Friday 27 June 2008

गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक का हिन्दी अनुवाद और अनुवादक

तुगलक का हिंदी अनुवाद विख्यात रंगकर्मी और सिने शख्सियत बी.वी.कारंत (बाबु कोडि वेंकटरामन कारंत) ने किया है। बी.वी.कारंत का जन्म 1928 में कर्नाटक के दक्षिणा कन्नड जिले के बंटवाल ताल्लुक के मांची गांव में हुआ। रंगमंच से कारंत का पहला साक्षात्कार तब हुआ जब वे तीसरी कक्षा में थे। उन्होंने तब पी.के.नारायण के निर्देशन में नाना गुपाला नामक नाटक में अभिनय किया। कारंत ने बहुत कम उम्र में ही घर से भाग कर कर्नाटक की गुब्बी वीरन्ना नाटक कंपनी में काम करना शुरु कर दिया। गुब्बी वीरन्ना ने बाद में कारंत को स्नातकोत्तर की षिक्षा के लिए बनारस भेजा। यहीं रहकर कारंत ने ओंकारनाथ ठाकुर से हिंदुस्तानी गायन की शिक्षा भी ली। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से कारंत का गहरा रिश्ता रहा है। पहले वे यहां के विद्यार्थी रहे और बाद में इब्राहिम अलकाजी आदि के साथ निर्देशन का कार्य किया। 1977 में कारंत ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक का पद ग्रहण किया। उन्होंने अपनी पत्नी प्रेमा कारंत के साथ बेनका नामक रंग संस्था भी कायम की। मध्य प्रदेष सरकार ने भारत भवन स्थापित करने के बाद वहां रंगमंडल का कार्यभार संभालने के लिए कारंत को निमंत्रित किया। कारंत ने 1981-86 की अवधि के दौरान भारत भवन के रंगमंडल के निदेषक रहे और उन्होंने यहां वाद्य यंत्रों का अद्भुत संग्रहालय कायम किया। 1989 में कर्नाटक सरकार के निमंत्रण पर उन्होंने बैंगलोर में रंगायन संस्था कायम की। कारंत ने अब तक कन्नड सहित हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, तेलगु, मलयालम आदि के लगभग सौ नाटकों का निर्देषन किया है, जिसमें मेकबेथ, किंग लियर, घासीराम कोतवाल, मृच्छकटिकम्, मुद्राराक्षस, हयवदन, एवं इंद्रजीत, ईडीपस, चंद्रहास, मालविकाग्निमित्र आदि शामिल हैं। कारंत ने चार फीचर और चार ही डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्देषन और लगभग 26 फिल्मों में संगीत दिया है। कारंत को भारत सरकार के पद्मश्री सहित कई सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

भारत जैसे बहुभाषिक समाज में अनुवाद का बहुत महत्व है। इससे भिन्न भाषाभाषी समाजों के बीच अंतकिZया और संवाद का बढ़ावा मिलता है। नाटक तुगलक मूलत: कन्नड में रचित इसी नाम के नाटक का हिंदी अनुवाद है। खास बात यह है कि यह अनुवाद प्रसिद्ध रंगकर्मी बी.वी. कारंत ने किया है, जिन्हें कन्नड और हिंदी, दोनों भाषाओं में महारत हासिल है और जिन्होंने हिंदी और सहित कई अन्य आधुनिक भाशाओं में रंगकर्म का अनुभव प्राप्त है। अक्सर कहा जाता है कि अनुवाद में रचना की मूल आत्मा सुरक्षित नहीं रहती, लेकिन यह कथन तुगलक के इस हिंदी अनुवाद के संबंध में सही नहीं है। यह अनुवाद इस तरह का है कि इसमें मूल नाटक की आत्मा सुरक्षित रही है, क्योंकि एक तो, अनुवादक कारंत स्वयं मूलत: कन्नड भाशी और कन्नड रंगकर्मी हैं और दूसरे, गिरीश कारनाड और उनके बीच पारस्परिक समझ बहुत अच्छी है। दरअसल हिंदी में अनुवादित होकर यह नाटक अधिक प्रभावशाली और अर्थपूर्ण हो गया है, क्योंकि इसमें प्रयुक्त अधिकांष उर्दू शब्द हिंदी की मूल प्रकृति से कन्नड की तुलना में ज्यादा मेल खाते हैं। इसी तरह इस नाटक की वाक्य रचना और दरबारी अदब-कायदों और रवायतों वाला मुहावरा भी हिंदी के अधिक निकट पड़ता है। अनुवाद की भाषा आद्यंत प्रवाहपूर्ण है। लंबे संवादों के बावजूद इसमें चमत्कार बना रहता है। इसमें लंबे संवाद जरूर है, लेकिन कारंत ने छोटे और अर्थपूर्ण वाक्यों से उनको उबाऊ और नीरस होने से बचा लिया है। मूल कन्नड में रचित तुगलक के बजाय इसके हिंदी अनुवाद को अधिक लोकप्रियता मिली। राश्ट्रीय नाट्य विद्यालय में इब्राहिम अलकाजी द्वारा इसके हिंदी अनुवाद के मंचन के बाद इसके कई दूसरी आधुनिक भारतीय भाशाओं में अनुवाद और मंचन हुए। गिरीष कारनाड को भी इसके हिंदी अनुवाद और मंचन के बाद ही कर्नाटक से बाहर एक भारतीय रंगकर्मी की प्रतिष्ठा और सम्मान मिले।

Wednesday 25 June 2008

गिरीश कारनाड का नाट्य कर्म

विख्यात नाटककार, कवि, अभिनेता, निर्देशक, आलोचक, अनुवादक और सांस्कृतिक प्रशासक गिरीश कारनाड का जन्म महाराष्ट्र के माथेराम में एक कोंकणीभाषी परिवार में 19 मई, 1938 को हुआ। कारनाड ने 1958 में धारवाड स्थित कर्नाटक विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद वे रोहड्स स्कॉलर के रूप में इग्लैंड गए, जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा ग्रहण की। कारनाड शिकागो विविद्यालय के फुलब्राइट महाविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे। कारनाड की मातृभाषा कोंकणी थी, लेकिन वे अंग्रेजी में लिखकर शेक्सपीयर और टी.एस. ईलियट की तरह विख्यात होना चाहते थे। कारनाड विख्यात तो हुए, लेकिन कोंकणी या अंग्रेजी में नहीं, कन्नड़ में हुए। 1961 में कन्नड़ में प्रकाषित उनके पहले नाटक ययाति ने उनको भारतीय साहित्य की महत्वपूर्ण शख्सियत के रूप में स्थापित कर दिया। इस नाटक के कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुए। इसके बाद कारनाड मद्रास स्थित ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस की नौकरी छोड़ कर पूर्णकालिक स्वतंत्र लेखन में जुट गए।

