Thursday 12 November 2009

साहित्य के समक्ष ग्लॉबलाइजेशन, बाजार और मीडिया की चुनौतियां

विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं और संस्कृतियों का मेल और एकरूपीकरण ग्लॉबलाइजेशन है, जिसकी शु़रुआत पंद्रहवीं सदी में उस समय हुई, जब कुछ साहसी यूरोपीय व्यापार की मंशा से नए देशों की खोज में निकले। ग्लॉबलाइजेशन का पहला चरण 1492 में कोलंबस की नयी और पुरानी दुनिया के बीच व्यापार का मार्ग प्रशस्त करने वाली यात्रा से शुरू होकर 1800 तक चलता है। इसने दुनिया को सिकोड़ कर बड़ी से मध्यम आकार में बदल दिया। इस चरण में परिवर्तन का मुख्य घटक और ग्लॉबल एकीकरण की चालक शक्ति देशों की ताकत मतलब बाहुबल, वायु शक्ति और बाद में वाष्प शक्ति को सर्जनात्मक ढंग से प्रयुक्त कर फैलाने की सामर्थ्य थी। विश्व को एक साथ गूंथकर ग्लॉबल एकीकरण का काम इस दौरान देशों और सरकारों ने किया। ग्लॉबलाइजेशन का दूसरा चरण 1800 से शुरू होकर 2000 में समाप्त हुआ, लेकिन यह पहले और दूसरे महायुद्ध के अवसाद से अवरुद्ध हुआ। इस चरण में परिवर्तन का मुख्य घटक और ग्लॉबल एकीकरण की चालक शक्ति बहुराष्ट्रीय कंपनियां थीं। श्रम और बाजारों की तलाश में ये कंपनियां ग्लॉबल हुईं। इस चरण के पूर्वाद्ध में ग्लॉबल एकीकरण की प्रक्रिया को परिवहन की लागत कम हो जाने से बल मिला, जो भाप के इंजिन और रेल-मोटर के कारण संभव हुआ। इस चरण के उत्तरार्द्ध में ग्लॉबल एकीकरण की प्रक्रिया दूर संचार की कीमतें गिर जाने से द्रुत हुई और यह तार, टेलीफोन, पर्सनल कंप्यूटर, सैटेलाइट, फाइबर ऑप्टिक केबल और वल्र्ड वाइड वेब के आरंभिक संस्करण के विस्फोटक प्रसार से संभव हुआ। दुनिया इस चरण में मध्यम से छोटे आकार में तब्दील हो गई। इस चरण में ग्लॉबल अर्थव्यवस्था का जन्म भी हुआ। यह इस अर्थ में कि अब सूचनाओं और वस्तुओं का एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक पर्याप्त मात्रा में यह संचलन हो रहा था। ग्लॉबलाइजेशन की प्रक्रिया में वर्ष 2000 मील का पत्थर साबित हुआ। विख्यात पत्रकार और द वल्र्ड इज फ्लैट नामक बहुचर्चित किताब के लेखक थॉमस एल. फ्रीडमेन के अनुसार इस वर्ष से ग्लॉबलाइजेशन का तीसरा महान चरण शुरू होता है। पहले चरण के ग्लॉबलाइजेशन में चालक शक्ति ग्लॉबल होते हुए देश थे, दूसरे चरण के ग्लॉबलाइजेशन में चालक शक्ति ग्लॉबल होती हुई बहुराष्ट्रीय कंपनियां थीं, जबकि इस तीसरे चरण में ग्लॉबलाइजेशन की चालक शक्ति व्यक्तियों को ग्लोबल स्तर पर सहभागी और प्रतिद्वंद्वी होने की नयी सुलभ ताकत है। व्यक्तियों और समूहों को विश्व स्तर पर सहभागी और प्रतिद्वंद्वी होने में सक्षम बनाने का काम अब हॉर्सपॉवर या हार्डवेयर नहीं, सॉफ्टवेयर कर रहा है, जिसने ग्लॉबल ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क के साथ जुड़कर विश्व के तमाम लोगों को निकटस्थ पड़ोसी बना दिया है। फ्रीडमेन कहते हैं कि दुनिया अब छोटे से नन्ही और सममतल हो गई है। दुनिया के समतल हो जाने का आशय स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं कि “कंप्यूटर, ई-मेल, नेटविर्कंग, टेलीकान्फ्रेंसिंग और द्रुत और नए सॉफ्टवेयर के प्रयोगों द्वारा विश्व इतिहास के किसी भी विगत समय की तुलना में दुनिया के ज्यादा लोग अलग-अलग हिस्सों में होते हुए भी अलग-अलग तरह के कामों के लिए समान धरातल पर एक ही समय में मिलजुल कर या प्रतिस्पर्धी रूप में काम कर सकते हैं।”

ग्लॉबलाइजेशन में मुक्त बाजार की निर्णायक भूमिका है। बाजार के जादू की अवधारणा नयी नहीं है। आधुनिक अर्थ व्यवस्थाओं के जनक कहे जाने वाले एडम स्मिथ ने लगभग 250 साल पहले अपनी विख्यात किताब दी वेल्थ ऑफ नेशन्स में खरीदने वालों और बेचने वालों की समानता को आधार मानकर बाजार को मनुष्य और देशों की आर्थिक समृद्धि की कुंजी सिद्ध किया था। मुक्त बाजार के समर्थन में आज भी यही तर्क दिया जा रहा है। स्मिथ का मुक्त बाजार सीमित था, लेकिन अब यह बहुत व्यापक हो गया है। गत सदी में हुई संचार क्रांति और ब्रेटनवुड्स समझौते के ढह जाने के बाद बाजार पूरी तरह मुक्त और गतिशील हो गया है। कंप्यूटर, फाइबर ऑप्टिक्स, सैटेलाइट्स और इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के लघुकरण से सामग्री और सेवाओं के उत्पादन, वितरण और विक्रय में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। बाजार के निर्णायक और सर्वोपरि हैसियत में आ जाने का दूसरा महत्वपूर्ण कारण ग्लॉबल अर्थव्यवस्था में आया संरचनात्मक परिवर्तन है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रेटन वूड्स में 44 देशों में विश्व व्यापार और मुद्रा परिवर्तन के लिए जो समझौता हुआ, वो 1980 के आसपास ब्रिटेन और अमरीका में मुक्त बाजार समर्थक सरकारों के उदय और बाद में रूस में राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था के बिखर जाने से ढह गया। अब यहां की अर्थव्यवस्थाएं राज्य के नियंत्रण से मुक्त हो गईं। यहां कंपनियों को उत्पादन की लागत कम करने और निवेशकर्ताओं को अधिकतम लाभांश देने के लिए विश्व में कहीं भी जाने की छूट मिल गई। आगे चलकर भारत सहित विश्व के कई और देशों ने भी यही रास्ता अिख्तयार किया। 1997 में पूर्वी एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं के ढह जाने और इन दिनों आई विश्वव्यापी मंदी से ग्लॉबल और मुक्त बाजार के संबंध में कुछ लोगों में यह समझ बनी है कि इसमें सब कुछ वैसा नहीं है, जैसा अपेक्षित था, लेकिन इसके ज्यादातर उत्साही समर्थक इसकी सफलता के संबंध में अभी भी आश्वस्त हैं।
ग्लॉबलाइजेशन के दौरान पहले हार्डवेयर और फिर सॉफ्टवेयर की जो तकनीकी क्रांति हुई है, उसने मीडिया के स्वरूप और चरित्र में भी आधारभूत परिवर्तन कर दिए हैं। संचार तकनीक के विकास और ग्लॉबलाइजेशन ने अब मीडिया को बहुत शक्तिशाली बना दिया है। आरंभिक अवस्था में जब संचार के साधन नहीं थे, तो मीडिया की हैसियत स्वायत्त नहीं थी, लेकिन अब यह स्वायत्त है। यह संदेश के पुनरुत्पादन की प्रक्रिया में संदेश को नया रूप देने और संदेश को नया गढ़ने में सक्षम है। मार्शल मैक्लुहान के शब्दों में अब मीडियम ही संदेश है। ग्लॉबलाइजेशन के दूसरे चरण में जो बहुराष्ट्रीय कंपनियां अस्तित्व में आईं, उन्होंने इस मीडिया की ताकत को पूरी तरह अपने व्यापारिक हितों के पोषण में झोंक दिया है।

ग्लॉबजाइजेशन और उसमें बाजार की सर्वोपरि नियामक के हैसियत से संस्कृति सबसे अधिक प्रभावित हुई है। संस्कृति के उपभोग की कामना को संचार क्रांति और मीडिया विस्फोट से पंख ल गए है। बाजार इसका जमकर फायदा उठा रहा है। उसने संस्कृति को उद्योग में तब्दील कर दिया है। विश्व भर में सांस्कृतिक उत्पादों का व्यापार 1980 के बाद तेजी से बढ़ रहा है। विकासशील देशों में बढ़ोतरी की यह दर सबसे अधिक है। 1980 में यहां इनका व्यापार मूल्य लगभग 50 बीलियन डालर था, जो अब बढ़कर 200 के आसपास पहुंच गया है। फिलहाल भारत में केवल टीवी उद्योग 20,000 करोड़ रुपए सालाना का कूता जाता है और अनुमान है कि यह 22 प्रतिशत की दर से बढ़कर 50,000 करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच सकता है। औद्योगीकरण के साथ-साथ संचार क्रांति और मीडिया विस्फोट से सांस्कृतिक संक्रमण और एकरूपीकरण की प्रक्रिया भी बहुत तेज हो गई है। साहित्य भी एक सांस्कृतिक उत्पाद है इसलिए औद्योगीकरण और तीव्रगति संक्रमण तथा एकरूपीकरण का उस पर गहरा और व्यापक असर हुआ है। औद्योगीकरण के मामले में अभी इसमें असमंजस है, इसलिए अन्य सांस्कृतिक उत्पादों की तुलना में बाजार में यह कोई खास जगह नहीं बना पाया है। एक और खास बात इसके संबंध में यह है कि तमाम परिवर्तनों के बाद भी इसका आवयविक संगठन बहुत पुराना है, जो तीव्र गति सांस्कृतिक संक्रमण और एकरूपीकरण के साथ तालमेल बिठाने में पिछड़ रहा है। इस कारण या तो यह हाशिए पर है या फिर यह अपने को बदलने की जद्दोजहद में लगा हुआ है।

संस्कृति के औद्योगीकरण की प्रक्रिया से पारंपरिक साहित्य में जबर्दस्त बेचैनी है। आरंभिक आंशिक प्रतिरोध के बाद थोडे़ असमंजस के साथ इसमें बाजार की जरूरतों के अनुसार ढलने की प्रक्रिया की शुरुआत हो गई है। साहित्य को उत्पाद मानकर उसकी मार्केटिंग हो रही है। इसका नतीजा यह हुआ कि साहित्य की घटती लोकप्रियता के बावजूद पिछले कुछ सालों से भारत में भी पुस्तकों की ब्रिक्री में असाधारण वृद्धि हुई है। एक सूचना के अनुसार यहां 70,000 पुस्तकें प्रतिवर्ष छपती हैं और ये 10 से 12 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही हैं। साहित्य भी अब साबुन या नूडल्स की तरह उत्पाद है, इसलिए इसकी मार्केटिंग के लिए फिल्म अभिनेताओं का सहारा लेने की बात की जा रही है। इंडिया टुडे कॉनक्लेव, 2004 में शामिल विश्व विख्यात अमरीकी प्रकाशक अल्फ्रेड ए. नॉफ के भारतीय मूल के अध्यक्ष और संपादक सन्नी मेहता ने प्रस्ताव किया कि “कुछ साल पहले अमरीकी टीवी के लोकप्रिय प्रस्तोता ऑप्रा विनफ्रे के साप्ताहिक टीवी बुक क्लब शुरू करने के बाद पुस्तकों की बिक्री काफी बढ़ गई थी। कल्पना की जा सकती है कि अगर आज अमिताभ बच्चन या ऐश्वर्या राय भारत में टीवी पर ऐसा कार्यक्रम शुरू कर दें तो क्या कमाल हो सकता हैं।“ मीडिया में चर्चित और विख्यात होने के कारण सलमान रश्दी, विक्रम सेठ और अरुंधती राय की किताबें तेजी से लोकप्रिय हुई हैं। यह मार्केटिंग का ही कमाल है कि विक्रम सेठ को उनकी गैर औपन्यासिक कृति टू लाइव्स के लिए बतौर अग्रिम 13 लाख पाउंड दिए गए। साहित्यिक किताबों की मार्केटिंग के लिए अब नई-नई रणनीतियां ईजाद की जा रही हैं। अब कई वेबसाइट्स हैं, जो किताबें खरीदने के लिए पाठकों को प्रलोभन देती हैं। हिंदी में भी अब किताब को कमोडिटी का दर्जा दिया जा रहा है और हिंदी प्रकाशन व्यवसाय का कारपोरेटराइजेशन हो रहा है। यही नहीं, हिंदी के प्रकाशक अब प्लेयर की तरह बाजार में उतर रहे हैं।

