Sunday, 18 February, 2018

भाषा से भाषा और भाषा में भाषा

(वागर्थ, फरवरी, 2018 में प्रकाशित आलेख)

विदेशी या बाहरी नज़रिये के अनुसार हमारा भाषायी परिदृश्य बहुत विचित्र है। यहाँ कहते हैं कि बारह कोस पर बोली बदलती है और यह सच है। हमारे यहाँ एक बोली के ही कई क्षेत्रीय रूप हैं। यहाँ बोलियाँ और भाषाएँ एक दूसरे से जुड़ी हुई भी हैं और कुछ मामलों में ये अलग भी हो जाती हैं। असमिया बंगला की एक बोली भी है और अलग भाषा भी है। हमारे प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की रचनाएँ भी एकाधिक भाषाओं में मिलती हैं। ये गुजराती में हैं, तो इनके राजस्थानी और ब्रज रूपांतरण भी मिलते हैं और यदि ये मराठी में हैं, तो ये गुजराती और अन्य भाषाओं में भी उपलब्ध हैं। स्थिति यह है कि इन कवियों की रचनाओं पर एकाधिक भाषाओं के लोग अपनी होने का दावा करते हैं। उपनिवेशकाल में भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण करने वाले जार्ज ग्रियर्सन को यह सब देख कर बड़ा अचंभा हुआ। सर्वेक्षण के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत सचमुच विरोधी तत्त्वों की भूमि है और भाषाओं पर विचार करते समय तो ये तत्त्व और भी दृष्टिगोचर होते हैं। ग्रियर्सन से पहले मध्यकाल में हुए अमीर ख़ुसरो और अबुल फ़जल, दोनों भारत में पैदा हुए थे, लेकिन यहाँ की भाषाओं के संबंध में उनका नज़रिया भी बाहरी था। अमीर ख़ुसरो के अनुसार यहाँ के प्रत्येक देश में, ऐसी विचित्र एवं स्वतंत्र भाषाएँ प्रचलित हैं, जिनका एक दूसरे से कोई संबंध नहीं है। इसी तरह अबुल फ़जल का भी मानना था कि हिन्दुस्तान के विस्तृत भूभाग में अनेक बोलियाँ बोली जाती हैं। इनमें पर्याप्त अंतर है तथा ये परस्पर बोधगम्य भी नहीं हैं।

भारतीय भाषाओं के ‘विविध’, ‘परस्पर अबोधगम्य’, ‘परस्पर विरोधी’ आदि होने संबंधी मध्यकालीन और उपनिवेशकालीन विदेशी अध्येताओं का यह नज़रिया ठीक नहीं है, लेकिन विडंबना यह है कि अब अधिकांश भारतीय अध्येताओं का नज़रिया भी यही हो गया है। यह नज़रिया बाहरी और विदेशी नज़रिया है। कोई भी विदेशी या बाहरी व्यक्ति अपने बुनियादी भाषायी संस्कार और आदत के कारण हमारी ख़ास ढंग की भाषायी स्थिति को इसी तरह देखेगा-समझेगा और इसी तरह के निष्कर्ष पर पहुँचेगा। जार्ज ग्रियर्सन के भारत प्रेम, भारत ज्ञान और वैदुष्य पर संदेह नही किया जा सकता। इस मामले में वे किसी भी देशी अध्येता से आगे हैं, लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा उनके संस्कार यूरोपीय थे और इस कारण समस्त ‘पूर्व’ के बारे में उनकी राय अच्छी और ऊँची नहीं थी। इसको लेकर उनके मन में कुछ पूर्वाग्रह थे। उनका आग्रह था कि आधुनिक भारत को पश्चिमी ज्ञान के प्रकाश में ही समझा जा सकता है। उन्होंने भारत के भाषा सर्वेक्षण के अपने निष्कर्षों में इस संबंध में जो राय ज़ाहिर की पश्चिम से अभिभूत हमारे ‘आधुनिक’ अध्येताओं ने उस पर ग़ौर ही नहीं किया। उन्होंने आग्रहपूर्वक इस लोकप्रिय कथन और धारणा को ख़ारिज़ कर दिया कि ‘प्रकाश पूर्व से आता है।’ उन्होंने लिखा कि प्रकाश पूर्व से आता है, किंतु अभी इसमें तथा उस काल्पनिक प्रभात में जो अभी आने वाला है पर आया नहीं है, अंतर स्पष्ट करने के लिए हमें ज्ञान की निरंतर खोज में अनेक वर्षों तक प्रवृत्त होना पड़ेगा। अब तक विद्वानों ने भारत की प्राचीन भाषाओं का तथा विचारधाराओं का ही अध्ययन किया है और उसी में आधुनिक भारत का भी रूप देखा है। किंतु भारत का वास्तविक ज्ञान हमें तब तक नहीं हो सकता जब तक हम पश्चिमी ज्ञान के प्रकाश में यहाँ की बत्तीस करोड़ जनता की आशा, भय और विश्वास का अध्ययन न करें। इसके लिए आधुनिक भाषाओं और बोलियों का सूक्ष्म ज्ञान आवश्यक है।ज़ाहिर है, जिस नज़रिये और आग्रह के साथ वे भारतीय भाषाओं के अध्ययन में प्रवृत्त हुए, वो सजग भाव से विदेशी और बाहरी था और उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले वे भारतीय भाषाओं की सही तस्वीर पेश नहीं करते। विडंबना यह है कि भारतीय भाषाओं के बारे में उनकी राय मान्य होकर अब हमारी समझ का हिस्सा हो गई है। अब हम अपनी भाषाओं के संबंध में उनके लगभग मान्य हो गए वर्गीकरण और विभाजन के साँचों-खाँचों में ही सोचते-समझते हैं।
  
