Tuesday 22 June 2010

नागार्जुन और उनकी यायावर कविता


अपनी धर्मपत्नी
आदरणीया श्रीमती
अपराजिता देवी के
चंद लफ्जों के मुताबिक
‘हम तो आज तक
इन्हें समझ नहीं पाए!’
नागार्जुन के व्यक्ति और कवि के संबंध में उनकी पत्नी की यह टिप्पणी अक्षरशः सही है। किसी को समझने के लिए कोई पहचान बनानी पड़ती है- इसके लिए तुलना सामान्यीकरण और वर्गीकरण करना पड़ता हैं, लेकिन नागार्जुन का जीवन और कविता इसकी अनुमति नहीं देते। उनकी कोई पहचान बनाना बहुत मुश्किल काम है- वे अपनी कोई पहचान बनने ही नहीं देते। वे इसके बनने से पहले ही इसको ध्वस्त करके आगे निकल जाते हैं। उनके जीवन और कविता में इस निरंतर विचलन और अस्थिरता के कारण इतना वैविध्य, विस्तार और विषमता है कि उनको किसी सामान्यीकरण में बांधा ही नहीं जा सकता। अपने को ध्वस्त करने और फिर इसको लांघ कर आगे बढ़ जाने की इस आदत के कारण नागार्जुन की कविता में जीवन की ऐसी समृद्धि और विविधता संभव हुई है, जो हिन्दी कविता में अन्यत्र दुर्लभ है।

नागार्जुन का जीवन सामान्य नहीं था। उसमें जन्म, स्थान, जाति व्यवसाय आदि कोई संस्कार जम ही नहीं पाया। वे अपने बचपन के ठक्कन मिसर को ध्वस्त कर वैद्यनाथ मिश्र हुए, लेकिन उनकी यह पहचान भी दीर्घकालीन नहीं हुई। वे इसको ध्वस्त कर यात्री और नागार्जुन हुए, लेकिन इसको लांघने में भी उनको ज्यादा समय नहीं लगा। जन्म उनका मिथिलांचल के दरभंगा जिले के तरौनी गांव में हुआ। पिता गोकुल मिश्र विधुर थे और वे अपने इस मातृहीन बालक को कंधे पर बिठा कर रिश्तेदारों में यहां-वहां डोलते रहते थे। उनकी यह यायावरी ही संस्कार के रूप में बाल ठक्कन मिसर के मन-मस्तिष्क में स्थायी रूप से जम गई। आरंभिक संस्कृत शिक्षा उनकी गांव में ही हुई। वे मेधावी थे और ऐसे बच्चों को मिथिलांचल में सम्पन्न गृहस्थों द्वारा अपने आश्रय में रखकर पढ़ाने का रिवाज था, इसलिए ढक्कन मिसर की आगे की शिक्षा मधुबनी जिले के गनौली गांव के संपन्न गृहस्थ रघुनाथ झा के यहां हुई। अपने ठक्कन मिसर को पीछे छोड़ कर पंडित वैद्यनाथ मिश्र बनने के लिए वे बनारस गए। यहां उन्होंने पांडित्य की पारंपरिक शिक्षा के साथ साहित्य के संस्कार भी अर्जित किए। यह उनके मिथिला की परंपरा और ज्ञान से परिपूर्ण वैदेह बनने का दौर था, लेकिन इस दौरान ही उनके भीतर यात्री-नागार्जुन भी उग रहा था। धीरे-धीरे उनका यही रूप बड़ा होकर उनके वैद्यनाथ मिश्र पर भारी पड़ने लगा। बनारस से वे कलकत्ता गए। यहां वे आर्य समाज और बौद्ध दर्शन से प्रभावित हुए। बाद में बौद्ध दर्शन के प्रति उनका झुकाव बढ़ता ही चला गया। राहुल सांस्कृत्यायन इस दौर में उनके आदर्श थे। वे भ्रमण करते हुए दक्षिण भारत पहुंचे और यहां से श्रीलंका चले गए। यहां के विख्यात बौद्ध विहार विद्यालंकार परिवेण में पहले उन्होंने अध्यापन किया और बाद में बौद्ध धर्म दीक्षित हो गए। यहां रहकर उन्होने बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया। यहीं उन्होंने संस्कृत, सिंहली, पालि, हिंदी आदि भाषाओं में भी महारत हासिल की। यहां उनका नया नामकरण नाजार्जुन हुआ। यह उनकी नई पहचान थी, लेकिन नागार्जुन ने इसको भी स्थायी नहीं होने दिया। सहजानंद सरस्वती के आह्वान पर अंग्रेजी राज और जमीदारों विरुद्ध चलने वाले किसानों के संघर्ष में सहभागी होने के लिए वे बिहार लौट आए। उन्होंने भिक्षु वेश छोड़ दिया और फिर से और गृहस्थ हो गए। लेकिन गृहस्थ, मतलब पुत्र, पति और पिता वे सही मायने में कभी नहीं हुए। उनमें गृहस्थ का अभिभावक भाव विकसित ही नहीं हुआ। वे तरौनी-दरभंगा-पटना-कलकत्ता-इलाहाबाद-बनारस-जयपुर-विदिशा-दिल्ली-जहरीखाल और न जाने कहां-कहां की यात्राएं करते रहे, यहां-वहां होने वाले जनांदोलनों में भाग लेते रहे और क्भी-कभार जेल भी जाते रहे। अपने घर-परिवार के लिए वे हमेशा दुर्लभ रहे। उनके बेटे शोभाकांत के अनुसार “कभी-कभी लगता है कि इस बहुआयामी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के भीतर शायद एक ऐसा सेल है, जिसके भीतर वैद्यनाथ मिश्र को बंद कर दिया गया हो और एक भारी-भरकम ताला डाल दिया गया। उस ताले की चाभी फक्कड़ नागार्जुन अपनी यात्रा के क्रम में कहीं रखकर भूल गए हैं।” नागार्जुन जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी शामिल हुए। उन्होंने कहा कि “सत्ता प्रतिष्ठानों की दुर्नीतियों के विरोध में एक जनयुद्ध चल रहा है, जिसमें मेरी हिस्सेदारी सिर्फ वाणी की ही नहीं कर्म की हो, इसीलिए मैं आज से अनशन पर हूं, कल जेल भी जा सकता हूं।” लेकिन इससे भी उनका जल्दी ही मोहभंग हो गया। आगे चलकर उनको यह आंदोलन खिचड़ी विप्लव लगा और इसमें अपनी भागीदारी पर उनरको ग्लानि हुई। उन्होंने इस संबंध में लिखा कि खिचड़ी विप्लव देखा हमने/हमने क्रांति विलास। इस तरह वे आजीवन अपनी पहचान लांघते रहे। वे किसी के भी और कहीं के नहीं हुए। अपने संबंध में सही लिखा कि कहां नहीं हूं,/ कौन नहीं हूं/जहां चाहिए वहां मिलूंगा/-सबके लेखे सदा सुलभ मैं।

