Sunday 4 May 2008

इलेक्ट्रोनिक मीडिया से बदल रहा है साहित्य?

इलेक्ट्रोनिक मीडिया दृश्य और श्रव्य प्रविधि है। उपग्रह-प्रक्षेपण से इसकी पहुंच और प्रभाव का दायरा बड़ा हो गया और डिजिटल-तकनीक ने इसकी दृश्य-श्रव्य के संचार की गुणवत्ता बढ़ा दी। पारम्परिक प्रिंट मीडिया में अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा थी। भाषा की लाक्षणिकता, व्यंजकता, मुहावरा आदि ही इसकी अभिव्यक्ति के खास औजार थे। इलेक्ट्रोनिक मीडिया, उसमें भी खास तौर पर टीण्वीण् ने अभिव्यक्ति की पद्धति को पूरी तरह बदल दिया। अब दृश्य का यथावत और त्वरित गति से संचार संभव हो गया। भाषा भी यहां श्रव्य रूप पाकर अधिक लाक्षणिक और व्यंजक हो गई। पाठ्य अभिव्यक्ति में भाषा की नाटकीयता लगभग खत्म हो गई थी-टीण्वीण् में उसका भी पुनराविष्कार हुआ। इस सबका नतीजा यह हुआ कि पारम्परिक अभिव्यक्ति-रूप इलेक्ट्रोनिक मीडिया की जरूरतों के अनुसार अपनी प्रकृति, प्रक्रिया और स्वरूप को बदलने के लिए तत्पर और बेचैन दिखे। इस प्रक्रिया में कुछ अभिव्यक्ति-रूपों का रूपान्तरण हुआ और कुछ सर्वथा नए अभिव्यक्ति-रूप भी अस्तित्व में आए।
इलेक्ट्रोनिक मीडिया बहुराष्ट्रीय पूंजी के स्वामित्व वाला व्यापारिक उपक्रम है, इसलिए यह अपने लाभ के लिए संस्कृति को उत्पाद और उद्योग में बदलता है। अपने विस्फोटक विस्तार के साथ ही हमारे देश में भी उसने यही किया। हमारे यहां यह तत्काल और आसानी से हो गया। दरअसल हमारे यहां परंपरा से समाज के सभी तबकों को संस्कृति के उपभोग की अनुमति नहीं थी। इस संबंध में कई सामाजिक विधि-निषेध और नैतिक अंतबाZधाएं थीं। 1990 के दशक में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के विस्फोटक विस्तार से यह सब भरभरा कर ढह गए। संस्कृति के उपभोग में अब कोई बाधा नहीं रही। इसके लिए केवल उपभोक्ता होना पर्याप्त था। देखते-ही-देखते संस्कृति विराट उद्योग में तब्दील हो गई और इसके व्यवसाय का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ गया। टीण्वीण्, रेडियो, केबल और लाइव मनोरंजन में उफान आ गया। एक सूचना के अनुसार वषZ 2003 के दौरान हमारे यहां मनोरंजन उद्योग 16,600 करोड़ रुपए का कूता गया। एक अनुमान के अनुसार हमारे यहां फिल्मों का कारोबार वषZ 2006 में 1.1 खरब डॉलर हो जाएगा। साहित्य भी संस्कृति-रूप है, इसलिए इस सब से या तो यह हािशए पर आ गया है या तेजी से अपने को उत्पाद और उद्योग में बदल रहा है। फरवरी, 2004 में दिल्ली में आयोजित सोलहवें विश्व पुस्तक मेले के उद्घाटन के अवसर पर भारतीय मूल के साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता सर वी.स.नायपाल ने साहित्य की इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ´´दुर्भाग्य है कि आज साहित्य अपनी जड़ों से उखड़ गया हैं। साहित्य का स्थान घटिया कथानक, जादू-टोना और ओझाई लेखन ने ले लिया है। तकनीकी विकास के साथ पुस्तकों की बिक्री बढ़ी है और नए पाठक तैयार हो रहे है, लेकिन बिक्री की नई तरकीबों के बीच साहित्य मर रहा है। उसे कोने में धकेल दिया गया है।``
संस्कृति के औद्योगीकरण की प्रक्रिया से हमारे पारंपरिक साहित्य में जबर्दस्त बेचैनी है। आरिम्भक आंशिक प्रतिरोध के बाद थोड़े असमंजस के साथ इसमें बाजार की जरूरतों के अनुसार ढलने की प्रक्रिया की शुरुआत हो गई है। साहित्य को उत्पाद मानकर उसकी माकेZटिंग हमारे यहां भी शुरू हो गई है। इसका नतीजा यह हुआ कि साहित्य की घटती लोकप्रियता के बावजूद पिछले कुछ सालों से हमारे यहां पुस्तकों की बिक्री में असाधारण वृिद्ध हुई है। एक सूचना के अनुसार हमारे यहां 70,000 पुस्तकें प्रतिवर्ष छपती हैं और ये 10 से 12 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही है। अब हमारे यहां साहित्य भी साबुन या नूडल्स की तरह उत्पाद है, इसलिए इसकी मार्केटिंग के लिए फिल्म अभिनेताओं का सहारा लेने की बात की जा रही है। इंडिया टुडे कॉनक्लेव, 2004 में शामिल विश्वविख्यात अमरीकी प्रकाशक अल्फ्रेड एण् नॉफ के भारतीय मूल के अध्यक्ष और संपादक सन्नी मेहता ने प्रस्ताव किया कि ´´कुछ साल पहले अमरीकी टी.वी. के लोकप्रिय प्रस्तोता ऑप्रा विनफ्रे के साप्ताहिक टीण्वीण् बुक-क्लब शुरू करने के बाद पुस्तकों की बिक्री काफी बढ़ गई थी। कल्पना की जा सकती है कि अगर आज अमिताभ बच्चन या ऐश्वर्या राय भारत में टीण्वीण् पर ऐसा कार्यक्रम शुरू कर दें तो क्या कमाल हो सकता है।`` इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर चर्चित और विख्यात होने के कारण सलमान रश्दी, विक्रम सेठ और अरुंधती राय की किताबें हमारे यहां तेजी से लोकप्रिय हुई हैं। बहुत उबाऊ और बोिझल होने के बावजूद इन किताबों के हिन्दी रूपान्तरण निकले और पाठकों द्वारा खरीदे भी गए।