रंगकर्मी के रूप में स्थापित होने के बाद कारनाड की दिलचस्पी फिल्मों में भी हुई। इस नए माध्यम में भी उन्होंने बतौर लेखक, निर्देशक और अभिनेता कई कीर्तिमान कायम किए। उनकी फिल्म संस्कार को आरंभिक विवादों के बाद राश्टपति का स्वर्ण पदक पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त उन्होंने वंशवृक्ष, काडू, अंकुर, निशांत, स्वामी और गोधुलि जैसी फिल्में बनाईं और इनमें अभिनय भी किया। मृच्छकटिकम् पर आधारित विख्यात लोकप्रिय फिल्म उत्सव का लेखन और निर्देषन भी कारनाड ने ही किया। इकबाल जैसी लोकप्रिय फिल्म से भी कारनाड संबंधित रहे हैं। कारनाड को उनके साहित्य में समग्र योगदान के लिए 1990 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त पद्मभूषण-पद्मश्री, साहित्य अकादमी और संगीत-नाटक अकादमी सहित कई पुरस्कार-सम्मान उनको प्राप्त हो चुके हैं। निरंतर सृजनषील रहने के बावजूद कारनाड अपनी चिकित्सक पत्नी और दो बच्चों को पर्याप्त समय देते हैं और अपने व्यक्तिगत जीवन की सार्वजनिक चर्चा करने से परहेज करते हैं। फिलहाल सभी तरफ से समेटकर कारनाड ने अपने को नाटकों के लिए समर्पित कर दिया है। उनके अपने शब्दों में ´´अब जो भी समय मेरे पास बचा है, उसे मुझे नाटक लेखन, जो मुझे सबसे अधिक पसंद है, में व्यतीत करना चाहिए।

गिरीश कारनाड मूलत: नाटककार हैं और उनकी प्रतिभा का सर्वोत्तम इस अनुशासन में ही व्यक्त हुआ है। बतौर फिल्म निर्देशक, लेखक और अभिनेता उनकी ख्याति का पर्याप्त विस्तार हुआ, उन्हें इन विभिन्न भूमिकाओं के लिए पुरस्कार-सम्मान भी मिले, लेकिन उनका पहला और आखिरी प्यार नाटक है और उनकी आत्मा इसी में रची-बसी है। उनके अपने शब्दों में ´´मैं अभिनेता जीविकोपार्जन के लिए बना। अगर नाटक लेखन से यह हो गया होता, तो मैं कुछ और नही करता।`` कारनाड ने जिस समय कन्नड में नाट्य कर्म की शुरुआत की, तो वहां पश्चिमी साहिित्यक पुनर्जागरण का गहरा और व्यापक प्रभाव था। कन्नड लेखकों में इस समय नवाचार और प्रयोगशीलता की होड़ लगी हुई थी। ऐसे समय में कारनाड ने पौराणिक और ऐतिहासिक विषय वस्तु और चरित्रों वाले नाटकों के माध्यम से अपने समय और समाज समझने-समझाने की कोशिश की, जो बहुत लोकप्रिय हुई।

कारनाड का महाभारत के मिथकीय चरित्रों पर एकाग्र पहला नाटक ययाति 1961 में प्रकाशित हुआ। यह नाटक चरित्र सृष्टि और रंग योजना के लिहाज से असाधारण था, इसलिए इसको तत्काल पहचान मिली। 1964 में प्रकाशित कारनाड का दूसरा नाटक तुगलक सल्तनतकालीन विख्यात ऐतिहासिक चरित्र मुहम्मद बिन तुगलक पर आधारित था। तुगलक प्रतापी और स्वप्नदृ, लेकिन निरंकुश शासक था, जिसको कारनाड ने इस नाटक में नेहरूयुगीन द्वंद्व और यथार्थ की जटिलता को उजागर करने के लिए चुना। इस नाटक का मंचन विख्यात रंगकर्मी इब्राहिम अलकाजी ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में किया। कारनाड के नाटक रक्त कल्याण के भी कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुए। 1168 ईण् से पहले के दो दषकों के कर्नाटक के इतिहास पर आधारित इस नाट्य रचना का नायक बसवण्णा नामक कवि और समाज सुधारक है। धर्म, जाति, लिंग आदि की असमानता का विरोध और कर्म का निर्वाह बसवण्णा के आदर्श थे। इन आदर्शों के लिए बसवण्णा द्वारा किए गए संघर्ष को कारनाड इस नाटक के माध्यम से हमारे समय और समाज के लिए प्रासंगिक बनाते हैं। यह नाटक नाटय शिल्प के लिहाज से भी सुगठित है और इसकी रंग योजना इस तरह की है कि इससे आठ सौ वर्ष पूर्व की कन्नड़ संस्कृति जीवंत हो उठती है। 1971 में प्रकाषित नाटक हयवदन भी गिरीश कारनाड के नाट्य कर्म को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाला है। यहां नाटककार स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता को खोलने के लिए मिथकीय आख्यान का सहारा लेता है। स्त्री-पुरुष संबंधों की संपूर्णता की अंतहीन तलाष की यातना और बुद्धिऔर देह का सनातन संघर्ष इस नाटक में खास तौर पर दिखाया गया है। प्रासंगिक और आकर्षक कथ्य तथा सम्मोहक शिल्प इस नाटक की खासियत है। इन कुछ विभिन्न भारतीय भाशाओं में अनूदित नाटकों के अतिरिक्त अग्नि मटट, माले, ओदेकलु बिंब, अंजुमालिंगे, मा निशाद, टीपूविना, कनासुगल, हित्तिना हुंज, नाग मंडल और बलि भी कारनाड के नाटकों में शामिल हैं।

