Thursday 1 May 2008

सिरोही राज्य में 1857 का सैनिक विद्रोह

1857 का विद्रोह देशव्यापी तो था, लेकिन उस समय क्षेत्रीय विषमताएं इतनी ज्यादा थीं कि यह विद्रोह सभी क्षेत्रों में एकरूप ढंग से नहीं हुआ। खास तौर पर राजस्थान, जहां हालात बंगाल, बिहार, अवध, दिल्ली आदि की तुलना में बहुत अलग थे, यह विद्रोह व्यापक जनसहभागिता वाली किसी मुहिम या संघर्ष का रूप नहीं ले पाया। यहां यह भिन्न परिस्थितियों के कारण केवल ब्रिटिश सेना के असंतुष्ट देशी सैनिकों और कुछ हद तक सामंत शासकों से निजी कारणों से नाराज जागीरदारों के विद्रोह तक सीमित रह गया। खास बात यह है कि इन जागीरदारों ने भी बहुत खुलकर अंग्रेजों की मुखालपत करने से परहेज किया। आऊवा और कोटा के विद्रोह में जनसाधारण की सहभागिता के जो साक्ष्य दिए जाते हैं वे सही मायने में किसी राजनीतिक चेतना से प्रेरित नहीं थे। प्रस्तुत आलेख में तत्कालीन राजपुताना के गुजरात की सीमा से लगे हुए सिरोही राज्य की ऐरिनपुरा छावनी के जोधपुर लीजन के सैनिकों के विद्रोह का अध्ययन है। यह अध्ययन यह संकेत करता है कि अलग प्रकार के हालात के कारण यहां विद्रोह में जनसाधारण की भागीदारी बिलकुल नहीं थी। खास बात यह है कि इस विद्रोह से यहां के जनजीवन पर भी कोई असर नहीं पड़ा। कुछ सीधे राज्य के कामकाज से जुड़े अभिजात तबके के अलावा अन्य किसी को इसकी जानकारी भी नहीं हुई। सिरोही राज्य से व्यक्तिगत कारणों से नाराज दो बागी जागीरदार ठाकुरों ने विद्रोही सैनिकों को उकसाया, पर वे भी खुलकर उनके साथ नहीं हुए।
ब्रिटिश सरकार और सिरोही
राजपुताना के दक्षिण-पिश्चम में गुजरात की सीमा से लगा हुआ सिरोही राज्य मराठों-पिंडारियों की लूटपाट और आतंक से तो अछूता रहा, लेकिन इसके बावजूद उन्नीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में यहां के हालात बहुत खराब और चिंताजनक थे। पड़ोसी राज्य जोधपुर के निरंतर आक्रमण, जागीरदारों के स्वेच्छाचार और भील-मीणों की लूटपाट से यहां पूरी तरह अव्यवस्था हो गई थी। उदयभाण 1807 में सत्तारूढ हुआ लेकिन राज्य में प्रशासन कायम करने के बजाय उसकी दिलचस्पी रागरंग में थी।1 जोधपुर नरेश मानसिंह की मंशा सिरोही को अपने राज्य में मिलाने की थी इसलिए वह निरंतर आक्रमण और लूटपाट से इसको कमजोर करने में लगा हुआ था। उसने 1812 में सेना भेजकर आक्रमण किया और लूटपाट की। उसने तीर्थ यात्रा से लौटते हुए उदयभाण को पाली में गिरफ्तार करवाकर जोधपुर में तीन माह तक नजरबंद रखा। इस दौरान उसने उदयभाण से सिरोही के जोधपुर के अधीन होने की तहरीर भी लिखवा ली।2 जोधपुर नरेश ने 1816 में फिर सेना भेजकर सिरोही के भीतरोट परगने को तबाह कर दिया। 1817 में उसकी सेना ने फिर भीषण आक्रमण किया और इस बार लूटपाट निरंतर दस दिन तक जारी रही। यह सेना सिरोही से लगभग ढाई लाख का माल-असबाब लेकर जोधपुर लौटी। सिरोही नरेश को इस दौरान पहाड़ों में शरण लेनी पड़ी।3 निरंतर आक्रमणों से हालत इतनी खराब हो गई थी कि राज्य में आबाद गांव गिनती के ही रह गए थे।