अब उत्पाद मानकर साहित्य की मार्केटिंग ही नहीं हो रही है, बाजार की मांग के अनुसार इसके सरोकार, वस्तु, शिल्प आदि में भी बदलाव किए जा रहे हैं। इसमें मनोरंजन, उत्तेजना और सनसनी पैदा करने वाले तत्त्वों की घुसपैठ बढ़ी है। इस कारण पिछले कुछ वर्षों से साहित्य में भी राजनेताओं, उच्चाधिकारियों, अभिनेताओं और खिलाड़ियों के व्यक्तिगत जीवन से पर्दा उठाने वाली आत्मकथात्मक, संस्मरणात्मक और जीवनीपरक रचनाओं की स्वीकार्यता बढ़ी है। बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की की यौन लीलाओं के वत्तांत का हिन्दी रूपांतरण मैं शर्मिंदा हूं को साहित्य के एक विख्यात प्रकाशक ने प्रकाशित किया और यह हिन्दी पाठकों में हाथों-हाथ बिक गया। हिन्दी में ही नेहरू और लेडी माउंटबेटन एडविना के प्रणय संबंधों पर आधारित केथरिन क्लैमां के फ्रेंच उपन्यास ने पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित की। इसी तरह विख्यात पत्रिका हंस में राजेन्द्र यादव द्वारा चर्चित प्रसंग होना और सोना एक औरत के साथ को हिन्दी की साहित्यिक बिरादरी ने चटखारे लेकर पढ़ा और सराहा। हिन्दी की श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं में भी जाने-अनजाने मनोरंजन और उत्तेजना पैदा करने वाले तत्त्वों की मात्रा पिछले दस-बारह सालों में बढ़ी है। मैत्रेयी पुष्पा के साहित्यिक उपन्यासों में रति क्रियाओं के दृश्य अलग से पहचाने जा सकते हैं, विजयमोहनसिंह की कहानियों में सेक्स जबरन ठूंसा गया लगता है तथा अशोक वाजपेयी की कविताओं में रति की सजग मौजूदगी को भी इसी निगाह से देखा जा सकता है। सुरेन्द्र वर्मा का हिन्दी उपन्यास दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता तो संपूर्ण ही ऐसा है। साहित्य में साधारण की जगह असाधारण का आग्रह बाजार की मांग के कारण निरंतर बढ़ रहा है। यूरोपीय और अमरीकी बाजारों में भारतीय और अफ्रीकी लेखकों की किताबें बेस्ट सेलर सूचियों में शामिल हो रही हैं और पुरस्कारों से नवाजी जा रही हैं। हिंदी में भी अज्ञात या अल्पज्ञात जनजातीय यथार्थ पर आधारित अल्मा कबूतरी और रेत जैसे उपन्यास खासे लोकप्रिय हुए हैं।

ग्लॉबलाइजेशन से होने वाले सांस्कृतिक एकरूपीकरण से साहित्यिक अभिव्यक्ति की वाहन अधिकांश अंग्रेजीतर भाषाओं का अस्तित्व संकट में आ गया है। सांस्कृतिक एकरूपीकरण के कारण अधिकांश लोकप्रिय सांस्कृतिक उत्पाद अंग्रेजी भाषा में है इसलिए इनकी लोकप्रियता के साथ अंग्रेजी का वर्चस्व और विस्तार भी तेजी बढ़ रहा है। भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद समाज के सभी वर्गों में अंग्रेजी का चलन बढ़ गया है। कैंब्रिज एनसाइक्लोपीडिया आफ द इंग्लिश लैंग्वेज के लेखक प्रोफेसर डेविड डाल्वी का मानना है कि बहुत जल्दी ही विश्व भर में सबसे ज्यादा अंग्रेजी बोलने वाले भारत में ही होंगे। अंग्रेजी की लोकप्रियता का असर विश्व की दूसरी भाषाओं को बदल भी रहा है। भारत में एक-दो दशकों में अंग्रेजी से प्रभावित हिंदी का नया संस्करण हिंगलिश चलन में आ गया है। प्रीतीश नंदी की यह टिप्पणी भले ही हिंदी साहित्यिक बिरादरी को अतिरंजना लगे, लेकिन इसमें कुछ सच्चाई तो है। वे लिखते हैं- “आप देख रहे हैं कि आजकल ज्यादा से ज्यादा हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी के संवाद इस्तेमाल किए जा रहे है और ज्यादातर हिंदी फिल्मों के गीत भी अंग्रेजी रैप की धुनों पर फिल्माएं जा रहे है। यहां तक कि ब्लैक और ब्लफमास्टर की तर्ज पर फिल्मों के शीर्षक भी अंग्रेजी में होने लगे हैं या फिर कम से कम प्यार के साइड इफैक्ट और टैक्सी नंबर दौ नो ग्यारह जैसे नामों के आधार पर हिंदी-अंग्रेजी का मिश्रण तो हो ही गया है। इस सबसे तो ऐसा लगता है कि हम अंग्रेजी को मिलाकर एक नई मातृभाषा रच रहे है।” विख्यात फिल्म अभिनेता विवेक ओबेराय से एक बार पूछा गया कि आप सपने किस भाषा में देखते है, तो उनका जवाब था हिंगलिश में और जब उनसे पूछा गया कि आप किस भाषा में सोचते हैं, तो उन्होंने कहा कि “भावना की बात हो तो हिन्दी में और विचार हो तो अंग्रेजी में। रस की बातें हिन्दी में होती है और अर्थ की बातें हो तो अंग्रेजी में।” हिन्दी के इस कायांतरण से गत दस-पंद्रह सालों के हिन्दी साहित्य की भाषा में भी असाधारण बदलाव आया है। यह अब पहले जैसी ठोस और ठस साहित्यिक भाषा नहीं रही। यह अब जनसाधारण की बोलचाल की बाजार की भाषा के निकट आ गई है। विख्यात कहानीकार उदयप्रकाश ने एक जगह स्वीकार किया कि “इधर हिन्दी में कई लेखक उभरकर आए हैं जो बाजार की भाषा में लिख रहे हैं और उनके विचार वही हैं, जो हमारे हैं। मुझे लगता है कि हम लोगों को भी जो उन मूल्यों के पक्ष में खड़े हैं, जिन पर आज संकट की घड़ी है, अपना एक दबाव बनाने के लिए बाजार की भाषा को अपनाना पड़ेगा।” यह बदलाव केवल साहित्य के गद्य रूपों की भाषा में ही नहीं, कविता की भाषा में भी हुआ है। यहां आग्रह अब सरलता का है और इसमें बोलचाल की भाषा की नाटकीयता एवं तनाव का रचनात्मक इस्तेमाल हो रहा है।

बाजार ने संस्कृति के उत्पाद और उद्योग में बदलने का लाभ यह हुआ है कि इसका उपयोग पहले की तरह अब कुछ वर्गों तक सीमित नहीं रहा। इसके उपभोग में जाति, धर्म, संप्रदाय और लैंगिक भेदभाव समाप्त हो गया है। साहित्य भी संस्कृति का एक रूप है, इसका भी व्यापक और त्वरित गति से जनतंत्रीकरण हुआ है। इस कारण अब साहित्यिक अभिव्यक्ति और इसके उपभोग की आकांक्षा समाज के सभी वर्गों में खुलकर व्यक्त हुई है। विश्व भर में दलित और स्त्री अस्मिताओं का उभार इसी कारण संभव हुआ है। इस दौरान भारतीय भाषाओं के साहित्य में दलित वर्ग के कई साहित्यकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई। हिन्दी में भी इस दौरान दलित विमर्श मुख्य धारा में आया। दलित वर्ग की तरह ही इधर साहित्य में अपनी अस्मिता के प्रति सचेत स्त्री रचनाकारों ने भी बड़ी संख्या में उपस्थिति दर्ज करवाई है। अंग्रेजी और हिन्दी की लगभग सभी लोकप्रिय और साहितयिक पत्र -पत्रिकाओं ने इस दौरान स्त्री रचनाओं पर विशेषांक प्रकाशित किए हैं। साहित्य के जनतंत्रीकरण का एक और लक्षण गत कुछ वर्षों की हिन्दी की साहित्यिक सक्रियता में खास तौर पर लक्षित किया जा सकता है। पहले हिन्दी की साहित्यिक सक्रियता और प्रकाशन के केन्द्र महानगरों में होते थे। अब ये वहां से शहरों, कस्बों और गांवों में फैल गए हैं। सूचनाओं की सुलभता के कारण दूरदराज के कस्बों-गांवों के रचनाकार आत्मविश्वास के साथ हिन्दी के समकालीन साहित्यिक विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं और अपनी पहचान बना रहे हैं।

ग्लॉबलाइजेशन के अंतिम चरण में व्यक्तियों और समूहों को ग्लॉबल स्तर पर सहभागी और प्रतिद्वंद्वी होने की जो नयी ताकत मिली है, उससे साहित्यिक अभिव्यक्ति की पारंपरिक अवधारणा पूरी तरह बदल जाने की संभावना है। अब साहित्यकार होने के लिए किसी पारंपरिक अर्हता की जरूरत नहीं है। इंटरनेट और वल्र्ड वाइड वेब से यह बहुत आसान हो गया हैं। अब साधारण व्यक्ति अपनी भावनाओं और विचारों को ब्लॉग लिखकर व्यक्त कर सकता है। एक सूचना के अनुसार रोज 1 लाख 20 हजार नए ब्लॉग बनाए जाते हैं और इस समय लगभग 1.2 करोड़ से ज्यादा वयस्क अमरीकियों ने ब्लॉग बना रखे हैं। टेक्नोराती पर इस समय 7 करोड़ से अधिक ब्लॉग देखे जा सकते हैं। अब हिंदी में भी ब्लॉग लिखने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। चिठ्ठा जगत पर 2004 से 2007 के बीच केवल 1000 ब्लॉग थे, लेकिन केवल एक वर्ष में यह संख्या बढ़कर अब 6000 के निकट पहुंच गई है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां और मीडिया बहुराष्ट्रीय पूंजी के नियंत्रण और निर्देशन में जिस उपभोक्तावाद और आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का प्रसार कर रहे हैं उसका प्रतिरोध मुख्यतया साहित्य में ही हो रहा है। यू.आर. अनंतमूर्ति ने पिछले दिनों एक जगह कहा था कि “जैसे टेलीविजन वाले करते हैं वैसे हमें नहीं करना चाहिए। हमें रेसिस्ट करना है, डिसक्रिमीनेट करना है।“ इस प्रतिरोध के कारण गत दस-पंद्रह सालों के हमारे साहित्य के सरोकारों और विषय वस्तु में बदलाव आया है। हिन्दी में भी यह बदलाव साफ देखा जा सकता है। मनुष्य को उसके बुनियादी गुण-धर्म और संवेदना से काटकर महज उपभोक्ता में तब्दील कर दिए जाने की प्रक्रिया का खुलासा करने वाली कई कविताएं इस दौरान हिन्दी में लिखी गई हैं। इसी तरह आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के दुष्परिणामों पर एकाग्र उपन्यास और कहानियां भी हिन्दी में कई प्रकाशित हुई हैं। उपभोक्तावाद और आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया इस दौरान हिन्दी कविता में पलायन की नई प्रवृत्ति के उभार में भी व्यक्त हुई है। कई कवि इस नई स्थिति से हतप्रभ और आहत होकर घर-गांव की बाल किशोरकालीन स्मृतियों में लौट गए हैं। इस कारण इधर की हिन्दी कविता में कहीं-कहीं वर्तमान यथार्थ से मुठभेड़ की जगह स्मृति की मौजूदगी बढ़ गई है।

