Wednesday 11 March 2009

यादों से बुनी और बनी रचना

संस्मरण फिलहाल एक लोकप्रिय साहित्य विधा है। लोगों में संस्मरण लिखने की होड़ लगी हुई है। हिंदी में भी संस्मरण खूब लिखे जा रहे हैं। संस्मरणों की बढ़ती हुई लोकप्रियता पर टिप्पणी करते हुए विलियम जिंसर लिखते है कि ´´यह संस्मरण का युग है। बीसवीं सदी के अंत से पहले अमरीकी धरती पर व्यक्तिगत आख्यान की ऐसी जबर्दस्त फसल कभी नहीं हुई थी। हर किसी के पास कहने के लिए एक कथा है और हर कोई कथा कह रहा है।´´ हिंदी के रचनाकार भी संस्मरण लिखने में हाथ आजमा रहे है। विश्वनाथप्रसाद त्रिपाठी, काशीनाथसिंह आदि लेखकों ने हिंदी में संस्मरण विधा को नयी पहचान दी है।

संस्मरण, वर्तमान मे अतीत के बारे में लिखे जाते हैं। संस्मरण स्मृति पर आधारित होता है। संस्मरण लेखक अपने जीवन से संबंधित किसी घटना, व्यक्ति, अनुभव आदि की स्मृति के आधार पर पुनर्रचना करता है। संस्मरण अतीत और दोनों से संबंधित होता है। संस्मरण लेखक अतीत और वर्तमान के आधार पर अतीत की स्मृतियों को खोजता-खंगालता है और उनमें से किसी एक पर अपने को एकाग्र करता है। यह एकाग्रता व्यक्ति, घटना आदि किसी पर भी हो सकती है। संस्मरण में संपूर्ण जीवन नहीं होता। इसमें जीवन का कोई खंड या टुकड़ा ही आ पाता है। जीवन का कोई खास समय या घटना या व्यक्ति संस्मरण में उभरकर सामने आता है।

संस्मरण और सच्चाई में गहरा संबंध है। सच्चाई संस्मरण की पहचान है। पाठक संस्मरण में दिलचस्पी इसलिए लेते हैं, क्योंकि यह सच के करीब माना जाता है। संस्मरण में सच्चाई या यथार्थ स्मृति के माध्यम से आता है और कुछ लोगों का मानना है कि स्मृति में सच्चाई दब या कट-छंट जाती है इसलिए संस्मरण सच नहीं होता। स्मृति वर्तमान अतीत का स्मरण है इसलिए यह वर्तमान से आविष्ट और प्रभावित होती है और सच इसमें विकृत से जाता है। स्मृति और सच कथाकार अरुणप्रकाश के शब्दों में ´´एक दूसरे के रिश्तेदार जरूर है, पर ये जुड़वां संतानें तो कतई नहीं है।´´ स्मृति पूर्ण सत्य नहीं है इसलिए संस्मरण में सत्य नहीं, अक्सर सत्यांश होता है। विख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार एंथनी पॉवेल ने इसीलिए एक जगह लिखा है कि ´´संस्मरण कभी भी पूरी तरह सच नहीं हो सकते, क्योंकि बीती हुई हर बात, हर घटना, हर परिस्थिति को संस्मरण में शामिल करना संभव नहीं है।´´

संस्मरण सहित सभी कथेतर गद्य विधाएं अपनी वस्तुपरकता के लिए जानी जाती हैं। कथाप्रधान साहित्यिक विधाएं, जैसे कहानी, नाटक, उपन्यास आदि में कल्पना सर्वोपरि होती है, लेकिन संस्मरण पूरी तरह कल्पना पर निर्भर नहीं होते। संस्मरण में तथ्य और वस्तुपरकता न हो तो, उसका महत्व कम हो जाएगा। संस्मरण लेखक अपनी स्मृति के सहारे अतीत को इस तरह पुनर्जीवित करता है कि कुछ हद तक उसकी वस्तुपरकता बनी रहती है। यह सही है कि वर्तमान के राग-विराग और सरोकार संस्मरण में अतीत को पूरी तरह तथ्यात्मक और वस्तुपरक नहीं रहने देते, लेकिन पाठक फिर भी उसमें तथ्यों की तलाश करता ही है। संस्मरण लेखक का आत्म, उसका दृष्टिकोण अक्सर यथार्थ की वस्तुपरकता को प्रभावित करता है। यहीं कारण है कि दो भिन्न संस्मरणकार एक यथार्थ को कई बार अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। कुछ लोगों के अनुसार तो संस्मरण वस्तुपरक नहीं, आत्मपरक लेखन है।