4 अंतत: सिरोही के जागीरदार एकमत होकर उदयभाण के छोटे भाई नादिया के जागीरदार ठाकुर िशवसिंह के पास गए और उससे राज्य का प्रबंध अपने हाथ में लेने का आग्रह किया। 1817 में शिवसिंह ने उदयभाण का नजर कैद कर राज्य का प्रबंध अपने हाथ में ले लिया।5 राज्य में इस समय माहौल अराजकता का था और इसका राजस्व केवल 60 हजार रुपए वार्षिक रह गया था। गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार देश उजड़-सा गया था और राज्य की इतनी ताकत न थी कि प्रजा के जान-माल की रक्षा कर सके।6 चोरी-डकैती राज्य के भील-मीणों की आजीविका के मुख्य स्त्रोत थे। ये सिरोही सहित पड़ोसी जोधपुर और पालनपुर राज्यों में लूटपाट करते थे। जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट पीण्वाईण् वाघ ने अपने समाचार लेखकों के साक्ष्य से सिरोही राज्य के बिगड़ते हालातों के संबंध में एकाधिक बार दिल्ली और मालवा के रेजिडेंट डेविड ऑक्टरलोनी को लिखा। वाघ ने स्पष्ट किया कि भील-मीणों की लूटपाट रोकने की क्षमता और साधन सिरोही नरेश के पास नहीं है।7 उसने कुख्यात भील-मीणों-भरथ, हुरजीरा, राणोमा, रूपला, बिड्डा, कायरा, बेडिया, पीठा और जोधा के नामोल्लेख करते हुए ऑक्टरलोनी को यह भी लिखा कि इनको मोचाल, रेवाडा, अरठवाड़ा आदि के ठाकुरों का संरक्षण प्राप्त है।8 जागीरदार ठाकरों का स्वेच्छाचार भी इस समय बहुत बढ़ गया था। वे राज्य की अवज्ञा करते थे और संतान नहीं होने की स्थिति में राज्य अनुमति के बिना ही किसी को गोद ले लेते थे। निंबज का जागीरदार ठाकुर सिरोही नरेश का मुख्य शत्रु था, जिसको जोधपुर नरेश का संरक्षण प्राप्त था। सिरोही नरेश का अधिकांश समय इस बागी ठाकुर की छलकपटपूर्ण चालों का मुकाबला करने में बीतता था।9
उन्नीसवीं सदी दूसरे दशक तक आपसी प्रतिद्वंद्विता और द्वेष तथा मराठों और पिंडारियों की लूटपाट से कमजोर हो गई राजस्थान की अधिकांश रियासतों ने संधियों द्वारा ब्रिटिश सरकार का संरक्षण प्राप्त कर लिया था। जोधपुर के आक्रमणों और आतंरिक अव्यवस्था से परेशान सिरोही नरेश िशवसिंह ने भी सत्तारूढ होते ही 1817 में कंपनी सरकार के संरक्षण में जाने की इच्छा व्यक्त की। उसने इस निमित्त बड़ोदा के रेजिडेंट कप्तान करनिक को पत्र लिखा।10 सिरोही राजपुताना में होने के कारण दिल्ली रेजिडेंट के अधीन था, इसलिए करनिक ने सिरोही नरेश को इस संबंध में वहां से पत्राचार करने के निर्देश दिए।11 सिरोही नरेश की पहल पर पिश्चमी राजपुताना के पॉलिटिकल एजेंट कर्नल जेम्स टॉड के माध्यम से पत्राचार आरंभ हुआ, लेकिन इसमें जोधपुर के नरेश मानसिंह ने बाधा डाल दी। उसके अनुसार सिरोही जोधपुर राज्य के अधीन उसका एक अंग है और जोधपुर राज्य से 1818 में संधि हो चुकी है, इसलिए सिरोही से पृथक् से संधि गलत है।12 जोधपुर के इस दावे की पड़ताल का काम कर्नल टॉड को सौंपा गया, जिसने बहुत निष्पक्ष रहकर दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनीं और दस्तावेज देखे। उसने जोधपुर के दावे को खारिज करते हुए सिरोही के स्वतंत्र राज्य होने की पुिष्ट कर दी।