बाजार और मीडिया साहित्य की शिल्प प्रविधि को भी अनजाने ढंग से प्रभावित कर बदलता है। साहित्यकार मीडिया का उपभोक्ता है इसलिए अनजाने ही उसकी कल्पनाशीलता इससे प्रभावित होती है। इसके अनुसार उसका अनुकूलीकरण होता है। खास तौर पर टीवी के कारण साहित्य की प्रविधि और शिल्प में जबर्दस्त बदलाव हुए हैं। दस-पंद्रह सालों के साहित्य में इस कारण दृश्य का आग्रह बढ़ गया है-यहां वर्णन पहले की तुलना में कम, दृश्य ज्यादा आ रहे हैं। इसी तरह पाठक अब पहले से सूचित है और पहले से ज्यादा जानता है, इसलिए इधर की रचनाओं में सूचनाएं कम हो गई हैं या असाधारण सूचनाएं बढ़ गई हैं। टीवी के प्रभाव के कारण ही लंबी कहानियों और उनके एपिसोडीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी है। साहित्य की पारंपरिक तकनीक रोचकता और रंजकता के पारंपरिक उपकरण ओवर एक्सपोजर से बासी हो गए हैं, इसलिए इधर के हिन्दी साहित्य में इनके विकल्पों के इस्तेमाल की सजगता दिखाई पड़ती है। रचनाकार पुराकथाओं या मिथकों की तरफ लौट रहे हैं और वर्णन की पुरानी शैलियों का नवीनीकरण हो रहा है। बाजार और मीडिया ने पारंपरिक साहित्य में एक और खास तब्दीली की है। अब साहित्यिक विधाओं का स्वरूपगत अनुशासन ढीला पड़ गया है। इनमें परस्पर अंतर्क्रिया और संवाद बढ़ रहा है। इसका असर हिन्दी में भी दिखाई पड़ने लगा है। इसी कारण हिन्दी में उपन्यास आत्मकथा की शक्ल और आत्मकथा उपन्यास की शक्ल में लिखे जा रहे हैं। कहानियां पटकथाएं लगती हैं और संस्मरण कहानी के दायरे में जा घुसे हैं। इसी तरह हिन्दी कविता ने भी अपने पारंपरिक औजारों का मोह लगभग छोड़ दिया है। यह अधिकांश बोलचाल की भाषा के पेच और खम के सहारे हो रही है।

ग्लॉबलाइजेशन और बाजार की सर्वोपरिता के इस दौर में साहित्य का नया रूप क्या होगा, यह अभी तय करना मुश्किल काम है। यह अवश्य है कि यह फिलहाल हाशिए पर है। आगे चलकर इसके कुछ रूप खत्म हो जाएंगे और कुछ पूरी तरह बदल जाएंगे। इस पर रोना-धोना तो होगा, लेकिन यह सब नक्कारखाने में तूती की तरह दब जाएगा।

जनसत्ता के दीपावली विशेषांक,2009 में प्रकाशित

Sunday 27 September 2009

गोरा का पुनर्पाठ



रवीन्द्रनाथ कागोरा पुनरुत्थान में अंतर्निहित बंधे हुए, क्षुद्र और विछिन्न हिंदुत्व के छद्म को उजागर करनेवाला विलक्षण और क्लासिक उपन्यास है। यह सही मायने में संकीर्ण हिंदुत्व का साहसपूर्ण और ओजस्वी जवाब है। प्रस्तुत है इस उपन्यास का पुनर्पाठ:


संकीर्णता के प्रतिरोध की सकारात्मक रणनीति

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत की सामाजिक चिंताओं में अतीत सर्वोपरि था, लेकिन इस दौरान अपने रचनाकार को रूप देने वाले रवींद्रनाथ ठाकुर की दृष्टि अतीत के बजाय भविश्य की ओर थी। चेतना पुनरुत्थान की हो या समाज सुधार की, इस दौरान अतीत की आलोचना और पुनरावलोकन ही विमर्श पर काबिज थे। रवींद्रनाथ का नजरिया इससे अलग था। वे द्रष्टा थे-वे बिजली की तरह सत्य का साक्षात्कार करते थे और पल भर में उसके समग्र रूप को पकड़ लेते थे। उन्होंने भी अपने अतीत और वर्तमान को समझा, पहचाना, लेकिन वे वहीं अटक नहीं गए। यहां से उन्होंने भविष्य को देखा। पुनरुत्थान में अंतनिर्हित संकीर्ण हिंदुत्व के जिस संकट से हम बीसवीं सदी के अंतिम समय में रूबरू हुए, उसके खतरे को उन्होंने लगभग सौ वर्ष पहले ही भांप लिया था। उनके उपन्यास गोरा में इस संकीर्ण हिंदुत्व की पहचान और प्रत्याख्यान, दोनों हैं।

रवींद्रनाथ का समय व्यापक सामाजिक उथल-पुथल का था। पुनरुत्थान और समाज सुधार की चेतना ने भारतीय समाज और उसमें भी खास तौर पर रवींद्रनाथ के अपने बंगाली समाज को भीतर तक उद्वेलित कर रखा था। उसमें एक तरफ बंकिमचंद्र और अरविंद घोष जैस नेता थे, जो हिंदू पुनरुत्थानवाद पर जोर दे रहे थे, जबकि दूसरी ओर राजाराम मोहनराय थे, जिनका आग्रह पश्चिम के युक्तिसंगत और वैज्ञानिक नजरिए से हिंदू सामाजिक मान्यताओं और रीति रिवाजों को निरर्थक सिद्ध कर समाज सुधार का था। पुनरुत्थान और समाज सुधार की ये धाराएं इस दौरान के बंगाली समाज में इस गहराई से सक्रिय थीं कि यह पारंपरिक हिंदू और आधुनिक और उदार, ब्राह्म समाज जैसे दो वर्गों में बंट गया था। रवींद्रनाथ बंकिमचंद्र से प्रभावित थे और ब्राह्म समाज से भी उनका गहरा संबंध था। वे इस नवजागरण के पुरस्कर्ताओं में से एक थे, लेकिन उन्होंने इन दो परस्पर विरोधी धाराओं के अतिवाद से अपने को अलग रखा। पुनर्जागरण आंदोलन में अंतनिZहित संकीर्ण हिंदुत्व के खतरे को वे इसीलिए समझ पाए। गोरा का प्रकाशन 1917 में हुआ, लेकिन 1895 में ही उन्होंने कथित पुनर्जागरण आंदोलन में छिपे संकीर्ण हिंदुत्व की असलियत और खतरे की ओर संकेत कर दिया था। बंगीय साहित्य परिशद में दिए गए अपने एक व्याख्यान में उन्होंने कहा कि ´´आज हम साहित्य की धारा को पकड़े हुए हिंदुत्व के उस बृहत, प्रबल, बहुमुखी, सचल, तटगठनशील, सजीव स्रोत पर बहते हुए इस काल से उस काल में नहीं जा सकते। आज हम उसी सूखे रास्ते के बीच-बीच अपनी अभिरुचि और आवश्यकता के अनुसार तालाब खोदकर उसी को हिंदुत्व कह कर पुकारते हैं। यह बंधा हुआ, क्षुद्र, विच्छिन्न हिंदुत्व हमारा व्यक्तिगत संबंध है, उसमें कोई मेरा हिंदुत्व है, कोई तेरा हिंदुत्व है, वह कण्व-कणाद, राघव-कौरव, नंद-उपनंद और हमारे सर्वसाधारण का तरंगित-प्रवाहित अखंड विपुल हिंदुत्व है कि नहीं, इसमें संदेह है।´´

पुनरुत्थान में अंतर्निहित इसे बंधे हुए, क्षुद्र और विछिन्न हिंदुत्व के छद्म को उजागर करने के लिए उन्होंने बाद में गोरा जैसे विलक्षण और क्लासिक उपन्यास की रचना की। यह संकीर्ण हिंदुत्व का साहसपूर्ण और ओजस्वी जवाब था। गोरा एक ऐसे कट्टर और रूढिवादी हिंदू युवक की कथा है, जो अंतत: इस पहचान से मुक्त होकर एक सामान्य मानवीय अस्तित्व रह जाता है। हिंदू धर्म, जाति और कर्मकांड में दुराग्रह की सीमा तक आस्था रखने वाले युवक गोरा को जब पता चलता है कि वह हिंदू की जगह आयरिश माता-पिता की संतान है, तो एक झटके के साथ उसकी धर्म-जाति की पहचान धराशायी हो जाती है और वह जाति, रंग और धर्म विहीन मनुष्य रह जाता है। उसे लगता है कि वह एक संकीर्ण सत्य से मुक्त होकर बृहत सत्य के सामने आ खड़ा हुआ है। वह पाता है कि वह अब सबका है और सब उसके हैं। गोरा की यह मुक्ति अतिनाटकीय है, लेकिन यह इस सत्य को उद्घाटित करती है कि जाति, धर्म और रंग की पहचान जन्म से नहीं, जन्म के बाद संस्कार से बनती है, इसलिए निरर्थक है। उपन्यास के आरंभ में आनंदमयी कहती है कि ´दुनिया में जात लेकर कोई नहीं जन्मता´ और अंत में गोरा सभी संकीर्णताओं से छुटकारा पाकर इस बहुत बड़े सत्य की गोद में आ गिरता है।

पुनरुत्थान में अंतर्निहित संकीर्ण हिंदुत्व स्त्री-पुरुष समानता का भी विरोधी था। उसका नजरिया स्त्रियों को घर के भीतर तक सीमित रखने का था। गोरा की राय में ´´लड़कियां घर के काम में पूरा मन न लगा पाएं, तो उनके कर्तव्य की एकाग्रता नष्ट होती है। गोरा में रवींद्रनाथ इस धारणा के औचित्य को गलत सिद्ध करने के लिए एकाधिक स्वतंत्र विवेक और व्यक्तित्व वाले मजबूत स्त्री चरित्रों की रचना करते हैं। ये स्त्री चरित्र घर के बाहर के भी हैं और घर की चार दीवारी के भीतर के भी हैं। इस उपन्यास की नायिका सुचरिता पूरी तरह स्वतंत्र और अपने विवेक पर निर्भर स्त्री चरित्र है। धर्म, जाति और विचार के दायरे से बाहर निकलकर वह अपने हृदय और सत्य के साथ है। गोरा का लालन-पालन कर बड़ा करने वाली उसकी मां आनंदमयी की सक्रियता घर की चार दीवारी के भीतर तक सीमित है, लेकिन बावजूद इसके वह सहज ही स्वतंत्र दृष्टिकोण वाली स्त्री है। उसने अपने अनुभव से सत्य को पा लिया है और वह जाति, रंग और धर्म की संकीर्णताओं से सहज ही मुक्त है।

