Sunday 22 January 2012

किताब से कट्टी

बात अभी गत सदी के सातवें और आठवें दशक की है। टीवी की चर्चा तो शुरू हो गई थी, लेकिन अभी यह पूरी तरह आया नहीं था और बच्चों के पास अपनी दुनिया से बाहर झांकने का साधन केवल किताबें थीं। बच्चों मे किताबों के लिए दीवानगी इस दौरान इस हद तक थी कि पराग, नंदन, चंपक और चंदामामा जैसी पत्रिकाओं की गांव-कस्बों और शहरों घर-स्कलों में बेसब्री से प्रतीक्षा होती थीं और इनके पहुंचने पर वहां माहौल उत्साह, सनसनी और उत्तेजना का होता था। ये कई हाथों से गुजरती थीं और इन्हें दुबारा तो कभी तिबारा पढ़ा जाता था। इनके लिए बच्चे लड़ते-झगड़ते थे और नए अंक आने तक इनकी हालत अक्सर लीर-चीर हो जाती थी। इनकी रंगीन पारदर्शिया, किस्से-कहानियां, कविताएं और लेख बच्चों को सपनों की दुनिया में ले जाते थे। इनको पढ़कर बच्चों को अपने घर-गांव, हाट-बाजार, खेत-खलिहान, नदी-पहाड़ और जंगल-जानवर नए और अनोखे लगने लगते थे।

किताबों से बच्चों की गहरी और मजबूत दोस्ती में दरार गत सदी के अंतिम दशक में तब पडना शुरू हुई, जब टीवी आया और विस्फोटक ढंग से एकाएक सब जगह फैल गया। किताबें और पत्रिकाएं अब पहले से ज्यादा हो गई हैं, इनमें रंगीन पारदर्शियां और चित्र भी बढ़ गए हैं, सामग्री भी पहले से अधिक और विविधतापूर्ण है, लेकिन बच्चों में इनके लिए कोई खास उत्साह नहीं है। किताबें अब पहले की तरह उनको अपनी दोस्त नहीं लगतीं क्योंकि एक तो टीवी के कैदी हो गए है और दूसरे, टीवी की आदत से उनका किताबों का जायका खराब होने लग गया है।

बच्चों के पास अब किताबों के लिए समय नहीं के बराबर है। पहले की बात अलग थी- खेलकूद और पढ़ाई-लिखाई के बाद बचे समय में किताबें ही बच्चों की संगी-साथी होती थीं। अब इस ज्यादातर समय पर टीवी का कब्जा हो गया है। विशेषज्ञ टीवी ‘प्लग इन ड्रग’ कहते हैं। मतलब यह कि स्विच दबाओं और नशीली दवा खाओ। यो तो टीवी का नशा अब बड़ों-बूढ़ों, सभी को अपनी गिरफ्त में ले चुका है, लेकिन बच्चों के संबंध में तो प्लग इन ड्रग की बात अक्षरशः सही साबित हो रही है। बच्चे फिलहाल टीवी की रंग-बिरंगी और चकाचौंध वाली दुनिया के सम्मोहन के शिकार हैं। यह सम्मोहन खतरनाक ढंग से वर्चस्वकारी है। इसने बच्चों को केवल किताब से ही नहीं, शेष सब से भी काटकर केवल अपना बना लिया है। बच्चे जब इसके सामने होते हैं, तो इस तरह इसके साथ होते हैं कि उन्हें और कुछ अच्छा नहीं लगता।

टीवी के आने से पहले तक किताबों से बच्चों की अंतरंगता इसलिए थी कि इनमें बहुत कुछ नया और अनजाना होता था, जो उन्हें विस्मित और आह्लादित करता था। अब टीवी ने सब एक्सपोज कर दिया है और किताबों के पास नया, अनजाना और गोपन बहुत कम रहता है। जब टीवी नहीं था, तो बच्चों की दुनिया आज जितनी बड़ी और विविधता पूर्ण नहीं थी। उनके मन-मस्तिष्क में अपने घर-गांव या शहर के आसपास के बिंब और जानकारियां होती थीं। इस छोटी-सी दुनिया में जब किताबें कुछ ईजाफा करती थीं, तो बच्चे आह्लाद और रोमांच से भर जाते थे। अद्भुत कहानियां, जानकारियां और नयी रंगीन पारदर्शियां उन्हें चंकित करती थीं। वे यह सब देख-पढ़कर गर्वित महसूस करते थे। अब किताबों में नया जोड़ने की कुव्वत कम होती जा रही है। टीवी की निगाह बहुत पैनी है और वह बहुत जल्दी, बहुत दूर तक जाती है इसलिए इसके अभ्यस्त बच्चों को अब पहले से ही सब पता है। ऐसी स्थिति में बच्चों की किताबों की दुनिया बासी और पुरानी लगती है और वे इससे न चकित अनुभव करते है और न ही यह उन्हें आह्लादित कर पाती है।

टीवी ने बच्चों की आदत इस तरह खराब कर दी है कि अब वे किताब में पढ़कर शब्द से देखने का रोमांच और आह्लाद महसूस नहीं कर पाते। टीवी में सब दिखता है, इसलिए शब्द उनके भीतर दृश्य में नहीं बदलता। किताब के शब्द बच्चों को देखने के लिए मुक्त करते थे। वे पढ़ते थे नदी, तो उनकी कल्पना एक नदी गढ़ देती थी। वे पढ़ते पहाड़ तो फिर कल्पना के सहारे वे अपने बनाए पहाड़ के शिखर पर जा खड़े होते थे। बच्चे इसी तरह लिलिस्म बनाते थे, खेत-खलिहान रचते थे और राजा-रानी गढ़ते थे। शब्द उनके मन-मस्तिष्क में धीरे-धीरे खुलता था और कल्पना के पंखों पर सवार होकर दृश्य की उड़ान भरता था। अब केवल दृश्य की आदत हो गई है। पहले गांव की नदी थी, पड़ोस का पहाड़ था और ज्यादा हुआ तो कभी कहीं देखा हुआ झरना था पर अब तो मन-मस्तिष्क में दृश्यों की भरमार है। अब शब्द दृश्य की यात्रा पर निकलने की तैयारी में ही हांफ जाते हैं। कल्पना भी अब दूर तक नहीं जाती-उसके पंख उड़ते ही दृश्यों के बोझ से भारी होकर जमीन पर धूल चाटने लगते हैं।

टीवी की आदत और नशे के कारण बच्चों को अब किताबों की दुनिया अपनी नहीं लगती। जब टीवी नहीं था, तो किताबों की दुनिया से बच्चों का रिश्ता ऐंद्रिक और बहुत कुछ नजदीक का था। उनकी कल्पना की पतंग को दूर तक उड़ान भरने की छूट थी, लेकिन उसकी डोर का आखिरी सिरा तो उनके घर-गांव या शहर के अपने यथार्थ से बंधा रहता था। वे पढ़ते थे बाजार, तो अक्सर अपनी ही गली-मोहल्ले से सटा हाट-बाजार ही नया रूप धर कर उनकी कल्पना में आ बैठता थ। वे जब मंदिर के बारे में पढ़ते थे, तो अपने गांव-कस्बे या शहर के मंदिर की घंटियां उनके कानों में गूंजने लगती थीं। किले का नाम आते ही वे अपने देखे-जाने किले की घुमावदार सीढियों पर जा खड़े होते थे। अब किताब की दुनिया से बच्चों का यह ऐंद्रिक रिश्ता खत्म हो रहा है। टीवी ने बच्चों को अपने आसपास में काट दिया है और उनके मन-मस्तिष्क को अजनबी और बेगानी दुनिया के गोदाम में तब्दील कर दिया है। अब वे कुछ पढ़ते हैं, तो अपना कम, बेगाना ज्यादा सामने आता है।