भारतीय भाषाओं के परस्पर संबंध और वैशिष्ट्य को अपनी भाषा की आदत और संस्कारवाला बाहरी या विदेशी व्यक्ति अच्छी तरह नहीं समझ सकता, क्योंकि हमारे यहाँ सांस्कृतिक वैविध्य बहुत है और उसके अनुसार भाषा में क्षेत्रीय विशेषताओं की भी बहुतायत है। कई बार ये क्षेत्रीय विशेषताएँ इतनी अधिक मुखर और प्रमुख होती हैं कि इनसे भाषा के अलग होने भ्रम हो जाता है। जार्ज ग्रियर्सन, अमीर ख़ुसरो और अबुल फ़जल सहित कई विदेशी नज़रिये वाले लोगों को ऐसा भ्रम हुआ था। उन्होंने क्षेत्रीय सांस्कृतिक विशेषताओं को आधार मानकर भाषा को अलग होने का दर्ज़ा दे दिया, जबकि ऐसा था नहीं। कोई सामान्य भारतीय भी यह आसानी से समझ जाएगा कि उसकी भाषा उसके अपने इलाके से बाहर कुछ बदल तो जाएगी, लेकिन अलग नहीं होगी। उसे यह भी अच्छी तरह पता है कि अपने इलाके या ‘देश’ से बाहर भी उसे संवाद में कोई ख़ास असुविधा नहीं होगी। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति पूरे देश में हो। उन इलाकों में जहाँ किसी पहाड़ आदि की भौगोलिक बाधा या रेस से विभाजक बदलाव हो, तो भाषाएँ अलग भी होती हैं, लेकिन अधिकांश इलाकों में जहाँ संपर्क और संवाद की निर्बाध निरंतरता है, वहाँ एक ही भाषा बदलती हुई बहुत दूर तक जारी रहती है। कभी-कभी यह इतनी बदल जाती है कि एक छोर की भाषा दूसरे छोर पर जाकर अलग जैसी भी लगने लगती है। फ़ैजाबाद-सुल्तानपुर की अवधी ही आरा-बलिया-छपरा पहुँचकर भोजपुरी हो जाती है।
भारत का भाषायी वैविध्य ‘विचित्र’ के रूप में जिस तरह से प्रचारित है, यह दरअसल वैसा है नहीं। यह विचित्र हमें भाषायी वर्गीकरण और विभाजन की औपनिवेशिक समझ के कारण दिखाई पड़ता है। उपनिवेशकाल से पहले तक जब भारतीय भाषाओं को औपचारिक पहचान नहीं मिली थी, तब यहाँ का भाषायी परिदृश्य अलग था। यहाँ की भाषाएँ और बोलियाँ एक-दूसरे से इस तरह से संबद्ध थीं कि इनको पृथक् और वर्गीकृत करना कठिन था। भारत के भाषा सर्वेक्षण के दौरान जार्ज ग्रियर्सन को इसी तरह की मुश्किल का सामना करना पड़ा। उनसे पहले तक तो यूरोपीय विद्वान् एक-दूसरे से भिन्न चरित्र और स्वभाव वाली भारतीय भाषाओं की भी इनकी परस्पर संबद्धता के कारण सदियों तक कोई अलग पहचान नहीं बना पाए। लंबे समय तक शब्द समूह की समानता के आधार पर कतिपय दक्षिण भारतीय भाषाओं को भी संस्कृत से उत्पन्न माना जाता रहा। जार्ज ग्रियर्सन ने खींच-खाँचकर भारतीय भाषाओं का जो वर्गीकरण और विभाजन किया उससे पहली बार भाषाओं को एक-दूसरे से अलग पहचान मिली। विडंबना यह है कि खींच-खाँचकर कर किया गया वर्गीकरण और विभाजन तो हमारी भाषायी समझ का हिस्सा हो गया, लेकिन भारतीय भाषाओं की परस्पर घनिष्ठ संबद्धता संबंधी कई बातें जो सर्वेक्षण के दौरान सामने आईं, उन पर कम लोगों का ध्यान गया।
भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे से इस तरह जुड़ी हुई हैं कि वे एक-दूसरे से कहाँ और कैसे अलग होती हैं, यह तय करना मुश्किल काम है। ख़ास बात यह है कि यह बात इन भाषाओं की जीने और बरतनेवाला ही अच्छी तरह समझ सकता है। अकसर वे दूसरी भाषा की सीमा शुरू होने से पहले ही उसके जैसी होने लगती हैं। ग्रियर्सन ने भी सर्वेक्षण के दौरान यह महसूस किया। उन्होंने इसके प्रतिवेदन के पूर्व कथन में भारत में क्षेत्रीय भाषाओं की सीमाओं की चर्चा करते हुए लिखा कि ‘‘सामान्यतः जब तक विशेष रूप से जाति (रेस) एवं संस्कृति में अंतर न हो या बड़ा पहाड़ या प्राकृतिक बाधा उपस्थित न करे, तब तक भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं।’’ मीरां सहित कई प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की कविता की भाषा में गुजराती, राजस्थानी, ब्रज आदि अलग-अलग भाषाएँ नहीं हैं। ये एक ही भाषा के क्षेत्रीय रूप हैं, जो कुछ दूर चलकर एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। दरअसल इन कवियों की भाषा में एक ही भाषा के एक-दूसरे संबद्ध और एक-दूसरे में घुले-मिले क्षेत्रीय रूप हैं, जो अब औपनिवेशिक भाषायी समझ के कारण हमें अलग-अलग भाषाओं के रूप में दिखाई पड़ते हैं।