हमारे यहां उत्पाद मानकर साहित्य की मार्केटिंग ही नहीं हो रही है, बाजार की मांग के अनुसार इसके सरोकार, वस्तु, ल्प आदि में भी बदलाव किए जा रहे हैं। इसमें मनोरंजन, उत्तेजना और सनसनी पैदा करने वाले तत्वों में घुसपैठ बढ़ी है। इस कारण पिछले कुछ वर्षों से हमारे साहित्य में भी राजनेताओं, उच्चाधिकारियों, अभिनेताओं और स्टार खिलािड़यों के व्यक्तिगत जीवन से पर्दा उठाने वाली आत्मकथात्मक, संस्मरणात्मक और जीवनपरक रचनाओं की स्वीकार्यती बढ़ी है। बिल िक्लंटन और मोनिका लेविंस्की की यौन लीलाओं के वृत्तांत का हिन्दी-रूपान्तरण ´मैं शर्मिंदा हूं` को साहित्य के एक विख्यात प्रकाशक ने प्रकाशित किया और यह हिन्दी-पाठकों में हाथों-हाथ बिक गया। हिन्दी में ही नेहरू और लेडी माउंटबेटन एडविना के प्रणय संबंधों पर आधारित केथरिन क्लैमां के फ्रेंच उपन्यास ने पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित की। इसी तरह विख्यात पत्रिका ´हंस` में राजेन्द्र यादव द्वारा चर्चित प्रसंग ´होना और सोना एक औरत के साथ` को हिन्दी की साहित्यिक बिरादरी ने चटखारे लेकर पढ़ा और सराहा। हिन्दी की श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं में भी जाने-अनजाने मनोरंजन और उत्तेजना पैदा करने वाले तत्वों की मात्रा पिछले दस-बारह सालों में बढ़ी है। मैत्रेयी पुष्पा के साहित्यिक उपन्यासों में रतिक्रियाओं के दृश्य अलग से पहचाने जा सकते हैं, विजय मोहन सिंह की कहानियों में सेक्स जबरन ठूंसा गया लगता है तथा अशोक वाजपेयी की कविताओं में रति की सजग मौजूदगी को भी इसी निगाह से देखा जा सकता है। पिछले दशक में प्रकािशत सुरेन्द्र वर्मा का हिन्दी उपन्यास ´दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता` तो संपूर्ण ही ऐसा है।
इलेक्ट्रोनिक मीडिया व्यावसायिक उद्यम है और इसका लक्ष्य उपभोक्ता-समाज को अपने संजाल के दायरे में लाकर उसकी आकांक्षा, रुचि और स्वाद का, अपने विज्ञापित उत्पादों के उपभोग के लिए, अनुकूलीकरण करना है। यह काम, जाहिर है, उपभोक्ता समाज की संपर्क भाषा में ही हो सकता है। हमारे देश में अपने प्रसार के साथ ही इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने उपभोक्ता-समाज की संपर्क भाषा हिन्दी की अपनी जरूरतों के अनुसार नए सिरे से बनाना शुरू कर दिया है। पारम्परिक प्रिंट मीडिया और साहित्य की हिन्दी ठोस और ठस थी। इस भाषा में आम भारतीय उपभोक्ता समाज से संपर्क और संवाद संभव ही नहीं था। इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने दस-पंद्रह सालों में हिन्दी का नया रूपान्तरण ´हिंगलिश` कर दिया। देखते-ही-देखते इसका व्यापक इस्तेमाल भी होने लग गया। खास तौर पर यह नयी पीढ़ी के युवा वर्ग में संपर्क और संवाद की भाषा हो गई। विख्यात फिल्म अभिनेता विवेक ओबेराय से एक बार पूछा गया कि आप सपने किस भाषा में देखते हैं, तो उनका जवाब था ´हिंगलिश में` और जब उनसे पूछा गया कि आप किस भाषा में सोचते हैं तो उन्होंने कहा कि "भावना की बात हो तो हिन्दी में और विचार हो तो अंग्रेजी में। रस की बातें हिन्दी में होती हैं और अर्थ की बातें हो तो अंग्रेजी में।" हिन्दी के इस कायान्तरण से नफा और नुकसान दोनों हुए हैं। नफा यह कि अब हिन्दी अपने लिखित-पठित, ठोस-ठस रूप के दायरे से बाहर निकल कर सरल और अनौपचारिक हो गई है। अब इसमें शुद्धता का आग्रह नहीं है और इसने परहेज करना भी बंद कर दिया है इसलिए यह व्यापक सरोकारों वाली बाजार की जनभाषा का रूप ले रही है। नुकसान यह हुआ है कि इसमें विचार को धारण करने का सामथ्र्य कम होता जा रहा है। लेकिन इस संबंध में फिलहाल कोई निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है। यह समय संक्रमण का है-बाजार के बीच ही सही, व्यापक जनभाषा का रूप लेने से इसमें अभी नए पेच-खम बनेंगे और यह अभी और नया रूप धारण करेगी। आज तक, स्टार न्यूज और डिस्कवरी पर हिन्दी के इस नए रूप की झलक अभी से देखी जा सकती है। हिन्दी के इस कायान्तरण से गत दस-पंद्रह सालों के हिन्दी साहित्य की भाषा में भी असाधारण बदलाव आया है। यह अब पहले जैसी ठोस और ठस साहित्यिक भाषा नहीं रही। यह अब जनसाधारण के बोलचाल की बाजार की भाषा के निकट आ गई है। विख्यात कहानीकार उदयप्रकाश ने एक जगह स्वीकार किया कि ´´इधर हिन्दी में कई लेखक उभरकर आए हैं जो बाजार की भाषा में लिख रहे हैं और उनके विचार वही हैं, जो हमारे हैं। मुझे लगता है कि हम लोगों को भी जो उन मूल्यों के पक्ष में खड़े हैं, जिन पर आज संकट की घड़ी है, अपना एक दबाव बनाने के लिए बाजार की भाषा को अपनाना पडे़गा।`` यह बदलाव केवल साहित्य के गद्य रूपों की भाषा में ही नहीं, कविता की भाषा में भी हुआ है। यहां आग्रह अब सरलता का है और इसमें बोलचाल की भाषा की नाटकीयता एवं तनाव का रचनात्मक इस्तेमाल हो रहा है।
इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने हमारे देश में संस्कृति को उत्पाद और उद्योग में बदलकर उसका जो बाजारीकरण किया, उसका एक लाभ यह हुआ है कि इसका उपयोग पहले की तरह अब कुछ वर्गों तक सीमित नहीं रहा। इसके उपभोग में जाति, धर्म, संप्रदाय और लैंगिक भेदभाव समाप्त हो गया है। साहित्य भी संस्कृति का एक रूप है इसलिए इलेक्ट्रोनिक मीडिया के प्रसार के साथ हमारे देश में इसका भी व्यापक रूप से और त्वरित गति से जनतंत्रीकरण हुआ है। इस कारण हमारे यहां पिछले दस-पंद्रह सालों के दौरान साहिित्यक अभिव्यक्ति और इसके उपभोग की आकांक्षा समाज के सभी वर्गों में खुलकर व्यक्त हुई है। इस दौरान भारतीय भाषाओं के साहित्य में दलित वर्ग के कई साहित्यकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई। हिन्दी में भी इस दौरान दलित-विमर्श मुख्यधारा में आया। दलित वर्ग की तरह ही इधर साहित्य में अपनी अस्मिता के प्रति सचेत स्त्री रचनाकारों ने भी बड़ी संख्या में उपस्थिति दर्ज करवाई है। अंग्रेजी और हिन्दी की लगभग सभी लोकप्रिय और साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं ने इस दौरान स्त्री रचनाओं पर विशेषांक प्रकाशित किए। साहित्य के जनतंत्रीकरण का एक और लक्षण गत कुछ वर्षों की हिन्दी की साहित्यिक सक्रियता और प्रकाशन के केन्द्र महानगरों में होते थे। अब ये वहां से शहरों, कस्बों और गांवों में फैल गए हैं। सूचनाओं की सुलभता के कारण दूरदराज के कस्बों-गांवों के रचनाकार आत्मविश्वास के साथ हिन्दी के समकालीन साहिित्यक विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं और अपनी पहचान बना रहे हैं।
इलेक्ट्रोनिक मीडिया हमारे देश में बहुराष्ट्रीय पूंजी के नियंत्रण और निर्देशन में जिस उपभोक्तावाद और आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का प्रसार कर रहा है उसका प्रतिरोध मुख्यतया हमारे साहित्य में ही हो रहा है। यूण्आरण् अनंतमूर्ति ने पिछले दिनों एक जगह कहा था कि जैसे टेलीविजन वाले करते हैं वैसे हमें नहीं करना चाहिए हमें रेसिस्ट करना है, डिसक्रिमीनेट करना है। इस प्रतिरोध के कारण गत दस-पंद्रह सालों के हमारे साहित्य के सरोकारों और विषय-वस्तु में बदलाव आया है। हिन्दी में भी यह बदलाव साफ देखा जा सकता है। मनुष्य को उसके बुनियादी गुण-धर्म और संवेदना से काटकर महज उपभोक्ता में तब्दील कर दिए जाने की प्रक्रिया का खुलासा करने वाली कई कविताएं इस दौरार हिन्दी में लिखी गई हैं। इसी तरह आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के दुष्परिणामों में एकाग्र उपन्यास और कहानियां भी हिन्दी में कई प्रकाशित हुई हैं। उपभोक्तावाद और आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया इस दौरान हिन्दी कविता में पलायन की नई प्रवृत्ति के उभार में भी व्यक्त हुई है। कई कवि इस नई स्थिति से हतप्रभ और आहत होकर घर-गांव की बाल-किशोर कालानी स्मृतियों में लौट गए हैं। इस कारण इधर की हिन्दी कविता में कहीं-कहीं वर्तमान यथार्थ से मुठभेड़ की जगह स्मृति की मौजूदगी बढ़ गई है।
इलेक्ट्रोनिक मीडिया अपनी प्रविधि और खास चरित्र से पारम्परिक साहित्य की िशल्प-प्रविधि को भी अनजाने ढंग से प्रभावित कर बदलता है। साहित्यकार इलेक्ट्रोनिक मीडिया का उपभोक्ता है इसलिए अनजाने ही उसकी कल्पनाशीलता इससे प्रभावित होती है। इसके अनुसार उसका अनुकूलीकरण होता है। हमारे यहां खास तौर पर टी.वी. के कारण साहित्य की प्रविधि और शिल्प में जबर्दस्त बदलाव हुए हैं। दस-पंद्रह सालों के हिन्दी साहित्य में इस कारण दृश्य का आग्रह बढ़ गया-यहां वर्णन पहले की तुलना में कम, दृश्य ज्यादा आ रहे हैं। इसी तरह पाठक अब पहले से सूचित है और पहले से ज्यादा जातना है इसलिए इधर की रचनाओं में सूचनाएं कम हो गईं हैं या असाधारण सूचनाएं बढ़ गई हैं। टी.वी.