बच्चे प्लग इन ड्रग की हालत से बाहर आएंगे, फिलहाल इसकी गुंजाइश बहुत कम है। वे किताबों से पूरी तरह कट्टी कर लेंगे, इस संबंध में कोई निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगी। इतना अवश्य है कि टीवी दोस्त नहीं हो सकता, क्योंकि दोस्ती दोतरफा होती है, जबकि टीवी एकतरफा है। किताबें दोस्त हो सकती हैं, लेकिन इसके लिए उनको अपना जायका बदलना पड़ेगा।

जनसत्ता के दुनिया मेरे आगे स्तंभ में 9 जनवरी, 2012 को प्रकाशित आलेख।

Sunday 18 September 2011

विवादों की गर्द, कल्पना का दलदल और इतिहास की गाड़ी



अभी कुछ समय पहले तक हिंदी के साहित्यिक विमर्श का दायरा केवल अपने तक सीमित था। साहित्य में साहित्येतर अनुशासनों की मौजूदगी घुसपैठ की तरह अवांछनीय थी। समाज विज्ञान, इतिहास, संस्कृति, पुरातत्त्व, संगीत आदि अनुशासनों के साथ संवाद और अंतर्क्रिया को इसमें अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था। अब हालात बदल रहे हैं। हिंदी के साहित्यिकों की समझ अब साहित्य की सीमा लांघ कर ज्ञान के साहित्येतर अनुशासनों तक पहुंच गई है। अब वे ज्ञान के दूसरे अनुशासनों की समझ के साथ साहित्य में हस्तक्षेप कर रहे हैं, जिससे साहित्य की दुनिया पहले की तुलना में अधिक समृद्ध ओर बड़ी हुई है। मुअनजोदड़ो विख्यात पत्रकार ओम थानवी की पहली किताब है। यह एक यात्रा वृत्तांत है जो इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व की गहरी समझ के साथ लिखा गया है। खास बात यह है कि मुअनजोदड़ो को यह किताब ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक के साथ सांस्कृतिक दिलचस्पी को केन्द्र में लाती है।

मुअनजोदड़ों की खोज से पारंपरिक भारतीय इतिहास का नक्शा बदल गया था। इतिहासकारों और पुरातत्त्ववेत्ताओं को इस खोज से अपनी धारणाओं में कई उलट-फेर करने पड़े। अब तक सर्वाधिक प्राचीन मानी जाने वाली वैदिक संस्कृति के साथ इसका तालमेल मुश्किल हो गया। किसी को भी यह समझ में नहीं आया कि सुमेरी सभ्यता के समकक्ष यह समृद्ध सभ्यता खत्म कैसे हो गई। इसकी लिपि अभी तक कोई पढ़ नहीं पाया। इतिहासकार और पुरातत्त्ववेत्ता इस संबंध में केवल कयास लगाते रहे, जिससे विवादों की झड़ी लग गई। लेखक के शब्दों में कहें तो सिंधु घाटी की सभ्यता को लेकर खुदाई कम हुई है, विवादों की जड़ें ज्यादा खोदी गई हैं।(पृ.109) हिंदी के साहित्यिक भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने मुअनजोदडो के इतिहास की गाड़ी को कल्पना के दलदल में घसीट लिया। लेखक ने इस वृत्तांत में इन विवादों और कल्पना के दलदल की विस्तार से पड़ताल की है। उसने उन पुनरुत्थानवादी प्रयासों को खारिज किया है, जो इस सभ्यता हिंदू सभ्यता साबित करना चाहते हैं। उसने पूरी तरह देशज इस सभ्यता की वर्तमान में निरंतरता के कुछ व्यावहारिक सूत्रों की भी खोज की है।

यह किताब शुरू यात्रा वृत्तांत से और खत्म पुरातात्त्विक विवेचन-विश्लेषण से होती है। किताब के शुरुआती पृष्ठों में कराची से मुअनजोदड़ो तक का यात्रा वृत्तांत है। यहां लेखक पाठकों के सिंध संबंधी ज्ञान और समझ को कभी पुनर्नवा तो कभी समृद्ध करता चलता है। वह स्थानीय सिंधी सहयात्री के सहयोग से सिंध को उसके अतीत और वर्तमान की जड़ों में जाकर समझने की कोशिश करता है। वह देखता है कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम राज सबसे पहले सिंध में कायम हुआ, मगर हिंदू-मुस्लिम फसाद वहां कभी नहीं हुए। वह इसके कारणों की तह में जाता है और पाता है एक तो सदियों पहले यहां कायम बौद्ध मत के सहनशीलता और करुणा की गहरी जड़े छोड़ जाने से और दूसरे सूफियों के प्रभाव के कारण ऐसा हुआ। (पृ.23) बंटवारे और आजादी के बाद सिंध में बड़े पैमान पर हुए जातीय दंगों के कारणों की पड़ताल करते हुए वह इस निष्कर्ष पहुंचता है कि यह सिंध में सिंधियों के हाशिए पर चले जाने कारण हुए। बंटवारे के बाद सबसे अधिक मुहाजिर उत्तर प्रदेश और पाक पंजाब से यहां आए, सिंधी आबादी यहां केवल आठ प्रतिशत रह गई और सिंधी भाषा की जगह उर्दू और अंग्रेजी ने ले ली। सिंध के लोगों ने इसे अपनी पहचान पर हमला समझा। जातीय अस्मिता की इस कशमकश में सिंध में ‘सिंधु देश’ के लिए ‘जिए सिंध’ आंदोलन उठ खड़ा हुआ। (पृ.25 ) कराची से मुअनजोदड़ो तक की इस बस यात्रा के दौरान आने वाले दो शहरों के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व से भी लेखक रूबरू करवाता है। उसकी इस यात्रा का पहला पड़ाव है सेवण। रुना लैला, आबिदा परवीन, नुसरत फतह अली खान और न जाने कितने और गायकों के मुंह से इस शहर का नाम सुना है, लेकिन इसके महत्व पर रोशनी अब लेखक डालता है। वह बताता है कि सेवण सूफी फकीर शाहबाज कलंदर का स्थान है, जिन्हें मुस्लिम पीर और हिंदू भर्तृहरि का अवतार मानते हैं।(पृ.31) लरकाणा, जिसे लेखक अपने स्थानीय सहयात्री के आग्रह पर सही लाड़काणा कहता है, के आते ही लेखक उसकी पहचान जुल्फीकार अली भुट्टो के शहर के रूप में करता है। बाद वह इसे सूफी गायिका आबिदा परवीन और फिल्मकार कुमार शाहनी के शहर के रूप में भी याद करता है।(पृ.34)