नागार्जुन के व्यक्ति की तरह उनके कवि ने भी आजीवन अपनी कोई एकरूप पहचान नहीं बनने दी। अपने संबंध में धारणा बनाने वालों को नागार्जुन का कवि अंगूठा दिखाकर हमेशा आगे निकल गया। उनकी कविता इतनी अलग और इतनी विविध है कि कविता के खेमेबाजोंजों को उसके बारे में राय कायम करने में हमेशा असुविधा हुई। खेमेबाज आलोचकों ने उसके बारे में धारणाएं बनाईं, उसको ऐसी या वैसी बताया, लेकिन नागार्जुन ने हमेशा नया कुछ करके सबको झुठला दिया। उनकी विख्यात कविता ‘प्रतिबद्ध’ कि पंक्तियां प्रतिबद्ध हूं/ संबद्ध हूं/ आबद्ध हूं......... जी हां, शतधा प्रतिबद्ध हूं पढ़कर लहालौट होने वालों को उन्होंने यह कह कर चौंका दिया कि तुमसे क्या झगड़ा है/ हमने तो रगड़ा है/ इनको भी, उनको भी, उनको भी, उनको भी! /दोस्त है, दुश्मन है/खास है, कामन है/ छांटो भी, मीजो भी/ धुनको भी! उन्होंने कलावादियों को भी जम कर धोया। एक जगह उनके बारे मे उन्होंने लिखा कि सर्वतंत्र स्वतंत्र, निर्लिप्त-निरंजन कलाकार/अंतरतर के प्रति सर्वथा ईमानदार। बड़ी-बड़ी तनखाह, प्रचुरतम रायल्टी/ एकमात्र शाश्वत सत्य के प्रति लायल्टी/बाकी सब ठीक है। उन्होंने वामपंथियों की भी बखिया उधेड़ी। उन्होंने लिखा कि क्रांति दूर है सच सच बतला/ बुद्धू, तुझको क्या दिखता र्है/ आ तेरे को सैर कराऊं/ घर में घुसकर क्या लिखता है। उनके यहां मार्क्स, लेनिन, ट्राट्स्की, अरविन्द आदि सब हैं, लेकिन सच केवल वही है जो उन्होंने देखा है, जिसके वे साक्षी है। उनका सच इसका या उसका सच नहीं है। यह उसके या इसके दबाव या लाग-लपेट में कहा गया सच नहीं है। यह कबीर की तरह साफ और दो टूक अनभै सांचा है। वे साफ कहते हैं कि जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं।/ जन कवि हूं मैं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं?“