भाषा को अपनी क्षेत्रीय अस्मिता के साथ जोड़कर देखने का चलन यहाँ उपनिवेशकाल में शुरू हुआ। उपनिवेशकाल से पहले तक तो भारत में भाषा के क्षेत्रीय रूपों को पहचान देने का आग्रह लगभग नहीं था। संस्कृत के बरक्स प्राच्य प्राकृत की मौजूदगी के संकेत 400 ई. से मिलने लगते हैं। इसमें में भी क्षेत्रीय वैविध्य था। उद्योतन सूरि की आठवीं सदी की रचना कुवलयमाला के अनुच्छेद 242 में 18 बोलियों का क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ सोदाहरण नामोल्लेख हैं, लेकिन ख़ास बात यह है कि यहाँ ये पृथक् अस्तित्व वाली भाषाओं के रूप में उल्लिखित नहीं हैं। यहाँ भाषा एक है, लेकिन यह अलग-अलग क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ बोली जा रही है। भाषा में क्षेत्रीय वैशिष्ट्य होता है और यह यहाँ भी सदियों से है, लेकिन इस आधार पर अलग भाषा की पहचान और उसके नामकरण की सजगता यहाँ लगभग नहीं के बराबर थी। भाषाएँ यहाँ इस तरह एक-दूसरे से जुड़ी और एक-दूसरे में घुली-मिली थीं कि कि इनको अपनी अस्मिता के साथ जोड़ कर देखना संभव भी नहीं था। भारतीय भाषाओं को उनकी क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर पहली बार वर्गीकृत और विभक्त करने वाले जार्ज ग्रियर्सन ने भी भाषा के मामले में भारतीयों के इस ख़ास नज़रिये को लक्ष्य किया। उन्होंने सर्वेक्षण के अपने प्रतिवेदन के पूर्वकथन में एक जगह लिखा कि एक सामान्य भारतीय ग्रामीण यह नहीं जानता कि जिस बोली को वह बोल रहा है उस का नाम भी है। वह अपने यहाँ से पचास मील दूरी पर बोली जानेवाली बोली का नाम तो बता सकता है, किंतु जब उसकी बोली का नाम पूछा जाता है तो वह कह उठता है किओह, मेरी बोली का तो कुछ नाम नहीं है, यह तो विशुद्ध भाषा है। भारत में देशभाषा अथवा बोलियों की नाम संज्ञाओं को मान्यता और स्वीकृति उपनिवेशकाल में मिली। यहाँ के लोग अपनी भाषा को देशभाषा या बोली कहते थे या फिर दूसरे लोग उसका क्षेत्र के आधार पर कोई नाम कौशली, गुजराती आदि रख देते थे। हमारे उन प्राचीन और मध्यकालीन कवियों, जिनकी कविता की लोकप्रियता उतर भारत के बड़े भूभाग में थी, की अब यही विशेषताएँ मुखर होकर अस्मिता का हिस्सा हो जाने के कारण हमें अलग भाषाओं के रूप में दिखाई पड़ती हैं।
पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी के अधिकांश उत्तर भारतीय साहित्य को आज की राजस्थानी गुजराती, ब्रज भोजपुरी आदि भाषायी पहचानों में देखना गलत है। दरअसल पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में आज की प्रांतीय इकाइयों राजस्थान, गुजरात, उतरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार आदि में जो भाषा इस्तेमाल हो रही थी, वह कुछ क्षेत्रीय विशेषताओं को छोड़कर लगभग एक थी। जार्ज ग्रियर्सन ने भी उपनिवेशकाल में भाषाओं का वर्गीकरण और विभाजन तो किया, लेकिन वे इस सच्चाई से परिचित थे कि क्षेत्रीय भिन्नताओं के साथ तमाम उत्तर भारत में एक ही भाषा इस्तेमाल होती थी। सर्वेक्षण के दौरान वे भी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि राजपूताना, मध्यभारत तथा गुजरात के विस्तृत क्षेत्रों में दैनिक जीवन में व्यवहृत शब्द एवं शब्द समूह प्रायः समान है। हाँ, उच्चारण में अंतर अवश्य है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है और सामान्य लोगों का विश्वास भी यही है कि गंगा के समस्त कांठे में, बंगाल और पंजाब के बीच, अपनी अनेक स्थानीय बोलियों सहित केवल एक मात्र प्रचलित भाषा हिन्दी ही है। इस भाषा की अलग-अलग और स्पष्ट क्षेत्रीय पहचानें बहुत बाद में विकसित हुईं। गुजराती साहित्य के एक विशेषज्ञ आई.जे.एस. तारपुरवाला ने पंद्रहवीं-सोलहवीं सदीं की संत-भक्त कवयित्री मीरां की कविता के भाषिक वैविध्य के कारणों की बहुत युक्तिसंगत पड़ताल की है। उनके अनुसार ''मीरां पर गुजरात, राजपुताना और पूरा मथुरा क्षेत्र अपना दावा करता है, लेकिन जिस समय में वह जी रही थी, उस समय इन क्षेत्रों में केवल एक ही भाषा-पुरानी गुजराती या पुरानी पश्चिमी राजस्थानी प्रचलित थी, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि उनके पद अब उन तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में मिलते हैं, जिन्होंने इस भाषा का स्थान ले लिया था।'' कबीर की भाषा के संबंध में भी भोलानाथ तिवारी की यही राय है। उन्होंने साफ़ लिखा कि विभिन्न विद्वानों ने कबीर की भाषा को कोई एक बोली राजस्थानी, अवधी, भोजपुरी आदि माना है। ऐसा मानना उचित नहीं कहा जा सकता। क्योंकि कबीर का रचनाकाल मोटे रूप से ईसा की पंद्रहवीं सदी है। उस समय तक ब्रज, राजस्थानी, अवधी, भोजपुरी आदि पूर्णतया अलग नहीं हुई थी, जिस रूप में आज है। दरअसल हुआ यह है कि कबीर, मीरां आदि की रचनाएँ राजस्थान, गुजरात, मालवा, ब्रज आदि में उस समय लगभग समान रूप से व्यवहृत भाषा में हुईं, लेकिन जैसे-जैसे क्षेत्रीय भाषिक इकाइयों का पृथक् विकास हुआ, ये रचनाएँ इन इकाइयों के अनुसार राजस्थानी, ब्रज, गुजराती आदि में ढलती  गईं।