Sunday 22 June 2008

गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक की भाषा और संवाद

सल्तनतकालीन शासक वर्ग से संबंधित होने के कारण तुगलक की भाषा और संवाद अभिजातवर्गीय हैं। इनमें दरबारी अदब-कायदों की बारीकियों को समाविश्ट किया गया है। इसके एक-दो चरित्रों को छोड़कर शेष सभी चरित्र मुसलमान हैं, इसलिए वे नफीस और अदब-कायदों वाली उर्दू बोलते दिखाए गए हैं। यह अवश्य है कि सामाजिक हैसियत के अनुसार इनकी भाषा का चरित्र कुछ हद तक बदल जाता है- सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की भाषा एक अभिजात शासक और बुद्धिजीवी की प्रांजल भाषा है, जबकि अजीज और आजम की भाषा में चोर-उच्चकों वाली उठापटक है। महान चरित्र पर एकाग्र होने के कारण इसके संवाद लंबे और कहीं-कहीं भाषणों जैसे हैं।

मुहम्मद बिन तुगलक उलाउद्दीन खिलजी के बाद सबसे अधिक प्रतापी शासक था। यही नहीं, वह अपने समय का सबसे बड़ा बुिद्धजीवी और स्वप्नदृष्टा भी था। यह नाटक इस महान शासक और बुद्धिजीवी पर एकाग्र है, इसलिए तदनुसार उसकी भाशा और संवाद अभिजात और प्रांजल उर्दू में हैं। नाटक के आरंभिक दृश्यों में उसकी भाशा उसके आदर्शवाद और सपनों के अनुरूप गंभीर और गहरी है। उसके संवाद उसके गहरे विचार मंथन से निकले हुए हैं। इनमें गरिमा और अभिजात्य है। नाटक के दूसरे दृश्य का एक संवाद उदाहरण के लिए यहां प्रस्तुत है, जिसमें वह अपनी सौतेली मां से कहता है ´´अल्लाह से दरख्वास्त करता रहता हूं कि या खुदा, मुझे नींद न आये! दिन तो यों ही दुनियावी शोरो-गुल में निकल जाता है। मगर ज्यों ही दिन का उजाला रुखसत हो जाता है, रात की तारीकी को चीर कर मैं आसमान के पार पहुंच जाता हूं, और आसमान के सितारों के इर्दगिर्द मंडराया करता हूं। फिर इब्न-अल-मोतज, दुर्रुम्मान जैसे बावकार शायरों का कलाम गुन-गुनाया करता हूं। तब एकाएक दिल में यह ख्वाहिष जागती है कि मैं अभी और इल्म हासिल करूं, अभी और तरक्की करूं, और ऊपर उठूं, मेरे तसुव्वर में मेरी रिआया का साया उभरने लगता है, और मेरा जी फिर बेकरार होने लगता है। जी होता है कि किसी उंचे दरख्त पर चढ़ जाउं, और वहां से अपनी रियाआ को आवाज दूं, चीख-चीख कर उन्हें पुकारा करूं- ऐ मेरी अजीज-तरीन रिआया, उठो, उठो, मैं तुम्हें आवाज दे रहा हूं, तुम्हारी राह देख रहा हूंण्ण्ण्आओ, अपनी तमाम परेषानियां मुझे बताओ, मैं अपनी तमाम ख्वाहिषें तुम्हें सुना दूं, फिर हम सब एक साथ परवरदिगार की इबादत करें!`` लेकिन जैसे-जैसे हताषा बढ़ती है, तुगलक के मन में अंतर्संघर्ष बढ़ता जाता है। नाटक के अंतिम दृश्यों की भाषा और संवादों में यह उतार-चढ़ाव साफ दिखाई पड़ता है। दौलताबाद किले के उपरी हिस्से पर अपना मूल्यांकन करते हुए तुगलक के ऐसे एक लंबे संवाद का उदाहरण यहां देना ठीक रहेगा। यहां वह बरनी से कहता है- ´´अंदर ही अंदर एक ख्वाहिशउभरती है कि इस कशमकश को तोड़कर हज पर रवाना हो जाऊं। ´रुआब` के सामने अपनी जिंदगी बिछा दूं और रूहानी सुकून हासिल कर लूं। मगर हकीकते हाल निहायत संगीन है, बरनी! ला इलाज बीमार शख्स को मैदानों में खुले फेंक देने का मतलब है, नयी बीमारियों को दावत देना। (आवाज को ऊंचा करते हुए) बरनी, हजारों खूंख्वार गिद्ध सर पर मंडरा रहे हैं जिनकी खूनी नजरें मुझ पर जमी हुई हैं।

नाटक के दूसरे चरित्रों की भाषा उनकी सामाजिक हैसियत के अनुसार है। वजीरे-आजम नजीब की भाशा उसके चरित्र के अनुसार दो-टूक और बेलाग भाशा है। उसमें उठापटक और द्वंद्व कम है। शेख इमामुद्दीन की भाषा में उसकी ऊंची धार्मिक हैसियत की खनक साफ सुनाई पड़ती है। तुगलक और उसके बीच हुए संवादों में एक-दूसरे को पछाड़ने की जद्दोजहद है। सौतेली मां की भाशा में ऊपरी वात्सल्य के भीतर वर्चस्व की चाहत से पैदा हुई चतुराई साफ दिखाई पड़ती है। उसके संवाद अपेक्षाकृत छोटे हैं और उनमें जानकारियां पा लेने की जल्दबाजी झलकती है। आजम और अजीज की भाषा में चोर-उच्चकों वाली उठापटक, लेकिन साफगोई है। इस नाटक की भाषा और संवादों की खास बात यह है कि ये पात्रों की सामाजिक हैसियत के अनुसार बदलती है, लेकिन उसका स्तर कभी भी निम्न नहीं होता।

Thursday 19 June 2008

गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक की रंग योजना

तुगलक विख्यात रंगकर्मी गिरीश कारनाड की मूलत: कन्नड़ में रचित नाट्य कृति है, जिसके हिंदी सहित कई आधुनिक भारतीय भाशाओं में अनुवाद और मंचन हुए हैं। इसके नाटककार गिरीश कारनाड आधुनिक भारतीय साहित्य और रंगमंच की महत्वपूर्ण शख्शियत हैं। यह कृति आदर्शवादी, स्वप्नदृष्टा और बुध्दिजीवी, लेकिन इतिहास में सनकी और पागल के रूप में चर्चित मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन तुगलक के चरित्र पर एकाग्र है।