के प्रभाव के कारण ही हिन्दी में लंबी कहानियों और उनके एपिसोडीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी है। साहित्य की पारम्परिक तकनीक-रोचकता और रंजकता के पारम्परिक उपकरण ओवर एक्सपोजर से बासी हो गए हैं इसलिए इधर के हिन्दी साहित्य में इनके विकल्पों के इस्तेमाल की सजगता दिखाई पड़ती है। रचनाकार पुराकथाओं या मिथकों की तरफ लौट रहे हैं और वर्णन की पुरानी शैलियों का नवीनीकरण हो रहा है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने पारम्परिक साहित्य में एक और खास तब्दीली की है। गत दस-पंद्रह सालों के दौरान साहित्यिक विधाओं का स्वरूपगत अनुशासन ढीला पड़ गया है। इनमें परस्पर अंतर्क्रिया और संवाद बढ़ रहा है। इसका असर हिन्दी में भी दिखाई पड़ने लगा है। इसी कारण हिन्दी में उपन्यास आत्मकथा की शक्ल और आत्मकथा उपन्यास की शक्ल में लिखीं जा रही हैं। कहानियां पटकथाएं लगती हैं और संस्मरण कहानी के दायरे में जा घुसे हैं। इसी तरह हिन्दी कविता ने भी अपने पारम्परिक औजारों का मोह लगभग छोड़ दिया है। यह अधिकांश बोलचाल की भाषा के पेच और खम के सहारे हो रही है।
जाहिर है, साहित्य पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया का गहरा और व्यापक प्रभाव है। यह अलग बात है कि आत्म मुग्ध और अपने तक सीमित साहित्यिक बिरादरी को अभी इसका अहसास बहुत कम है।

Thursday 1 May 2008

सिरोही राज्य में 1857 का सैनिक विद्रोह

1857 का विद्रोह देशव्यापी तो था, लेकिन उस समय क्षेत्रीय विषमताएं इतनी ज्यादा थीं कि यह विद्रोह सभी क्षेत्रों में एकरूप ढंग से नहीं हुआ। खास तौर पर राजस्थान, जहां हालात बंगाल, बिहार, अवध, दिल्ली आदि की तुलना में बहुत अलग थे, यह विद्रोह व्यापक जनसहभागिता वाली किसी मुहिम या संघर्ष का रूप नहीं ले पाया। यहां यह भिन्न परिस्थितियों के कारण केवल ब्रिटिश सेना के असंतुष्ट देशी सैनिकों और कुछ हद तक सामंत शासकों से निजी कारणों से नाराज जागीरदारों के विद्रोह तक सीमित रह गया। खास बात यह है कि इन जागीरदारों ने भी बहुत खुलकर अंग्रेजों की मुखालपत करने से परहेज किया। आऊवा और कोटा के विद्रोह में जनसाधारण की सहभागिता के जो साक्ष्य दिए जाते हैं वे सही मायने में किसी राजनीतिक चेतना से प्रेरित नहीं थे। प्रस्तुत आलेख में तत्कालीन राजपुताना के गुजरात की सीमा से लगे हुए सिरोही राज्य की ऐरिनपुरा छावनी के जोधपुर लीजन के सैनिकों के विद्रोह का अध्ययन है। यह अध्ययन यह संकेत करता है कि अलग प्रकार के हालात के कारण यहां विद्रोह में जनसाधारण की भागीदारी बिलकुल नहीं थी। खास बात यह है कि इस विद्रोह से यहां के जनजीवन पर भी कोई असर नहीं पड़ा। कुछ सीधे राज्य के कामकाज से जुड़े अभिजात तबके के अलावा अन्य किसी को इसकी जानकारी भी नहीं हुई। सिरोही राज्य से व्यक्तिगत कारणों से नाराज दो बागी जागीरदार ठाकुरों ने विद्रोही सैनिकों को उकसाया, पर वे भी खुलकर उनके साथ नहीं हुए।
ब्रिटिश सरकार और सिरोही
राजपुताना के दक्षिण-पिश्चम में गुजरात की सीमा से लगा हुआ सिरोही राज्य मराठों-पिंडारियों की लूटपाट और आतंक से तो अछूता रहा, लेकिन इसके बावजूद उन्नीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में यहां के हालात बहुत खराब और चिंताजनक थे। पड़ोसी राज्य जोधपुर के निरंतर आक्रमण, जागीरदारों के स्वेच्छाचार और भील-मीणों की लूटपाट से यहां पूरी तरह अव्यवस्था हो गई थी। उदयभाण 1807 में सत्तारूढ हुआ लेकिन राज्य में प्रशासन कायम करने के बजाय उसकी दिलचस्पी रागरंग में थी।1 जोधपुर नरेश मानसिंह की मंशा सिरोही को अपने राज्य में मिलाने की थी इसलिए वह निरंतर आक्रमण और लूटपाट से इसको कमजोर करने में लगा हुआ था। उसने 1812 में सेना भेजकर आक्रमण किया और लूटपाट की। उसने तीर्थ यात्रा से लौटते हुए उदयभाण को पाली में गिरफ्तार करवाकर जोधपुर में तीन माह तक नजरबंद रखा। इस दौरान उसने उदयभाण से सिरोही के जोधपुर के अधीन होने की तहरीर भी लिखवा ली।2 जोधपुर नरेश ने 1816 में फिर सेना भेजकर सिरोही के भीतरोट परगने को तबाह कर दिया। 1817 में उसकी सेना ने फिर भीषण आक्रमण किया और इस बार लूटपाट निरंतर दस दिन तक जारी रही। यह सेना सिरोही से लगभग ढाई लाख का माल-असबाब लेकर जोधपुर लौटी। सिरोही नरेश को इस दौरान पहाड़ों में शरण लेनी पड़ी।3 निरंतर आक्रमणों से हालत इतनी खराब हो गई थी कि राज्य में आबाद गांव गिनती के ही रह गए थे।4 अंतत: सिरोही के जागीरदार एकमत होकर उदयभाण के छोटे भाई नादिया के जागीरदार ठाकुर िशवसिंह के पास गए और उससे राज्य का प्रबंध अपने हाथ में लेने का आग्रह किया। 1817 में शिवसिंह ने उदयभाण का नजर कैद कर राज्य का प्रबंध अपने हाथ में ले लिया।5 राज्य में इस समय माहौल अराजकता का था और इसका राजस्व केवल 60 हजार रुपए वार्षिक रह गया था। गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार देश उजड़-सा गया था और राज्य की इतनी ताकत न थी कि प्रजा के जान-माल की रक्षा कर सके।