13 इसके बाद दिल्ली और मालवा के रेजिडेंट डेविड ऑक्टरलोनी ने कोषागार खाली होने, यात्रा असुरक्षित होने तथा कानून की अवज्ञा करने वाले तत्वों के निरंतर बढ़ने का उल्लेख करते हुए आपराधिक तत्वों के दमन और व्यापार को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सिरोही राज्य को ब्रिटिश संरक्षण लेने की सिफारिश कर दी।14 कप्तान स्पीयर्स को सिरोही राज्य के साथ संधि करने का दायित्व दिया, जिसने विचार-विमशZ कर संधि का प्रारूप तैयार किया, जो स्वीकार कर लिया गया और अंतत: 11 सितंबर, 1823 को संधि हो गई और सिरोही राज्य ब्रिटिश संरक्षण और सुरक्षा में आ गया।15
ब्रिटिश संरक्षण में जनसाधारण और जागीरदार
सिरोही के ब्रिटिश संरक्षण में आ जाने के अच्छे परिणाम निकले। इससे यहां नरेश की सत्ता फिर कायम हुई। जनसाधारण ने राहत की सांस ली, भील-मीणों का आतंक कम हुआ और जागीरदारों के स्वेच्छाचार में भी कमी आई। जोधपुर के आक्रमणों के दौरान होने वाली लूटपाट और भील-मीणों के आतंक से यहां के जनसाधारण को कुछ हद तक मुक्ति मिली। गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार सरकार अंग्रेजी की सहायता लोगों के वास्ते ऐसी फायदेमंद हुई, जैसी कि सूखती हुई खेती के लिए बारिश होती है।16 9 जून, 1822 को जब कर्नल टॉड इंग्लैंड जाने से पूर्व यात्रा करता हुआ यहां से गुजरा तो हालात सामान्य होने लगे थे। उसने लिखा कि ष् शहर जो पहले बिलकुल उजड़-सा गया था अब बसने लग गया है, जो व्यापारी तीन या चार साल पहले यह समझते थे कि सिरोही में घुसना चोरों की मांद में घुसना है और यह बात अक्षरश: सत्य भी थी, वे अब फिर दुकानें खोलने लगे हैं।17 यहां भील-मीणों की लूटपाट और आतंक में कमी आई। आधिपत्य में आते ही ब्रिटिश सरकार ने बंबई रेजिडेंसी की एक सैनिक टुकड़ी को सिरोही में नियुक्त कर दिया, जिसने बहुत अच्छा काम किया। ब्रिटिश सेना की मौजूदगी का यहां की लूटपाट ओर चोरी-चकारी करने वाली जनजातियों पर जादुई असर हुआ। जीण् स्वीन्टोन ने डेविड ऑक्टरलोनी को 11 जून, 1824 को एक पत्र में लिखा कि ष्जंगली जातियां सोचती हैं कि अंग्रेज जादूगर हैं, जो अपनी अपनी जेब में सेना छिपाकर ले जा सकते हैं और वे लड़ाई के समय कागज के सिपाहियों से काम लेते हैं।ष्18 अंग्रेजों के परामशZ पर राज्य में भील-मीणों की लूटपाट के विरुद्ध कई उपाय किए। टॉड ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है कि ष्मीणा जाति की पूरी तरह रोक दिया गया हैं, मजबूत चौकियां कायम कर दी गई हैं और व्यापारियों, कारीगरों व किसानों को लूट के विरुद्ध सुरक्षा एवं प्रोत्साहन देने के पट्टे दिए जाते है।19
ब्रिटिश संरक्षण में यहां के स्वेच्छाचारी जागीरदार ठाकुरों के विरुद्ध भी कार्यवाही शुरू की गई। निंबज का ठाकुर जोधपुर नरेश की शह पर सिरोही नरेश की मुखालपत करता था। 1840 में उसने अपने पुत्र को गिरवर में गोद रखकर वहां का पट्टा अपने अधीन कर लिया। गिरवर पर सेना भेजी गई, जिसने ठाकुर के पुत्र को गिरफ्तार कर लिया। पॉलिटिकल एजेंट ने हस्तक्षेप कर निबंज ठाकुर को अपना दावा छोड़ने के लिए विवश किया, जिससे सिरोही नरेश ने गिरवर को खालसा घोषित कर सीधे अपने अधीन कर लिया।