गहरी उदासीनता है। विद्वान इसका कारण हमारी अलग संस्कृति को मानते है। दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दिलचस्पी अंग्रेजी समाज में पागलपन की हद तक है, जबकि भारतीय एक-दूसरे के निजी जीवन में ताकझांक को गलत मानते हैं। इसके अलावा भारतीय समाज मिथक-विदग्ध समाज है। इतिहास में उसकी दिलचस्पी बहुत कम है और जीवनी मिथक नहीं, इतिहास है। रासो और चरित रचनाओं को छोड़ दें तो हिंदी में जीवनी लेखन की शुरुआत उपनिवेशकाल में हुई। कार्तिक प्रसाद खत्री ने 1893 में मीराबाई का जीवन चरित्र लिखा। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पूर्व आधुनिक कालीन साहित्यकारों और धर्माचार्यों की जीवनियां लिखीं। इस युग को दो जीवनीकारों, रमाशंकर व्यास और देवीप्रसाद मुंसिफ का इस क्षेत्र में योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। व्यास ने भारतेंदु की साहित्यिक जीवनी लिखी, जबकि मुंसिफ ने मीरा, रहीम और सूरदास के अलावा बाबर, हुमायुं, शेरशाह, अकबर, राणा सांगा, बीकाजी, जैतसी, मानसिंह आदि की जीवनियां लिखीं। देवीप्रसाद मुंसिफ ने लगभग तीस जीवनियां लिखीं, लेकिन आलोचकों ने उनको कभी अपनी निगाह में नहीं लिया। हिंदी समाज में जीवनी को लेकर उदासीनता इस हद तक है कि साहित्यिक दृष्टि से मूल्यवान जीवनियां यहां कुल चार-पांच ही लिखी गई हैं। नवजागरणकालीन साहित्यकारों-प्रेमचंद, सुमद्राकुमारी चौहान और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पर क्रमश: अमृतराय की कलम का सिपाही, सुधा चौहान की मिला तेज से तेज और रामविलास शर्मा की निराला की साहित्य साधना नामक जीवनियां ही साहित्यिक महत्व की हैं। गहरी संबद्धता और मनोयोग से लिखी ये जीवनियां इन युगांतरकारी साहित्यकारों के जीवन और साहित्य की हमारी समझ को विस्तृत और गहरा करती है। विख्यात बंगला साहित्यकार शरतचंद्र के नाटकीय और घटनापूर्ण जीवन पर एकाग्र विष्णु प्रभाकर की आवारा मसीहा और कवि आलोचक मुक्तिबोध के जीवन संघर्ष पर आधारित विष्णुचंद्र शर्मा की मुक्तिबोध की आत्मकथा भी ऐसी ही उल्लेखनीय रचनाएं है।