Tuesday 17 February 2009

चंद्रधर शर्मा गुलेरी होने का मतलब

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानियां हमारी विरासत का हिस्सा है। विरासत के साहित्य की आलोचना और मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि यह अपने समय से कितना आगे है। मतलब यह कि अपने समय के साहित्य की प्रचलित रूढ़ियों का अतिक्रमण कर इसने अपने को जीवंत और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए कथ्य, शिल्प, भाषा और तकनीक के स्तर पर कुछ नवीन और मौलिक संभव किया है या नहीं ? गुलेरी की साहित्यिक सक्रियता की अवधि कम है। उनका जन्म 1883 ई. में हुआ और 1922 ई. में उनका निधन हो गया। उन्होंने कुल तीन ही कहानियां लिखीं। पहली सुखमय जीवन 1911 ई. में भारत मित्र में छपी। दूसरी उसने कहा था, जो उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ कहानी है, 1915 ई. में छपी। उनकी तीसरी कहानी बुद्ध का कांटा है। यह हिंदी कहानी के विकास का आरंभिक समय था। प्रेमचंद इस समय सक्रिय थे, लेकिन उन्होंने अपनी श्रेष्ठ यथार्थदर्शी कहानियां बाद में लिखीं। 1915 ई. प्रकाशित पंच परमेश्वर कहानी उनकी कहानी-कला के उत्कर्ष की प्रतिनिधि रचना नहीं है। इससे पूर्व की उनकी कहानियां बहुत अनगढ़ और अपरिपक्व कहानियां हैं। किशोरीलाल गोस्वामी की इंदुमती रामचंद्र शुक्ल की ग्यारह वर्ष का समय और बंग महिला की दुलारी बाई जैसी कहानियां सही मायने में कहानियां नहीं हैं। दरअसल इनका ढ़ांचा पारंपरिक है- इनमें अलौकिक चमत्कार, कूतुहल, शिक्षा-उपदेश, त्याग-बलिदान और प्रेम-वियोग आदि के वृत्तांत हैं। सबसे खास बात यह है कि कहानीकार की मौजूदगी इनमें बहुत मुखर है।

गुलेरी की कहानी-कला अपने समय इस कहानी-कला से आगे की है। गुलेरी पर भी अपने समय का प्रभाव है-उसकी प्रचलित रूढ़ियों का साफ प्रभाव उनकी पहली कहानी सुखमय जीवन पर है। यह कहानी वैसी ही है जैसी उस दौर की अन्य कहानियां हैं। यह कहानी नहीं, वृत्तांत भर है-इसमें शिल्प और तकनीक का कोई मौलिक नवोन्मेष नहीं है। लेकिन उन्होंने अपनी अगली कहानी उसने कहा था में अपने समय को बहुत पीछे छोड़ दिया है। शिल्प और तकनीक का जो उत्कर्ष प्रेमचंद ने अपने जीवन के अंतिम चरण में 1936 ई. के आसपास कफन और पूस की रात में अर्जित कि नहीं या है, गुलेरी ने इस कहानी में उसे 1915 ई. में ही साध लिया। यह यों ही संभव नहीं हुआ। इसे संभव किया गुलेरी के असाधारण व्यक्तित्व ने। गुलेरी 1915 ई में महज 32 वर्ष के थे। युवा होने के कारण उनमें नवाचार का साहस था। उम्र-दराज आदमी जिस तरह की दुविधाओं और संकोचों से घिर जाता है, गुलेरी उनसे सर्वथा मुक्त थे। अंग्रेजी कहानी इस समय अपने विकास के शिखर पर थी और उसमें प्रयोगों की भी धूम थी, जिनसे गुलेरी बखूबी वाकिफ थे। कम लोगों को जानकारी है कि गुलेरी उपनिवेशकाल में अंग्रेजों द्वारा सामंतों की शिक्षा के लिए अजमेर में स्थापित विख्यात आधुनिक शिक्षण संस्थान मेयो कॉलेज में अध्यापक थे और आधुनिक अंग्रेजी साहित्य के अच्छे जानकार थे। दरअसल नवाचार के साहस और आधुनिक अंग्रेजी साहित्य की विशेषज्ञता के कारण ही गुलेरी अपने समय से आगे की कहानी लिख पाए।