20 यहां के कुछ जागीरदार ठाकुर भील-मीणों को लूटपाट के लिए प्रोत्साहन और संरक्षण देकर उनसे हिस्सा लिया करते थे, इसलिए उन पर भी ब्रिटिश सेना के सहयोग से सख्ती की गई। जोगापुरा के ठाकुर को इसके लिए दंडित किया गया।21 भटाणा के जमीरदार ठाकुर के दो गांव सीमा निर्धारण के दौरान पालनपुर में चले गए थे, इसलिए उसने विद्रोह कर दिया। पहाड़ों में शरण लेकर उसने लूटपाट आरंभ कर दी। अंग्रेजी सेना के सहयोग से वह पकड़ा गया, लेकिन 1858 में वह जेल से भाग गया। उसको पकड़ने के सभी प्रयत्न व्यर्थ गए। अंत में उसने सिरोही नरेश से समझौता कर लिया।22 रोहुआ के बागी ठाकुर के विरुद्ध भी अंग्रेजी सेना के सहयोग से कार्यवाही की गई। इसी तरह धानता, वेलांगरी, सणवाड़ा, सिरोड़ी, पीथापुरा आदि ठिकानों के जागीरदारों के विद्रोह और झगड़ों को दबाने में भी अंग्रेजों ने नरेश की भरपूर मदद की।23
जोधपुर लीजन और सैनिक विद्रोह
1818 में संपन्न संधि के अनुसार जोधपुर राज्य को यथावश्यकता ब्रिटिश सरकार को 1500 घुड़सवार सैनिक उपलब्ध करवाने थे। 1832 में ब्रिटिश सरकार के आदेश पर भेजे गए ये सैनिक अनुशासनहीन और अयोग्य पाए गए। 1835 में इस संबंध में फिर संधि हुई और यह प्रावधान किया गया कि 1500 घुड़सवारों के बदले जोधपुर राज्य 1,15,000 रुपए वार्षिक देगा, जिससे ब्रिटिश सरकार एक सेना तैयार करेगी।24 इस रािश से ब्रिटिश सरकार ने 1836 में अजमेर में केिप्टन डाउनिंग के नेतृत्व जोधपुर लीजन नामक सेना का गठन किया। 1842 में इस सेना का मुख्यालय अजमेर से हटाकर जोधपुर की सीमा के निकट स्थित सिरोही राज्य के ऐरिनपुरा में कर दिया गया। विद्रोह के समय केिप्टन हॉल के नेतृत्व में जोधपुर लीजन के पैदल, तोपखाना और घुड़सवार, तीन अंग थे। इसकी पैदल सेना में आठ कंपनियां पूरबिया और शेष तीन भील सैनिकों की थीं।25 माउंटआबू राजपुताना में अरावली शृंखला का सबसे ऊंचा और ठंडा स्थान था, इसलिए 1845 में सिरोही के साथ संधि26 कर ब्रिटिश सरकार ने यहां एक सेनिटोरियम बनाया, जहां राजपुताना और उसके पास स्थित अन्य राज्यों के ब्रिटिश सैनिक स्वास्थ्य लाभ और विश्राम के लिए रहते थे। यह ब्रिटिश अधिकारियों और उनके परिवारों का ग्रीष्मकालीन आवास भी था। विद्रोह के समय यहां जोधपुर लीजन के 60 देशी सैनिकों की एक सुरक्षा टुकड़ी के अतिरिक्त हिजमेजेस्टीज रेजिमेंट के 30 या 35 बीमार ब्रिटिश सैनिक भी विश्राम कर रहे थे। 18 अगस्त, 1857 को जोधपुर लीजन की एक कंपनी रोहुआ के बागी जागीरदार ठाकुर के विद्रोह को दबाने के लिए माउंट आबू के नीचे अनादरा पहुंची। कोटिन हॉल, जो इस समय माउंटआबू में था, 19 अगस्त, 1857 की नीचे आया और उसने सैनिकों को जरूरी दिशा-निर्देश दिए और वह माउंट आबू लौट गया। मार्ग में उसकी भेंट माउंटआबू में नियुक्त जोधपुर लीजन की सुरक्षा टुकड़ी के हवलदार गोजनसिंह से हुई। गोजनसिंह ने उसके पूछने पर बताया कि वह अनादरा में नियुक्त अपने साथियों से मिलने जा रहा है। बाद में हुई जांच-पड़ताल में पता लगा कि अनादरा में जोधपुर लीजन की कंपनी के विद्रोह में इस गोजनसिंह ने निर्णायक भूमिका निभाई।