हमारे प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की कविताएँ आज के हिसाब से एकाधिक भाषाओं में मिलती है। मीरां की कविता इसका अच्छा उदाहरण है। यह राजस्थानी के साथ गुजराती और ब्रज आदि भाषाओं में भी मिलती है। कबीर सहित अन्य संत कवियों की भाषा के संबंध में भी यही कहा जाता है। कुछ विद्वान् इनकी कविता को आज की भाषायी पहचानों में देखना-समझना चाहते हैं। यह ग़लत है। इन कवियों की भाषा की मूल भाषा अपभ्रंश की अंतिम अवस्था में विकसित वह देश भाषा है, जिसका व्यवहार कुछ विशेषताओं के साथ लगभग तमाम उत्तर भारत में होता था। मध्यकालीन वैयाकरणों ने इस भाषा का नाम सब जगह देश भाषा ही प्रयुक्त किया है। एल.पी. तेस्सीतोरी आदि कतिपय आधुनिक विद्वानों ने इसको 'पुरानी पश्चिमी राजस्थानी', या 'जूनी या पुरानी गुजराती' आदि नाम भी दिए हैं। दरअसल पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में राजस्थानी, गुजराती और ब्रज अलग भाषाएँ नहीं हैं और आगे उपनिवेशकाल तक ये एक ही भाषा की अलग-अलग बोलियाँ ही हैं। जार्ज ग्रिय्रर्सन के बाद इन भाषाओं की उत्पति और पहचान पर पहली बार विस्तार से विचार करने वाले एल.पी. तेस्सितोरी के शब्दों में प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी शौरसेन अपभ्रंश की पहली संतान है और साथ ही उन आधुनिक बोलियों की माँ है, जिनको गुजराती तथा मारवाड़ी के नाम से जाना जाता है। आगे वे कई प्राचीन रचनाओं के साक्ष्य से इस निष्कर्ष पहुँचे कि जिस भाषा को मैं ‘प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी’ के नाम से पुकारता हूँ, उसमे वे सभी तत्त्व हैं, जो गुजराती के साथ-मारवाड़ी के उद्भव के सूचक हैं और इस तरह वह भाषा स्पष्टतः इन दोनों की सम्मिलित माँ है।मुनि जिनविजय ने भी गुजरात विद्यापीठ के अपने कार्यकाल में तैयार की गई पुरानी गुजराती गद्य संदर्भ नामक एक पाठ्य पुस्तक में तेरहवीं से पंद्रहवीं सदी तक के 300 वर्षों के दौरान के गद्य के नमूने संकलित किए। इनकी भाषा 'प्राचीन गुजराती' के आगे कोष्ठक में उन्होंने स्पष्ट नामोल्लेख किया 'अर्थात् पश्चिमी राजस्थानी'। गुजराती भाषा के मर्मज्ञ और विद्वान् स्वर्गीय झवेरचंद्र मेघाणी के विचार भी इस धारणा को पुष्ट करते हैं। उन्होंने इस संबंध में एक जगह लिखा है कि "मेड़ता की मीरां इसी में पदों की रचना करती और गाया करती थी। इन पदों को सौराष्ट्र की सीमा तक के मनुष्य गाते तथा अपना कर मानते थे। चारण का दूहा राजस्थान की किसी सीमा में से राजस्थानी भाषा में से अवतरित होता तथा कुछ वेश बदलकर काठियावाड़ में घर-घराऊ बन जाता। नरसी मेहता गिरनार की तलहटी में प्रभु पदों की रचना करता और ये पद यात्रियों के कंठों पर सवार होकर जोधपुर, उदयपुर पहुँच जाया करते। इस ज़माने का पर्दा उठाकर यदि आप आगे बढेंगे, तो आपको कच्छ, काठियावाड़ से लेकर प्रयागपर्यंत भूखंड पर फैली हुई एक भाषा दृष्टिगोचर होगी।'' आगे उन्होंने और स्पष्ट करते हुए लिखा है किउसी की पुत्रियाँ फिर ब्रजभाषा, गुजराती और आधुनिक राजस्थानी का नाम धारण कर स्वतंत्र भाषाएँ बनीं।" जार्ज ग्रियर्सन ने भी पन्द्रहवीं सदी में राजस्थानी और गुजराती के एक होने की बात कही है। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि गुजराती का राजस्थानी से बहुत निकट संबंध है। यहाँ तक कि पंद्रहवीं शताब्दी में मारवाड़ तथा गुजरात की भाषा एक थी। इसके बाद ही इसने इन दो भाषाओं का रूप धारण किया; किंतु मूलतः इन दोनों बोलियों में अत्यल्प ही अंतर है। इसको उन्होंने एक उदाहरण देकर पाद टिप्पणी में और स्पष्ट क़िया। उन्होंने लिखा कि सन् 1455-56 में मारवाड़ राज्य के जालोर स्थान के एक कवि ने ‘कान्हड़देव’ शीर्षक प्रबंध लिखा था। सन् 1912 में इसको लेकर गुजरात में एक वादविवाद चल पड़ा कि यह पुरानी गुजराती का प्रबंध है अथवा मारवाड़ी का। सच यह है कि यह दोनों में से किसी का नहीं है, अपितु कवि की उस मातृभाषा में है, जो बाद में इन भाषाओं के रूप में प्रकट हुई।