गोरा अपने समय से आगे की रचना है, लेकिन यह उससे मुक्त नहीं है। यह अपने समय में गहराई तक धंसी हुई और उससे ओतप्रोत रचना है। गोरा में आया बंगाली समाज हिंदू और ब्राह्म में बंटा हुआ है, लेकिन यह विभाजन बहुत संश्लिष्ट किस्म का है। रवींद्रनाथ इस ऊपर से विभाजित दिखने वाले समाज को भीतरी तहों में जाकर इसके अंतर्विरोधों और द्वंद्वों के यथार्थ को समेटने के लिए कई चरित्रों, कथाओं और आनुषंगिक कथाओं का विधान करते हैं। उनके चरित्र एकरेखीय नहीं हैं। इनके अंतर्विरोधों और द्वंद्वों की विलक्षण समझ रवींद्रनाथ को है। गोरा का मित्र विनय हिंदू है, ब्राह्म धर्म को स्वीकार कर ललिता से विवाह करना चाहता है, लेकिन परेश बाबू से कहता है कि ´´मेरे जीवन में धर्म विश्वास अभी विकसित नहीं हुआ है। इतना भी समझ सका हूं वह भी आपको देखकर। धर्म की मुझे अपने जीवन में सच्ची आवश्यकता नहीं हुई और उसमें सच्चा विश्वास नहीं उत्पन्न हुआ इसलिए मैं कल्पना और युक्ति कौशल से अब तक अपने समाज में प्रचलित धर्म की ही तरह-तरह की सूक्ष्म व्याख्या करके केवल अपने तर्क करने की निपुणता बढ़ाता रहा हूं।´´

जाति, धर्म और रंग की संकीर्णताओं के विरोध का शोरगुल फिलहाल हमारे यहां बहुत है, लेकिन इसका कोई व्यापक और गहरा असर समाज पर हुआ हो, ऐसा नहीं लगता। दरअसल कमजोरी प्रतिरोध की रणनीति में है। यह विरोध एक तो समाज के दायरे से बाहर जाकर किया गया विरोध है और दूसरे यह अतिवाद का शिकार है। लगभग सौ साल पहले इस संकीर्णता के प्रतिरोध की जो सकारात्मक रणनीति रवींद्रनाथ ने गोरा में अख्तियार की थी उसकी आज सबसे अधिक जरूरत है। रवींद्रनाथ का यह प्रतिरोध एक तो अतिवाद से मुक्त था और दूसरे यह समाज के दायरे से बाहर जाकर नहीं, भीतर रह कर था। रवींद्रनाथ समाज के दायरे से बाहर जाकर विरोध करने की निरर्थकता को जानते थे। उन्होंने गोरा के मुख से इसीलिए कहलवाया था कि ´´आपसे मेरा अनुरोध है कि आप भारतवर्ष के भीतर प्रवेश कीजिए। इसकी सारी अच्छाइयों-बुराइयों के बीच खड़ी होइए, जो त्रुटियां हैं उनका भीतर से संशोधन कीजिए।´´



गोरा का कथा सार

गोरा का नायक है गौरमोहन, जिसे सब गोरा कहकर पुकारते थे। उसके शरीर का रंग एकदम गोरा झक था। लंबाई करीब छ: फुट, सीना चौड़ा, दोनों हाथ की मुट्ठियां मानो बाघ के पैर के पंजे हों। गले की आवाज इतनी भारी और गंभीर थी कि अचानक कान में पड़े तो आदमी चौंक उठे। ....उसका व्यक्तित्व सबसे अलग था, ऐसा लगता था जैसे अपने आस-पास से उसका विशेश संबंध न हो, उसके बीच वह जैसे अटपटे ढंग से अचानक उठ खड़ा हुआ हो। कॉलेज के पंडितजी उसे ´रजतगिरी´ कहते थे। आईरिश वंशीय गोरा का जन्म 1857 के गदर के समय इटावा में हुआ था। जन्म के बाद ही उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई और कृष्णदयाल की पत्नी आनंदमयी ने उसका लालन-पालन किया। वह उन्हें ही अपना माता-पिता समझता था। बाद में थोड़ा बड़ा होने पर केशव बाबू का भाशण सुनकर वह ब्राह्म समाज की ओर आकृष्ट हुआ। कृष्णदयाल के घर रोज ही पंडित लोग आया करते थे। मौका मिलते ही गोरा उनसे वाद-विवाद करने बैठ जाता। हरचंद विद्यावगीश से उसने वेदांत पढ़ना शुरू किया। इसी समय एक अंग्रेज मिशनरी ने हिन्दू शास्त्र और समाज की कटु आलोचना करते हुए भारत वासियों को तर्क-युद्ध के लिए ललकारा तो गोरा उससे युद्ध के लिए प्रस्तुत हो गया। कुछ दिनों तक अखबारों में चिट्ठी-पत्री चलती रही। वह बंद होने पर उसने ´हिन्दूइज्म´ नाम से एक किताब लिखना शुरू किया। थोड़े दिनों बाद ही उसने इस काम को अपने ही तर्कों द्वारा व्यर्थ प्रमाणित कर दिया। बोला-´विदेशियों की अदालत में हमारा ही देश मुजरिम की तरह खड़ा हो और विदेशियों द्वारा बनाये कानून द्वारा उसका विचार हो, यह हम कभी न बरदाश्त करेंगे।´ गोरा धीरे-धीरे कट्टर और रूढ़िवादी हिंदू बन गया। उसने संध्या पूजा शुरू कर दी, चुटिया रख ली और खानपान का विचार करने लगा।

गोरा का एक मित्र था विनय। ब्राह्म समाज के परेश बाबू कृष्णदयाल के बचपन के मित्र थे। उनके परिवार के साथ विनय का घनिष्ठ संबंध था। इसे लेकर गोरा बराबर विनय पर आपेक्ष किया करता। यहां तक कि हिंदू समाज के आचार-विचार के प्रति निश्ठा की कमी देखकर उसको अपनी मां आनंदमयी के हाथ का भोजन करने में असुविधा होने लगी। एक बार कृश्णदयाल बाबू के कहने पर गोरा परेश बाबू का कुशल समाचार लेने गया। परेश बाबू के यहां विनय पहले से ही बैठा था। उसकी उपस्थिति की ओर गोरा ने ध्यान ही नहीं दिया। साकार उपासना के प्रति परेश बाबू की स्त्री वरदासुंदरी की उपेक्षा का भाव देखकर वह बोला-`´जो निराकार है वह संपूर्ण नहीं है। जिस प्रकार शब्द में अर्थ निहित रहता है उसी प्रकार आकार में निराकार निहित रहता है।´´ ब्राह्म समाज के हारान बाबू ने बंगालियों के दोश बताए, तो गोरा ने बडे़ गंभीर स्वर में इसका विरोध किया। एक दिन भोजन के बाद रात में गोरा और विनय छत पर चटाई बिछाकर बैठे। विनय अपने आंतरिक भाव को छिपा न सका। परेश बाबू के परिवार में हुए अपने प्रथम प्रेम की चर्चा उसने गोरा से की। गोरा की दृष्टि में प्रेम आदि सदा अत्यंत तुच्छ और त्याज्य रहे, पर विनय की इस अनुभूति ने गोरा को आकृष्ट किया।

गोरा रोज मुहल्ले के निम्न वर्ग के लोगों के यहां आता-जाता। पढ़े-लिखे लोगों के यहां उसका ऐसा सहज आना-जाना नहीं था। गोरा को वे लोग ´दादा ठाकुर´ कहते। इसी बीच आनंदमयी के सौतेले बेटे महिम की लड़की के साथ विनय की और परेश बाबू की बेटी के साथ गोरा के विवाह की बात उठी। गोरा बोला- मैंने जब से अपनी मां को देखा है, जाना है, तब से मुझे संसार की सारी स्त्रियां उसी रूप में दिखलाई पड़ती हैं। गोरा के मत से स्थूल दृष्टि से स्त्रियां रात्रि की तरह प्रच्छन्न होती हैं।

गोरा अपने विचारों पर दृढ़ रहता था। परेश बाबू के यहां आकर उसने हारान बाबू के साथ तर्क शुरू किया। गोरा के मुख पर अवज्ञा भरी हंसी, उसकी घृणापूर्ण भृकुटी, आत्म मर्यादा का गौरव तथा असंदिग्ध विश्वास फिर दिखलाई पड़ा। हारान बाबू के जाने के बाद गोरा का परिचय हुआ सुचरिता से। सुचरिता परेश बाबू के मित्र की कन्या थी और उनके ही आश्रय में पल रही थी। एक शिक्षित लड़की में गोरा ने औद्धत्य और प्रगल्भता की ही आशा की थी। किंतु सुचरिता की बौद्धिक प्रखरता और सलज्ज नम्रता से अभिभूत होकर वह बोला-´´भारत की अपनी एक विशेश प्रकृति है, विशेश शक्ति है, विशेष सत्य है। आपसे मेरा अनुरोध है कि आप भारतवर्ष के भीतर प्रवेश कीजिए। इसकी सारी अच्छाइयों-बुराइयों के बीच खड़ी होइए, जो त्रुटियां हैं उनका भीतर से संशोधन कीजिए।........त्रुटियों के विरुद्ध खड़े होकर.....देश के कोई काम न आइएगा।´´ नरेश बाबू के घर से निकल कर वह पहुंचा गंगा किनारे। उस काले जल के घने अंधकार, नगर के अव्यक्त कोलाहल, नक्षत्रों के धुंधले आलोक में गोरा के संकल्पमय जीवन में एक स्त्री छवि आई। इसका सामना करने के लिए उसने मुट्ठियां कस लीं। तभी बुद्धि से आलोकित और नम्रता से मृदु सुचरिता के दो नेत्रों की दृ उसके मुख पर स्थित हो गयी। पर गोरा को लगा यह दुर्बलता ठीक नहीं। भोजन के बाद पीठ पर एक पोटली बांध कुछेक भक्तों के साथ वह ग्रैंड ट्रंक रोड पर चल पड़ा। कलकत्ता के पढ़े-लिखे भद्र लोगों के समाज से परे भारतवर्ष का ग्रामीण समाज कितना विच्छिन्न है, संकीर्ण हैं, दुर्बल है, इसका प्रथम साक्षात्कार गोरा को इस दौरान हुआ। चरघोषपुर पहुंचने पर उसने पाया कि गांव नील-कर साहबों के अधीन है। गोरा मैजिस्ट्रेट के पास गया। मैजिस्ट्रेट ने गांववालों को ही दोशी बतलाया। गोरा ने उसके उत्तर में कहा, ´सत्य इतना ही है कि गांव वाले निभीZक हैं और स्वाधीनता के प्रति सजग भी।´ गोरा ने चरघोषपुर की प्रजा की ओर से जमानत के लिए दरख्वास्त दी। वकील की खोज में गोरा कलकत्ता की ओर चल पड़ा। रास्ते में छात्रों के एक दल को पुलिस द्वारा अपमानित होते और मार खाते देख गोरा पुलिस से उलझ पड़ा आर उनसे मारपीट करने के फलस्वरूप खुद ही जेल में पहुंच गया। एक महीने बाद जेल से लौटने पर गोरा स्वयं को अपवित्र लगने लगा। इस बीच विनय ने परेश बाबू की लड़की ललिता से विवाह करने का निर्णय कर लिया था। यह सुनकर गोरा क्षुब्ध हो गया। जेल के बंधन से दो अधिष्ठात्री देवियां गोरा को बीच-बीच में मुक्त करती रहती थीं। एक चेहरा मां का था चिरपरिचित दूसरा बुद्धि से आलोकित नम्र सुंदर चेहरा सुचरिता का था। गोरा अपनी देशभक्ति को सुचरिता के साथ मिलकर समान दृष्टि से देखने के लिए व्यग्र था। गोरा कहता- ´´हमारे भारतवर्ष के लिए हम पुरुष तो केवल मेहनत कर सकते हैं, पर तुम न हुई तो प्रदीप जलाकर उसका वरण कौन करेगार्षोर्षो तुम यदि उसके पास से हटकर दूर चली गयी तो भारतवर्ष का रूप सुंदर न होगा।´´ गोरा की इस तरह की बातों से सुचरिता के संशयहीन नेत्रों से आंसू झरने लगते, उसका हृदय भूमिकम्प के समान आंदोलित होने लगता। धर्म विरुद्ध होने के कारण अपने घर से होने वाले विनय के विवाह में गोरा ने केवल बाधा ही नहीं पहुंचाई, वरन स्वयं शामिल होने में असमर्थता भी व्यक्त की। जेल की अपवित्रता दूर करने के लिए उसने एक प्रायिश्चत सभा का आयोजन किया। जेल से छूटने के बाद गोरा नियमपूर्वक गांव में भ्रमण के लिए निकलता। गोरा ने पहली बार लक्ष्य किया कि ग्रामीण समाज में सामाजिक आचार-विचार तथा लोकाचार आदि के बंधन िशक्षित लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक है। उसने यह भी पाया कि उनमें एकता का अभाव है। विनय के विवाह के दिन अपराह्न में गोरा कंधे पर चादर डालकर घूमने निकल पड़ा। घूमते-घूमते वह सुचरिता के मकान के सामने पहुंचा। देखा दरवाजा बंद है। सुचरिता किसी के यहां विवाह में गयी थी। सहसा उसे लगा सुचरिता का द्वार उसके लिए रुद्ध है। गोरा को लगा- ब्राह्मण के लिए तो संसार में नियम-संयम, धर्म-साधना, ज्ञान आदि ही मुख्य हैं, ये ही उसका गौरव है।