जीवन में यायावरी कुछ हद तक नागार्जुन की व्यक्ति की सीमा समझी जाएगी, लेकिन कविता में तो यह उनकी ताकत है। इस यायावरी ने उनकी कविता की भावभूमि को असाधारण ढंग की विविधता और समृद्धि दी है। निराला के बाद नागार्जुन की कविता में पहली बार इतनी विषम भावभूमियों का एक साथ सफल निर्वाह दिखाई पड़ता है। नामवरसिंह के शब्द उधार लेकर कहें तो “विषम इतनी कि इस ऊंची-नीची भूमि में समतल आंखों की अभ्यस्त आंखें अकसर धोखा खा जाती है।” खास बात यह है कि इन विषम भावभूमियों पर आवाजाही में नागार्जुन कहीं भी असहज नहीं लगते। यह उनकी कविता ही है जिसमें एक साथ, दुख, संताप और संघर्ष भी है और रूप, रस और गंध भी है। वे मुग्ध और अभिभूत होते हैं और फिर इस पर पश्चाताप भी करते हैं। जीवन की ऐसी सहज और स्वाभाविक उठापटक हिंदी कविता में अन्यत्र दुर्लभ है। जीवन ही नहीं इसको धारण करने वाली नागार्जुन की भाषा के भी कई रंग और कई धरातल हैं। एकाधिक भाषाओं की जानकारी से उनकी कविता में अलग प्रकार की समृद्धि आई है। में उस्में संस्कृत से लगाकर ठेठ देशज शब्दों का सहज और अर्थपूर्ण इस्तेमाल मिल जाएगा। छंद भी उन्होंने कई इस्तेमाल किए।

नागार्जुन निरंतर चले- यायावरी उनके जीवन और कविता का स्वभाव रही। न तो वे कहीं ठहरे और न ही उन्होंने अपना कोई पक्का ठिकाना बनाया। शायद उन्हें पता था कि ठहरने का मतलब है बीमार होना। उन्होंने अपने बेटे शोभाकांत को एक बार हंस कर इसीलिए कहा था कि ‘‘जब भी बीमार पड़ूं, तो किसी नगर के लिए टिकिट लेकर ट्रेन में बैठा देना, स्वस्थ हो जाऊंगा।”
डेली न्यूज के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग में 20 जून, 2010 को प्रकाशित

Thursday 4 March 2010

मीरा की स्त्री अस्मिता और भक्त छवि


उपनिवेशकाल में यूरोपीय विद्वानों की भारतीय इतिहास में दिलचस्पी भी उनकी अपने साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण और विस्तार का हिस्सा थी। भारतीय समाज में जब भी वर्चस्ववादी ताकतों का जोर बढ़ा, उनके विरुद्ध प्रतिरोध के स्वर भी यहाँ हमेशा मुखर हुए हैं, लेकिन इन साम्राज्यवादी-प्राच्यवादी यूरोपीय विद्वानों ने इनको कोई महत्त्व नहीं दिया। मध्यकालीन में सामंती व्यवस्था और पितृसत्तात्मक विचारधारा के अधीन स्त्रियों के लैंगिक दमन और शोषण के विरुद्ध मीरा के आजीवन संघर्ष को ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टॉड ने इसी मुहिम के तहत अपने यथार्थ से काटकर पेश किया है। उन्होंने योजनाबद्ध रूप से मीरा की एक ऐसी कुलवधू पवित्रात्मा और रहस्यवादी संत-भक्त स्त्री छवि निर्मित की है, जिसकी ऐतिहासिक तथ्यों और उसकी कविता के अंतर्साक्ष्यों से पुष्टि नहीं होती। दरअसल भक्ति मीरा के यहाँ लैंगिक दमन और शोषण के विरुद्ध स्त्री के निरंतर संघर्ष की युक्ति मात्र है। मीरा की कविता में संत-भक्तों से अलग एक पीड़ित-वंचित स्त्री का दु:ख और असंतोष इतना मुखर है कि यह उसकी निर्मित छवि को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है।

“भक्ति आंदोलन का मूल आधार भगवान विष्णु और उनके अवतारों, राम और कृष्ण की भक्ति थी। किंतु यह शुद्धत: एक भक्ति आन्दोलन नहीं था। वैष्णवों के सिद्धान्त मूलत: उस समय व्याप्त सामाजिक-आर्थिक यथार्थ की आदर्शवादी अभिव्यक्ति थे। संस्कृति के क्षेत्र में उन्होंने नवजागरण का रूप धारण किया। सामाजिक विषयवस्तु में वे जातिप्रथा के आधिपत्य और अन्यायों के विरुद्ध अत्यंत महत्त्वपूर्ण विद्रोह के द्योतक थे।” विख्यात समाज दार्शनिक के. दामोदरन का यह कथन संपूर्ण मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के संबंध
में है लेकिन उसमें भी मीरा की कविता के संबंध में तो यह अक्षरश: सही है। मीरा की कविता केवल भक्ति की कविता नहीं है-यह भक्ति से पहले सामंती मर्यादा और दमन के विरुद्ध एक सामान्य स्त्री के विद्रोह की लौकिक अभिव्यक्ति है।