किताब के आगे के हिस्से के वृत्तांत में विवेचन और विश्लेषण का पुट आ जाता है। लेखक अब एक शोधार्थी की तरह पहले मुअनजोदड़ो के महत्व पर रोशनी डालता है। उसके अनुसार यहां की खुदाई से रातों-रात भारत के इतिहास का नक्शा बदल गया।(पृ.38) यही बात बहुत पहले रोमिला थापर ने भी कही थी। उनके अनुसार इस खोज से पारंपरिक भारतीय इतिहास का प्रारंभिक भाग पौराणिक कहानी बनकर रह गया। लेखक के अनुसार सौ साल पहले भारत का दुनिया में महज दावा था कि उसकी सभ्यता प्राचीन है लेकिन सिंधु घाटी के हड़प्पा और मुअनजोदड़ो की खुदाई ने इस दावे को हकीकत में बदल दिया।(पृ38.) उसके अनुसार सिंध के मुअनजोदड़ो, पाक-पंजाब के हड़प्पा, राजस्थान के कालीबंगा और गुजरात के लोथल व धौलावीरा की खुदाई में हासिल पुरावशेषों ने यह अच्छी तरह साबित कर दिया कि सिंधु घाटी समृद्ध और व्यवस्थित नागर संस्कृति थी। उसके निवासी उन्नत खेती और दूर-दूर तक व्यवसाय करते थे। वे उपकरणों का इस्तेमाल करते थे, शुद्ध नाप-तौल जानते थे और उनका रहन-सहन और नगर नियोजन उन्नत किस्म का था। लेखक को इस सभ्यता की जो बात सबसे महत्वपूर्ण लगती है वो यह कि इसमें साक्षरता, सुरुचि और संपन्नता थी। इस सभ्यता के सौंदर्यबोध से भी वह अभिभूत है। वह इसके लिए यहां मिली बहुचर्चित याजक नरेश और कांसे से निर्मित निर्वसन नर्तकी युवती का विस्तृत वर्णन करता है। लेखक यहीं मोएनजोदड़ो, मोहनजोदड़ो आदि प्रचलित नामों के स्थान पर इस स्थान के असल नाम मुअनजोदड़ो का भाषायी अर्थ भी स्पष्ट करता है। वह लिखता है, मुआ यानि मृत.. बहुवचन में मुअन, मुआ का सिंधी प्रयोग है। दड़ा माने टीला। मुअन-जो-दड़ो: मुर्दो का टीला। (पृ.44) मुअनजोदड़ो का महत्व स्थापित कर देने के बाद लेखक इस स्थान की खोज और इसमें लगे लोगों की मेहनत का सिलसिलेवार ब्योरा देता है। 1924 ई. में सामने आए मुअनजोदड़ो की खोज का श्रेय आम तौर पर भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल को दिया जाता है, लेकिन लेखक मानता है कि महानिदेशक के रूप में उन्होंने खुदाई और खोज का नेतृत्व तो किया, लेकिन हड़प्पा और मुअनजोदड़ो की खुदाई का काम भारतीय पुरातत्त्ववेत्ताओं ने ही किया। हड़प्पा में यह काम हीरानंद शास्त्री ने 1909 ई. में, जबकि मुअनजोदड़ो में यह काम राखालदास बंद्योपाध्याय ने 1922-23 ई. में किया। मुअनजोदड़ो में बंद्योपाघ्याय के बाद माधोस्वरुप वत्स और काशीनाथ दीक्षित ने भी खुदाई करवाई।