काशीपुर के बगीचे में प्रायिश्चत करना तय हुआ। पहले दिन गोरा बगीचे जाने के लिए तैयार हुआ। तभी सुचरिता की मौसी हरिमोहिनी आ गयी। हरिमोहिनी की इच्छा थी कि गोरा सुचरिता को कहीं और विवाह कर लने के लिए समझाए। इस बात से गोरा के मन को गहरी ठेस पहुंची, क्योंकि गोरा ने सुचरिता को एक प्रगाढ़ सत्य के रूप में देखा था। उस सत्य को कोई और कैसे प्राप्त कर सकता है। कृश्णदयाल गोरा के प्रायश्चित में बराबर बाधा खड़ी कर रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि गोरा अंतर से ब्राह्मण नहीं है। बगीचे में पहुंचकर गोरा स्नान करके उठा ही था कि समाचार मिला कि कृश्णदयाल की तबियत बहुत खराब हो गयी है। गोरा तुरंत घर लौट आया और वहीं उसे अपने जन्म का वृत्तांत सुनने को मिला। गोरा ने उद्विग्न भाव से मां की ओर देखा और अचानक ज्वालामुखी के विस्फोट की तरह उसके मुंह से शब्द फूट पड़े-´´मां, तुम मेरी मां नहीं हो..´´ एक-एक करके उसने अपने बारे में सब कुछ सुना। सुनने के साथ ही साथ ही उसकी शैशवकाल में बनी जीवन-भित्ति, उसके बाद का अतीत और आगे का सुनिर्दिष्ट भविष्य, सब लुप्त हो गए। उसकी मां नहीं, बाप नहीं, देश नहीं, जाति नहीं, नाम नहीं, गोत्र नहीं, इष्टदेव नहीं। उसका सब कुछ केवल मात्र एक विराट ´ना´ है।

परेश बाबू हमेशा शास्त्र द्वारा अनुमोदित अनुशासन तथा लोकाचार की अपेक्षा सत्य और हृदय को ही बड़ा मानते थे। ललिता का विवाह करके वे ब्राह्म समाज से च्युत हो गए थे। गोरा उनके पास गया। सुचरिता भी वहां उपस्थित थी। गोरा ने धरती पर सिर टेककर परेश बाबू से कहा- ´मैं हिंदू नहीं हूं...भारतवर्ष में उत्तर से लेकर दक्षिण तक के सभी मंदिरों के द्वार मेरे लिए रुद्ध हैं। आज सारे देश में किसी भी पंक्ति में बैठकर खाने का अधिकार मुझे नहीं है।´ गोरा ने अनुभव किया कि एक संकीर्ण भारतवर्ष का निर्माण करके, उस अभेद्य दुर्ग के भीतर अपनी भक्ति को सर्वथा निरापद रूप में स्थित करने के लिए उसने अपने चारों ओर से कितनी लड़ाई की थी, कितना युद्ध किया था। आज अचानक जाति-गोत्रहीन होकर सर्वथा मुक्त होकर वह एक बृहत सत्य के सामने आ खड़ा हुआ है। आज भारतवर्ष की सब जाति उसकी जाति है, सबका खाद्य उसका खाद्य है। गोरा अब ऐसे देवता का मंत्र चाहता था जो हिंदू, मुसलमान, ईसाई, ब्राह्म सबके हों, जिनका द्वार किसी विशेष जातिवालों के लिए कभी अवरुद्ध न हो, जो केवल हिंदुओं के देवता नहीं, वरन् सारे भारतवर्ष के देवता हों। सुचरिता का हाथ पकड़कर वह परेश बाबू के चरणों में नत हो गया।

संध्या समय घर लौटकर मां आनंदमयी के चरणों को अपने सिर पर रखकर गोरा बोला-´´मां, तुम्हीं मेरी मां हो। जिस मां को मैं खोजता घूम रहा था वे तो मेरे ही घर में उपस्थित थीं। तुम्हीं थी। तुम्हारी जाति नहीं, तुम्हें विचार नहीं, घृणा नहीं, तुम केवल कल्याण की मूर्ति हो। तुम्हीं मेरा भारतवर्ष हो।´´
डेली न्यूज के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग, 27 सितम्बर,2009 को प्रकाशित

Sunday 12 July 2009

राष्ट्रीय आंदोलन और हिंदी कविता

लगभग दो सौ सालों के ब्रितानी शासन के बाद भारत आजाद हुआ। एक तरह से 1757 में ब्रितानी शासन कायम हुआ और यहीं से उसके विरुद्ध संघर्ष भी शुरू हो गया, जो 1947 तक बराबर जारी रहा। इसकी प्रकृति, ढंग और नजरिया हमेशा और हर जगह एक से नहीं रहे। इसमें कई उतार-चढ़ाव आए और कई मोड़-पड़ावों से गुजर कर यह अपनी मंजिल तक पहुंचा। ब्रितानी शासन के शुरुआती सौ सालों, मतलब 1757 से 1857 तक शासन कंपनी सरकार का था, जिसकी नीयत अपने व्यापारिक हितों क लिए ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों के राजनीतिक अधिकार हासिल करना रही। इसने व्यापार के नाम पर जम कर लूट-खसोट की। इसके व्यापारिक एकाधिकार और राजनीतिक वर्चस्व के विरुद्ध इस दौरान कई आंदोलन हुए। ये आंदोलन ज्यादातर क्षेत्रीय थे और वंचित जमीदारों, सैनिकों, किसानों और धार्मिक नेताओं द्वारा चलाए गए थे। इस सबकी चरम परिणति 1857 के पहले विद्रोह के रूप में हुइ, जो दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ। अब कंपनी सरकार की जगह ब्रितानी साम्राज्य ने ले ली।

आधुनिक किस्म की राजनीति और साम्राज्यवाद के विरोध की शुरुआत यों तो राजा राममोहन राय और डोरजियो जैसे लोगों ने पहले ही कर दी थी, लेकिन 1857 के विद्रोह की असफलता के बाद इसमें तेजी आई। शिक्षित भारतीयों की पहल पर कई संगठन कायम हुए। साम्राज्यवाद के खराब नतीजों पर बहस-मुबाहिसे की शुरुआत हुई। 1857 में कांग्रेस की स्थापना हुई, जो धीरे-धीरे एक देशव्यापी संगठन बन गया। आरंभ में इस संगठन से जुड़ने वाले लोगों का रवैया साम्राज्य के भीतर ही कुछ सुधारों और अधिकारों की मांग करने तक सीमित रहा, लेकिन कुछ समय बाद इसका चरित्र बदल गया। इसका कायाकल्प ऐसे संगठन के रूप में हुआ, जिसने लगभग एक सदी तक ब्रितानी शासन के विरुद्ध भारतीय जनसाधारण के संघर्ष का नेतृत्व किया।

व्यापक राष्ट्रीय भावना और आधुनिक राजनीतिक विचारों का प्रसार बीसवीं सदी के शुरुआती पचास सालों के दौरान हुआ। चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में जनांदोलनों को सफल नेतृत्व देने के बाद 1920 में गांधीजी ने राश्ट्रीय संघर्ष की बागडोर संभाली। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन व्यापक हुआ-इसमें जनभागीदारी बढ़ी और इसकी पहुंच और प्रभाव का दायरा बढ़कर देशव्यापी हो गया। अब संघर्ष के तौर तरीके भी बदल गए-अहिंसा और सत्याग्रह आंदोलन के मुख्य हथियार हो गए। जैसे-जैसे राष्ट्रीय संघर्ष व्यापक और उग्र हुआ, ब्रितानी शासन का दमन और अत्याचार भी बढ़ गए। इसी बीच रूसी क्रांति हुई। राष्ट्रीय संघर्ष के नेतृत्वकर्ताओं, खासकर नेहरू और उनके युवा सहयोगियों की मनोदशाओं और नजरिये में इससे कुछ आधारभूत तब्दीलियां हुईं। उन्होंने राष्ट्रीय संघर्ष में समाजवाद के लक्ष्य को भी शामिल कर लिया। संघर्ष के जो कई अलग-अलग तौर-तरीके थे, उनके चलते नेतृत्व में सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे कई नाम जुड़े। इसी बीच दो विश्व युद्ध हुए, जिनका व्यापक और गहरा प्रभाव राश्ट्रीय आंदोलन पर हुआ।

ब्रितानी शासन के विरुद्ध चला दो सौ सालों का यह आंदोलन देशव्यापी था। शुरुआत में यह अभिजात और पढ़े-लिखे तबकों तक सीमित था, लेकिन आगे चलकर देश के जनसाधारण ने भी कुछ हद तक इसमें भागीदारी की। खास तौर पर गांधीजी के नेतृत्व संभालने के बाद यह समाज के सब तबकों में फैल गया। उन्नीसवीं सदी के दौरान शुरू हुए पुनरुत्थान और समाज सुधार संबंधी आंदोलन भी इस व्यापक राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण घटक थे। इनके कारण फैले उदार और लोकतांत्रिक विचारों से सदियों पुराने धार्मिक और सामाजिक ढांचे में भी रद्दोबदल शुरू हुए। गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों का भी व्यापक प्रभाव पड़ा। इनसे सामाजिक जीवन में उथल-पुथल ओर आत्मालोचन शुरू हुआ। इस व्यापक और गहरी उठापटक का तत्कालीन हिंदी कवि सक्रियता पर भी असर पड़ा। हिंदी की कवि सक्रियता इस दौरान दो रूप अख्तियार करती है। पहली पकार की सक्रियता छायावादी थी-यह इतिहास से कटी जान पड़ती है, लेकिन कुछ हद तक यह अपने समय के राजनीतिक-सामाजिक नवोन्मेष की ही परोक्ष सांस्कृतिक अभिव्यक्ति थी। दूसरी प्रकार की सक्रियता आंदोलन से सीधे संबंधित थी। इसके कवि, सुभद्राकुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन आंदोलन में भागीदार भी थे। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों को कविता से गहरा लगाव था। राष्ट्रीय भावना के कवि माखनलाल चतुर्वेदी पर तिलक का गहरा प्रभाव था, जिन्होंने क्रांतिकारी के रूप में ही अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी।

राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हिंदीभाषी क्षेत्रों में कविता को बतौर हथियार तो इस्तेमाल किया गया, लेकिन यह बहुत प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुई। एक तो हिंदीभाषी क्षेत्र बंगाल और महाराष्ट्र जैसे प्रांतों की तुलना में पिछड़ा हुआ था और यहां पर सामंती-अर्धसामंती निश्प्राण सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों की जकड़बंदी बहुत मजबूत थी, इसलिए यहां की कविता अपने देश के इतिहास और समाज के संबंध में कोई युक्तिसंगत नजरिया नहीं बना पाई। दूसरे, हिंदी कविता की परंपरा में प्रतिष्ठान विरोध को कोई खास सम्मान और स्वीकृति कभी नहीं मिली थी, इसलिए ब्रितानी साम्राज्यवाद के विरोध में यह आरंभ में दुविधा की शिकार रही। फिर हिंदीभाषी क्षेत्रों में आजादी से पहले साक्षरता बहुत कम थी और यहां संचार के साधन बहुत सीमित थे, इसलिए इस कविता की पहुंच और प्रभाव का दायरा भी बहुत सीमित रहा।