मीरां सहित अधिकांश मध्यकालीन कवियों की कविता की भाषा के संबंध में भी यही सच है। यह राजस्थानी, गुजराती या ब्रज नहीं है, यह पंद्रहवीं सदी की उसकी वह मातृभाषा है, जिसकी पहचान अब क्षेत्रीय विशेषताओं के मुखर हो जाने के कारण अलग-अलग भाषाओं के रूप हो गई है। पद्मनाभ के कान्हड़देवप्रबंध की भाषा पुरानी पश्चिमी राजस्थानी है, इसलिए तेस्सीतोरी के अनुसार उसके समकालीन नरसिंह मेहता की भाषा भी यही रही होगी। उसकी कविता का आधुनिक गुजराती में रूपांतरण बहुत आगे चलकर हुआ। मीरां जो नरसिंह मेहता के साथ गुजराती की दूसरी बड़ी भक्त कवयित्री है और उसके कुछ समय बाद ही हुई है, की रचनाएँ भी इसी भाषा में हुईं। आगे चलकर ये अलग-अलग भाषायी पहचानों के बनने के साथ आधुनिक गुजराती या राजस्थानी में ढलती गईं। जहाँ तक मीरां की कविता के ब्रज में मिलने का सवाल है तो ब्रज और राजस्थानी भी मध्यकाल में अलग भाषाएँ नहीं थीं। राजस्थानी के प्राचीन साहित्यिक रूप पिंगल में ब्रज शामिल है। ब्रज दरअसल पुरानी राजस्थानी का ही क्षेत्रीय विस्तार है। ये भाषायी पहचानें बाद में बनी यह इससे भी प्रमाणित है कि मध्यकालीन अधिकांश कवियों की कविता की भाषा एकरूप नहीं है। कोई पद संपूर्ण ब्रज में है, तो किसी पद में राजस्थानी और ब्रज एक साथ है और किसी पद में राजस्थानी के साथ कुछ शब्द या वाक्यांश गुजराती के भी आ गए हैं। मीरां के समय देश भाषाओं की पृथक् क्षेत्रीय पहचानें नहीं थीं, लेकिन धीरे-धीरे ये बनती गईं। मीरां के पद लोकप्रिय थे, इसलिए ये भी इनके अनुसार ब्रज, राजस्थानी और गुजराती होते गए। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि क्षेत्रीय भाषायी पहचानों के अनुसार ढल जाने के बाद भी इनमें उस समय की भाषा के साक्ष्य मौजूद हैं। उसके ब्रज भाषा के पदों में राजस्थानी और राजस्थानी में गुजराती भाषा के शब्द और अर्थ रूढ़ियाँ इसी कारण हैं।
 
प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की कविता को आज की अपनी-अपनी भाषायी पहचानों तक सीमित करने का आग्रह बढ़ गया है। मीरां का जन्म, लालन-पालन और विवाह राजस्थान में हुआ, इसलिए कुछ विद्वानों की धारणा है कि केवल राजस्थानी मीरां की भाषा है और इससे इतर भाषाओं की मीरां की रचनाएँ मीरां की रचनाएँ नहीं हैं। हीरालाल माहेश्वरी का मानना है कि मीरां का अधिकांश जीवन राजस्थान में बीता। वह वहीं जन्मी और ब्याही गई। केवल जीवन के अंतिम दिन गुजरात में बीते। उसकी वृन्दावन यात्रा अथवा वहाँ निवास निराधार है। इस कारण शुद्ध गुजराती, शुद्ध पंजाबी और शुद्ध भोजपुरी भाषाओं में मिलने वाले पद अपने वर्तमान रूप में कदापि मीरां के नहीं हो सकते। शुद्ध ब्रजभाषा के पद भी संदेहास्पद ही हैं। अधिक से अधिक ऐसे पदों में मीरां की भावना भले ही सुरक्षित हो। मीरां की भाषा राजस्थानी थी। कमोबेश यही बात नरोत्तम स्वामी ने भी कही है। उनके अनुसार मीरांबाई की कविता की भाषा राजस्थानी है, जो पश्चिमी हिन्दी का एक प्रधान विभाग है।.....मीरांबाई की भाषा में ब्रजभाषा का मिश्रण बहुत है। गुजराती की विशेषताएँ भी अनेक स्थान पर पाई जाती है। पंजाबी, खड़ी बोली, पूरबी आदि का आभास भी कई स्थानों पर होता है। उनके अनेक पद शुद्ध गुजराती में भी पाए जाते हैं, पर इसमें संदेह है कि वे उनके बनाए हुए हैं। इसी तरह के आग्रह अन्य प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की भाषा के संबंध में भी है। इस तरह के आग्रह युक्तिसंगत नहीं हैं। दरअसल पंद्रहवी-सोलहवीं सदी में का क्षेत्रीय आधार पर भाषाओं का विभाजन नहीं हुआ था, लेकिन आगे चलकर ये पहचानें कुछ हद तक बनती गईं। इन कवियों की विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित कविता भी इन पहचानों में ढलकर गुजराती, ब्रज, राजस्थानी आदि होती गईं। साफ़ है कि इन कवियों की ब्रज या गुजराती या राजस्थानी