6 चोरी-डकैती राज्य के भील-मीणों की आजीविका के मुख्य स्त्रोत थे। ये सिरोही सहित पड़ोसी जोधपुर और पालनपुर राज्यों में लूटपाट करते थे। जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट पीण्वाईण् वाघ ने अपने समाचार लेखकों के साक्ष्य से सिरोही राज्य के बिगड़ते हालातों के संबंध में एकाधिक बार दिल्ली और मालवा के रेजिडेंट डेविड ऑक्टरलोनी को लिखा। वाघ ने स्पष्ट किया कि भील-मीणों की लूटपाट रोकने की क्षमता और साधन सिरोही नरेश के पास नहीं है।7 उसने कुख्यात भील-मीणों-भरथ, हुरजीरा, राणोमा, रूपला, बिड्डा, कायरा, बेडिया, पीठा और जोधा के नामोल्लेख करते हुए ऑक्टरलोनी को यह भी लिखा कि इनको मोचाल, रेवाडा, अरठवाड़ा आदि के ठाकुरों का संरक्षण प्राप्त है।8 जागीरदार ठाकरों का स्वेच्छाचार भी इस समय बहुत बढ़ गया था। वे राज्य की अवज्ञा करते थे और संतान नहीं होने की स्थिति में राज्य अनुमति के बिना ही किसी को गोद ले लेते थे। निंबज का जागीरदार ठाकुर सिरोही नरेश का मुख्य शत्रु था, जिसको जोधपुर नरेश का संरक्षण प्राप्त था। सिरोही नरेश का अधिकांश समय इस बागी ठाकुर की छलकपटपूर्ण चालों का मुकाबला करने में बीतता था।9
उन्नीसवीं सदी दूसरे दशक तक आपसी प्रतिद्वंद्विता और द्वेष तथा मराठों और पिंडारियों की लूटपाट से कमजोर हो गई राजस्थान की अधिकांश रियासतों ने संधियों द्वारा ब्रिटिश सरकार का संरक्षण प्राप्त कर लिया था। जोधपुर के आक्रमणों और आतंरिक अव्यवस्था से परेशान सिरोही नरेश िशवसिंह ने भी सत्तारूढ होते ही 1817 में कंपनी सरकार के संरक्षण में जाने की इच्छा व्यक्त की। उसने इस निमित्त बड़ोदा के रेजिडेंट कप्तान करनिक को पत्र लिखा।10 सिरोही राजपुताना में होने के कारण दिल्ली रेजिडेंट के अधीन था, इसलिए करनिक ने सिरोही नरेश को इस संबंध में वहां से पत्राचार करने के निर्देश दिए।11 सिरोही नरेश की पहल पर पिश्चमी राजपुताना के पॉलिटिकल एजेंट कर्नल जेम्स टॉड के माध्यम से पत्राचार आरंभ हुआ, लेकिन इसमें जोधपुर के नरेश मानसिंह ने बाधा डाल दी। उसके अनुसार सिरोही जोधपुर राज्य के अधीन उसका एक अंग है और जोधपुर राज्य से 1818 में संधि हो चुकी है, इसलिए सिरोही से पृथक् से संधि गलत है।12 जोधपुर के इस दावे की पड़ताल का काम कर्नल टॉड को सौंपा गया, जिसने बहुत निष्पक्ष रहकर दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनीं और दस्तावेज देखे। उसने जोधपुर के दावे को खारिज करते हुए सिरोही के स्वतंत्र राज्य होने की पुिष्ट कर दी।13 इसके बाद दिल्ली और मालवा के रेजिडेंट डेविड ऑक्टरलोनी ने कोषागार खाली होने, यात्रा असुरक्षित होने तथा कानून की अवज्ञा करने वाले तत्वों के निरंतर बढ़ने का उल्लेख करते हुए आपराधिक तत्वों के दमन और व्यापार को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सिरोही राज्य को ब्रिटिश संरक्षण लेने की सिफारिश कर दी।14 कप्तान स्पीयर्स को सिरोही राज्य के साथ संधि करने का दायित्व दिया, जिसने विचार-विमशZ कर संधि का प्रारूप तैयार किया, जो स्वीकार कर लिया गया और अंतत: 11 सितंबर, 1823 को संधि हो गई और सिरोही राज्य ब्रिटिश संरक्षण और सुरक्षा में आ गया।15
ब्रिटिश संरक्षण में जनसाधारण और जागीरदार
सिरोही के ब्रिटिश संरक्षण में आ जाने के अच्छे परिणाम निकले। इससे यहां नरेश की सत्ता फिर कायम हुई। जनसाधारण ने राहत की सांस ली, भील-मीणों का आतंक कम हुआ और जागीरदारों के स्वेच्छाचार में भी कमी आई। जोधपुर के आक्रमणों के दौरान होने वाली लूटपाट और भील-मीणों के आतंक से यहां के जनसाधारण को कुछ हद तक मुक्ति मिली। गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार सरकार अंग्रेजी की सहायता लोगों के वास्ते ऐसी फायदेमंद हुई, जैसी कि सूखती हुई खेती के लिए बारिश होती है।16 9 जून, 1822 को जब कर्नल टॉड इंग्लैंड जाने से पूर्व यात्रा करता हुआ यहां से गुजरा तो हालात सामान्य होने लगे थे। उसने लिखा कि ष् शहर जो पहले बिलकुल उजड़-सा गया था अब बसने लग गया है, जो व्यापारी तीन या चार साल पहले यह समझते थे कि सिरोही में घुसना चोरों की मांद में घुसना है और यह बात अक्षरश: सत्य भी थी, वे अब फिर दुकानें खोलने लगे हैं।