उन्नीसवीं सदी के दौरान हिंदी भाषी क्षेत्रों में सामंती-अर्धसामंती व्यवस्था का दबदबा था और इसे ब्रितानी शासन का संरक्षण, समर्थन और प्रोत्साहन भी हासिल था। इस दौरान एक नए पूंजीपति वर्ग का उदय तो हो रहा था, लेकन यह पूरी तरह इसी सामंती व्यवस्था से जकड़ा हुआ था। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय और इसका नेतृत्व करने वाले लोग भी संबंधों की इस जकड़न से पूरी तरह आजाद नहीं थे। अंग्रेजों की अधीनता के संबंध में ये लोग असमंजस के शिकार थे। अंग्रेजों की पराधीनता इनके जातीय स्वाभिमान को चुभती थी, लेकिन ज्यादातर लोग सोचते थे कि उनकी आकांक्षाएं विदेशी आधिपतय के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष के द्वारा नहीं, वरन ब्रितानी पूंजीपती वर्ग की सहायता और संरक्षण से ही पूरी हो सकती हैं। यह दुविधा हिंदी के भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि कवियों की कविता में भी साफ-साफ दिखाई पड़ती है। इन्होंने ´किय सनाथ भोली भारत की प्रजा अनाथन´ कहकर रानी विक्टोरिया की सराहना भी की और ´हिंदी हिंदू और हिंदुस्तान´ का जयगान भी किया।

राश्ट्रीय आंदोलन हिंदी भाषी क्षेत्रों में कुछ हद तक लोकप्रिय तो हुआ, लेकिन इसका यहां के जनसाधारण के आचार-विचार पर कोई निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा। आधुनिक विचारों की जड़ें यहां मजबूत नहीं हो पाई, इसलिए बंगाल और महाराष्ट्र की तरह समाज सुधार का कोई बड़ा आंदोलन यहां नहीं हुआ। दरअसल सड़ी-गली धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं की जड़ें यहां इतनी गहरी और मजबूत थीं कि युक्तियुक्तता, वैज्ञानिक विचार और रहन-सहन का आधुनिक ढंग यहां नहीं फैल पाए। बंगाल और महाराष्ट्र इस मामले में अग्रणी थे। बंगाल में राजा राममोहन राय का ब्रह्म समाज और महाराष्ट्र में महादेव गोविंद रानाडे का प्रार्थना समाज सोच के मामले में कुछ हद तक वैज्ञानिक और प्रगतिशील थे, जबकि हिंदी भाशी क्षेत्रों में चले समाज सुधार आंदोलनों का स्वर मुख्यतया पुनरुत्थानवादी था। ये लोग पश्चिम की ´भौतिकवादी संस्कृति´ की तुलना में भारत की ´आध्यात्मिक संस्कृति´ को खड़ा करते थे और इनकी निगाह में इसकी सुरक्षा के लिए पुरानी धार्मिक परंपराओं को पुनरुत्थान जरूरी था। पुनरुत्थान की यही चेतना हिंदी भाषी क्षेत्रों की कविता में केन्द्रीय सरोकार रही है। मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, माखनलाल चतुर्वेदी आदि सभी कवियों का आग्रह अतीत की पुनर्रचना का है। मैथिलीशरण गुप्त की ´भारत-भारती´ आद्यंत पुनरुत्थान की चेतना से ओतप्रोत है।

राष्ट्रीय आंदोलन से यह भी अपेक्षित था, कि यह देश के इतिहास ओर समाज के संबंध में जनसाधारण में वैज्ञानिक और युक्तिसंगत सोच का विकास करता। दुर्भाग्य से हिंदी भाषी क्षेत्रों में ऐसा नहीं हुआ। यहां सक्रिय कवियों ने भी यह नहीं किया। ब्रितानी उपनिवेशवाद और आर्थिक साम्राज्यवाद ने भारतीय अर्थव्यवस्था और उद्योग धंधों को चौपट कर दिया था, लेकिन इसकी कोई समझ इस दौरान की हिंदी कविता में नहीं मिलती। हिंदी के इन राश्ट्रीय कवियों का इतिहास बोध भी संकीर्ण सोच के कारण कुछ हद तक गड़बड़ लगता है। इनमें से कुछ कवियों ने तो ब्रितानी उपनिवेशवाद की तुलना में मुगलों की पराधीनता को अधिक घातक और हानिकारक ठहराया है, जो ऐतिहासिक सच्चाई नहीं है। युक्तिसंगत ओर उदार समझ के अभाव में इन अधिकांश कवियों का नजरिया भी समाज में दलितों और स्त्रियों की हैसियत को लेकर भी दो टूक नहीं है।

इन कवियों में अतीत प्रेम और पुनरुत्थान की चेतना इतनी प्रबल है कि इनकी सोच वर्णाश्रम व्यवस्था, पितृसत्तात्मक समाज और पारंपरिक धर्म के दायरे से बाहर नहीं निकलती। यहां तक कि इन्होंने अपने गिने-चुने नवाचारों को भी खोज-खाजकर शास्त्र सम्मत ठहराने का प्रयास किया। समाज में स्त्रियों की दोयम दर्जे की हैसियत भी इन राश्ट्रीय कवियों की चिंता और सरोकार नहीं बन पाई। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय महिला कवयित्रियों की ज्यादातर उठापटक भी पारंपरिक पितृसत्तात्मक सामाजिक चार दीवारी तक ही सीमित रही। कवियों के ही क्यों, राष्ट्रीय आंदोलन के पितामह महात्मा गांधी के विचार भी स्त्रियों के संबंध में कुछ हद तक दकियानूसी थे। ´हिंद स्वराज´ में ब्रिटेन की कामकाजी महिलाओं के संबंध में उनकी टिप्पणी का तत्कालीन स्त्री समर्थकों ने विरोध किया था। अपनी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद कथाकार प्रेमचंद के विचार भी स्त्रियों के संबंध में कमोबेश ऐसे ही थे। महादेवी वर्मा की विद्यापीठ की छात्राओं की संबोधित करते हुए उन्होंने आशंका व्यक्त की थी कि नए माहौल की हवा लगने से लडकियां बिगड़ जाएंगी। हिंदी कवियों का दलितों के प्रति नजरिया भी युक्तिसंगत और वैज्ञानिक नहीं है। गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों से दलितों के प्रति हिंदी कविता में सहानुभूति तो बढ़ी, लेकिन दुर्भाग्य से इस संबंध में इसका नजरिया वैज्ञानिक और युक्तिसंगत नहीं हो पाया। दलितों की हैसियत या उनके सामाजिक उत्थान को सरोकार बनाने वाली कोई हिंदी कृति राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान नहीं लिखी गई।

राष्ट्रीय आंदोलन देशव्यापी था, लेकिन सभी क्षेत्रों में इसकी प्रकृति ओर ढंग एक जैसे नहीं थे। हिंदी भाषी क्षेत्र में पारंपरिक सामंती-अर्धसामंती सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों का दबदबा ज्यादा था, इसलिए यहां के राष्ट्रीय आंदोलन मे में बंगाल या महाराष्ट्र जैसी धार नहीं थी। इसके अंतर्विरोधों और अंतर्बाधाओं ने ही यहां की कविता को भी बहुत असरकारी निर्णायक भूमिका मे खड़ा नहीं होने दिया।

Tuesday 2 June 2009

इतिहास और आख्यान की जुगलबंदी

उपनिवेशकालीन दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी विद्रोह पर एकाग्र हरिराम मीणा की रचना धूणी तपे तीर को यों तो उपन्यास की संज्ञा दी गई है, लेकिन यह इतिहास और दस्तावेज भी है। गल्प के अनुशासन में होने के कारण यह एक औपन्यासिक रचना है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज होने के कारण इसका साहित्येतर महत्व भी बहुत है। यह रचना हिंदी में साहित्य की साहित्येतर अनुशासनों के साथ बढ़ रही निकटता और इससे होने वाली अंतिर्कयाओं की भी साक्ष्य है।

हिंदी में किसी घटना या व्यक्ति पर गहन और व्यापक शोध आधारित उपन्यास लिखने की कोई समृद्व परपंरा नही है। हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यासों की जो परपंरा है , उसमें शामिल अधिकांश उपन्यास पुनरुत्थान की चेतना से ओतप्रोत है। खास बात यह है कि इनमें तथ्यों को कल्पना से पुष्ट और विस्तृत करने के बजाय विकृत गया है। इनमें दूरस्थ अतीत की केवल कल्पनाप्रधान पुनर्रचना और अमूर्तन है। हरिराम मीणा की यह रचना हिंदी में अपनी तरह की पहली रचना है, जो उपनिवेशकालीन निकट अतीत के एक आदिवासी विद्रोह पर की गई गहन और व्यापक शोध पर आधारित है और जिसमें तथ्यों को कल्पना से विकृत या अमूर्त करने के बजाय पुष्ट और विस्तृत किया गया है।

यह रचना राजस्थान के दक्षिणी भूभाग में उपनिवेशकाल के दौरान ब्रिटिश-सामंती गठजोड़ के विरुद्ध हुए आदिवासी विद्रोह पर आधारित है। यह विद्रोह कोई मामूली उपद्रव या उत्पात नहीं था। उपनिवेशकाल से पहले तक अपनी जमीन और जंगलों पर आदिवासियों का सहज और निर्विवाद स्वामित्व था। सामंतों की उनके वर्चस्व वाले इलाकों में पहुंच और दखलंदाजी सीमित थी और वे अपने इलाकों में खुदमुख्तार थे। अंग्रेजो से संधियों के बाद रियासती सामंतो ने जंगल और जमीन पर आदिवासियों के इस पारंपरिक स्वामित्व और वर्चस्व में दखलंदांजी शुरू कर की। उनके रखवाली और बोलाई जैसे पारंपरिक अधिकार छीन लिए गए। अंग्रजों के समर्थन और सहयोग से आदिवासियों का दमन और शोषण भी बढ़ गया। इसके लिए खैरवाड़ा में मेवाड़ भील कोर की स्थापना की गई। वंचित और दमित-शोषित आदिवासियों में धीरे-धीरे असंतोष बढने लगा और विद्रोह होने लगे। पहला सफल विद्रोह बारापाल और पडोना में हुआ और धीरे-धीरे यह दूसरे इलाकों में भी फैल गया। इसकी चरम परिणति 1913 के मानगढ़ विद्रोह में हुई। यह केवल एक क्षेत्रीय विद्रोह नहीं था। यह तत्कालीन राजपुताना की आदिवासी बहुल मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और कुशलगढ़ के साथ गुजरात की पड़ोसी ईडर और संतरामपुर रियासतों तक विस्तृत था। इसका नेतृत्व 1858 में डूंगरपुर रियासत के बांसिया गांव में उत्पन्न बनजारा जाति के समाज सुधारक और क्रांतिकारी गोविदंगरु ने किया, जिन्हें आदिवासियों का व्यापक समर्थन और सहयोग प्राप्त था। गोविंद गुरु ने आदिवासी नायक पूंजा के साथ मिल कर संप सभा के माध्यम से तीन दशकों तक निरंतर आदिवासियों में पहले जागृति का काम किया। उन्होंने इसके लिए गांव-फलियों में संप सभाएं और धूणियां कायम कीं। उन्होंने आदिवासियों में सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन के लिए आंदोलन चलाए। खास तौर पर आदिवासियों में शराब के व्यापक चलन के विरुद्व उन्होंने सफल मुहिम चलाई, जिसका परिणाम यह हुआ कि बांसवाडा रियासत में 1913 में शराब की खपत 18,740 गैलन से घटकर केवल 5,154 गैलन रह गई। उन्होने घूम-घूम कर गांव-फलियों में जागृति और अन्याय-अत्याचार के प्रतिकार के लिए समर्पित और निषठावान कार्यकर्ताओं का एक संगठन खडा किया। अंतत: 1913 में आरपार की लड़ाई शुरू हुई। गोविंद गुरु के आह्वान पर 25,000 आदिवासी रणनीतिक महत्व के पहाड़ मानगढ़ पर एकत्रित हुए। अंग्रेजों ने इस विद्रोह के दमन के लिए रियासती फौजों के साथ अपनी सात सैनिक कंपनियां लगाई। विद्रोह को नृशंसतापूर्वक कुचल दिया गया। इस दौरान लगभग 1500 आदिवासी मारे गए, इतने ही घायल हुए और 900 विद्रोही आदिवासियों को गोविंद गुरु सहित गिरफ्तार कर लिया गया।