28 अनादरा के निकट स्थित भटाना और रोहुआ के जागीरदार ठाकुरों की भी इस विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका थी। ये दोनों ठाकुर सिरोही नरेश से निजी कारणों से नाराज थे। भटाना का बागी ठाकुर नाथूसिंह सिरोही जेल से भागकर पहाड़ों में छिपा हुआ था और रोहुआ के ठाकुर उम्मेदसिंह के बागी तेवर के विरुद्ध ही अनादरा में जोधपुर लीजन की कंपनी नियुक्त की गई थी। ये दोनों ठाकुर सिरोही नरेश के साथ अंग्रेजों से भी खफा थे, क्योंकि उनकी सरपरस्ती में सिरोही नरेश उनके पारंपरिक विशेषाधिकारों में कटौती कर रहा था। कहते हैं कि ये दोनों ठाकुर माउंटआबू पर नियुक्त जोधपुर लीजन की सुरक्षा टुकड़ी के संपर्क में थे और उनके सुझाव पर ही गोजनसिंह नीचे आया था। दरअसल ये दोनों ठाकुर और विद्रोही माउंटआबू में ब्रिटिश सैनिकों की वास्तविक उपस्थिति के बारे में जानना चाहते थे।29 जोधपुर के पुराने अभिलेखों में भटाना ठाकुर नाथुसिंह देवडा के संबंध में एक लोकगीत मिला है, जिसमें उसके द्वारा छावनी लूटने और गोरों की हत्या करने का उल्लेख मिलता है, लेकिन तत्कालीन ब्रिटिश साक्ष्यों से इसकी पुष्टि नहीं होती ।30
21 अगस्त को सुबह लगभग 3 बजे अनादरा स्थित जोधपुर लीजन की कंपनी ने विद्रोह कर दिया। कंपनी के 40 या 50 सैनिक अनादरा से माउंटआबू पर चढ़ गए।30 सुबह कोहरा इतना घना था कि किसी को उनकी भनक तक नहीं लगी।31 उन्होंने अंग्रेज सैनिकों की बैरकों पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया। बीमार और अयोग्य अंग्रेज सैनिकों ने भी उत्तर में गोलीबारी की।32 कोई भी अंग्रेज सैनिक हताहत नहीं हुआ। एक सार्जेंट के साथ 14 सैनिकों एक टुकड़ी ने पास ही स्थित स्कूल की ओर प्रस्थान किया। मेहरबानसिंह के नेतृत्व विद्रोही सैनिकों ने केिप्टन हॉल के आवास पर भी आक्रमण किया, लेकिन उसने सपरिवार पिछले दरवाजे से निकल कर स्कूल में शरण ले ली।33 केिप्टन हॉल के आवास पर गोलीबारी की आवाज सुनकर एजीजी का पुत्र एण् लॉरेंस बाहर निकला और विद्रोहियों की गोलीबारी में घायल हो गया। सभी अंग्रेज परिवारों को स्कूल में सुरक्षित पहुंचाकर केिप्टन हॉल और डाक्टर यंग हिज मेजेस्टीज रेजिमेंट के आठ अंग्रेजी सैनिकों के साथ जोधपुर लीजन की सुरक्षा टुकड़ी के िशविर की ओर गए। कुछ देर गोलीबारी के बाद केप्टिन हॉल ने विद्रोहियों को पहाड़ी के नीचे, अनादरा की तरफ खदेड़ दिया।34 अनादरा में एकत्रित होकर विद्रोहियों ने सिरोही की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में चौकियों पर नियुक्त सुरक्षा प्रहरी भी विद्रोहियों के साथ हो गए।35 यह पता लगने पर कि सिरोही नरेश ने नगर के द्वार पर दो तोपें तैनात कर दी हैं तो विद्रोही मार्ग बदलकर ऐरिनपुरा पहुंच गए।36