17 यहां भील-मीणों की लूटपाट और आतंक में कमी आई। आधिपत्य में आते ही ब्रिटिश सरकार ने बंबई रेजिडेंसी की एक सैनिक टुकड़ी को सिरोही में नियुक्त कर दिया, जिसने बहुत अच्छा काम किया। ब्रिटिश सेना की मौजूदगी का यहां की लूटपाट ओर चोरी-चकारी करने वाली जनजातियों पर जादुई असर हुआ। जीण् स्वीन्टोन ने डेविड ऑक्टरलोनी को 11 जून, 1824 को एक पत्र में लिखा कि ष्जंगली जातियां सोचती हैं कि अंग्रेज जादूगर हैं, जो अपनी अपनी जेब में सेना छिपाकर ले जा सकते हैं और वे लड़ाई के समय कागज के सिपाहियों से काम लेते हैं।ष्18 अंग्रेजों के परामशZ पर राज्य में भील-मीणों की लूटपाट के विरुद्ध कई उपाय किए। टॉड ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है कि ष्मीणा जाति की पूरी तरह रोक दिया गया हैं, मजबूत चौकियां कायम कर दी गई हैं और व्यापारियों, कारीगरों व किसानों को लूट के विरुद्ध सुरक्षा एवं प्रोत्साहन देने के पट्टे दिए जाते है।19
ब्रिटिश संरक्षण में यहां के स्वेच्छाचारी जागीरदार ठाकुरों के विरुद्ध भी कार्यवाही शुरू की गई। निंबज का ठाकुर जोधपुर नरेश की शह पर सिरोही नरेश की मुखालपत करता था। 1840 में उसने अपने पुत्र को गिरवर में गोद रखकर वहां का पट्टा अपने अधीन कर लिया। गिरवर पर सेना भेजी गई, जिसने ठाकुर के पुत्र को गिरफ्तार कर लिया। पॉलिटिकल एजेंट ने हस्तक्षेप कर निबंज ठाकुर को अपना दावा छोड़ने के लिए विवश किया, जिससे सिरोही नरेश ने गिरवर को खालसा घोषित कर सीधे अपने अधीन कर लिया।20 यहां के कुछ जागीरदार ठाकुर भील-मीणों को लूटपाट के लिए प्रोत्साहन और संरक्षण देकर उनसे हिस्सा लिया करते थे, इसलिए उन पर भी ब्रिटिश सेना के सहयोग से सख्ती की गई। जोगापुरा के ठाकुर को इसके लिए दंडित किया गया।21 भटाणा के जमीरदार ठाकुर के दो गांव सीमा निर्धारण के दौरान पालनपुर में चले गए थे, इसलिए उसने विद्रोह कर दिया। पहाड़ों में शरण लेकर उसने लूटपाट आरंभ कर दी। अंग्रेजी सेना के सहयोग से वह पकड़ा गया, लेकिन 1858 में वह जेल से भाग गया। उसको पकड़ने के सभी प्रयत्न व्यर्थ गए। अंत में उसने सिरोही नरेश से समझौता कर लिया।22 रोहुआ के बागी ठाकुर के विरुद्ध भी अंग्रेजी सेना के सहयोग से कार्यवाही की गई। इसी तरह धानता, वेलांगरी, सणवाड़ा, सिरोड़ी, पीथापुरा आदि ठिकानों के जागीरदारों के विद्रोह और झगड़ों को दबाने में भी अंग्रेजों ने नरेश की भरपूर मदद की।23
जोधपुर लीजन और सैनिक विद्रोह
1818 में संपन्न संधि के अनुसार जोधपुर राज्य को यथावश्यकता ब्रिटिश सरकार को 1500 घुड़सवार सैनिक उपलब्ध करवाने थे। 1832 में ब्रिटिश सरकार के आदेश पर भेजे गए ये सैनिक अनुशासनहीन और अयोग्य पाए गए। 1835 में इस संबंध में फिर संधि हुई और यह प्रावधान किया गया कि 1500 घुड़सवारों के बदले जोधपुर राज्य 1,15,000 रुपए वार्षिक देगा, जिससे ब्रिटिश सरकार एक सेना तैयार करेगी।24 इस रािश से ब्रिटिश सरकार ने 1836 में अजमेर में केिप्टन डाउनिंग के नेतृत्व जोधपुर लीजन नामक सेना का गठन किया। 1842 में इस सेना का मुख्यालय अजमेर से हटाकर जोधपुर की सीमा के निकट स्थित सिरोही राज्य के ऐरिनपुरा में कर दिया गया। विद्रोह के समय केिप्टन हॉल के नेतृत्व में जोधपुर लीजन के पैदल, तोपखाना और घुड़सवार, तीन अंग थे। इसकी पैदल सेना में आठ कंपनियां पूरबिया और शेष तीन भील सैनिकों की थीं।25 माउंटआबू राजपुताना में अरावली शृंखला का सबसे ऊंचा और ठंडा स्थान था, इसलिए 1845 में सिरोही के साथ संधि26 कर ब्रिटिश सरकार ने यहां एक सेनिटोरियम बनाया, जहां राजपुताना और उसके पास स्थित अन्य राज्यों के ब्रिटिश सैनिक स्वास्थ्य लाभ और विश्राम के लिए रहते थे। यह ब्रिटिश अधिकारियों और उनके परिवारों का ग्रीष्मकालीन आवास भी था। विद्रोह के समय यहां जोधपुर लीजन के 60 देशी सैनिकों की एक सुरक्षा टुकड़ी के अतिरिक्त हिजमेजेस्टीज रेजिमेंट के 30 या 35 बीमार ब्रिटिश सैनिक भी विश्राम कर रहे थे। 18 अगस्त, 1857 को जोधपुर लीजन की एक कंपनी रोहुआ के बागी जागीरदार ठाकुर के विद्रोह को दबाने के लिए माउंट आबू के नीचे अनादरा पहुंची। कोटिन हॉल, जो इस समय माउंटआबू में था, 19 अगस्त, 1857 की नीचे आया और उसने सैनिकों को जरूरी दिशा-निर्देश दिए और वह माउंट आबू लौट गया। मार्ग में उसकी भेंट माउंटआबू में नियुक्त जोधपुर लीजन की सुरक्षा टुकड़ी के हवलदार गोजनसिंह से हुई। गोजनसिंह ने उसके पूछने पर बताया कि वह अनादरा में नियुक्त अपने साथियों से मिलने जा रहा है। बाद में हुई जांच-पड़ताल में पता लगा कि अनादरा में जोधपुर लीजन की कंपनी के विद्रोह में इस गोजनसिंह ने निर्णायक भूमिका निभाई।