में मिलने वाली कविता इनकी ही है। यह अलग बात है कि बाद में यह निरंतर चलन में रहने के कारण इन पहचानों में अलग भी दिखाई देने लगीं। मीरां की भाषा ब्रज मिश्रित राजस्थानी मानने वाले नरोत्तम स्वामी ने भी यह तो स्वीकार किया है कि मीरां के प्रचलित पदों की आधुनिक भाषा उसकी असल भाषा नहीं है। उन्होंने लिखा कि मीरांबाई के पद जिस रूप में पाए जाते हैं ठीक उसी रूप में वे लिखे गए होंगे, यह कहना कठिन है। जो पद छपे हैं उनमें अधिकांश की भाषा आधुनिक हो गई है। पद गाने की चीज हैं और गानेवालों द्वारा गाते समय फेरफार हो जाना बहुत संभव है। गाने वाले जनता को समझाने के लिए भी भाषा को आधुनिक कर देते हैं।

भारत में प्रजातीय और क्षेत्रीय विविधता के कारण भाषायी वैविध्य है, लेकिन इस वैविध्य को अंदरूनी या भारतीय नज़रिये से समझा जाए, तो नतीजे प्रचारित से अलग प्रकार के आएँगे। एक तो अधिकांश उत्तर भारतीय भाषाओं का उद्गम एक है, केवल क्षेत्रीय वैशिष्ट्य के कारण इस भाषा के कई रूप हो गए हैं और अब ये रूप क्षेत्रीय अस्मिता के साथ जुड़कर मुखर और प्रमुख भी हो गए हैं। दूसरे, सदियों के सहजीवन और आदान-प्रदान के कारण यहाँ की भिन्न परिवार वाली भाषाएँ भी कुछ हद तक एक-दूसरे में घुल-मिल गई हैं। उनके शब्द समूह और मुहावरे भी एक दूसरे के निकट आ गए हैं। यहाँ लगता है कई भाषाएँ हैं, लेकिन साथ में थोड़ा बारीकी और पास से देखा जाए, तो यह भी सच है कि यह विविधता इस तरह से है कि यहाँ भाषा से भाषा है या फिर भाषा में भाषा है।


Wednesday, 7 February, 2018

नेहरू का रास्ता



जीवन दृष्टि और राजनीतिक विचार के मामले में नेहरू और गांधी का रवैया एकदम भिन्न किस्म का था। गांधी का सुसंगत विचार-प्रणाली और जीवन दृष्टि के साथ सार्वजनिक जीवन में उतरे, जबकि नेहरू ने सार्वजनिक जीवन में रहकर उसके अनुभवों से ही अपनी जीवन दृष्टि और राजनीतिक विचारों का विकास किया। इस कारण नेहरू के राजनीतिक विचारों में वैसी सुसंगति और दृढ़ता नहीं है, जैसी गांधी में हैं। किसी विचार प्रणाली को अन्तिम मानकर उस पर कायम रहने को नेहरू गलत मानते थे। दुनिया में हालात जिस तेज रफ्तार से बदल रहे थे, उनके अनुसार, विचारों में गतिशीलता नेहरू को जरूरी लगती थी। उन्होंने साफ लिखा कि- विचार स्थिर कर लेना या सन्तुष्ट हो जाना ज्यादा सुविधाजनक भले ही हो सकता है, लेकिन निश्चय ही यह प्रशंसनीय नहीं हो सकता, क्योंकि यह केवल जड़ता और सड़ांध की तरफ ले जाता है। तयशुदा विचार प्रणालियों से भी नेहरू प्रभावित हुए। उन्होंने इनके अनुसार अपने राजनीतिक विचारों और आचरण को ढालने की कोशिश भी की। खासतौर पर गांधीवाद, पूंजीवाद और समाजवाद-साम्यवाद को उन्होंने अलग-अलग दौर में इस महादेश की समस्याओं के समाधान के लिए ठीक पाया, लेकिन वे इनमें से किसी को भी पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाए। आजादी से पहले और बाद में इस महादेश के जो हालात थे उसकी रोशनी में ये सभी विचार-प्रणालियां उनकी कमोबेश अधूरी लगीं। वे आजीवन इस महादेश की समस्याओं के समाधान के लिए अपनी तरह का रास्ता खोजते रहे। उनमें राजनीतिक विचारों का अन्तर्संघर्ष अन्तिम समय तक जारी रहा। क्या आजादी के लिए संघर्ष और देश निर्माण के काम के अपने लंबे अनुभव के बाद भी नेहरू किसी अंतिम निष्कर्ष तक तक नहीं पहुंचे? इस सवाल का कुछ जवाब 1958 में छपे उनके एक आलेख बुनियादी रास्तामें हैं। इस आलेख में इस महादेश की अद्वितीय समस्याओं का, इसकी अपनी परिस्थितियों के अनुसार, समाधान पाने के लिए जद्दोजहद साफ दिखाई पड़ती है।
गांधी के तौर-तरीकों के संबंध में नेहरू का नजरिया बदलता रहा। इससे संबंधित अपनी पसंद- नापसन्द को उन्होंने जब-तब जाहिर भी किया। खासतौर पर तीसरे दशक में और आगे चलकर आजादी से ठीक पहले गांधी से उनके मतभेद बहुत बढ़ गए थे। हिन्द स्वराजके अवधारणात्मक ढांचे पर गांधी 1945 में भी कायम थे, जबकि नेहरू को इसके बहुत से विचार दकियानूसी और गुजरे जमाने के लगते थे। गांधी ने नेहरू को अपना उत्तराधिकारी बनाया, लेकिन यह सही है कि उन्हें अपने अनुसार ढालने से वे कामयाब नहीं हुए। यह जरूर है कि गांधी का कुछ प्रभाव नेहरू की शख्सियत और राजनीतिक विचारों पर हुआ। शुरूआती दिनों में यह असर खासा गहरा भी था। नेहरू ने इसे स्वीकार करते हुए लिखा कि- ‘‘मैने अहिंसा के सिद्धान्त को सोलहों आने नहीं मान लिया था, या हमेशा के लिए नहीं अपना लिया था, लेकिन हां, वह मुझे अधिकाधिक अपनी तरफ खींचता चलता जाता था और यह विश्वास मेरे दिल में पक्का बैठ जाता था कि हिन्दुस्तान की जैसी परिस्थिति बन गयी है, हमारी जैसी परम्परा और संस्कार हैं, उन्हें देखते हुए यही सही नीति हैं, लेकिन जल्दी ही नेहरू की राय बदल गई। 