मीरा के जीवन काल में भक्ति को लौकिक स्वीकृति मिल गई थी और लोकजीवन में इसकी महिमा भी बहुत थी। सामंती मर्यादा और दमन के विरोध के लिए जाने-अनजाने मीरा के बचपन के भक्ति संस्कार उसके वैवाहिक और विधवा जीवन के अंतिम लक्ष्य बन गए। एक असहाय और पीड़ित-वंचित स्त्री का विद्रोह भक्ति के हठ में बदलकर लोक में स्वीकार्य और मान्य हो गया। सामंती दमन से त्रस्त जनसाधारण के लिए यह हठ असाधारण और आकर्षक था। उन्हें इसमें अपनी दमित आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति होती लगी। इस कारण जनसाधारण में मीरा की लोकप्रियता बढ़ती गई। मीरा जहाँ भी गई लोगों ने उसको आँखों पर बिठाया। जीवनकाल में ही उसके पद जनसाधारण की जबान पर चढ़ गए होंगे। मीरा का विद्रोह भक्ति की युक्ति और भाषा में था, इसके दमन के लिए सामंती तौर-तरीके व्यर्थ थे, जो प्रयुक्त किए उसका कोई खास नतीजा नहीं निकला और जनरोष भड़कने की आशंका भी सामंतों के मन के मन में जरूर रही होगी। इन सब कारणों से मीरा का साहस बढ़ता गया। यहाँ तक कि वह निर्भय होकर राणा को चुनौती देने की हैसियत में आ गई। अपने राणा को ललकारते हुए कहा कि राणाजी थें क्यांने राखो म्हां सूं बैर/थें तो म्हाने एड़ा लागों ज्यूं ब्रिच्छन में कैर। यही नहीं, उसने राणा को मूर्ख कहने में संकोच नहीं किया। उसने साफ कहा कि मूरख जण सिंघासण राजा, पंडित फिरतां द्वारां। मीरा की कविता का मूल्यांकन किसी भी तरह से हो, यह बात अनदेखी नहीं की जाना चाहिए कि उसमें भक्ति की युक्ति और भाषा में एक सामान्य स्त्री अपने समय की सबसे बड़ी सत्ता को चुनौती देने और ललकारने की हैसियत में है।

यह सही है कि भक्ति के संस्कार मीरा में बचपन से थे। मेड़ता, जहाँ उसका लालन-पालन हुआ, वैष्णव भक्ति का केन्द्र था। भक्ति के परिनिष्ठित रूप का विस्तार तो मेड़ता में नहीं था, लेकिन विभिन्न मत-मतांतरों से के योग से बनी लोकभक्ति की गतिविधियाँ वहाँ आम थीं। मीरा की शिक्षा के लिए पंडित का प्रबंध भी था। साक्ष्य कहते हैं कि ब्याह के बाद यही पंडित उसके साथ चित्तौड़ भी गया। मीरा के कुल में लोकदेवताओं की भी परंपरा थी। यदि मीरा केवल इस पृष्ठभूमि और इन संस्कारों के साथ चित्तौड़ जाती तो उसके लिए सधवा और विधवा, दोनों स्थितियों में जीवन निर्वाह आसान था। मेवाड़ में सामंती मर्यादा की चारदीवारी के भीतर रहकर स्त्रियों को भक्ति, मतलब सत्संग और पूजापाठ की अनुमति थी। भक्तिमति बहू पाकर मेवाड़ और गौरवान्वित ही महसूस करता, लेकिन वस्तुस्थिति इससे भिन्न थी। मीरा के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा जरूर था, जो मेवाड़ की मर्यादा के चौखट में नहीं आया। दरअसल मीरा को अनमनीयता और स्वच्छंदता के संस्कार भी मेड़ता से ही मिले। मेड़ता मेवाड़ की तरह सुस्थापित राज्य नहीं था-वहाँ मेवाड़ की तुलना में स्वच्छंदता थी, राजा-प्रजा का भेद बहुत ध्यानाकर्षक नहीं था और स्त्रियों के लिए परंपरागत विधि निषेध भी बहुत सख्त नहीं थे। मीरा जब विवाहित होकर आई तो चित्तौड़ को उसका वह अनमनीय और स्वच्छंद व्यक्तित्व सहन नहीं हुआ। उसके वैवाहिक जीवन में इस कारण मुश्किलें बढ़ गईं। विधवा होने के बाद तो हालात और बिगड़ गए। सास, ननद, देवर, जेठ सब उसके विरोधी हो गए। राड़ और झगड़े बढ़ गए और उस पर पाबंदियाँ लगा दी गईं। मीरा कहती है-सास लड़ै मेरी ननद खिजावै, राणा रह्या रिसाय। पहरो भी राख्यो, चौकी बिठायो, तालो दियो जड़ाय। अनमनीय और स्वच्छंद व्यक्तित्व वाली मीरा ने विद्रोह कर दिया, उसने लोकलाज छोड़ दी। उसने कहा-लोक लाज कुल रां मरजादां, जग री एक न मानां री। खास बात यह है कि अपने विधवा जीवन के आरंभ में मीरा विख्यात भक्त नहीं रही होगी, इसलिए उसका लोकलाज को पानी की तरह बहा देने का विद्रोह सामंती विधि-निषेधों से त्रस्त एक सामान्य स्त्री का विद्रोह ही समझा जाना चाहिए।