28 अनादरा के निकट स्थित भटाना और रोहुआ के जागीरदार ठाकुरों की भी इस विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका थी। ये दोनों ठाकुर सिरोही नरेश से निजी कारणों से नाराज थे। भटाना का बागी ठाकुर नाथूसिंह सिरोही जेल से भागकर पहाड़ों में छिपा हुआ था और रोहुआ के ठाकुर उम्मेदसिंह के बागी तेवर के विरुद्ध ही अनादरा में जोधपुर लीजन की कंपनी नियुक्त की गई थी। ये दोनों ठाकुर सिरोही नरेश के साथ अंग्रेजों से भी खफा थे, क्योंकि उनकी सरपरस्ती में सिरोही नरेश उनके पारंपरिक विशेषाधिकारों में कटौती कर रहा था। कहते हैं कि ये दोनों ठाकुर माउंटआबू पर नियुक्त जोधपुर लीजन की सुरक्षा टुकड़ी के संपर्क में थे और उनके सुझाव पर ही गोजनसिंह नीचे आया था। दरअसल ये दोनों ठाकुर और विद्रोही माउंटआबू में ब्रिटिश सैनिकों की वास्तविक उपस्थिति के बारे में जानना चाहते थे।29 जोधपुर के पुराने अभिलेखों में भटाना ठाकुर नाथुसिंह देवडा के संबंध में एक लोकगीत मिला है, जिसमें उसके द्वारा छावनी लूटने और गोरों की हत्या करने का उल्लेख मिलता है, लेकिन तत्कालीन ब्रिटिश साक्ष्यों से इसकी पुष्टि नहीं होती ।30
21 अगस्त को सुबह लगभग 3 बजे अनादरा स्थित जोधपुर लीजन की कंपनी ने विद्रोह कर दिया। कंपनी के 40 या 50 सैनिक अनादरा से माउंटआबू पर चढ़ गए।30 सुबह कोहरा इतना घना था कि किसी को उनकी भनक तक नहीं लगी।31 उन्होंने अंग्रेज सैनिकों की बैरकों पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया। बीमार और अयोग्य अंग्रेज सैनिकों ने भी उत्तर में गोलीबारी की।32 कोई भी अंग्रेज सैनिक हताहत नहीं हुआ। एक सार्जेंट के साथ 14 सैनिकों एक टुकड़ी ने पास ही स्थित स्कूल की ओर प्रस्थान किया। मेहरबानसिंह के नेतृत्व विद्रोही सैनिकों ने केिप्टन हॉल के आवास पर भी आक्रमण किया, लेकिन उसने सपरिवार पिछले दरवाजे से निकल कर स्कूल में शरण ले ली।33 केिप्टन हॉल के आवास पर गोलीबारी की आवाज सुनकर एजीजी का पुत्र एण् लॉरेंस बाहर निकला और विद्रोहियों की गोलीबारी में घायल हो गया। सभी अंग्रेज परिवारों को स्कूल में सुरक्षित पहुंचाकर केिप्टन हॉल और डाक्टर यंग हिज मेजेस्टीज रेजिमेंट के आठ अंग्रेजी सैनिकों के साथ जोधपुर लीजन की सुरक्षा टुकड़ी के िशविर की ओर गए। कुछ देर गोलीबारी के बाद केप्टिन हॉल ने विद्रोहियों को पहाड़ी के नीचे, अनादरा की तरफ खदेड़ दिया।34 अनादरा में एकत्रित होकर विद्रोहियों ने सिरोही की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में चौकियों पर नियुक्त सुरक्षा प्रहरी भी विद्रोहियों के साथ हो गए।35 यह पता लगने पर कि सिरोही नरेश ने नगर के द्वार पर दो तोपें तैनात कर दी हैं तो विद्रोही मार्ग बदलकर ऐरिनपुरा पहुंच गए।36
ऐरिनपुरा छावनी में अनादरा के विद्रोही सैनिकों के पहुंचने से पहले ही विद्रोह हो गया था। माउंटआबू में हुए विद्रोह की सूचना लेफ्टिनेंट कोनोली को अपने अर्दली मखदूम बख्श से प्राप्त हुई। दरअसल मखदूम बख्श को आबू से एक विद्रोही सैनिक ने पत्र लिखा था जिसमें आबू में हुए विद्रोह का अतिरंजित विवरण देते हुए ऐरिनपुरा छावनी के सैनिकों से आग्रह किया गया था कि वे छावनी की तोपें छीनकर दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दें। यह पत्र मखदमू बख्श ने कोनोली के सौंप दिया। कोनोली ने विद्रोह सूचना के साथ एक गोपनीय संदेश तत्काल सैनिक सहायता के लिए जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेसन भेज दिया।37 छावनी में इस समय लेिफ्टनेंट कोनोली सहित तीन अंग्रेज अधिकारी और उनके परिवार, जिनमें दो महिलाएं और पांच बच्चे थे, निवास कर रहे थे। 22 अगस्त को दिन निकलने के बाद कोनोली घोड़े पर सवार होकर परेड ग्राउंड पर गया तो माहौल में उत्तेजना थी। तोपों की तरफ दौड़ रहे सैनिकों को उसने उनसे दूर रहने का आदेश दिया, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। इसी समय घुड़सवार सेना भी बागी हो गई। वह मेजर वूडी के साथ तोपखाने की तरफ गया, लेकिन सैनिकों ने तोपों का मुंह उसकी तरफ घुमाकर उसको मारने की धमकी दी। कोनोली ने दूसरी दिशा से तोपों की ओर पहुंचने का प्रयत्न किया, लेकिन सैनिकों ने उसकी तरफ बंदूकें तान कर यह प्रयास विफल कर दिया। भील सैनिक निष्ठावान बन रहे, लेकिन विद्रोही इतने अधिक उत्तेजित थे कि उन्होंने उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की। कुछ निष्ठावान सैनिक, जिनमें रिसालदार अब्बास अली, इलाही बख्श और नसीरूद्दीन प्रमुख थे, कोनोली की रक्षा के लिए आगे आए। विद्रोहियों में मतभेद और झगड़ा हो गया। कुछ सैनिक कोनोली सहित सभी अंग्रेजों को उनके भाग्य पर छोड़ देने के पक्ष में थे, जबकि कुछ उन्हें मार डालना चाहते थे। अब्बास अली बेग ने अपनी पगड़ी विद्रोहियों के पैरों में रखते हुए ऐलान कर दिया यदि कोई सैनिक कोनोली की तरफ बढ़ेगा तो उसे पहले उसकी लाश पर से गुजरना होगा।