यह एक संगठित, सुनियोजित, दीर्घकालीन और तैयारी के बाद किया गया विद्रोह था, जिसमें शहीद होने वोले आदिवासियों की संख्या जलियावाला हत्याकांड से चार गुना अधिक थी। विडंबना यह है कि इतिहास में इसका उल्लेख नहीं है। राजस्थान के सामंतो का विस्तृत इतिहास लिखने वाले गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसके संबंध में केवल इतना ही लिखकर किनारा कर लिया कि “मानगढ़ पर एकत्रित कुछ भीलों ने उत्पात मचा रखा था। फौज को गोलियां चलानी पड़ी। कुछ भील मारे गए।“ इस विद्राह से संबंधित पर्याप्त अभिलेख हैं, लोक साक्ष्य हैं, लेकिन अभी तक उनको एक जगह एकत्रित नहीं किया गया था। इस रचना में लेखक ने पहली बार इन सभी को गहन और व्यापक शोध के बाद एक जगह एकत्रित किया है और इस तरह इस विद्रोह को एक मुकम्मिल पहचान देने की कोशिश की है।

इतिहास के साथ यह कृति एक रचनात्मक आख्यान भी है। लेखक इसमें बहुत कौशल के साथ संयम में रहकर इतिहास को रचना में ढालता है। यह मुश्किल काम है, लेकिन लेखक ने इसे खूबी के साथ अंजाम दिया है। वह इसमें तथ्य की जमीन पर मजबूती से अपने पांव जमा कर फिर अपनी कल्पना को ढील देता है। इस रचना में ऐसे कई प्रसंग हैं, जो तथ्य और कल्पना के असाधारण संयोग से संभव हुए हैं। मेवाड़ भील कोर को रायफल देने के लिए आयोजित उत्सव, पालपा के जागीरदार के विरुद्ध दड़वाह की जमीन के लिए आदिवासी संघर्ष के प्रसंग इसके अच्छे उदाहरण हैं। मानगढ़ विद्रोह का दैनंदिन विवरण भी तथ्य और कल्पना के संयोग के कारण ही इसमे बहुत बसरदार बन गया है। चरित्रों के गठन और विस्तार में भी लेखक ने यही किया है। गोविंद गुरु के चरित्र मेके गठन और निर्माण में तथ्यों को कल्पना से ही विस्तार दिया गया है। लोक में उनकी छवि धार्मिक आधार वाले संत-महात्मा की थी और मूलत: वे एक समाज सुधारक और क्रांतिकारी थे, लेकिन लेखक कल्पना के सहारे उनके इन दोनों रूपों को मिला कर एक नई छवि गढता है। इसमें पूंजा और कमली के चरित्र भी इस तरह गढ़े गए हैं। अलबत्ता लेखक ने कुरिया का चरित्र गढ़ने में कल्पना की अतिरिक्त छूट ली है। कुरिया की ऊहापोह और अंतर्सघर्ष को लेखक कल्पना के सहारे खास दिशा देता ल है। कुल मिला कर इतिहास, दस्तावेज , लोककथाएं, लोकगीत, जनश्रृतियां आदि इस कृति में लेखक की कल्पना के साथ घुल मिल कर एक रचनात्मक आख्यानन का रूप ले लेते है।

हिंदी के कहानी-उपन्यासों में क्षेत्रीय भूगोल और प्रकृति की मौजूदगी कभी भी ध्यानाकर्षक और उल्लेखनीय हैसियत नही बना पाई, लेकिन इस रचना में ऐसा हुआ है। दक्षिणी राजस्थान का खास भूगोल और प्रकृति अपनी समग्रता यहां मौजूद हैं। यहां के पहाड़ों, नदी-नालों आदि का इतना सूक्ष्म और विस्तृत विवरण इस रचना में आया है कि लगता है जैसे लेखक वहीं का रचा-बसा हो। खास उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें प्रकृति मानवीय जीवन अलग नहीं, उसके साथ अविभाज्य रूप में मौजूद है। मानवीय सुख-दुख, द्वंद,और हास-परिहास यहां के धरती-आकाश, चांद-सूरज धूप-छाया, बादल-बरसात और तारों के साथ आते हैं। प्रकृति इसमें आदिवासियों के सुख-दुख के साथ अपना रूप और रंग बदलती लगती है। उपन्यास में एक जगह ओले गिरने से बना जीवन और का प्रकृति का संयुक्त दृश्य इस तरह है:
“इस दरम्यान चांद घटाओं से घिर चुका था। कुछेक तारे ही पूर्वी गोलार्द्व में टिमटिमा रहे थे। गांव के सर के ठीक ऊपर जोरदार बिजली कौंघी और बादलों की गड़गड़ाहट से सारा अंचल कांप उठा। इक्की-दुक्की बूंदें कहीं-कहीं गिरी तो गिरी, ओलों की बारिश आरंभ हो गई। लपलपाती विद्युत कौधं, घन-घर्जन और तड़ातड़ उपल वृष्टि ...।
वागड़ प्रदेश के इस अंचल की पहाड़ियों के चैन में खलल पड़ा, जंगल की शांत मुद्रा भंग हुई और गांव-गांव का बच्चा-बच्चा जाग गया। प्रौढ़ औरतों ने अपनी झौपडियों से काली हांडिया बाहर फैंकी। बुजुर्ग महिलाओं ने पत्थर की चक्की के पाटों को उल्टी दिशा में फिराया.....।“
ऐसा की एक प्राकृतिक दृश्य इस रचना में उस समय का है जब आदिवासियों में अन्याय और अयाचार के विरुद्व असंतोष और प्रतिकार की भावनाएं गहरा कर बाहर आने के लिए तैयार हैं:
“वागड़ प्रदेश के जंगलों में पलाश के पेड़ों की बेतरतीब शाखाएं फूलों के गुच्छों से लदी हुई थीं। पत्ते तो नाम के थे। दहकते अंगारों से सुर्ख फूल , जैसे जंगल में चारों और आग लगी हो। खेत-खलिहान सूने हो चुके थे। पतझड़ के बाद चैत में फूटी नन्ही कोंपलें अब किशोर हो गयी थीं। जंगल के बीच-बीच में यहां-वहां अमलतास के पेड़ अपने पीले फूलों को टहनियों के गर्भ में पाले हुए थे। सागौन के लम्बे दरख्त जंगल के पहरेदारों से प्रतीत हो रहे थे। इमली, महुआ, सरेस, बरगद, पीपल, जामून, आम के वृक्ष अपनी सघनता के कारण गम्भीर व शांत दिखायी दे रहे थे। मौसम का मिजाज गर्म होता जा रहा था।“

इतिहास और आख्यान के संतुलित और संयमित मेल से बनी इस रचना का आस्वाद पारंपरिक औपन्यासिक रचनाओं से अलग तरह का है। कुछ विधायी दकियानूसों को यह अच्छा नहीं लगेगा, पर उनकी बहुत चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अच्छी रचनाएं हमेशा अनुशासन तोड़ कर ही होती है।

समीक्ष्य पुस्तक: धूणी तपे तीर, साहित्य उपक्रम, जनवरी, 2008, पृष्ठ संख्या:376, मूल्य:100 रुपए
संस्कृति मीमांसा,मार्च-अप्रैल,2009 में प्रकाशित

Thursday 9 April 2009

जीवन की पुनर्रचना

अन्य कथेतर गद्य विधाओं में जीवनी सर्वाधिक प्राचीन है। पश्चिम में जीवनी लेखन बहुत पहले से शुरू हो गया था। युनानी जेनोफोन और प्लूटार्क तथा रोमन टैसिटस और सेयेटोनियस जैसे जीवनीकार वहां 1800 वर्ष पहले हो गए थे। आरंभ में जीवनियां विशिष्ट व्यक्तियों-राजाओं और धर्मगुरुओं की लिखी जाती थीं, लेकिन उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में इसमें बदलाव हुए। अब जीवनियां सामान्य व्यक्तियों की भी लिखी जाती हैं। भारतीय परंपरा में भी जीवनी राजप्रशस्ति, चरित वर्णन आदि रूपों में बहुत पहले से विद्यमान है। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजी साहित्य के संपर्क-संसर्ग के बाद यहां भी आधुनिक जीवनी लेखन की शुरुआत हुई। पश्चिम में जीवनी अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है।

जीवनी का आशय और अर्थ तय करने का काम स्वयं जीवनीकारों ने भी किया है और आलोचकों ने भी। दरअसल यह इतना स्पष्ट साहित्य रूप है कि इस संबंध में कोई खास विवाद नहीं है। जीवनी किसी व्यक्ति विशेश के जीवन का वृत्तांत है। अंग्रेजी में इसके लिए लाइफ और बायोग्राफी शब्दों का प्रयोग होता है। जीवनी में किसी व्यक्ति विशेश के व्यतीत जीवन की पुनर्रचना होती है। हैरी हुडनी, एडगर एलन पो आदि विख्यात लोगों के जीवनीकार कैनेथ सिल्वर मेन ने जीवनी को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ´´किसी अन्य व्यक्ति के जीवन की विश्वसनीय प्रमाणों वाली आख्यानात्मक नाटकीय प्रस्तुति की जीवनी कह सकते है।´´ कुछ साहित्य आलोचक जीवनी को साहित्य रूप मानने के विरुद्ध है। उनके अनुसार इसमें तथ्य और पत्रकारीय शैली का इस्तेमाल होता है। जीवनी का रूप जीवनीकार और लक्ष्य जीवन के संबंध पर निर्भर करता है। जीवनीकार जब जीवनी शुरू करता है, तो उसे खुद पता नहीं होता कि यह आगे जाकर क्या रूप ग्रहण करेगी। विख्यात जीवनीकार माइकेल हॉलरॉयड का कहना था कि ´´जीवनी एक ऐसी विधा है, जिसमें जीवनीकार आरंभ में चरित नायक से शादी तो कर लेता है, पर उसकी निभेगी कि नहीं, यह जीवनीकार को भी पता नहीं होता।´´ जीवनी की परिभाषा देने का काम हिंदी में भी हुआ है। बाबू गुलाबराय ने जीवनी में चरित्र वर्णन में कलात्मकता पर खास तौर पर जोर दिया है। उनके अपने शब्दों में ´´जीवनी लेखक अपने चरित नायक के अंतर-बाह्य स्वरूप का चित्रण कलात्मक ढंग से करता है। इस चित्रण में वह अनुपात और शालीनता का पूरा ध्यान रखता हुआ सहृयता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ अपने चरित नायक के गुण दोष मय सजीव व्यक्तित्व का एक आकर्षक शैली में उद्घाटन करता है।´´ इस तरह जीवनी किसी व्यक्ति विशेश के जीवन पर एकाग्र ऐसा साहित्य रूप है, जिसमें तथ्य, इतिहास, कला, कल्पना आदि सभी का योग रहता है।