मीरा की कविता में वैयक्तिक जीवन बहुत मुखर है। यदि मीरा भक्त है, तो फिर उसकी कविता में उसका वैयक्तिक जीवन मुखर और पारदशीZ नहीं होना चाहिए। भक्ति का जो लोकरूप मीरा के समय प्रचलित था, उसमें संत-भक्त अपने वैयक्तिक जीवन को लेकर बहुत आग्रही नहीं थे। वे अपनी रचनाओं में अपने संबंध में प्राय: मौन हैं-यह विनम्रतावश भी है और सांसारिक जीवन को असार समझने के कारण भी है। लेकिन मीरा की कविता में तो उसका वैयक्तिक जीवन और उसकी तमाम कटुताएँ भरी पड़ी हैं। वह संत-भक्त की तरह विनम्रतावश या सांसारिक जीवन के असार होने के कारण न तो इनकी अवहेलना करती और न इनको अनदेखा ही करती है। वह एक सामान्य स्त्री की तरह अपने जीवन के सभी चरणों की दु:ख-तकलीफों और कटुताओं को बार-बार याद करती है। मीरा के यहाँ संत-भक्तों की तरह तकलीफों का उदात्तीकरण भी नहीं है। मीरा तकलीफ को तकलीफ की तरह ही महसूस करती है और कहती है। मीरा का वैवाहिक जीवन मुश्किलों से भरा हुआ था। वह एक निहायत सामान्य स्त्री की तरह इन मुश्किलों का ब्यौरा पेश करती हुई कहती है-
सासरियो दुख घणा रे सासू नणद सतावै।
देवर जेठ कुटुम कबीलो, नित उठ राड़ चलावै।
राजा बरजै, राणी बरजै, बरजै सब परिवारी।
कुंवर पाटवी सो भी बरजै और सहैल्यां सारी।
जब ससुराल में मुश्किलें बहुत बढ़ीं तो मीरा एक सामान्य स्त्री की तरह अपने पीहर पक्ष को भी याद करती है। वह कहती है-म्हारे बाबो सा ने कहियो म्हाने बेगा लेबा आवे। मीरा चित्तौड़ से मेड़ता गई, लेकिन वहाँ पहुँचने के एक वर्ष बाद ही मालदेव के आक्रमण से मेड़ता छिन्न-भिन्न हो गया। ससुराल से प्रताड़ित अनाथ और निराश्रय भटकती मीरा की मार्मिक अंतर्व्यथा भी एक सामान्य स्त्री की अंतर्व्यथा ही ज्यादा है। वह कहती है-सगो सनेही मेरो न कोई, बैरी सकल जहान। एक जगह वह और कहती है-या भव में मैं बहु दुख पायो, संसा रोग निवार। मीरा अंतत: परेशान होकर द्वारिका चली गई। वह कहती है-सादां रे संग जाय द्वारका, मैं तो भज्या श्री रणछोड़। द्वारिका पहुँचकर श्रीकृष्ण में डूबने के बाद भी राणा के लिए उसके मन की कटुता कम नहीं हुई। अपना घर और देश छोड़ने की तकलीफ उसको वहाँ भी सालती रही। इसके लिए वह राणा को वहाँ भी कोसती रही। लोक में प्रचलित एक पद में मीरा अपने देश को एक सामान्य स्त्री की तरह राणा को कोसती हुई इस तरह याद करती है। वह कहती है-आंबा पाक्या, कलहर कैरी, निंबूडा म्हारे देस। उदपुर रा राणा किण विध छोड्यो देस, मेवाड़ी राणा कण पर छोड्यो देस। मतलब यह है कि आम पक गए होंगे, केरियाँ आ गईं होंगी। मेरे देश में तो केवल नींबू हैं। हे राणा! तू नहीं जानता क्या कि मैंने देश क्यों छोड़ा।