38 विद्रोहियों ने सभी अंग्रेज अधिकारियों और उनके परिवारों को परेड ग्राउंड के बीच एक टेंट में रात गुजारने की अनुमति दी, जहां वे पूरी रात सो नहीं पाए।39 23 अगस्त की सुबह माउंट और अनादरा के विद्रोही सैनिक ऐरिनपुरा पहुंच गए, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ। निष्ठावान सैनिकों ने इन विद्रोही सैनिकों को अंग्रेजों को नुकसान पहुंचाने से रोक दिया। विद्रोहियों ने अपने नेता मेहरबानसिंह को जनरल के पद पर पदोन्नत कर दिया। उन्होंने कोनोली के अतिरिक्त सभी अंग्रेज अधिकारियों, महिलाओं और बच्चों को जाने की अनुमति दे दी और इन सभी को िशवगंज के कामदार को सौंप दिया गया, जिसने उन्हें सुरक्षित सिरोही पहुंचा दिया।40 विद्रोहियों ने अपने नेता मेहरबानसिंह के आदेश पर 24 अगस्त को पाली के मार्ग से दिल्ली की ओर कूच किया। उन्होंने लेफ्टिनेंट कोनोली को भी उसके निष्ठावान सैनिकों सहित घोड़े पर बिठाकर अपने साथ ले लिया। अंतत: ढोला के पास पहुंचकर विद्रोहियों ने कोनोली को उसके निष्ठावान देशी सैनिकों के साथ मुक्त कर दिया।41 सिरोही राज्य के मुंशी नियामत अली की भेंट दो दिन तक निरंतर विद्रोहियों का पीछा करने के बाद कोनोली से हुई। नियामत अली कोनोली और उसके रक्षक सैनिकों को सुरक्षित सिरोही ले आया।42 विद्रोही पाली की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन जोधपुर के किलेदार अनाड़सिंह के सेना सहित पाली में होने की सूचना मिलने पर उन्होंने अपना मार्ग बदल लिया। वे खेरवा होते हुए आऊवा के निकट एक गांव में पहुंचे, जहां आऊवा के ठाकुर ने उनके सामने जोधपुर राज्य के विरुद्ध उसका साथ देने का प्रस्ताव रखा। विद्रोही तत्काल दिल्ली पहुंचना चाहते थे, इसलिए वे दो भागों में बंट गए।43 इनमें से कुछ ने दिल्ली की ओर कूच किया, जबकि शेष ने आऊवा के संग्राम में वहां के ठाकुर की मदद की। आऊवा में जोधपुर और ब्रिटिश सेना की दो बार परास्त करने के बाद जोधपुर लीजन के इन शेष सैनिकों ने भी प्रमुख जागीरदार ठाकुरों के साथ 10 अक्टूबर, 1857 को दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया
सिरोही राज्य के माउंटआबू और ऐरिनपुरा में हुआ जोधपुर लीजन का विद्रोह केवल सैनिक विद्रोह था। बंगाल, बिहार, अवध आदि राज्यों में जनसाधारण और उसमें भी खास तौर पर किसानों ने विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन सिरोही में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। यहां के जनसाधारण ने न तो विद्रोह में भाग लिया और न ही उसका समर्थन किया। विद्रोह के दौरान सिरोही का सामान्य जन जीवन भी अप्रभावित रहा। हमेशा की तरह यहां खेती और व्यापार होते रहे, राजस्व वसूली हुई और सभी प्रकार का लेन देन और दैनंदिन कामकाज निबाZध हुआ।44 दरअसल पूर्वी और केन्द्रीय प्रांतों को ब्रिटिश मौजूदगी और शासन का लंबा अनुभव था, जबकि सिरोही के जनसाधारण को यह अनुभव फिलहाल नहीं के बराबर था। सिरोही राज्य ने 1823 में ही ब्रिटिश सरकार से संधि की थी और जनसाधारण के मन में फिलहाल ब्रिटिश मौजूदगी से कोई नाराजगी और असंतोष नहीं था। उल्टे जोधपुर के आक्रमणों और भील-मीणों की लूटपाट से त्रस्त जन साधारण के लिए ब्रिटिश मौजूदगी राहत और सुकून पहुंचाने वाली सिद्ध हुई। सिरोही के ब्रिटिश संरक्षण में जाने का सर्वाधिक नुकसान जागीरदार ठाकुरों को हुआ। सही मायने में सिरोही नरेश ने ब्रिटिश सरकार से संधि ही इन ठाकुरों के दमन के लिए की थी और कुछ हद तक ब्रिटिश सहयोग से वह इनके स्वेच्छाचार पर लगाम लगाने में भी सफल हुआ। बावजूद इसके सिरोही राज्य के जागीरदार ठाकुरों में अंग्रेजों के प्रति कोई असंतोष और नाराजगी नहीं पनप पाई। जोधपुर लीजन के सैनिक विद्रोह में सहभागिता तो दूर, इन्होंने इसका समर्थन भी नहीं किया, जबकि मारवाड़ के आसोप, आलनियावास, गूलर, लांबिया, बांता, निंबालिया, बाजानास आदि के ठाकुरों ने आऊवा के विद्रोह और संग्राम सक्रिय सहभागिता की थी। भटाना और रोहुआ के बागी जागीरदार ठाकुरों ने जोधपुर लीजन के सैनिकों को विद्रोह के लिए उकसाने का काम तो किया, लेकिन वे खुलकर विद्रोहियों के साथ नहीं हुए।
स्पष्ट है कि सिरोही राज्य में 1857 का विद्रोह तो हुआ, लेकिन खास प्रकार की परिस्थितियां होने के कारण यह केवल सैनिक विद्रोह तक सीमित रहा गया। जन साधारण की इसमें कोई सहभागिता नहीं थी, इसलिए आज यहां के लोगों की स्मृति और संस्कार में इसका कोई अवशेष मौजूद नहीं है।
<अक्सर,अक्टू.-दिस.2007 में प्रकाशित