गिरीश कारनाड विख्यात रंगकर्मी हैं और उन्हें रंगकला के सभी अनुषंगों-नाट्य लेखन, निर्देशन, अभिनय आदि का अनुभव है। तुगलक की रग योजना इसीलिए अपार संभावनाओं से युक्त है। खास बात यह है कि यहां नाटककार ने प्रस्तुति के लिए निर्देशक को पूरी छूट दी है। उसने मंच परिकल्पना, साज-सज्जा, प्रकाष व्यवस्था और संगीत के लिए अपनी तरफ से कोई बांधने वाला विधान नाटक में नहीं किया है। नाटक ऐतिहासिक है, इसमें वर्णित घटनाएं और चरित्र महान और भव्य हैं, इसलिए इसके मंचन के लिए व्यापक शोध और कल्पनाशीलता अपेक्षित है। नाटककार पहले दृष्य की शुरूआत में समय, 1327ई.का और दृष्यों के आरंभ में केवल भवनों या स्थानों का नामोल्लेख करता है। वह इस तरह उस समय के भवनों या स्थानों की मंच परिकल्पना निर्देषक पर छोड़ देता है। नाटक की कथावस्तु भव्य और महान है, इसलिए इसमें वृहदाकार दृबंध और भव्य वेषभूशा अपेक्षित है। यह दृष्य बंध और वेषभूशा यथार्थवादी भी हो सकते है और प्रयोगधर्मी भी।

भव्य और महान कथावस्तु के बावजूद गिरीष कारनाड इस नाटक में समय, स्थान और कार्य व्यापार की अिन्वति बनाए रखने में सफल रहे हैं। नाटक 25-30 वर्षों के कालखंड में विस्तृत है। नाटक की शुरूआत तुगलक के सत्तारूढ होने के आरंभिक समय 1327 ई. से होती है और तुगलक के सनकी और पागल हो जाने की अवस्था में नाटक खत्म हो जाता है। रोमिल थापर के अनुसार तुगलक का निधन 1357 ईण् में हो गया था। तेरह अंकों में विभक्त इस नाटक में आठ दृष्य बंध है। मंच सज्जा यदि प्रयोगधर्मी हो, तो दृष्य बंधों की संख्या कम भी की जा सकती है। नाटक की ‘ाुरुआत दिल्ली की मिस्जद के बाहरी हिस्से से होती है, जहां से तुगलक लोगों के मजमे की संबोधित करता है। आगे के अंकों में शाही महल, मिस्जद के सामने का सेहन, अमीर की कायमगाह, दिल्ली से दौलताबाद जाने के रास्ते पर एक खेमा, दौलताबाद किले का ऊपरी हिस्सा, पहाड़ी गुफा और दौलताबाद किले के बंद दरवाजे के दृष्य बंध हैं। कारनाड ने संपूर्ण भवन या स्थान के बजाय उसके बाहरी हिस्से या कोने को ही दृष्य बंध में शामिल किया है। यह अवश्य है कि माहौल को सल्तनतकालीन बनाने के लिए भवनों में तत्कालीन स्थापत्य की झलक बेहद जरूरी है। स्थानों के दिल्ली और दौलताबाद में होने के बावजूद कार्य व्यापार में गति होने के कारण नाटक की अन्विति नहीं टूटती।

ऐतिहासिक होने कारण इस नाटक में वेषभूशा का खास महत्व है। इसी से दृश्यों में भव्यता का माहौल बनता है। वेषभूशा के संबंध में भी नाटककार ने अपनी तरफ से कोई रंग निर्देष नहीं दिए हैं। यह उसने निर्देषक की कल्पना और सूझबूझ पर छोड़ दिए हैं। नाटक के ऐतिहासिक कथानक को देखते हुए सल्तनतकालीन दरबारी औपचारिक वेषभूशा इस नाटक के लिए जरूरी है। युद्ध और शडयंत्रों की निरंतरता के कारण इस नाटक के प्रमुख पात्रों को शस्त्रों से भी लैस होना चाहिए। माहौल की भव्य रूप देने और खास तौर पर तुगलक के अंतर्संघर्ष और द्वंद्व को व्यक्त करने के लिए इस नाटक के मंचन में संगीत का भी महत्व है।

तुगलक के बी.वी.कारंत के हिंदी अनुवाद का मंचन विख्यात रंगकर्मी इब्राहिम अलकाजी ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली में किया था। उन्होंने इसका मंचन यथार्थवादी दृश्यबंधों के आधार पर तो नहीं किया, लेकिन मंच सज्जा, वेषभूशा, संगीत आदि के निर्धारण में उन्होंने तत्कालीन इतिहास सामग्री और स्थापत्य को आधार बनाया। उन्होंने इसकी प्रस्तुति राष्ट्रीयनाट्य विद्यालय के वृहदाकार खुले रंगमंच पर की। उन्होंने इसको एकाधिक भागों में बांटकर अलग-अलग भागों को कुछ खास पात्रों से संबद्ध किया। मंच के पृष्ठ भाग में तुगलक के अध्ययन कक्ष की मंच सज्जा इस तरह की गई कि जिससे उसकी अध्ययनषील, वैज्ञानिक और अन्वेषणप्रिय रुचि का संकेत मिल सके। उन्होंने मंच के पृष्ठ भाग में ही तुगलक की सौतेली मां के महल के दरवाजे का दृष्य बंध बनाया। इसी प्रकार ऊंची मेहराब वाले चबूतरे के एक दृष्यबंध को अलकाजी ने दो दष्यों के लिए काम लिया- एक बार जब अदालत के बाहर तुगलक भीड़ को संबोधित करता है, और दूसरी बार जब वह खलीफा के प्रतिनिधि गियासुद्दीन का दौलताबाद किले के दरवाजे के बाहर स्वागत करता है। इसी तरह नीचे स्थित चबूतरे से उन्होंने जंगल के खुले स्थान का काम लिया। अन्विति के लिए इन सभी ऊंचे-नीचे और अलग-अलग दृष्यबंधों को उन्होंने सीढ़ियों से जोड़ दिया। दृश्य बंधों की परिकल्पना और निर्माण में अलकाजी ने पर्सी ब्राउन के ग्रंथ इंडियन आर्किटेक्चर (द इस्लामिक पीरियड) और वास्तु विषेशज्ञों का भी सहयोग लिया। पहले और छठे दृश्य में दरबारी शान-शौकत और तड़क-भड़क के लिए अलकाजी ने फर्श पर कालीन बिछाया। तत्कालीन मुस्लिम दरबार का माहौल बनाने के लिए उन्होंने दरबारी अदब-कायदों की बारीकियां तबकात-अल-नासिरी और आईने-अकबरी जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों की मदद से जुटाईं। अलकाजी ने इस नाटक के मंचन में पात्रों की वेषभूशा पर खास ध्यान दिया। उन्होंने विभिन्न सामाजिक तबकों के लिए अलग-अलग रंग-जनसाधारण के लिए भूरे, अमीर-उमरा के लिए भूरे और चटख गुलाबी, दरबारी औरतों के लिए फिरोजी, पन्ना और सोने तथा तुगलक के लिए काले और सुनहरी रंगों की पोषाकें रखीं। अलकाजी ने लंबे शोध के बाद पारंपरिक तुर्की और फारसी संगीत के टुकड़ों को मिला कर इस नाटक के लिए संगीत तैयार किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने बीच-बीच में स्थिति के अनुसार कुरान पाक की आयतों के पाठ का भी प्रावधान किया, जिससे तुगलक के निजी अंतर्संघर्ष् को उदात्तता देने में मदद मिली।