मुअनजोदड़ो का मुआयना लेखक ने बहुत बारीकी और विस्तार से किया है। यह एक पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार के साथ एक साहित्यकार का मुआयना भी है। वह कहता है कि मुअनजोदड़ो की खूबी यह है कि इस आदिम शहर की सडकों और गलियों में आप आज भी घूम-फिर सकते हैं। यहां का सभ्यता और संस्कृति का सामान चाहे अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, शहर जहां था अब भी वहीं है। आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं। वह कोई खंडहर क्यों न हो, किसी घर की देहरी पर पांव रखकर सहसा सहम जा सकते हैं, जैसे भीतर कोई अब भी रहता है। (पृ.50) मुअनजोदड़ो की इमारतों, सड़कों का आदि का विवरण इस किताब में इस तरह है कि आपको यह जीवंत नगर की तरह लगता है। यह विवरण इतिहास और पुरातत्त्व की किताबों में भी है, लेकिन यहां एक कृतिकार की आंख से देखा गया विवरण है। उसके अनुसार सिंधु नदी के दाहिने तट पर पांच किलोमीटर के विस्तार में फैला हुआ यह 2600 ई.पू का यह नगर दो भागों में बंटा हुआ है। दुर्ग टीले के पश्चिमी भाग में स्थित सार्वजनिक महत्व के भवनों का इलाका गढ़ कहलाता है, जिसमें सभा भवन, ज्ञानशाला, अन्नागार और स्नानागार हैं। दुर्ग टीले के सामने आबादी वाला शहर है। नगर नियोजन की यह पद्धति बाद में भी दिखाई पड़ती है। लेखक का मानना है कि यह रास्ता दुनिया को मुअनजोदड़ो ने दिखाया लगता है।(पृ.53) लेखक इन सभी इमारतों और बस्तियों का जायजा लेता है। अपने मूल स्वरूप के बहुत नजदीक तक बचे हुए स्नानागार की पड़ताल लेखक ने अपेक्षाकृत विस्तार से की है। उसके अनुसार यह सिद्ध वास्तुकला का उदाहरण है।(पृ.55) मुअनजोदडो का नगर नियोजन और अवजल निकासी प्रबंध खास तौर पर लेखक का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। मुअनजोदड़ो के आबादी वाले इलाके का कोई घर सड़क पर नहीं खुलता। उनके दरवाजे अंदर गलियों में है। लेखक कहता है कि नगर नियोजन यही शैली आधुनिक शहर चंडीगढ़ में ली कार्बूजिए ने इस्तेमाल की है।(पृ.61) मुअनजोदड़ो के घरों से गंदे पानी की निकासी के लिए बनी होदियों और नालियों के जाल पर लेखक अमर्त्य सेन के शब्द उधर लेकर कहता है कि मुअनजोदड़ो के चार हजार साल बाद तक अवजल निकासी की ऐसी व्यवस्था देखने में नहीं आई।(पृ.63) यहां कुंओं की मौजूदगी के संबंध में वह इरफान हबीब को उद्घृत करता है जो लिखते है कि सिंधु घाटी की सभ्यता संसार में पहली ज्ञान संस्कृति है, जो कुंए खोदकर भूजल तक पहुंची।(पृ.63) बस्ती में घूमते हुए उसका ध्यान इस ओर जाता है कि एक तो कुओं को छोडकर सब कुछ चौकोर या आयताकार है और दूसरे, कमरे आकार में बहुत छोटे हैं और खिड़कियों और दरवाजों पर छज्जे नहीं है। वह इस संबंध में कयास तो लगाता है, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता। मुअनजोदड़ो के संग्रहालय का जायजा लेते हुए लेखक का ध्यान कुछ और बातों पर भी जाता है। एक तो वहां प्रदर्शित चीजों में कोई हथियार नहीं है और दूसरे इन चीजों में प्रभुत्व या दिखावे का तेवर नदारद है। हथियार नहीं होने के संबंध में वह विशेषज्ञों की राय को आधार बनाकर निष्कर्ष निकालता है कि वहां अनुशासन शक्ति आधारित नहीं था। दिखावे का तेवर नहीं होने के संबंध में लेखक का मत है कि यह लो-प्रोफाइल सभ्यता थी, जो लघुता में भी महत्ता का अनुभव करती थी।(पृ.75) मुअनजोदड़ो से जुड़ी उन दो चर्चित गुत्थ्यिों से लेखक भी रूबरू होता है, जिनसे अब तक सभी पुरातत्त्ववेत्ता और इतिहासकार रूबरू हो चुके हैं और कोई निष्कर्ष निकालने में असफल रहे हैं। पहली गुत्थी यह है कि सिंधु सभ्यता खत्म कैसे हो गई। अत्यधिक भूमि दोहन, भूकंप-बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा, जंगलों का विनाश और व्यापार शैथिल्य जैसे कई संभावित कारणों पर विचार के बाद लेखक ताजा भूगर्भगीय अध्ययनों के हवाला देते हुए संभावना व्यक्त करता है कि इसका विनाश समुद्र का स्तर ऊपर उठने से हुआ होगा। समुद्र का स्तर ऊपर उठने से सिंधु का प्रवाह धीमा हो गया होगा और उसमें खेतों में गाद भर गई होगी, जिससे क्षार बढ़ गया होगा।(पृ.83) दूसरी ज्यादा पेचीदा गुत्थी यह है कि वैदिक संस्कृति और सिंधु सभ्यता का संबंध किस तरह का है। दरअसल इस सभ्यता की खोज ने भारतीय इतिहास का ढांचा इस तरह बदला है कि उसके इस आरंभिक चरण को परवर्ती चरणों से जोडना मुश्किल काम हो गया। पुनरुत्थानवादी इतिहासकारों और कल्पनाजीवी साहित्यकारों ने कल्पना की घुड़दोड़ से अर्थ का अनर्थ कर दिया है। लेखक इस संबंध में कोई निष्कर्ष निकालने के बजाय यही कहता है कि अगर देशज-विदेशज की भावुकता के जंजाल में न पड़ें, तो वैदिक संस्कृति और सिंधु सभ्यता, दोनों, भारत के इतिहास की शान है।(पृ.87) लेखक सिंधु सभ्यता की तीसरी गुत्थी उसकी अबूझ लिपि को समझने के प्रयासों का ब्यौरा भी देता है, लेकिन इस संबंध में उसका मत है कि लिपि का रहस्य सिंधु सभ्यता की खोज के पहले जहां था, आज भी वहीं है।(पृ.89) वृत्तांत के उत्तरार्द्ध में लेखक ने सिंधु घाटी सभ्यता के साहित्य में इस्तेमाल की भी खोज-खबर ली है। उसका कहना है कि साहित्य के लोगों ने पुरातत्त्व और इतिहास के लोगों की तुलना में इस संबंध में ज्यादा लिखा है लेकिन पुरातत्त्व का लाभ न उठा पाने से हिंदी में सांस्कृतिक इतिहास की चर्चा अप्रामाणिक ही नहीं, कही-कहीं नितांत काल्पनिक हो गई है।(पृ.93) लेखक ने वासुदेवशरण अग्रवाल की भारतीय कला संबंधी एकाधिक स्थापनाओं को पुरातात्त्विक साक्ष्यों से पुष्ट नहीं होने के कारण गलत माना है। रामविलास शर्मा द्वारा किए गए सिंधु सभ्यता और वैदिक संस्कृति के बेमेल गठजोड़ की भी उसने जमकर खबर ली है। रामविलास शर्मा की यह धारणा कि वैदिक संस्कृति सिंधु सभ्यता से प्राचीन थी लेखक के अनुसार बलूचिस्तान की पहाड़ियों में मिले लगभग नौ हजार साल पहले के सिंधु सभ्यता के शुरुआती दौर के प्रमाण मिलने से निराधार हो जाती है।(पृ.97) डी. डी. कोसांबी और राहुल सांकृत्यायन की आर्य आक्रमणों से सिंधु सभ्यता के विनाश की धारणा को भी लेखक पुरातत्त्व सम्मत नहीं मानता। उसके अनुसार हमले की परिकल्पना प्रत्यक्ष और पारिस्थितिक साक्ष्य से निर्मूल साबित हुई है।(पृ.103) साहित्य में हुए सिंधु सभ्यता के इस्तेमाल के संबंध में अंत में यहीं निष्कर्ष निकलता है कि इतिहास की गाड़ी को कल्पना के घोड़े लगाकार दलदल में फंसाया जा सकता है।(पृ.104)

कराची से मुअनजोदड़ों तक की यात्रा का वृत्तांत और इस बहाने मुअनजोदड़ों और सिंधु सभ्यता की यह मीमांसा कई मायनों में खास है। यह हमारे ज्ञान और समझ को पुर्ननवा करती है और उसमें बहुत कुछ नया भी जोड़ती है। वृत्तांत के आरंभ में लेखक ने वा में उडने और जमीन पर चलने में फर्क होने की जो बात कही है, वह अंत तक उसके जेहन में रही है। उसने आद्यंत हवा में उडने के बजाय अपने पांव पुरातात्त्विक तथ्यों की जमीन पर मजबूती से टिकाए रखे हैं। साहित्यिक संस्कारों के बावजूद उसने अपने कल्पना के घोड़ों को दौडने नहीं दिया है। मुअनजोदड़ो और सिंधु सभ्यता संबंधी अपने विवेचन-विश्लेषण में वह उन सब मत-मतांतरों और संभावनाओं का ब्योरा देता है, जो अब तक सामने आए हैं। खास बात यह है कि वह न तो झटके से किसी खारिज करता है और न ही जल्दबाजी में कुछ स्वीकार करता है। इस संबंध में पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के बीच जो मामले अभी अनिर्णीत हैं, वह उनका केवल ब्योरा देकर आगे बढ़ जाता है। इस सभ्यता की लिपि और रुपांतरण को लेकर उसका रवैया ऐसा ही है। अपनी तरफ से कोई टिप्पणी करने में उसने बहुत संयम बरता है। जहां उसने टिप्पणी की है वहां उसका नजरिया एकदम तथ्यपरक है। इस संबंध में उसने अपने पर्यवेक्षण और अनुभव के साक्ष्य दिए है। सिंधु सभ्यता और उसके बाद विकसित वैदिक संस्कृति की सांस्कृतिक संरचना अलग-अलग है, लेकिन भारतीय जीवन दृष्टि में सिंधु सभ्यता की निरंतरता संबंधी कुछ अंतर्सूत्र उउसने अपनी तरफ से दिए हैं। ये अंतर्सूत्र उसके अपने पर्यवेक्षण पर आधारित हैं। शांति, अहं का विलय, कला के लघु रूप और प्रकृति सानिध्य, सिंधु सभ्यता की ये कुछ बातें भारतीय जीवन दृष्टि में लेखक अनुसार आज भी है। लेखक इसके कुछ और मुखर और प्रत्यक्ष साक्ष्य भी देता है। वह कहता है कि हम आज भी ईंटें उसी आकार में और वैसे ही सेंक कर बरतते है जैसे 5 हजार साल पहले बरती गई थी। खेत, हल, सिंचाई, फसलें, बैलगाडियां, गहने, घर, कुएं, जलनिकास, कला व शिल्प की अनेक परंपराए आज भी वैसी ही चली आती हैं, जैसी तब थीं। मुअनजोदड़ो की ‘नर्तकी’ के बाएं हाथ में कलाई से कंधे तक जो ‘चूड़ा’ है वह भारत और पाकिस्तान के थार में औरतों के हाथों पर आज भी इसी रूप में देखा जा सकता है।(पृ.112) इन अंतर्सूत्रों को आधार बनाकर यह निष्कर्ष निकालना आसान है कि यह सभ्यता खत्म नहीं हुई, इसका रुपांतरण हुआ, लेकिन लेखक ऐसी कोई टिप्पणी करने से भी बचता है। नवीनतम अन्वेषण भी यही कहते है कि सिंधु नदी के बहाव में बदलाव के कारण लोग इस कृषि प्रधान सभ्यता के नगरों को छोडकर भोजन की तलाश यहां-वहां बिखर गए होंगे और उन्होंने ‘कुछ छोडकर और कुछ जोडकर’ जीवन का सिलसिला जारी रखा होगा। लेखक ने एक जगह लिखा भी है कि संस्कृतियां इसी तरह कुछ छोड़ते और जोड़ते हुए आगे बढ़ती है। (पृ.112)