मीरा की कविता सामंती मर्यादा और दमन के विरुद्ध एक स्त्री के विद्रोह की सहज अभिव्यक्ति इसलिए भी लगती है कि उसमें तत्कालीन भक्ति साहित्य से भिन्न अभिव्यक्ति का खास लौकिक रूप उपलब्ध है। यह सही है कि संपूर्ण भक्ति आंदोलन की अभिव्यक्ति परिनिष्ठित अभिव्यक्ति से भिन्न थी। संत-भक्तों ने एक अलग और खास प्रकार का अभिव्यक्ति का विकास किया लेकिन साझा अनुभव और संवाद के कारण धीरे-धीरे इसका भी एक रूप स्थिर हो गया। कुछ अभिव्यक्ति रूपों की आवृत्तियाँ होने लगीं। कबीर की अभिव्यक्तियों में सिद्धों और नाथों की, तो परवर्ती संत कवियों में कबीर की अभिव्यक्ति रूपों की आवृत्ति साफ दिखाई पड़ती है। भक्ति आंदोलन के बीच होकर, भक्तों-संतों के निरंतर संसर्ग और सानिध्य के बावजूद मीरा की अभिव्यक्ति अलग और खास प्रकार की है। यह एक संत भक्त की अभिव्यक्ति से भिन्न एक स्त्री की अभिव्यक्ति है। मीरा किसी संत-भक्त की तरह स्थितियों का उदात्तीकरण नहीं करती। एक सामान्य स्त्री की तरह सीधी बात को सीधे ढंग से कहती है, जैसे-सीसोद्यो रूठ्यो म्हारो कांई कर लेसी या राणा जी थें जहर दिया, म्हे जाणी या ओ जी हरि कित गए नेह लगाय या राणा जी म्हाने बदनामी लागे मीठी आदि। मीरा एक क्षण के लिए भी यह नहीं भूलती कि वह स्त्री है। उसकी अभिव्यक्ति में इसलिए उसके स्त्री होने के संदर्भ बार-बार आते हैं, जैसे-फारूंगी चीर करूंगी गल कंथा, रहूंगी बैरागण होई री, चूरियां फोड़ूं मांग बिखेरूं, कजरा में डालूंगी धोई री। मीरा की अभिव्यक्ति में स्त्रियों की लोक कथन भंगिमाओं का भी भंडार है। मीरा की विख्यात पंक्ति है-पग बांध घूंघरा नाच्यां री/लोक कह्यां मीरा भई बावरी सास कह्या कुल नासी रे। एक और पंक्ति है-थैं मत बरजां माइ री, साधां दरसण जावां/स्याम रूप हिरदां मां बसां म्हारे ओर ना भावां। इसी तरह एक स्त्री सुलभ कथन भंगिमा है-माई म्हां लिया गोविंदो मोल/थे कह्यां छाने म्हा कां चौड़े, लिया री बजंता ढोल। मीरा स्त्रियों के खास त्योहार गणगौर को नहीं भूलती। यह भी उसकी अभिव्यक्ति का हिस्सा है। एक जगह वह कहती है-म्हानै गुरु गोविन्द री आण, गोरल ना पूजां। नहीं हम पूज्यां गोरज्या, नहीं पूजो अनदेव/परम सनेही गोविंदो, थें कांई जाणों म्हारो भेद।

मीरा का आचार-विचार भी उसके समय में सक्रिय और लोकप्रिय भक्त-संतों की तरह नहीं था। वह उस तरह भक्त-संत नहीं थी जिस तरह से कबीर, रैदास, तुलसीदास आदि थे। भक्ति की जटिलताओं और बारीकियों में वह नहीं जाती, भक्ति के शास्त्रसम्मत परिवर्तित रूप से भी वह अच्छी तरह से अवगत नहीं है, किसी संप्रदाय में भी उसको नहीं बांधा जा सकता ओर किसी गुरु से विधिवत भक्ति की दीक्षा लेने का भी कोई प्रामाणिक साक्ष्य उसके संबंध में उपलब्ध नहीं है। रैदास से कंठी लेने की बात एक-दो अंतसाZक्ष्यों में जरूर आई है, लेकिन कंठी लेने का रिवाज उस समय और बाद में जनसाधारण में भी प्रचलित था। भक्त-संत गृहस्थ जनसाधारण को भी कंठी देते थे। दरअसल मीरा एक सामान्य स्त्री की हैसियत से भक्ति के लोक प्रचलित रूप को ही जानती और अपनाती है। उसके लिए भक्ति का अर्थ है साधु-संतों का सानिध्य-संसर्ग, नियम से रोज चरणामृत ग्रहण करना, मंदिर जाना, कथा-कीर्तन सुनना और प्रसाद पाना। मीरा एक पर में कहती भी है-
राणाजी ! गिरिधर रा गुण गास्यां।
गुरु परताप साध की संगति, सहजै ही तिर जास्यां।।
म्हारै तो पण चरणामृत रो नित, उठ देवल जास्यां।।
कथा-कीरतन सुण निसि बासर महा प्रसाद ले पास्यां।।
सुनि-सुनि बचन साध रा मुख रा, निरत करां अर नाचां।।
प्रेम प्रतीति जाय निसी बासर, बहुरि न मौ जल आस्यां।।