Monday 16 June 2008

गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक में हमारा समय और समाज

तुगलक अपने समय और समाज के द्वंद्व और यथार्थ का सम्मोहक रूपक है। कोई समकालीन रचनाकार इतिहास या मिथ को केवल उसकी पुनर्रचना के लिए नहीं उठाता। जब इतिहास या मिथ में कहीं न कहीं वह अपने समय और समाज का साद्श्य पाता है, तभी वह उसे अपनी रचना का विषय बनाता है। अपने समय और समाज से सीधे मुठभेड में अक्सर खतरा रहता है। रचनाकार किसी समय और समाज में रह कर उस पर तटस्थ टिप्पणी या उसका तटस्थ मूल्यांकन नहीं कर पाता। इतिहास या मिथ की पुनर्रचना में पूरी तरह तटस्थ और निर्मम रहा जा सकता है और इस तरह अपने समय और समाज के द्वंद्व और यथार्थ को उसमें विन्यस्त करने में भी आसानी होती है।
आजादी के बाद के दो-ढाई दशकों का आधुनिक भारतीय इतिहास में खास महत्व है। एक तो इस समय का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व देश निर्माण के उत्साह से लबालब था और दूसरे, इस समय यहां जन साधारण की आकांक्षाएं भी आसमान छू रही थीं। योजनाकारों ने नेतृत्व की पहल पर आदर्शवादी योजनाएं बनाईं, आर्थिक और सामाजिक विशमता समाप्त करने के संकल्प लिए गए और लोगों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने की बातें हुईं, लेकिन तमाम शुभेच्छाओं के बावजूद हालात नहीं बदले। योजनाओं का लाभ जनसाधारण तक नहीं पहुंचा और विशमता बढ़ती गई। नौकरशाही की मंथर गति और टालमटोल तथा स्पष्ट नीति के अभाव में नेतृत्व द्वारा की गई पहल और निर्णयों को अमल में नहीं लाया जा सका।
गत सदी के सातवें दषक में नेतृत्व और जनसाधारण के सपनों और आकांक्षाओं का पराभव शुरू हो गया। उदाहरण के लिए आजादी के बाद भूमि सुधार तत्काल अपेक्षित थे,लेकिन प्रशासनिक शिथिलता और प्रबल इच्छा शक्ति के अभाव में इनको लागू नहीं किया जा सका। इसी तरह दूसरी पंचवर्षीय योजना (1957-61) में राष्टीय आय में 25 प्रतिशत वृध्दि का लक्ष्य रखा गया, लेकिन इसका आधा भी नहीं पाया जा सका। दरअसल आजादी के बाद में आरंभिक दो दशकों के आदर्शवाद और उससे मोहभंग का तुगलक के समय से गहरा साम्य है। तुगलक एक आदर्शवादी और स्वप्नदृश्टा शासक था और अपने समय से आगे की सोचता था। उसने सल्तनत के विस्तार और अपनी प्रजा के कल्याण की कई महत्वाकांक्षी, लेकिन अपारंपरिक योजनाएं बनाईं। विडंबना यह है कि उसे इन सपनों को अमली जामा पहनाने में समाज के किसी तबके का सहयोग नहीं मिलता। उसके विष्वस्त और आत्मीय व्यक्ति ही उसे धोखा देते हैं या घटनाक्रम से घबरा कर उसका साथ छोड़ जाते हैं। प्रजा उसकी अपारंपरिक भावनाओं और कार्यो को नहीं समझती, उलेमा अपनी उपेक्षा के कारण उसके विरुद्ध दुष्प्रचार करते हैं, अमीर-उमरा उसके विरुद्ध शडयंत्र करते हैं और अजीज और आजम जैसे लोग उसकी हर एक शुभेच्छामूलक घोशणा का अपने क्षुद्र स्वार्थ में दुरुपयोग करते हैं। उसकी सौतेली मां उसे धोखा देती है और उसका आत्मीय वाकया नवीस बरनी उसका साथ छोड़कर चल जाता है। विफल और सब तरफ से हताश तुगलक अंतत: तलवार की मदद से अपने विरोधियों के दमन का रास्ता अख्तियार करता है। देश में पराभव और मोहभंग का दौर 1962 के आसपास अपने चरम पर था और तुगलक प्रकाशन भी इसी दौरान 1964 में हुआ। जाहिर है, कारनाड ने अपने समय और समाज को बारीकी से देखा और उसको मुहम्मद बिन तुगलक के समय और समाज में रूपायित किया। यहां यथार्थ और द्वंद्व हमारे समय का है और केवल उसका ताना-बाना, मतलब घटनाएं और चरित्र सल्तनतकालीन है।
तुगलक की चरित्र सृष्टि में इतिहास और कल्पना, दोनों का योग है, लेकिन इतिहास पर आधारित होने के कारण कारनाड को चरित्र निर्माण में कल्पना की छूट ज्यादा नहीं मिली है। नाटक के ऐतिहासिक होने के कारण कारनाड ने इसके चरित्रों के वैयक्तिक जीवन, सामाजिक परिवेश और भाषा के संबंध में पर्याप्त शोध की है और उनके संबंध में इतिहास में उपलब्ध तथ्यों की कल्पना का पुट देकर जीवंत बनाया है। तुगलक में मुहम्मद बिन तुगलक नायक और धुरि चरित्र है और शेष सभी चरित्र यहां उसके चरित्र के विकास में पूरक की भूमिका निभाते हैं। नाटक में तुगलक का चरित्र आरंभ में आदर्शवादी और स्वप्नदृश्टा है, लेकिन परिस्थितियां धीरे-धीरे उसे क्रूर और निरंकुश तानाशाह और अंत में एकाकी और उन्मादी व्यक्ति में तब्दील कर देती है। तुगलक बुिद्धमान है,वह सल्तनत और प्रजा के हित में युक्तिसंगत निर्णय लेता है। राजधानी स्थानांतरण, प्रतीक मुद्रा का प्रचलन और खुरासान योजना केवल उसकी सनक के नतीजे नहीं हैं, इनके पीछे वजनदार तर्क है। तुगलक को अपने मनुष्य की ताकत पर पूरा भरोसा है वह खुदएतमादी है और धार्मिक कट्टरपंथियों का अंधानुगमन नहीं करता। सुल्तान के रूप में तुगलक कूटनीतिज्ञ भी है। वह चतुर राजनीतिज्ञ की तरह अपने विरोधियों को रास्ते से हटाता है। धार्मिक नेता शेख इमामुद्दीन और अमीर शहाबुद्दीन सियासी दाव-पेंच के खेल में उससे बुरी तरह पिट जाते हैं। अपने विरुद्ध होने वाले षडयंत्रों को वह चतुराई से नाकाम कर देता है। सब तरफ से जूझता हुआ, अपनी आत्मीय और विश्वस्त सौतेली मां तथा शहाबुद्दीन और अमीरों के षडयंत्रों से आहत तुगलक नाटक के अंतिम दृष्यों में हताश और निराष व्यक्ति के रूप में सामने आता है। इससे धर्म में उसकी आस्था को भी धक्का लगता है और वह अपनी सल्तनत में इबादत पर भी रोक लगा देता है। तुगलक अंत में निपट एकाकी होकर अपने ही हाथों किए गए सर्वनाश से घिरा उन्माद के छोर तक पहुंच जाता है। कारनाड के आलोचकों का कहना है कि वे अपने अन्य नाटकों की तरह तुगलक में भी अपने समय और समाज के यथार्थ और द्वंद्व को व्यक्त करने के लिए तुगलक के रूपक का सहारा लेते हैं, जिससे यथार्थ विकृत रूप में सामने आता है। इसके विपरीत कारनाड के समर्थकों का कहना है कि इस नाटक में अतीत के दूरस्थ यथार्थ को माध्यम बनाकर कारनाड अधिक निष्पक्ष और निर्भीक ढंग से अपने समय के यथार्थ को समझते-समझाते हैं। विख्यात कन्नड साहित्यकार यू.आर.अनंतमूर्ति के अनुसार कारनाड नाटक के कवि हैं। समसामयिक समस्याओं से निबटने के लिए इतिहास और मिथ का उपयोग उन्हें अपने समय पर टिप्पणी की मनोवैज्ञानिक दूरी प्रदान करता है। तुगलक बहुत सफल हुआ, क्योंकि यह एक यथार्थवादी नाटक नहीं था।
यह सही है कि तुगलक अपने समय और समाज के यथार्थ में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता और उसके चरित्र भी कुछ हद अपने समाज के वर्गीय प्रतिनिधि हैं, लेकिन इससे एक रंग नाटक के रूप में तुगलक का महत्व कम नहीं होता। कारनाड भव्य और महान चरित्र और घटना वाले इस नाटक के माध्यम से दर्शकों के मन में अपने समय और समाज के यथार्थ को चरितार्थ करने में सफल रहे हैं।