वैदिक संस्कृति से इस सभ्यता की भिन्नता संबंध में पुरातत्त्ववेत्ता और इतिहासकार लगभग एक राय हैं। वैदिक संस्कृति में इस सभ्यता की निरंतरता नहीं होना लेखक को भी विस्मित करता है। लेखक ने अपने पर्यवेक्षण और पुरातत्त्ववेत्ताओं के साक्ष्य से एक संकेत किया है कि यह सभ्यता समाज पोषित थी।(पृ.78) कहीं ऐसा तो नहीं कि वैदिक सभ्यता भी समाज पोषित सभ्यता हो और उपलब्ध साहित्यिक साक्ष्यों की धुंध में उसका यह रूप दब गया हो। यह तो तथ्य है कि वैदिक सभ्यता की अवधारणा के विकास में पुरातात्त्विक साक्ष्यों के साथ साहित्यिक साक्ष्यों की निर्णायक भूमिका है। साहित्यिक साक्ष्यों में कल्पना और आदर्श का पुट आ ही जाता है, यह लेखक ने भी स्वीकार किया है।(पृ.104 ) ब्राह्मण साहित्यिक साक्ष्य दैनंदिन सामाजिक वास्तविकता से कटे हुए थे, यह भी अब सिद्ध हो गया है। वैदिक सभ्यता को साहित्यिक साक्ष्यों से अलग पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार नए सिरे से देखा-परखा जाए तो शायद उसके समाजपोषित होने के साक्ष्य वहां भी मिले। उपनिवेशकाल से पहले हमारी संस्कृति की जीवंतता में समाजपोषण की सर्वोपरि भूमिका थी, इधर के नए अन्वेषणों का निष्कर्ष भी यही है।

आर्य बाहर से आए थे, यह धारणा हिंदुत्ववादी मंसूबों के अनुकूल नहीं थी, इसलिए हड़प्पा और मुअनजोदड़ो की खोज से वे सक्रिय हो गए। उन्होंने ऋग्वैदिक सभ्यता को खींच- खांचकर हड़प्पा पर लाद दिया। विडंबना यह है कि इस संबंध में हिन्दुत्ववादी, मार्क्सवादी और आर्यसमाजी, सब एक हो गए।(पृ.104) हिंदी में रामविलास शर्मा और भगवानसिंह के अन्वेषण की दिशा भी कमोबेश यही थी। यह अच्छी बात है कि लेखक ने सजगतापूर्वक अपनी पडताल की दिशा पुनुरुत्थानवादी नहीं होने दी है। उसने बहुत तार्किंग ढंग से इन सभी प्रयासों की निरर्थकता भी सिद्ध की है। हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा सिंधु सभ्यता को सिंधु-सरस्वती सभ्यता नाम देने का भी उसने विरोध किया है। उसके अनुसार सरस्वती वेदों में जरूर है पर उसका भौतिक और ऐतिहासिक पक्ष अभी खोज के दायरे में है।(पृ97.) वैदिक सभ्यता को हड़प्पा से भी पहले स्थापित करने की रामविलास शर्मा को धारणा भी उसके अनुसार बहुत काल्पनिक है।(पृ.96) नए पुरातात्त्विक साक्ष्य उसके अनुसार इस धारणा के एकदम उलट है।

मुअनजोदड़ो के ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक महत्व पर तो विश्व भर के विशेषज्ञों को ध्यान गया है, लेकिन लेखक की खूबी यह है कि उसने उसके सांस्कृतिक महत्व पर भी रोशनी डाली है। उसके अनुसार यह भारतीय उपमहाद्वीप की साझा विरासत है।(पृ.113) विभाजन के बाद इसका महत्व और बढ़ गया है। यह अलगाव और मतभेदों के बीच भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की सभ्यता के एक होने का सबूत है। लेखक के शब्दों में हमारी विविधता में यह एक केन्द्रीय सूत्र है। (पृ.113) लेखक ने इस संबंध में सिंध के एक नेता का बहुत अर्थपूर्ण कथन उद्घृत किया है जो कहता है कि हम चंद दशकों से पाकिस्तानी हैं, कुछ सदियों से मुसलमान, मगर हजारों साल से सिंधी हैं।(पृ.113)

वृत्तांत का गद्य शानदार है। विवेचन-विश्लेषण और विचार के लिए हिंदी में इस्तेमाल किए जानेवाले भारी भरकम और जलेबीदार वाक्यों वाले गद्य से एकदम अलग, यह छोटे-छोटे वाक्यों वाला, बोलचाल की नाटकीयता से भरपूर बहता हुआ गद्य है। कुछ अटपटे शब्द प्रयोग, जैसे अनुकूलित वायु, अवजलनिकासी आदि चुभते हैं। ये इस किताब की भाषा की प्रकृति के अनुकूल नहीं हैं। धर्मेन्द्र पारे के रेखाचित्र वृत्तांत को पढने-समझने बहुत मदद करते हैं, अलबत्ता इनके शीर्षक नहीं होने से कई बार मुश्किल जरूर होती है। पाठक को रुक कर इनके संबंध में कयास लगाना पड़ता है