1927 में ब्रुसेल्स में हुए उत्पीड़ित जातियों की कांग्रेस में शामिल होने और दो-तीन दिन के रूस प्रवास के बाद तो उन्हें पूरी तरह विश्वास हो गया कि गांधी के प्रचलित तौर-तरीके गलत हैं। 1945 में उन्होंने देश का भविष्य तय करने में गांधीवादी तौर-तरीकों पर अमल करने से साफ मना कर दिया। आजादी के बाद देश के निर्माण और विकास के काम में अपने तजुर्बे से नेहरू ने बहुत सीखा। समाजवादी तरीके को अमल में लाने की व्यावहारिक दिक्कतों से रूबरू होने के बाद इसके बारे में उनकी राय थोड़ी बदली। समाजवाद और खास तौर पर उसके साम्यवादी तरीके में जो हिंसा है उसको लेकर असमंजस तो उनके मन में शुरू से ही था, लेकिन आजादी के एक दशक बाद उनको साफ लग गया कि इस मामले में गांधी सही थे। उन्होंने बुनियादी रास्तामें लिखा कि हिंसा के रास्ते आज की किसी भी बड़ी समस्या का समाधान मुमकिन नहीं है, क्योंकि हिंसा का स्वरूप अत्यन्त भीषण और संहारक हो गया है। गांधी की ही तरह वे भी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि गलत साधनों से सही नतीजे नहीं प्राप्त किये जा सकते और अब यह सिर्फ नीति सम्भव मान्यता नहीं है, बल्कि व्यवहार सम्मत उक्ति भी है।
नेहरू अपनी शिक्षा के दौरान इंण्लैण्ड में यूरोप की भौतिक समृद्धि और उदारवादी जनतान्त्रिक विचारों के साथ-साथ फेबियन समाजवादियों से भी प्रभावित हुए। देश लौटने के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन में भागीदारी करते हुए नेहरू ने अपनी कोई राजनीतिक लाइन तय नहीं की। इन दिनों, जैसा उन्होंने खुद लिखा है, वे शुद्ध राष्ट्रीयतावादीथे। समाजवाद की तरफदारी और झण्डाबरदारी नेहरू ने 1927 के बाद शुरू की। बुसेल्स कान्फ्रेंस और रूस प्रवास के बाद जब वे मद्रास के कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए, तो उनका नजरिया बिल्कुल बदला हुआ था। अपनी आत्मकथा में नेहरू ने इसका जिक्र करते हुए लिखा है कि- मेरा दृष्टि बिन्दु व्यापक हो गया है। और राष्ट्रीयता का लक्ष्य मुझे निश्चित रूप से तंग और नाकाफी मालूम होता था। इसमें कोई शक नहीं कि राजनीतिक स्वतन्त्रता लाजिमी थी, लेकिन यह तो सही दिशा में कदम भर है। जब तक सामाजिक आजादी न होगी तथा समाज का तथा राज का बनाव समाजवादी न होगा तब तक न तो देश की उन्नति कर सकता है, न उसमें रहने वाले लोग ही। तीसरे और चौथे दशक के दौरान नेहरू ने कांग्रेस और कांग्रेस से बाहर समाजवादी विचारों के प्रचार-प्रसार में खासी दिलचस्पी ली। उनकी शह पर कांग्रेस के भीतर ही अलग कांग्रेस समाजवादी पार्टी का गठन हुआ। कांग्रेस में समाजवादियों ने प्रभाव के बढ़ने के कारण गांधी को कांग्रेस से अलग होना पड़ा। समाजवादियों की तरफदारी करते हुए भी नेहरू पूरी तरह आश्वस्त और सन्तुष्ट नही थे। खास तौर पर साम्यवाद को लेकर दुविधा उनके मन में बराबर थी। 1929 में श्रीभगवत दयाल को एक पत्र में उन्होंने लिखा कि- जाति तौर पर उनके सिद्धान्तों की तरफ मेरा खिंचाव है, हालांकि उनके कितने तौर-तरीकों से मैं सहमत नहीं हूं और मुझे इसमें शक है कि उसके लिए हिन्दुस्तान कहां तक तैयार हो पाया हैं। अपने द्वारा कायम यूथ लीगों के दरवाजे भी उन्होंनें सभी तरह के राजनीतिक रुझान वाले लोगों के लिए खुले रखे। इस सम्बन्ध में उन्होंने एक पत्र में लिखा कि- ‘‘ये उन लोगों के लिए भी खुले हैं, जिनका रुझान साम्यवाद की तरफ है और उनके लिए भी जो साम्यवाद को शैतान की खास देन मानते हैं। ट्रेड यूनियन आन्दोलन में भी वे दक्षिणपंथियों और वामपंथियों के बीच समान रूप से लोकप्रिय थे। त्रिपुरा कांग्रेस के दौरान भी जब समाजवादी सुभाषचन्द्र बोस को त्याग पत्र देने के लिए विवश किया गया, तो नेहरू ने इस कार्यवाही का समर्थन नहीं किया, लेकिन उन्होंने खुलकर बोस की तरफदारी भी नहीं की।