मीरा अपने समय के विख्यात और लोकप्रिय भक्त-संतों से समान स्तर पर संवाद भी नहीं करती। मीरा के समय के ज्यादातर भक्त-संत अपने समानधर्माओं को संबोधित करते हैं। वे अपने अनुभवों और द्वंद्वों को अपने समानधर्माओं के सामने रखते हैं। कबीर कहते हैं-संतों भाई आई ज्ञान की आंधी या संतों सहज समाधि भली। धरमदास कहते हैं-नाम रस ऐसा है भाई। दादूदयाल कहते हैं-राम रस मीठा रे कोई पीवै साध सुजाण। इसी तरह रज्जब भी अपने समानधर्माओं को संबोधित करते हुए कहते हैं-संतों मगन भया मन मेरा या संतों, ऐसा यहु संसार। मीरा ऐसा नहीं करती। मीरा अपने अनुभवों और तकलीफ में अपनी सखी, सहेली को साझीदार बनाती है। मीरा की रचनाओं में इन्हीं का उल्लेख बारबार आता है। वह कहती है-आली री म्हारे नेणां बाण पड़ी या आली म्हानै वृंदावन लागै नीको। कभी वह कहती है-सखी म्हारी नींद नसाणी हो या विरह कथा कांसू कहूं सजनी या कांई करूं, कित जाऊं री सजनी या को है सखी सहेली सजनी पिया कुं आन मिलावै। मीरा की व्यथा चरम क्षणों में भक्त-संतों की नहीं, सामान्य औरतों की तरह अपनी मां को याद आती है। वह कहती है-मैं हरि बिन क्यूं जीऊं री माई।

मीरा की कविता में भावों का उतार-चढ़ाव भी भक्त-संतों जैसा नहीं है। यहाँ आद्यंत आम स्त्रियों की तरह का भावोद्वेलन है। मीरा आम स्त्रियों की तरह दुखी और आह्लादित दिखाई पड़ती है। वह उनकी तरह ही बेचैन होती है और प्रतीक्षा करती है। दु:ख के क्षणों में वह आम स्त्रियों की तरह चूड़ियाँ फोड़ती है और माँग बिखेरती है। बेचैनी के क्षणों में वह सामानय स्त्री की तरह कहती है-कल न परत पल हरि मग जोवत भई छमासी रैण। प्रतीक्षा भी वह बिलकुल आम स्त्रियों की तरह ही करती है। वह कहती है-तुमरै कारण सब सुख छांड़्या,अब मोहि क्यूं तरसावौ हो। आह्लाद के क्षणों में भी मीरा का तन-मन सामान्य स्त्री की तरह उमड़ता है। वह कहती है-
म्हारां औलगिया घर आया जी।
तन की ताप मिटी सुख पाया, हिलमिल मंगल गाया जी।
बंशी की धुनि सुनि मोर मगन भया, यूं मेरे आणंद छाया जी।
मगन भई प्रभु आपणा सूं, भौ का दरद मिटाया जी।
चंद कूं देखि-देखि कमोदणि फूलै, हरखि भयो मेरी काया जी।
मीरा सामान्य स्त्रियों की तरह ही लोकप्रवादों और कुचर्चाओं से आहत होती है। कुचर्चाएँ उसको फांस की तरह भीतर ही भीतर सालती है। वह कहती है-मीरां गिरिधर हाथ बिकानी, लोग कहे बिगड़ी। वह एक और जगह कहती है-लोग कह्यां मीरा भई बावरी, सास कह्यां कुलनासी री।

मीरा की कविता में संबंधों की विवृत्ति भी पूरी तरह मानवीय धरातल पर है। मीरा एक क्षण के लिए इसको अति मानवीय स्तर पर नहीं ले जाती। कृष्ण उसके लिए लौकिक सदगृहस्थ पति की तरह ही है। वह उसकी प्रतीक्षा भी उसी तरह करती है। उसका अभाव भी उसको सामान्य स्त्री की तरह खलता है और वह उसके आगमन की कल्पना पर भी सामान्य स्त्री की तरह प्रसन्न और आह्लादित अनुभव करती है। कहीं-कहीं तो संबंध का यह स्वरूप ग्रामीण पति-पत्नी संबंध जैसा लगता है। मीरा नाराज भी ग्रामीण सदगृहस्थ की तरह होती है और उलाहना भी उसी तरह देती है।