ऐरिनपुरा छावनी में अनादरा के विद्रोही सैनिकों के पहुंचने से पहले ही विद्रोह हो गया था। माउंटआबू में हुए विद्रोह की सूचना लेफ्टिनेंट कोनोली को अपने अर्दली मखदूम बख्श से प्राप्त हुई। दरअसल मखदूम बख्श को आबू से एक विद्रोही सैनिक ने पत्र लिखा था जिसमें आबू में हुए विद्रोह का अतिरंजित विवरण देते हुए ऐरिनपुरा छावनी के सैनिकों से आग्रह किया गया था कि वे छावनी की तोपें छीनकर दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दें। यह पत्र मखदमू बख्श ने कोनोली के सौंप दिया। कोनोली ने विद्रोह सूचना के साथ एक गोपनीय संदेश तत्काल सैनिक सहायता के लिए जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेसन भेज दिया।37 छावनी में इस समय लेिफ्टनेंट कोनोली सहित तीन अंग्रेज अधिकारी और उनके परिवार, जिनमें दो महिलाएं और पांच बच्चे थे, निवास कर रहे थे। 22 अगस्त को दिन निकलने के बाद कोनोली घोड़े पर सवार होकर परेड ग्राउंड पर गया तो माहौल में उत्तेजना थी। तोपों की तरफ दौड़ रहे सैनिकों को उसने उनसे दूर रहने का आदेश दिया, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। इसी समय घुड़सवार सेना भी बागी हो गई। वह मेजर वूडी के साथ तोपखाने की तरफ गया, लेकिन सैनिकों ने तोपों का मुंह उसकी तरफ घुमाकर उसको मारने की धमकी दी। कोनोली ने दूसरी दिशा से तोपों की ओर पहुंचने का प्रयत्न किया, लेकिन सैनिकों ने उसकी तरफ बंदूकें तान कर यह प्रयास विफल कर दिया। भील सैनिक निष्ठावान बन रहे, लेकिन विद्रोही इतने अधिक उत्तेजित थे कि उन्होंने उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की। कुछ निष्ठावान सैनिक, जिनमें रिसालदार अब्बास अली, इलाही बख्श और नसीरूद्दीन प्रमुख थे, कोनोली की रक्षा के लिए आगे आए। विद्रोहियों में मतभेद और झगड़ा हो गया। कुछ सैनिक कोनोली सहित सभी अंग्रेजों को उनके भाग्य पर छोड़ देने के पक्ष में थे, जबकि कुछ उन्हें मार डालना चाहते थे। अब्बास अली बेग ने अपनी पगड़ी विद्रोहियों के पैरों में रखते हुए ऐलान कर दिया यदि कोई सैनिक कोनोली की तरफ बढ़ेगा तो उसे पहले उसकी लाश पर से गुजरना होगा।38 विद्रोहियों ने सभी अंग्रेज अधिकारियों और उनके परिवारों को परेड ग्राउंड के बीच एक टेंट में रात गुजारने की अनुमति दी, जहां वे पूरी रात सो नहीं पाए।39 23 अगस्त की सुबह माउंट और अनादरा के विद्रोही सैनिक ऐरिनपुरा पहुंच गए, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ। निष्ठावान सैनिकों ने इन विद्रोही सैनिकों को अंग्रेजों को नुकसान पहुंचाने से रोक दिया। विद्रोहियों ने अपने नेता मेहरबानसिंह को जनरल के पद पर पदोन्नत कर दिया। उन्होंने कोनोली के अतिरिक्त सभी अंग्रेज अधिकारियों, महिलाओं और बच्चों को जाने की अनुमति दे दी और इन सभी को िशवगंज के कामदार को सौंप दिया गया, जिसने उन्हें सुरक्षित सिरोही पहुंचा दिया।40 विद्रोहियों ने अपने नेता मेहरबानसिंह के आदेश पर 24 अगस्त को पाली के मार्ग से दिल्ली की ओर कूच किया। उन्होंने लेफ्टिनेंट कोनोली को भी उसके निष्ठावान सैनिकों सहित घोड़े पर बिठाकर अपने साथ ले लिया। अंतत: ढोला के पास पहुंचकर विद्रोहियों ने कोनोली को उसके निष्ठावान देशी सैनिकों के साथ मुक्त कर दिया।41 सिरोही राज्य के मुंशी नियामत अली की भेंट दो दिन तक निरंतर विद्रोहियों का पीछा करने के बाद कोनोली से हुई। नियामत अली कोनोली और उसके रक्षक सैनिकों को सुरक्षित सिरोही ले आया।