तीसरे दशक में नेहरू साम्यवाद से गहराई तक प्रभावित हुए, सोवियत रूस की महान उपलब्धियों पर अभिभूत भाव से उन्होंने एक छोटी-सी किताब भी लिखी, लेकिन आजादी के बाद साम्यवाद से उनका मोहभंग हो गया। इसका खास कारण तो विश्व के बदले हुए हालात थे, लेकिन इसमें कुछ भूमिका गांधी के साथ नेहरू के लम्बे सहकर्म की भी रही। बुनियादी रास्तामें उन्होंने साम्यवाद के बारे में अपनी राय प्रकट करते हुए लिखा है कि- ‘‘यह रास्ता मैं निरा अवैज्ञानिक, अविवेकपूर्ण और असभ्य पाता हूं। इसके उन्होंने तीन कारण गिनाए- पहला यह कि यह जीवन के आध्यात्मिक और नैतिक पक्ष की अवहेलना करता है, दूसरा यह कि इसमें व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का दमन होता है और तीसरा यह कि इसका हिंसा के साथ मेल-मिलाप है। साम्यवाद से मोहभंग के बाद भी गरीबी के सवाल को राजनीति से जोड़ने का समाजवादी जज्बा नेहरू में आजादी के बाद भी बना रहा। हालांकि पश्चिम की भौतिक समृद्धि और उदार लोकतान्त्रिक विचार के बुनियादी संस्कार और विश्व के बदलते हालत के कारण पंजीवादी के बारे में नेहरू ने बुनियादी रास्तामें लिखा कि- पूंजीवाद ने जनतन्त्र को अपना कर अपनी अनेक बुराइयों को निष्प्रभ कर दिया है और दरअसल, अब यह वही नहीं है, जो एक या दो पीढ़ियों पहले था आगे उन्होंने और लिखा कि इन दोनों के बीच की दूरी कम होना तय है, क्योंकि समाजवाद के कई विचार एक-एक करके पूंजीवादी व्यवस्था में समाहित किये जा रहे हैं। पूंजीवाद की एक ही बात नेहरू को अखरती थी, वह यह कि ‘‘उसकी ताकतों पर अगर निगरानी नहीं रखी जाए, तो वे गरीब को और गरीब तथा अमीर को और अमीर बनाती है। इस मुद्दे पर नेहरू समाजवाद को अच्छा पाते थे, क्योंकि यह जानबूझ कर सामान्य प्रक्रिया में हस्तक्षेप करता है और इस तरह यह न सिर्फ उत्पादक शक्ति में कुछ जोड़ता है, बल्कि गैरबराबरी कम करता है।
इस तरह निरन्तर आत्मसंघर्ष और जद्दोजहद से गुजरकर नेहरू इस महादेश के विकास-उत्कर्ष के लिए जो बुनियादी रास्ता तय करते हैं, वो उनके अनुसार विकास के सभी तयशुदा रास्तों से अलग इस देश की परिस्थिति के अनुकूल नया रास्ता है। इसमें विकास के सभी प्रचलित रास्तों से कुछ-न-कुछ लिया गया है। गांधी गांवों की आत्मनिर्भरता के लिए विकेन्द्रीकरण को आवश्यक मानते थे, लेकिन नेहरू की राय इससे बिल्कुल भिन्न थी। उनके अनुसार इसका मतलब- उत्पादन के पुराने और किंचित आदिम तरीकों की और लौटना होगा, जिससे हमारी गरीबी और बढ़ेगी। नेहरू तेज रफ्तार के लिए आधुनिक तकनीक और ऊर्जा के नये स्रोतों के अधिकतम उपयोग को जरूरी समझते थे, क्योंकि इनके उपयोग से पश्चिमी देशों में भौतिक समृद्धि आई है। नेहरू इस संबंध में लिखते हैं कि- ‘‘गरीबी के इस दुष्चक्र से निकलने का और कोई रास्ता मुझे नजर नहीं आता, सिवा इसके कि हम ऊर्जा के नये स्रोतों का इस्तेमाल करें, जो विज्ञान ने हमारे हाथ में सौंपे हैं। नेहरू यह भी चाहते थे कि इस रास्ते पर चलकर जो समृद्धि आए, वो पूंजीवादी समाजों की तरह कुछ लोगों या तबकों तक ही सीमित नहीं रहे, उसके बराबर बंटवारे का कोई कारगर प्रबन्ध हो। विकास के काम के निरन्तर, सुनियोजित और सनतुलित ढंग से चलाने के लिए नेहरू एकीकृत राष्ट्रीय योजना को जरूरी मानते थे। योजना उनके अनुसार महज परियोजनाओं और कार्यक्रमों का जमावड़ा नहीं है, बल्कि इसका अर्थ तरक्की की रफ्तार और बुनियाद को मजबूत करने का सुविचारित तरीकाहै। नेहरू की विकास की इस अवधारणा में मनुष्य की अवहेलना नहीं है। इसकी प्राथमिकताओं में तेज रफ्तार विकास के साथ-साथ जड़ समाज के वर्गीय ढांचे को तोड़ने के लिए भूमि सुधार, सही शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी जगह है।
नेहरू का यह रास्ता कितना कारगर है या खुद नेहरू ने इस पर कितना अमल किया या नेहरू और जिन्दा रहते तो इस पर कितना कायम रहते, इन सवालों पर लम्बी बहस की गुंजाइश है। बुद्धिजीवियों के बीच इन सवालों पर खूब बहस-मुबाहिसा हुआ भी है। ऐसे समय में जब हमारा सारा राजनीतिक आचरण विचारविहीन हो गया है, यही क्या कम है कि नेहरू सोचते-विचारते थे और सबसे अहम बात यह है कि अपने समय की विचारधाराओं के साथ उनका संबंध द्वन्द्व का था।