Wednesday 11 June 2008

गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक में इतिहास और कल्पना की जुगलबंदी

तुगलक आधुनिक भारतीय नाटक और रंगमंच के शीर्षस्थानीय रंगकर्मी गिरीश कारनाड की मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन तुगलक के जीवन पर आधारित नाट्य रचना है, जिसमें देश की आजादी के बाद के दो-ढाई दषकों के आदर्शवाद और उससे मोहभंग के यथार्थ को सम्मोहक रूपक में प्रस्तुत किया गया है। इतिहासकार तुगलक के चरित्र के संबंध में एक राय नहीं हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि तुगलक अपने समय का सबसे महान और उल्लेखनीय शासक था, जबकि कुछ के अनुसार वह सनकी और पागल था। इतिहासकार एलफिन्स्टन के अनुसार उसमें पागलपन का कुछ अंष जरूर था, वी.एन. स्मिथ उसे आश्चर्यजनक विरोधी तत्वों का सिम्मश्रण मानते हैं, जबकि रोमिला थापर के अनुसार ´´यद्यपि उसकी कुछ नीतियां उसके सनकी दिमाग की तरंग मात्र प्रतीत होती है, तो भी उनके पीछे कुछ तर्क जरूर था।`` कुछ भी हो, जैसा वल्जले हेग ने कहा है कि ´´तुगलक दिल्ली के सिंहासन पर बैठने वाले असाधारण शासकों में से एक था।`` दरअसल तुगलक आदर्शवादी, स्वप्नद्रुष्टा और उदारचित्त बुध्दिजीवी शासक था, जिसे उसके अपारंपरिक कार्यों के कारण तत्कालीन जनसाधारण, अमीर और उलेमा वर्ग का सहयोग नहीं मिला। तुगलक के आदर्शों और सपनों के पराभव की यह कहानी ही इस नाटक की विशयवस्तु है। कारनाड ने आजादी के बाद के सपनों की उड़ान और कुछ समय बाद उनके धराषायी होने के यथार्थ को इस कथा के रूपक में बांधने का प्रयत्न किया है।