42 विद्रोही पाली की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन जोधपुर के किलेदार अनाड़सिंह के सेना सहित पाली में होने की सूचना मिलने पर उन्होंने अपना मार्ग बदल लिया। वे खेरवा होते हुए आऊवा के निकट एक गांव में पहुंचे, जहां आऊवा के ठाकुर ने उनके सामने जोधपुर राज्य के विरुद्ध उसका साथ देने का प्रस्ताव रखा। विद्रोही तत्काल दिल्ली पहुंचना चाहते थे, इसलिए वे दो भागों में बंट गए।43 इनमें से कुछ ने दिल्ली की ओर कूच किया, जबकि शेष ने आऊवा के संग्राम में वहां के ठाकुर की मदद की। आऊवा में जोधपुर और ब्रिटिश सेना की दो बार परास्त करने के बाद जोधपुर लीजन के इन शेष सैनिकों ने भी प्रमुख जागीरदार ठाकुरों के साथ 10 अक्टूबर, 1857 को दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया
सिरोही राज्य के माउंटआबू और ऐरिनपुरा में हुआ जोधपुर लीजन का विद्रोह केवल सैनिक विद्रोह था। बंगाल, बिहार, अवध आदि राज्यों में जनसाधारण और उसमें भी खास तौर पर किसानों ने विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन सिरोही में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। यहां के जनसाधारण ने न तो विद्रोह में भाग लिया और न ही उसका समर्थन किया। विद्रोह के दौरान सिरोही का सामान्य जन जीवन भी अप्रभावित रहा। हमेशा की तरह यहां खेती और व्यापार होते रहे, राजस्व वसूली हुई और सभी प्रकार का लेन देन और दैनंदिन कामकाज निबाZध हुआ।44 दरअसल पूर्वी और केन्द्रीय प्रांतों को ब्रिटिश मौजूदगी और शासन का लंबा अनुभव था, जबकि सिरोही के जनसाधारण को यह अनुभव फिलहाल नहीं के बराबर था। सिरोही राज्य ने 1823 में ही ब्रिटिश सरकार से संधि की थी और जनसाधारण के मन में फिलहाल ब्रिटिश मौजूदगी से कोई नाराजगी और असंतोष नहीं था। उल्टे जोधपुर के आक्रमणों और भील-मीणों की लूटपाट से त्रस्त जन साधारण के लिए ब्रिटिश मौजूदगी राहत और सुकून पहुंचाने वाली सिद्ध हुई। सिरोही के ब्रिटिश संरक्षण में जाने का सर्वाधिक नुकसान जागीरदार ठाकुरों को हुआ। सही मायने में सिरोही नरेश ने ब्रिटिश सरकार से संधि ही इन ठाकुरों के दमन के लिए की थी और कुछ हद तक ब्रिटिश सहयोग से वह इनके स्वेच्छाचार पर लगाम लगाने में भी सफल हुआ। बावजूद इसके सिरोही राज्य के जागीरदार ठाकुरों में अंग्रेजों के प्रति कोई असंतोष और नाराजगी नहीं पनप पाई। जोधपुर लीजन के सैनिक विद्रोह में सहभागिता तो दूर, इन्होंने इसका समर्थन भी नहीं किया, जबकि मारवाड़ के आसोप, आलनियावास, गूलर, लांबिया, बांता, निंबालिया, बाजानास आदि के ठाकुरों ने आऊवा के विद्रोह और संग्राम सक्रिय सहभागिता की थी। भटाना और रोहुआ के बागी जागीरदार ठाकुरों ने जोधपुर लीजन के सैनिकों को विद्रोह के लिए उकसाने का काम तो किया, लेकिन वे खुलकर विद्रोहियों के साथ नहीं हुए।
स्पष्ट है कि सिरोही राज्य में 1857 का विद्रोह तो हुआ, लेकिन खास प्रकार की परिस्थितियां होने के कारण यह केवल सैनिक विद्रोह तक सीमित रहा गया। जन साधारण की इसमें कोई सहभागिता नहीं थी, इसलिए आज यहां के लोगों की स्मृति और संस्कार में इसका कोई अवशेष मौजूद नहीं है।
<अक्सर,अक्टू.-दिस.2007 में प्रकाशित