समीक्ष्य पुस्तक: मुअनजोदडो, वाणी प्रकाशन, 4695, 21, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण, 2011, पृ.118, मूल्य: 200 रुपए

अक्सर, जुलाई-सितंबर, 2011 में प्रकाशित

Tuesday 12 April 2011

कहानीकार की समाज विवेचना

साहित्य से जुड़े शाश्वत और ग्लोबल किस्म के विषयों में विचार-विमर्श का कोलाहल तो हिन्दी में बहुत है, लेकिन इसमें हमारी जिंदगी को सीधे और तत्काल प्रभावित करने वाले सामान्य मुद्दों पर गंभीर विचार विमर्श और लेखन नहीं के बराबर है। हिंदी के अधिकांश बड़े रचनाकारों का हमारी जिंदगी को बदलने-बनाने में निर्णायक योग देने वाले फिल्म, टीवी, फैशन, संगीत, बाजार आदि मुद्दों पर नजरिया अनदेखी या उपेक्षा का है। वे इन मुद्दों पर विचार और लेखन में अपनी हेठी समझते हैं। इस मामले में नामचीन कथाकार स्वयंप्रकाश का नजरिया शुरू से ही अलग है। उन्होंनेअ अपने कथाकर्म के साथ हमारे देनंदिन जीवन से सीधे जुड़े सरोकारों और समस्याओं पर बहुत मनोयोग और गंभीरता से निरंतर लिखा है। उनकी समय-समय पर लिखी गईं इन आलेख-टिप्पणियों को ही उनकी इस नयी किताब एक कहानीकार की नोट बुक में संकलित किया गया है। इन आलेख-टिप्पणियों में आम हिंदी लेखकों से अलग स्वयंप्रकाश कि अपने समय और समाज पर विचार करते हुए न तो सभी तरह के परिवर्तनों के प्रतिरोध में खड़े होते हैं और न ही किसी नॉस्टेलजिया की गिरफ्त आते हैं। इन आलेख-टिप्पणियों की भाषा भी हिंदी में विचार के लिए आम तौर पर प्रयुक्त पत्थर तोड़ ठोस-ठस भाषा से अलग, बोलचाल के छौंकवाली कहानीकार की सरल और सहज भाषा है।