नाटक तुगलक विवादास्पद मध्यकालीन शासक मुहम्मद बिन तुगलक के जीवन पर आधारित है। कारनाड ने तुगलक के चरित्र निर्माण में उसके जीवन के संबंध में इतिहास में उपलब्ध सभी तथ्यों का उपयोग किया है। इतिहासकारों के अनुसार तुगलक अपने युग का सबसे उल्लेखनीय शासक था। कुछ इतिहासकार उसके अपरंपरागत कार्यों के कारण उसे पागल कहते हैं। उसके संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण उल्लेखनीय तथ्य यह है कि ´´उसकी महत्वाकांक्षाएं उसके साधनों की तुलना में हमेषा अधिक थीं।`` तुगलक ने कई साहसिक प्रयोग किए और उसने कृिश क्षेत्र के विकास में गहरी दिलचस्पी ली। उसने धर्म और दर्शन का गहन अध्ययन किया। वह आलोचनात्मक प्रवृत्ति और उदारचित्त वाला व्यक्ति था। इतिहासकार सतीशचंद्र के अनुसार ´´वह न केवल मुसलमान अध्यात्मवादियों के साथ, बल्कि हिन्दू योगियों और जिनप्रभा सूरी जैसे जैन महात्माओं के साथ तर्क-वितर्क कर सकता था।`` उसके समय के कट्टरपंथी मुसलमान उसे नापसंद करते थे। उनके अनुसार वह बुध्दिवादी था। मतलब यह कि वह धार्मिक मान्यताओं की केवल विष्वास के आधार पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। वह महत्वाकांक्षी था और बड़े-बड़े सपने देखता था, लेकिन तत्कालीन इतिहासकार बरनी के अनुसार वह चिड़चिड़ा और अधीर स्वभाव का भी था। दुभाZग्य से उसके सपने पूरे नहीं हुए और उसकी योजनाएं क्रियान्वयन के दौरान असफल हो गईं।

तुगलक ने अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए कई योजनाएं बनाईं और उनको सख्ती से अमल में लाने का प्रयास किया। वह एक भारतव्यापी साम्राज्य की स्थापना करना चाहता था इसलिए उसने कई साहसिक प्रयोग किए। वह मध्य एषिया में सैन्य अभियान कर खुरासान पर अधिकार करना चाहता था, इसलिए उसने दोआब के किसानों पर लगान बढ़ा दिया। दुभाZग्य से इसी समय दोआब में अकाल पड़ा और किसानों ने यह बढ़ा हुआ लगान देना अस्वीकार कर विद्रोह कर दिया। तुगलक का सबसे विवादास्पद निर्णय राजधानी का दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरण था। तुगलक दक्षिण भारत पर प्रभावषाली ढंग से शासन करना चाहता और दिल्ली उत्तर में स्थित होने के कारण दक्षिण से बहुत दूर थी, इसलिए उसने अपनी राजधानी दिल्ली से हटा कर सुदूर दक्षिण में स्थित देवागिरी, जिसका नामकरण उसने बाद में दौलताबाद किया, ले जाने का आदेष दिया। निर्णय तर्कसंगत था लेकिन अव्यावहारिक था। एक तो उसने दरबार की जगह समस्त दिल्लीवासियों को दौलताबाद जाने के लिए विवष किया और दूसरे इस निर्णय का क्रियान्वयन ग्रीश्मकाल में हुआ, जिससे कई लोग मार्ग में ही मर गए। इसके अलावा दिल्ली से दौलताबाद पहुंचे लोगों को घर की याद सताने लगी। तुगलक के विरुद्ध इस कारण जन असंतोश बढ़ गया और केवल दो ही साल बाद तुगलक स्वयं दिल्ली आ गया और यह फिर राजधानी हो गई। खुरासान पर अधिकार की अपनी महत्वाकांक्षी योजना के लिए धन अपेक्षित था, इसलिए तुगलक ने चांदी की जगह पीतल और तांबे की प्रतीक मुद्राएं जारी कीं। इस तरह के प्रयोग चीन और फारस में सफल हो चुके थे, लेकिन वह लोगों को नकली सिक्के ढालने से नहीं रोक पाया। नतीजा यह हुआ कि नकली सिक्कों के ढेर लग गए और मुद्रा का अवमूल्यन हो गया। अपनी योजनाओं और प्रयोगों की निरंतर असफलता से तुगलक को निराषा हुई। उसने खुरासान पर अधिकार की अपनी योजना छोड़ दी और हिमाचल में स्थित कांगडा पर आक्रमण कर संतोश कर लिया। तुगलक प्रतापी, महत्वाकांक्षी और स्वप्नदृश्टा शासक था, लेकिन उसकी अधिकांष योजनाएं और प्रयोग अपारंपरिक थे, इसलिए उसे इनके क्रियान्वयन में तत्कालीन अमीरों, उलेमाओं और जनसाधारण का सहयोग नहीं मिला। जनसाधारण में असफल प्रयोगों के कारण उसके लिए गुस्सा था, उलेमा और धार्मिक कट्टपंथी मुसलमान अपनी उपेक्षा के कारण उससे खफा थे और अमीर वर्ग में निहित स्वार्थों की पूर्ति नहीं होने के कारण उसके विरुद्ध नाराजगी थी। इस तरह तमाम शुभेच्छाओं के बावजूद तुगलक को सब जगह असफलताएं हाथ लगीं। इतिहासकार इसीलिए उसे अभागा आदषZवादी कहते हैं। तुगलक का यही महत्वाकांक्षी और स्वप्नदृश्टा, लेकिन सब जगह असफल और निराष व्यक्तित्व गिरीश कारनाड के इस नाटक का आधार है। उसके सपने और उनकी दुर्गति का यथार्थ ही इस नाटक की धुरि है।