संस्मरण कलात्मक कथा साहित्य की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन इसके शिल्प ढांचे का इस्तेमाल इनमें होता है। संस्मरण में रोचकता और पठनीयता बनाए रखने के लिए संस्मरण लेखक अक्सर कथा तत्त्वों का इस्तेमाल करता है। वह संवाद, नाटकीयता और भाशायी कौशल का इस्तेमाल करके संस्मरण की पाठकों के लिए रोचक और पठनीय बनाता है। उर्दू में इस्मत चुगताई और हिंदी में काशीनाथसिंह, विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी आदि के संस्मरणों में कथा तत्त्वों का खूब इस्तेमाल हुआ है। इस्मत के संस्मरण अपनी नाटकीयता और भाशायी कौशल के कारण बहुत रोचक और पठनीय हो गए हैं। काशीनाथसिंह के संस्मरणों में रोचकता का तत्व बहुत अधिक है। उनकी संस्मरण पुस्तक काशी का अस्सी आद्यंत पठनीय है। चरित्रांकन, वातावरण निर्माण आदि भी कथात्मक विधाओं के तत्व है, जिनका प्रयोग संस्मरणों में होता है। महादेवी के संस्मरणों में चरित्रांकन बहुत अच्छी तरह से हुआ है। यह सही है कि संस्मरण में तथ्य और यथार्थ जरूरी है, लेकिन कथात्मक विधाओं के संवाद, नाटकीयता, चरित्रांकन, भाशायी कौशल आदि तत्वों से इनमें रोचकता और पठनीयता आ जाती है।

संस्मरण का स्वरूप और चरित्र अब बहुत बदल गया है। कभी संस्मरण का उद्देश्य प्रेरणा होता था, विख्यात और महान व्यक्ति अपने जीवन के संस्मण पे्ररणा देने के लिए लिखते थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है। अब संस्मरण जीवन के अज्ञात प्रसंगों-प्रकरणों के अनावरण की विधा हो गई है। अब कई बार संस्मरण का उपयोग लोग दृश्य पर अपनी उपस्थिति को ध्यानाकर्षक बनाने के लिए भी करते हैं। वे लोग जो विमर्श में नहीं हैं, इसमें अपनी वापसी के लिए भी संस्मरण लिखते हैं। विख्यात लेखक देनियल हेरिस के अनुसार ´´संस्मरण खुद के हाशियाकरण से निबटने की कोशिश है।´´ हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका हंस में प्रकाशित मेरे विश्वासघात श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित संस्मरण कमोबेश ऐसे ही हैं। संस्मरण अब साहित्य की परिधि से निकल कर जीवन के दूसरे क्षेत्रों में पहुंच गए है। फिल्म अभिनेता, क्रिकेट खिलाड़ी, उद्योगपति और राजनेता भी अब अपने संस्मरण लिख रहे है।

संस्मरण ऐसी साहित्यिक विधा है, जिसका कहानी, उपन्यास, नाटक आदि से आदान-प्रदान और अंतर्क्रिया का रिश्ता है। आत्मकथा और डायरी तो इसकी सहोदर विधाएं हैं। आत्मकथा तो एक तरह से संस्मरण ही है। यह अवश्य है कि संस्मरण आत्मकथा की तुलना में बहुत छोटा होता है। कुछ लोग संस्मरण को आत्मकथा का फ्लैश कहते है। जीवनी भी संस्मरण की साथी विधा है, क्योंकि दोनों अतीत पर एकाग्र हैं। संस्मरण अपने संबंध में खुद लेखक लिखता है, जबकि जीवनी दूसरे के द्वारा लिखी जाती है। रेखा चित्र तो कभी-कभी संस्मरण जैसे ही लगते हैं। यों रेखाचित्र में स्टिल लाइफ होती है, लेकिन बहुत यह संस्मरण जैसा हो जाता है। डायरी पश्चिम की लोकप्रिय साहित्यिक विधा है, लेकिन हिंदी में अभी इसकी जड़ें मजबूत नहीं हुई हैं। यह भी संस्मरण की निकट विधा है, अलबत्ता इसका पृथक् अनुशासन है। यह संस्मरण की तुलना में लंबी होती है और इसमें लेखक वर्तमान के साथ आगे बढ़ता है।

हिंदी में शुरू से ही संस्मरण लिखे जाते रहे हैं। अन्य कथेतर गद्य विधाओं की तुलना में संस्मरण की हिंदी में समृद्ध परंपरा है। आरंभिक संस्मरण लेखकों में पदमसिंह शर्मा, जनार्दन प्रसाद द्विज और शांतिप्रसाद द्विवेदी हैं, जिनकी क्रमश: पदमराग (1929), चरित्र रेखा (1943) और पंच चिह्न (1946) नामक संस्मरण रचनाएं उल्लेखनीय हैं। हिंदी संस्मरण को पहचान महादेवी वर्मा ने दी। उनकी दोनों कृतियों-स्मृति की रेखाएं (1943) और अतीत चलचित्र (1941) को हिंदी जगत में व्यापक सम्मान मिला। मोहनलाल महतो वियोगी, प्रभाकर माचवे और विष्णु प्रभाकर ने संस्मरण लिखे हैं। आजादी के बाद संस्मरण लेखन में गति आई। इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम राजेन्द्र यादव, कृश्णा सोबती, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथसिंह और कशीनाथ सिंह ने किया है। कृष्णा सोबती की हम हशमत, राजेन्द्र यादव की औरों के बहाने, रवीन्द्र कालिया की सृजन के साथी और दूधनाथसिंह की लौट आ ओ धार नामक संस्मरण कृतिर्यों की साहित्यिक जगत में खूब चर्चा हुई है। हिंदी संस्मरण विधा को नए रूप और चरित्र के साथ इधर काशीनाथ सिंह ने प्रस्तुत किया है। उनकी रचना याद हो कि न याद हो और काशी के अस्सी ने संस्मरण के स्वरूप और आस्वाद को कुछ हद तक बदल दिया है। विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी की संस्मरण पुस्तक नंगातलाई का गांव की भी हिंदी में खूब चर्चा हुई है।