मीरा भक्ति-आन्दोलन के अन्य संत-भक्तों की तरह भक्तिमय नहीं है। यह सही है कि मध्यकाल में भक्ति का एक ऐसा लोक रूप विकसित हो गया जिसमें सभी मत-मतांतरों की कुछ चीजें शामिल थीं। भक्ति का यह लोकरूप मोटे तौर पर उदात्त मानवीय मूल्यों का हिमायती था। भक्ति आंदोलन में शामिल संतभक्त भक्ति के इसी रूप को मानते थे, लेकिन फिर भी आराध्य के स्वरूप और साधना के आधार पर इनका वर्गीकरण करना संभव है। विभिन्न मत-मतांतरों में विभाजन कर इनकी अलग-अलग पहचान भी की जा सकती है और की भी गई है। भक्ति आंदोलन के जो रूप लोकप्रिय हुए उनमें आगे चलकर शास्त्र की थोड़ी बहुत घुसपैठ भी मिल ही जाती है। कहीं-कहीं इनमें नया शास्त्र भी विकसित हो गया है। यह भी हुआ है कि कुछ संत-भक्त शास्त्र का विरोध करते-करते जड़ों की तलाश की कोशिश में फिर शास्त्र की शरण में भी पहुँच गए। लेकिन मीरा की कविता अपने समय के मत-मतांतरों से पूरी तरह से अप्रभावित और अलग रही। शास्त्र का आग्रह या मोह तो उसको छू भी नहीं गया है। यह भी इस बात का सबूत है कि यह एक भक्त से भिन्न, एक स्त्री के सामंती दमन और मर्यादा के विरुद्ध विद्रोह की सहज लौकिक अभिव्यक्ति है और इसने अपना अलग और सबसे अप्रभावित अलग रूप अख्तियार किया। मीरा की कविता में स्त्री के असहाय और अबला होने का तीव्र बोध है, अपने उत्पीड़न और दमन की तकलीफ है और इस भाव से मुक्त होने के लिए कृष्ण का पति रूप में वरण है। यह भक्ति का नया ढंग और पद्धति थी, जिसे एक पीड़ित-वंचित स्त्री ने अपने लिए अविष्कृत किया। यह ढंग उस समय चलन में नहीं था। यह परंपरा और शास्त्र में भी नहीं था, मीरां ने अपने स्त्रीत्व को सिद्ध करने के लिए इसे अपने जीवन संघर्ष के दौरान ही रचा और गढ़ा।

इस तरह मीरा के जीवन और काव्य के सभी अंत: और बहिर्साक्ष्य मीरा को आदर्श संत-भक्त की जगह, एक विद्रोही स्त्री की भूमिका में रखने वाले हैं। ये इस प्रकार हैं-
1.मीरा भारतीय समाज में स्त्रियों को पराधीन बनाने वाली पितृसत्तात्मक विचारधारा सामंतीव्यवस्था और धार्मिक विधि-निषेधों का उल्लंघन कर अपनी शर्तों पर जीवन यापन करती है।
2.मीरा अपने समकालीन भक्त-संतों से अलग है। उसकी भक्ति, भक्ति के प्रचलित या शास्त्रीय सांचे में नहीं अँटती। दरअसल मीरा ने अपनी लैंगिकता के दमन और शोषण के प्रतिरोध के लिए ही भक्ति का एक खास रूप गढ़ा है। मीरा का संवाद भी भक्तों से नहीं, अपनी समानधर्मा स्त्रियों से है।
3.संत-भक्तों से अलग मीरा की कविता में उसका वैयक्तिक जीवन बहुत मुखर है। संत-भक्त अपनी सांसारिक पहचान और वैयक्तिक जीवन के संबंध में मौन हैं, जबकि मीरा की कविता में उसका निजी जीवन संघर्ष, उसका अकेलापन, असुरक्षा, यातना आदि बार-बार आते हैं। सत्ता के प्रति नाराजगी और घृणा भी मीरा की कविता में बहुत मूर्त और प्रमुख है।
4.मीरा की अभिव्यक्ति पद्धति भी प्राय: एक सामान्य वंचित-पीड़ित स्त्री की है। उसमें भक्ति की जगह स्त्री जीवन की शब्दावली और मुहावरे का प्रयोग सर्वाधिक है।

समकालीन भारतीय साहित्य, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के अंक जनवरी-फरवरी, 2010 में प्रकाशित