स्वयं प्रकाश की सोच का दायरा बहुत विस्तृत है। संस्कृति पर विचार करते हुए वे सरकारी हलकों इसको केवल रूपंकर कलाओं का पर्याय और पर्यटन का हिस्सा मान कर इसमें से विचार को बाहर कर देने पर चिंतित हैं। उनके अनुसार रूपंकर कलाओं में विचार और मतभेद के गुंजाइश कम हैं, इसलिए इनका विकास अवरुद्ध है और ये अभी तक मध्यकाल में ही रुकी हुई हैं। कुछ लोगों द्वारा योजनाबद्ध ढंग से संस्कृति में असहमति को असहिष्णुता में बदलने की कशिशों का वे विरोध करते हुए वे कहते हैं कि असहमति भी विचार का एक आयाम है। उनके शब्दों मे “असहमति की अनुपस्थिति रेजीमेंटेशन, दमन और तानाशाही की सूचक होती है।”(पृ.10) भारत को विश्व का सबसे बड़ा बाजार मानकर खुश होने वालों से स्वयं प्रकाश असहमत हैं। वे नियंत्रण मुक्त और स्वेच्छाचारी बाजार की हिमायत करने वालों से अपनी धारणा के औचित्य पर पुनर्विचार का आग्रह करते हैं। उनके अनुसार मुनाफे के लिए जानवर बन जाना बाजारवाद है और इसकी पुष्टि के लिए वे दैनन्दिन जीवन के उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि बाजार के पशुवत आचरण के कारण ही साहित्य में इसका विरोध तेजी से बढ़ रहा है(पृ.13) स्वयं प्रकाश इस किताब में हिंदू हित बात करने वालों की भी अलग ढ़ंग से खबर लेते हैं। वे यह नहीं कहते कि वे क्या करते हैं। वे यह कहते हैं कि यह-यह करना उनका दायित्व है, लेकिन वे इससे भाग कर वो सब करते हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिए। वे हिंदुओं के वैयक्तिक और सामाजिक जीवन से सीधे जुड़े मुद्दों को पाठकों के सामने सिलसिलेवार रखते जाते हैं, जिनकी हिंदू हित की बात करने वालों ने अब तक उपेक्षा की है। अंत मे वे धर्म, संस्कृति और परंपरा की बार-बार दुहाई देनेवाली और क्रांतिकारी सोच रखने वाली ताकतों में किसी एक को चुनने विकल्प पाठकों पर छोड़ देते हैं।(पृ.17) नास्तिक जीवन शैली पर विचार करते हुए वे कहते हैं कि आस्तिक ईश्वर को सिर्फ मानता है, जबकि नास्तिक ईश्वर को मानता भी है और जानता भी है। ईश्वर मनुष्य का उससे अधिक बुद्धिमान और शक्तिशाली निर्माण उनके अनुसार वैसे ही है जैसे गायों का कल्पित ईश्वर किसी बलशाली सांड जैसा होगा।(पृ.19) स्वयं प्रकाश को कलाओं में अराजक किस्म का स्वेच्छाचार भी परेशान करता है, जिसको कुछ लोग लोकतंत्र कह कर जायज ठहराते नजर आते हैं। कलाओं में शास्त्रीय अनुशासन सामंती युग के अवशेष हैं, इसलिए इसके टूटने से वे विचलित नहीं है, लेकिन उनकी चिंता यह है कि अपनी सारी क्षमता और प्रतिभा लगाकर भी आजकल कलाकार कुछ नया और मौलिक करने के बजाय अनुकरण में लगे हुए हैं।(पृ.25) मंचीय कविता के विलुप्त हो जाने पर हिंदी में शायद ही किसी ने विचार किया हो, पर स्वयं प्रकाश इअस कितब में करते हैं। वे सातवें और दसवें दशक के दृश्यों को सिलसिलेवार रखकर कविता की वाचिक परंपरा के फूहड़ हास्य और चूटकलेबाजी तब्दील जाने के यथार्थ से पाठकों को रूबरू करवाते हैं। वे इसके लिए आधुनिक हिंदी कवियों को भी जिम्मेदार ठहराते हैं, जिन्होंने जनता को कविता सुनाना घटिया काम समझकर तीसरे-चौथे दर्जे के कवियों के लिए मंच छोड़ दिया है।(पृ.28) टीवी स्वयं प्रकाश की निगाह में हमारे समाज में हुए वेल्यूशिफ्ट का महत्वपूर्ण उपकरण सिद्ध हुआ है। वे इसके सम्मोहक और निर्णायक प्रभाव से होने वाले सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रकार के परिणामों की तह में जाते हैं। टीवी बच्चों में लिप्सा और इकलखुरेपन को बढावा देता है, लेकिन वे इस सच्चाई को भी स्वीकार करते हैं कि यह जाने के लिए नहीं आया है। इंटरनेट को भी उनके अनुसार आने से रोका नहीं जा सकता। वे इनका विरोध करने वालों की खबर लेते हुए लिखते हैं कि “एक तरफ आप सूचना के अधिकार के लिए संघर्ष करते हैं और दूसरी तरफ क्रांति के विरुद्ध विश्वामित्र बनने की चेष्टा करते हैं।” (पृ.32) फिल्म संगीत में सुरुचि में निरंतर गिरावट से भी वे चिंतित है, लेकिन रीमिक्स की, जैसा अक्सर बुद्धिजीवी करते है, वे आलोचना नहीं करते। आर. डी. बर्मन के संगीत का रीमिक्स उनके अनुसार युवा पीढ़ी को अच्छा लगता है, क्योंकि यह अपने समय में भी सामंती परिवेश से विद्रोह और लोकतंत्र की अभिव्यक्ति था। आर. डी. बर्मन के रीमिक्स धुनों की लोकप्रियता के बारे मे उनकी धारणा है कि यह अतीत की मिठास के संरक्षण के साथ आधुनिकता की खिड़कियां खोलने जैसा है।(पृ.35) स्त्री और दलित विमर्श के बारे में स्वयं प्रकाश का नजरिया एकदम खांटी मार्क्सवादी है। उन्हें जेंडर युद्ध या पितृसता का विरोध सत्ता के विमर्श का ही दूसरा रूप लगता है। इसकी पुष्टि में वे कहते हैं कि सत्तासीन होते ही स्त्री ठीक उसी तरह व्यवहार करने लगती है जिस तरह से सत्तासीन पुरुष करता है। दलित विमर्श के संबंध में भी स्वयं प्रकाश इसी तरह सोचते हैं। कुछ दलित समर्थेकों का यह तर्क कि दलित ही दलित की कथा लिख सकता है, उन्हें सिरे से गलत लगता है। वे इसी तर्क को आगे तक खींचते हुए लिखते हैं कि “मैं मुर्गी की कहानी लिखना चाहूंगा तो आप कहेंगे मुर्गी की कहानी लिखनी है तो पहले अंडा देकर दिखाओ।” वे इन दोनों विमर्शों के संबंध में इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि “जेंडर, जाति, स्थानीयता या संख्या की चेतना का विस्तार वर्ग चेतना को कहीं न कहीं कुंठित करता है।”(पृ.115) इस तरह की सजगता उन्हें हिन्दी की जनवादी-प्रगतीशील कहानी को भीतर से तोड़ने का षडयंत्र लगती है। वे लिखते हैं कि “अब इसे भीतर से तोड़ने की कोशिश की जा रही है। स्त्रियो! तुम इनसे विलग हो जाओ। दलितो! तुम इनसे अलग हो जाओ। इनसे कुट्टी कर लो। देखो हमारी मुठ्ठी में क्या है? आओ, आओ, आओ! शाबाश!” (पृ.105) लोकप्रिय धारावाहिक जस्सी जैसा कोई नहीं पर टिप्पणी में वे इसमें अंतर्निहित साम्राज्यवादी ताकतों के खेल को उजागर करते हैं। वे पाते हैं कि यह लोकप्रिय धारावाहिक मध्यवर्ग को साम्राज्यवादी ताकतों के प्रति वफादार रहने को प्रेरित करता है। अपनी एक और टिप्पणी ‘आदमी में नुक्स है’ में स्वयं प्रकाश टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने वाले एलिमिनेशन गेम्स में अंतर्निहित बारीक पूंजीवादी स्वार्थ को समझने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि यह आदमी को उसकी कमतरी का अहसास दिलाने और फुसलाने का तरीका है। वे लिखते हैं कि “उन्हें उनकी कमतरी और नकारापन का का अहसास दिलाओ। उनसे खुद पूछो कि तुम्हीं बताओ कि तुम में से सबसे ज्यादा नकारा कौन है?” (पृ.134) वे इसी टिप्पणी में कारपोरेट क्षेत्र की लोकप्रिय पुस्तकों हू मूव्ड माय चीज और रिच डैड पुअर डैड जैसी किताबों में पूंजीवादी जीवन दर्शन के प्रचार-प्रसार असलियत रोशनी डालते हैं। हू मूव्ड माय चीज का निष्कर्ष उनके शब्दों में यह है कि “इतिहास और परंपरा पर खाक डालो, समतावादी न्यायपूर्ण समाज की रचना का स्वप्न छोड़ दो, क्षणजीवी बन जाओ और जितना संभव हो उपभोग करो।”(पृ.134) रिच डैड पुअर डैड का संदेश उनके अनुसार यह कि “पैसे के लिए काम मत करो, पैसे को अपने लिए काम करने दो।”(पृ.136) ‘मन में चावै, मूंड हिलावै’ टिप्पणी में स्वयं प्रकाश हिंदी लेखक समाज के पुरस्कारों के संबंध में दोहरे रवैये की अरुंधती राय को मिले बुकर सम्मान के बहाने आलोचना हैं। वे कहते हैं कि “पुरस्कारों को धिक्कारते सब हैं, लेकिन कोई यह घोषणा नही करता कि मुझे मिलेगा तो मैं नहीं लूंगा। फिर वितृष्णा के इस पाखंड की भी क्या जरूरत है?”(पृ.110)