इतिहास और साहित्य में बुनियादी अंतर यह है कि इतिहास तथ्य पर आधारित होता है, जबकि साहित्य में तथ्य कल्पना के साथ संयुक्त होकर जीवंत रूप ले लेता है। यह सही है कि तुगलक की रचना के लिए कारनाड के मध्यकालीन भारतीय इतिहास का गहन शोध और अध्ययन किया है, लेकिन उनकी कल्पनाशीलता ही इस नाटक को सही मायने में नाटक का रूप देती है। इतिहास इस नाटक की रीढ है, लेकिन कल्पना इसका जीवन है। इतिहास यहां तथ्य तो उपलब्ध करवाता है, लेकिन इन तथ्यों को जीवंत मानवीय सरोकारों और संबंधों में दरअसल कल्पना ही ढालती है। कारनाड ने इस नाटक में चरित्रों और घटनाओं का ताना-बाना इतिहास से लिया है, लेकिन संबंधों का विस्तार, उनकी प्रकृति आदि का निर्धारण उनकी उर्वर कल्पना ने किया है। तुगलक ऐतिहासिक व्यक्तित्व है, लेकिन उसकी सोच, उसके निरंतर अंतर्संघशZ और संवेदनषीलता को गढने का काम कारनाड के रचनाकार की कल्पना ने किया है। तुगलक इतिहास में सनकी और पागल के रूप में कुख्यात है, लेकिन यह अकारण नहीं है। दरअसल निरंता असफलता और हताशा तुगलक के सकारात्मक चरित्र को नकारात्मक बना देती है। कारनाड का कल्पनाषील रचनाकार तुगलक के सनकी और निरंकुष शासक में तब्दील हो जाने प्रक्रिया के मानवीय पहलू को बहुत खूबी ओर बारीकी के साथ पेष करता है। कारनाड की कल्पनाषीलता तुगलक को एक ऐसे असाधारण मनुश्य का रूप देती है, जो अपनी सोच को अमल में लाने की जद्दोजहद में टूटता जाता है और अंतत: हार जाता है। यह कारनाड की कल्पना का ही चमत्कार है कि नाटक के अंत में तुगलक ऐसे शख्स के रूप में सामने आता है, जिसे परिस्थितियों में सनकी और पागल बना दिया है और दषZकों को उससे सहानुभूति होती है। कारनाड की कल्पना तुगलक के एक साथ परस्पर विरोधी और एक-दूसरे को करते हुए कई रूप गढती है। वह चिंतनषील, संवेदनशील और परदुखकातर है, लेकिन साथ ही वह कूटनीतिज्ञ, नृषंश, क्रूर और निरंकुष भी है। इस तरह का परस्पर विरोधी चारित्रिक विषेशताओं वाला व्यक्तित्व गढना और उसको स्वीकार्य बनाए रखना मुिष्कल काम है, लेकिन कारनाड अपनी कल्पना के सहारे यह कर लेते हैं। तुगलक के संबंधों के बहुत विस्तार और बारीकी में कारनाड नहीं जाते, लेकिन सौतेली मां के चरित्र की कल्पना से उसके व्यक्तित्व को मानवीय जीवंतता का स्पषZ मिलता है। यह संबंध बहुत सांकेतिक है- इसके विस्तार में कारनाड नहीं जाते, लेकिन स्पश्ट हो जाता है कि सौतेली मां तुगलक पर अनुरक्त है और उससे उसकी अपेक्षाएं भी मां की नहीं है।

कारनाड की रचनात्मक कल्पना का इस नाटक में सबसे अच्छा उदाहरण धार्मिक नेता शेख इमामुद्दीन की कूटनीतिक ढंग से हत्या का प्रकरण है। यह प्रकरण कारनाड की कल्पना की असाधारण सूझबूझ का नतीजा है। इस घटना से उन्होंने समाज में धर्म की हैसियत की असलियत को सामने रख दिया है। मुहम्मद तुगलक का यह कथन कि ´´आमो-खास की मजहबी अकीदत की जड़ें किस कदर कमजोर है! अवाम का भोलापन फितरती तौर पर शुबहा और वहम से वाबस्ता होता है`` दरअसल हमारे समय और समाज में भी धर्म की कमजोर बुनियाद की ओर संंकेत है। कारनाड इस घटना की कल्पना से यह सिद्ध करते हैं कि समय कोई भी हो जनसाधारण की जड़ें धर्म में कम, चमत्कार और भ्रम में ज्यादा गहरी होती हैं। दौलताबाद किले के ऊपरी हिस्से पर तुगलक और बरनी के बीच हुआ संवाद भी कारनाड की कल्पनाशीलता का ही नतीजा है। इस प्रकरण की कल्पना से तुगलक का उदात्त और संवेदनषील शासक व्यक्तित्व उभरता है। इन संवादों से कारनाड तुगलक की सोच और उसके कार्यों के औचित्य पर रोषनी डालते हैं। बरनी के इस परामर्श पर कि सबको माफी बख्श दें, तुगलक कहता है-´´ लेकिन उससे पहले मुझे ये यकीनी तौर पर इल्म होना चाहिए कि मेरा मकसद ही गलत था। मेरे इरादे ही नाकिस थे। तब ‘यद तुम्हारा यह इलाज मुफीद साबित हो। लेकिन जब तक वो लम्हा नहीं आयेगा, तब तक इसी पर अमल करूंगा। मैंने जो सीखा है या जाना है, उसी को जारी रखूंगा, उसी से रिआया को रूशनास कराता रहूंगा। मैं यह कभी गवारा नहीं करूंगा कि तवारीख को फिर अंधों की तरह अपने- आपको दुहराने का मौका मिले। ये मजबूरी है कि अपने पास मौजूदा एक ही जिंदगी पड़ी है, इसलिए मैं इसे नाकाम नहीं होने दूंगा। (एक-एक हर्फ पर जोर देकर) लोग जब तक मेरी बातों पर गौर नहीं करेंगे, तब तक यह कत्ले-आम मुसलसल जारी रहेगा। दूसरा कोई चारा नहीं, बरनी।``

नाटक में ढिंढोरची और उसकी घोषणाएं भी कारनाड की कल्पनाषीलता का नमूना हैं। इस कल्पना से नाटक में समय के विस्तार और घटनाओं की भीड़भाड़ कम करने में बहुत मदद मिली है। ढिंढोरची मंच पर आकर अपने ऐलान से घटनाओं का वृत्तांत पेष करता है, जिससे दषZक, जो देख रहे हैं उसको व्यापक परिप्रेक्ष्य में समक्ष लेते हैं। सबसे पहले ढिंढोरची पहले दृष्य के बीच में आता है और उपस्थित जन साधारण को सुल्तान के विरुद्ध ब्राह्मण विष्श्णुप्रसाद की दरख्वास्त पर हाकिमे अदालत का फैंसला बताता है। दृष्य चार से पहले िढंढोरची आईन-उल-मुल्क की दिल्ली पर चढ़ाई, सुल्तान के कन्नोज प्रस्थान, शेख इमामुद्दीन द्वारा सुल्तान को सहयोग देने और सुल्तान की अनुपस्थिति में शहाबुद्दीन के नायब सुल्तान होने की सूचना देता है। दृष्य सात के पूर्व िढंढोरची के दो महत्वपूर्ण ऐलान हैं। एक में वह शाही महल में बगावत और उसमें शहाबुद्दीन शहीद होने की सूचना और दूसरे में वह दिल्ली के जनसाधारण को एक माह में दौलताबाद जाने का शाही फरमान सुनाता है।