टॉमस मान एक जगह कहते हैं- ´´घटना आपके साथ हो सकती है, हुई होगी। बहुत-सी घटनाएं मेरे साथ होती हैं, वे आर्ट नहीं हैं। आर्ट तो मैं उसे अपनी प्रक्रिया से गुजारकर बनाऊंगा।´´ गुलेरीजी की कहानी-कला की खासियत यही है। पहले की और उनके अपने समय की कहानियों में घटनाएं हैं-उनके ब्यौरे और वृत्तांत हैं। गुलेरी पहली बार घटनाओं को एक प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का-कहानी का रूप देते हैं। यह हिंदी कहानी में एक तरह से पहली बार होता है। गुलेरी घटनाओं को आर्ट का रूप देने-कहानी बनाने के लिए जिस प्रक्रिया से गुजारते हैं उसमें सबसे पहला काम वे यह करते हैं कि वे अपने कहानीकार को अदृश्य कर देते हैं। उनकी कहानी में कहानीकार अपनी तरफ से बहुत कम बोलता है। उसमें दृश्य आते हैं, संवाद आते हैं, वस्तुस्थितियां आती हैं और कभी छोटी-मोटी टीप से कहानीकार इनको आपस में जोड़ देता है। उसने कहा था इस लिहाज से निर्दोष कहानी है। कहानीकार यहां लगभग अनुपस्थित है। वह वस्तुस्थिति को जीवंत दृश्यों के चाक्षुष बिंबों साक्षात कर देता है। इस कहानी का नायक बालक लहनासिंह जब सुनता है कि “कुड़माई हो गई” तो वह विचलित हो जाता है, लेकिन कहानीकार उसके इस विचलन के कारण होने वाले क्षोभ का यह कहकर वर्णन नहीं करता कि उसे क्रोध आ गया या वह परेशान हो गया। वह इस विचलन या क्षोभ को चाक्षुष बिम्बों से सम्मूर्त करता है। वह लिखता है- ´´रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया व एक छबड़ीवाले की दिनभर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले ठेले में दूध उड़ेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई, तब कहीं घर पहुंचा।´´ खास बात यह है कि इस कहानी में कहानीकार की अपनी टीप-टिप्पणियां गिनी-चुनी ही हैं। कहानी का दूसरा और तीसरा भाग तो संवादों से आगे बढ़ता है। कहानी का आरंभ, जिसमें 1890 ई. के अमृतसर शहर के बाजार का दृश्य है, बहुत जीवंत बन पड़ा है।

कहानी में वृत्तांत की तकनीक बहुत पुरानी है। गुलेरी ने खुद सुखमय जीवन में इसको काम में लिया था। पहले यह हुआ, उसके बाद यह और अंत में यह। गुलेरी को वृत्तांत को प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का रूप देना था, इसलिए उन्होंने यह तकनीक छोड़कर दूसरी अधिक कारगर तकनीक, जिससे घटना अपनी यथार्थ नाटकीयता में खुल जाए, अपनायी। उसने कहा था में उन्होंने घटनाओं की यथार्थ निरंतरता के क्रम को बदल दिया। सबसे पहले उन्होंने बालक लहनासिंह और आठ वर्षीय बालिका के बीच बने अस्पष्ट रागात्मक संबंध को उठाया। कहानी का दूसरा भाग पच्चीस वर्ष बाद फ्रांस की भूमि पर युद्ध के मोर्चे पर डटे सिक्ख सिपाहियों की बातचीत से शुरू होता है। इनमें सुबेदार हजारासिंह, उसका बेटा बोधासिंह और लहनासिंह शामिल हैं। लहनासिंह मोर्चे पर स्वयं कष्ट सहकर बोधासिंह और हजारासिंह के कुशल क्षेम के लिए समर्पित है। कहानी के तीसरा भाग महत्वपूर्ण है। यहीं आकर कहानी का विकास होता है-जर्मन सैनिकों के हमले से घायल लहनासिंह बीमार बोधासिंह और उसके पिता सूबेदार हजारासिंह को मोर्चे से वापस भेज देता है। अब घायल और मरणासन्न लहनासिंह अर्धचेतन अवस्था में लगभग सपने में अतीत को समरण करता है। यहीं आकर पहली बार पाठक को पता चलता है कि अमृतसर बाजार की आठ वर्षीय बालिका, जो अब सूबेदार हजारासिंह की पत्नी और बोधासिंह की मां है, को लहनासिंह ने एक भेंट में दोनों की रक्षा करने का वचन दिया था। कहानी घटनाओं की निरंतरता में आए व्यवधान से रोचक और नाटकीय हो जाती है। उसका उत्कर्ष इस व्यवधान से और पुष्ट और प्रभावी हो जाता। सुबेदार की पत्नी होरों से लहनासिंह की भेंट की घटना कहानीकार फ्लेशबैक पद्धति से बयान करता है। यह घटना फ्लेशबैक से आयी हुई होकर भी घायल और मरणासन्न लहनासिंह के अर्धचेतन अवस्था में निकले संवादों में गुंथकर आर्ट का रूप ले लेती है। हिंदी कहानी में फ्लेशबैक का भी यह शायद पहला इस्तेमाल है।

ब्यौरों या विवरणों की भाषा में जान नहीं होती। अक्सर वे अन्य व्यक्ति का कथन या बयान होते है। गुलेरी की कहानी उसने कहा था में ब्यौरे नहीं हैं। इसमें चाक्षुष बिंब है, इसमें संवाद और संवादों से सम्मूर्त होती वस्तुस्थितियां हैं, इसलिए इसकी भाषा में भी जान है। इसमें जीवन की हलचल और जीवन का ठंडा-गर्म है। गुलेरी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के गुलेर गांव के रहने वाले थे, इसलिए अमृतसर की संस्कृति और भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। उसने कहा था की जान इसमें विन्यस्त पंजाबी भाषा और उसका मुहावरा है। छोटे-छोटे वाक्यों वाली बोलचाल की, रोजमर्रा व्यवहार की पंजाबी जबान के छौंक ने इस कहानी को बहुत असरदार बना दिया है। इस कहानी की खड़ी बोली में यह मुहावरा इस तरह घुलमिलकर या रच-बसकर आया है कि उसके पंजाबी होने का अलग से अहसास ही नहीं होता।

प्रेम उदातीकृत रूप में गुलेरी के पहले की और उनके समय की कई कहानियों मे आया था। गुलेरी की खासियत यह है कि उन्होंने इसे प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का रूप दिया। यह आर्ट कहानी की आर्ट थी और हिंदी में इसे पहली बार इसे गुलेरी ने संभव किया।

डेली न्यूज,15फरवरी,2009 के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग में प्रकाशित