पुस्तक में स्वयंप्रकाश ने अपने समय के साहित्यिक सरोकारों और माहौल पर भी विचार किया है। खास तौर पर अपने अनुशासन कहानी के संबंध में इस पुस्तक में उनके एकाधिक लेख और टिप्पणियां हैं। वे यह स्वीकार करते हैं कि लंबे समय तक केवल संघर्ष को सरोकार बना लेने से हिंदी कहानी में प्रेम की उपेक्षा हुई है। कथादेश और लोकायत पत्रिकाओं के प्रेमकथा विशेषांकों में प्रकाशित कहानियों में वे पहले क्या नहीं है और क्या है का ब्यौरा पेश करते हैं और फिर कहानीकारों के ‘डूब कर’ प्रेम कथाएं न लिख पाने के कारणों की तह में जाते हैं। इसके कारण गिनाते हुए वे कहते हैं कि एक तो हिंदी भाषी समाज भयानक रूप से दमित-कुंठित और वर्जनाग्रस्त है दूसरे, यह असहिष्णु और हिंसा प्रेमी है। इस कारण हिन्दी का कहानीकार का नजरिया इस संबंध में दो टूक नहीं है। वे ज्ञान चतुर्वेदी के शब्दों में कहते हैं कि “सब दिखाओ पर तरीके से। काम कायदे का हो, चाहे फालतू हो। कहानी से लुच्चापन न झांके। लुच्चापन बना रहे, पर झांके न!.... पाठक मुंह फाड़ कर जुमहाइयां लेता रहे, वह उत्तेजित न हो जाए। हिन्दी साहित्य के पाठक की लंगोट की रक्षा करना हमारा प्रथम कर्तव्य है।”(पृ.55) आज की हिंदी कहानी को स्वयं प्रकाश सोवियत संघ और पूर्वी यूरोपीय सत्ताओं के पतन, संचार क्रांति और वैश्वीकरण जैसी परिघटनाओं से प्रभावित मानते हैं। इस माहौल में उनके अनुसार दो तरह की कथा पीढियां सामने आई हैं। एक बाजारवादी पीढ़ी है, जिसको व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशकों ने खूब हवा दी है, जबकि दूसरी पीढ़ी प्रगतिशील-जनवादी कहानीकारों की है, जो नवसाम्राज्यवाद के प्रतिरोध में खड़ी है।(पृ.88) हिंदी में व्यंग्य की समृद्ध परंपरा के सूख जाने की पड़ताल के लिए वे हमारे सामाजिक सोच में हो रहे बदलावों की तह में जाते हैं। वे कहते हैं कि अब सब कुछ जान लेने के बावजूद न्याय व्यवस्था बाहुबलियों के समक्ष लाचार नजर आती , इसलिए व्यंग्य का स्थान आक्रोश और गालियों ने ले लिया है। उनके अपने शब्दों में “हम हंसने की सलाहियत खो चुके है।”(पृ.73) हरिशंकर परसाई के बारे में उनकी धारणा बहुत ऊंची है। उनके अनुसार हास्य-विनोद में स्खलित हो चुके व्यंग्य को भारतेंदु युग की गौरवशाली परंपरा से जोड़कर परसाई ने संस्कारित किया और इसे एक स्वतंत्र विधा की प्रतिष्ठा हिलाई। वे मान हैं कि परसाई को यह खास की हैसियत भारतीय जनसाधारण की उनकी गहरी समझ, आडंबरहीनता, करूणा और स्वाभिमान से मिली है।(पृ.91) प्रेमचंद की परंपरा पर कलावादियों के कब्जे के प्रयास पर लिखी उनकी टिप्पणी का स्वर बहुत उग्र है। प्रेमचंद को केवल ‘कफन’ में रिड्यूज करके देखना उनके अनुसार नादानी नहीं, बदमाशी है।(पृ.125) लेखक संगठनों की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए वे उनकी समर्थक पार्टियों की भी खबर लेते हैं। उनके अनुसार वामपंथों राजनीतिक दलों ने भी अपनी पहले की चमक और प्रखरता खो दी है और अनेक बातों में उनका सोच और आचरण किसी भी अन्य बूर्ज्वा पार्टी से बहुत ज्यादा भिन्न नहीं दिखाई देता।(पृ.138)

मनुष्य और कहानीकार के रूप में स्वयंप्रकाश के जड़ें अपनी जमीन में है। उनकी सोच-समझ का खाद-पानी इसी जमीन से आता है। वे अपनी धारणाओं की पुष्टि के लिए तर्क अपने पास के दैनंदिन जीवन से ही जुटाते हैं। इस कारण उनका पाठक उनके तर्कों से अनायास सहमत हो जाता है। सोच-विचार की उनकी पद्धति आडंबरहीन है- वे एक के बाद एक सवाल रखते चले जाते हैं और फिर उनके सभी संभावित उत्तर देते हुए युक्तिसंगत निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। इस पद्धति में वे विरोधी के तर्क को भी पूरा विस्तार और असहमियत देते हैं। कभी-कभी वे तर्क को खींचकर बहुत दूर तक ले जाते हैं। उनका तर्क का यह खेल देखना हो, तो दलित विमर्श पर लिखी गई उनकी टिप्पणी ‘बात निकलेगी..’ पढ़ना चाहिए। निंदा और सराहना में भी वे कभी-कभी बहुत दूर तक चले जाते हैं। उनकी टिप्पणी ‘प्रेमचंद की परपंरा का सवाल’ इसका अच्छा उदाहरण है। अलग-अलग समय और जरूरतों के लिए लिखी गईं इन आलेख-टिप्पणियों के सोच-विचार में कुछ अन्तर्विरोध रह गए हैं। एक जगह वे साहित्य और कलाओं के अधिरचना होने का हवाला देते हैं(पृ.86) और इनमें हो रहे बदलावों को सहज और स्वाभाविक ठहराते हैं, लेकिन एक दूसरी टिप्पणी में कुछ साहित्यिक विधाओं के लोप पर उनका क्षोभ समझ में नहीं आता। (पृ.57) प्रौद्योगिकी और समाजार्थिक बदलावों से साहित्यिक विधाओं का लोप, अनुकूलन और रूपांतरण सहज-स्वाभाविक है, लेकिन इस टिप्पणी में उनका मिटते जाना उनको व्यथित और चिंतित करता है। इसी तरह हिन्दी भाषा में हो रहे बदलावों की सहजता को लेकर भी वे दुविधाग्रस्त लगते हैं। उनके लिए यह भाषा को भ्रष्ट करना भी है और उसे संप्रेषणीय और अनौपचारिक बनाना भी है।(पृ.69) टिप्पणी ‘आखिर हिंदी नाटक कहां चला गया’ में वे हिंदी में अच्छे नाटक नहीं है की जगह हिंदी में अच्छे नाटक क्यों नहीं है पर विचार करते हैं, लेकिन इसके कारणों की गहराई और विस्तार में जाने के बजाय वे इसका ठिकरा राष्ट्रीय नाटय विद्यालय के फोड़ देते हैं, जो बहुत युक्तिसंगत नहीं लगता। (पृ.45)

हिंदी में सोच-विचार ठोस-ठस भाषा करने का रिवाज है, लेकिन स्वयं प्रकाश के इन आलेख-टिप्पणियों की भाषा ठोस-ठस नहीं है। यह दैनंदिन जीवन के खट्टे-मीठ अनुभवों की आंच में तप कर बनी बोलचाल की व्यंजना और तनाव से भरी-पूरी असरदार भाषा है। दरअसल दैनंदिन जीवन की भाषा के मुहावरे और व्यंजना के इस्तेमाल का जो महारत स्वयं प्रकाश को हासिल है वो हिंदी में अन्यत्र दुर्लभ है। सरयूपारी या और किसी वेरायटी के ब्राह्मण के घर पैदा हो जाते, इनमें से अधिकांश श्री गुलशन नंदा की मौसी के लड़के साबित हो जाऐंगे, जिस देश के राष्ट्रपति को नौकरानी के घाघरे पर वीर्यपात करने में शर्म नहीं आए और उसे लोटा ले लेकर जंगल जाने पर टट्टी नहीं उतरती थी जैसे सीधे दैनंदिन जीवन से उठाए हुए बोलचाल की भाषा के तत्काल असर करने वाले प्रयोग स्वयं प्रकाश के यहीं मिलेंगे।

यदि विचार है तो अक्सर उसका विषय गुरु और गंभीर होगा, उसकी भाषा जटिल और कठिन होगी और यह उबाऊ और नीरस होगा। यह किताब ऐसी तमाम धारणाओं का प्रत्याख्यान करती है। इसमें गंभीरता का आडंबर नहीं है, यह सरल और बोलचाल की भाषा में है और खास बात यह है कि यह पढ़ने के दौरान मनहूसियत के बजाय आनंद और उत्साह का संचार करती है।


समीक्ष्य पुस्तक: स्वयं प्रकाश: एक कहानीकार की नोटबुक, अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ-IV, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.), पहला पेपरबैक संस्करण, 2010, मूल्य: 120 रुपए, पृ.151