जीवनकार लक्ष्य व्यक्ति के जीवन में जब कुछ खास देखता है, तभी वह उसे जीवनी के रूप में ढालने के लिए पे्ररित होता है। आम तौर पर लोगों का जीवन कमोबेश एक जैसा होता है। उनके दैनंदिन जीवन में कोई खास बात नहीं होती, लेकिन फिर भी मनुश्य मन के भीतर के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा जीवनकारों को जीवनी लिखने के लिए प्रवृत्त करती है। कथाकार अरुणप्रकाश के शब्दों में कहें तो ´´एक मनुष्य हर तरह का जीवन एक जन्म में नहीं जी सकता, इसीलिए वह दूसरों के जीवनानुभव में शिरकत करना चाहता है, क्योंकि वह यह भी जानता है कि रोजमर्रापन की पुनरावृत्ति के बावजूद हर मनुश्य में कुछ न कुछ विशिश्ट होता है। हर जीत और हार का रंग अलग-अलग होता है और रंग एक भी हुआ, तो रंगआभा अलग-अलग होती है।´´ दुनिया के सब लोगों की जीवनियां नहीं होती, और जिन लोगों के जीवनियां लिखी जाती हैं वे खास होते हैं। उनका जीवन समृद्ध और खास, मतलब लीक से हटकर होता है। वे पारंपरिक जीवन से हटकर अपने जीवन में कुछ ऐसा नया जोड़ते हैं, जो दूसरों के दैनंदिन जीवन से अलग और खास होता है।

आम तौर पर जीवनी में किसी व्यक्ति का संपूर्ण जीवन होता है, पर इसके अपवाद भी मिलते हैं। अक्सर जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को जीवनी के दायरे में लेता है। वह उसके जन्म और जन्म से पहले की परिस्थितियों से आरंभ करता है और क्रमश: उसके निधन और बाद के हालतों तक जाता है। इस तरह उसका लक्ष्य अपने चरित नायक के संपूर्ण जीवन की पुनर्रचना होता है। लेकिन यह कोई नियम नहीं है। जीवनी कई बार लक्ष्य व्यक्ति के जीवन काल में लिखी जाती है, तब उसमें संपूर्ण जीवन की पुनर्रचना संभव नहीं होती। कभी-कभी लक्ष्य व्यक्ति के जीवन का कोई भाग या खंड भी जीवनी का रूप ले लेता है। आरंभिक दौर में जीवनियों में व्यवस्था और अनुशासन होता था। जीवनीकार व्यक्ति के समग्र जीवन को रूपायित करते थे, लेकिन अब हालात बदल गए है। जीवनीकार अब लक्ष्य व्यक्ति के जीवन की पुनर्रचना में स्वच्छंद रहते हैं। वे व्यक्ति के जीवन के किसी एक या एकाधिक खंडों और पहलुओं को जीवनी का आधार बनाते हैं। नयी जीवनियों में लक्ष्य व्यक्ति का जीवन भी क्रमश: विकसित नहीं होता। अब कई जीवनीकार व्यक्तित्व को पहले प्रस्तुत कर फिर घटनाओं के संस्मरणों से उसे पुश्ट करते हैं। स्पष्ट है कि जीवनी में संपूर्ण जीवन आए, ऐसा कोई नियम नहीं है। यह जीवनीकार की दृष्टि और विवेक पर निर्भर है कि वह लक्ष्य व्यक्ति के जीवन से क्या ले और क्या छोड़ दे।

जीवनी में वस्तुपरकता बहुत आवश्यक तत्त्व है। जीवनी इस कारण इतिहास के निकट लगती है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन को तथ्यों को आधार पर गढ़ता है। तथ्यों पर निर्भरता ही जीवनी को विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाती है। अन्य साहित्यिक विधाओं में कल्पना का सहारा लिया जा सकता है, लेकिन जीवनी में वस्तुपरकता के बिना काम नहीं चलता। वस्तुपरकता तथ्यों से आती है इसलिए तथ्यों की अवहेलना या उनके साथ छेड़छाड़ से जीवनी की प्रमाणिकता संदिग्ध हो जाती है। कथाकार अरुणप्रकाश के अनुसार ´´वस्तुपरकता ही अच्छी जीवनी का सबसे बड़ा निकश है, जिसका निर्वहन प्रमाण, तर्क और प्रस्तुति में संतुलन के जरिए किया जाता है।´´ यह सही है कि जीवनी कुछ हद तक इतिहास है और उसकी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के लिए वस्तुपरकता जरूरी है, लेकिन अंतत: जीवनी एक साहित्य रूप है इसलिए इसे नीरस नहीं होना चाहिए। जीवनी में कुछ अंश तक कल्पना या कथातत्त्व भी चाहिए, लेकिन यह तथ्य के इदगिर्द ही रहे, तो अच्छा है। तथ्य जीवनी की रीढ है, लेकिन ´´केवल तथ्य किसी चरित नायक को जीवंत नहीं बना सकते। बल्कि कोरे तथ्य जीवनी को उबाउ बनाएंगे। इसके लिए जीवनीकार कुछ तथ्यों को छोड़ता ही नहीं, तथ्यों के अंबार में से सटीक तथ्य चुनता भी है। वह तथ्यों के क्रम में भी हेर-फेर करता है।´´

जीवनी में चरित्र-चित्रण का बहुत महत्व है। जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के अंतर्बाह्य, दोनों रूपों को उजागर करता है। यह आवश्यक है कि जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के शरीर, मुद्रा आदि के साथ उसमें अंतर्निहित भय, उर्जा, उल्लास और अवसाद को भी चित्रित करे। जीवनी में चरित्र का क्रमिक विकास होता है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के विभिन्न चरणों का क्रमश: इस तरह से वर्णन करता है कि उसका चरित्र निरंतर विकसित होकर अपनी अंतिम परिणति तक पहुंचता है। जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति की चारित्रिक विशेशताओं की केवल नामोल्लेख नहीं करता। वह घटनाओं के वर्णन से इन चरित्रिक विशेशताओं को उजागर करता है। पहले जीवनियां केवल महान् और सकारात्मक चरित्रों की लिखी जाती थी और जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति की लघुता और दोशों पर नहीं जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। जीवनीकार अब महानता के झांसे में नहीं आता, वह चरित नायक का शिकार करता है। आस्कर वाइल्ड ने जीवनीकारों के दृष्टिकोण में आए इस बदलाव की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि ´´पहले हम अपने नायकों को मानक बनाकर पेश किया करते थे। आधुनिक तरीका उन्हें अश्लील सिद्ध करने का है।´´ जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के चरित्र निर्धारण में कभी-कभी मनोविश्लेशण का तरीका काम में लेता है। शरतचंद्र के जीवन पर आधारित आवारा मसीहा में विष्णु प्रभाकर कहीं-कहीं ऐसा ही करते हैं।

स्व विवेक और स्वेच्छा से लिखी गई जीवनियां दबाव से लिखी गई जीवनियों की तुलना में अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय होती हैं। मध्यकाल और उससे पहले राजा, सामंत आदि अपने आश्रित रचनाकारों से अपनी प्रशस्तिपरक जीवनियां लिखवाते थे। यह काम लोभवश दबाव में होता था, इसलिए इनमें सच्चाई कम, अतिरंजना ज्यादा होती थीं। रासो और चरित रचनाएं इसी श्रेणी की रचनाएं हैं। स्व विवेक या स्वेच्छा से लिखी रचनाएं भी मध्यकाल और उससे पहले की कई हैं और इनका सम्मान भी खूब होता है। नाभादास की भक्तमाल ऐसी ही रचना है, जो मध्यकालीन संत-भक्तों के जीवन के संबंध में आधारभूत सामग्री उपलब्ध करवाती है। दबाव में जीवनी लिखने का काम अभी भी जारी है। राजनेता, उद्योगपति, क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म अभिनेता आदि की जीवनियां स्वविवेक से कम, दबाव में अधिक लिखी गई हैं।

लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के संबंध में जानकारी के स्रोत जितने ज्यादा और विविध होंगे, जीवनी उतनी ही असरदार बनेगी। जीवनीकार अक्सर इस संबंध में प्रकाशित अन्य पुस्तकों और लेखों का सहयोग लेता है। वह लक्ष्य व्यक्ति की डायरी, पत्राचार आदि का भी उपयोग करता है। वह उसके मित्र-परिचितों से साक्षात्कार-भेंट करता और उससे संबंधित नगरों-स्थानों आदि का भ्रमण करता है। यह लक्ष्य व्यक्तित्व पर निर्भर करता है कि उससे संबंधित सामग्री कहां मिलेगी। राजनीतिक व्यक्तित्वों का जीवन सार्वजनिक होता है इसलिए उनसे संबंधित दस्तावेज खूब मिल जाते हैं। गांधी- नेहरू के जीवन के संबंध में हमारे यहां दस्तावेज खूब मिलते हैं। साहित्यकारों का जीवन रहस्यमय होता है और उनके व्यक्तिगत जीवन के संबंध में जानकारियां कम मिलती हैं। जीवनीकार से यह अपेक्षित है कि वह अपनी स्रोत सामग्री का इस्तेमाल बहुत ध्यानपूर्वक करे। इसमें अनेक मोन सत्य और मुखर झूठ भरे होते है, जिनकी निर्ममता से छानबीन बहुत जरूरी है। अमृतराय ने कलम का सिपाही और विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा में स्रोत सामग्री की छानबीन और शोध बहुत अच्छी तरह से की। इसका उपयोग भी इन्होंने बहुत कौशल और रचनात्मक ढंग से किया है।

पश्चिम में जीवनी लेखन और उसकी स्वीकार्यता को लेकर हमेशा से माहौल उत्साह का रहा है, जबकि हमारे यहां इस संबंध में शुरू से ही गहरी उदासीनता है। विद्वान इसका कारण हमारी अलग संस्कृति को मानते है। दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दिलचस्पी अंग्रेजी समाज में पागलपन की हद तक है, जबकि भारतीय एक-दूसरे के निजी जीवन में ताकझांक को गलत मानते हैं। इसके अलावा भारतीय समाज मिथक-विदग्ध समाज है। इतिहास में उसकी दिलचस्पी बहुत कम है और जीवनी मिथक नहीं, इतिहास है। रासो और चरित रचनाओं को छोड़ दें तो हिंदी में जीवनी लेखन की शुरुआत उपनिवेशकाल में हुई। कार्तिक प्रसाद खत्री ने 1893 में मीराबाई का जीवन चरित्र लिखा। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पूर्व आधुनिक कालीन साहित्यकारों और धर्माचार्यों की जीवनियां लिखीं। इस युग को दो जीवनीकारों, रमाशंकर व्यास और देवीप्रसाद मुंसिफ का इस क्षेत्र में योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। व्यास ने भारतेंदु की साहित्यिक जीवनी लिखी, जबकि मुंसिफ ने मीरा, रहीम और सूरदास के अलावा बाबर, हुमायुं, शेरशाह, अकबर, राणा सांगा, बीकाजी, जैतसी, मानसिंह आदि की जीवनियां लिखीं। देवीप्रसाद मुंसिफ ने लगभग तीस जीवनियां लिखीं, लेकिन आलोचकों ने उनको कभी अपनी निगाह में नहीं लिया। हिंदी समाज में जीवनी को लेकर उदासीनता इस हद तक है कि साहित्यिक दृष्टि से मूल्यवान जीवनियां यहां कुल चार-पांच ही लिखी गई हैं। नवजागरणकालीन साहित्यकारों-प्रेमचंद, सुमद्राकुमारी चौहान और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पर क्रमश: अमृतराय की कलम का सिपाही, सुधा चौहान की मिला तेज से तेज और रामविलास शर्मा की निराला की साहित्य साधना नामक जीवनियां ही साहित्यिक महत्व की हैं। गहरी संबद्धता और मनोयोग से लिखी ये जीवनियां इन युगांतरकारी साहित्यकारों के जीवन और साहित्य की हमारी समझ को विस्तृत और गहरा करती है। विख्यात बंगला साहित्यकार शरतचंद्र के नाटकीय और घटनापूर्ण जीवन पर एकाग्र विष्णु प्रभाकर की आवारा मसीहा और कवि आलोचक मुक्तिबोध के जीवन संघर्ष पर आधारित विष्णुचंद्र शर्मा की मुक्तिबोध की आत्मकथा भी ऐसी ही उल्लेखनीय रचनाएं है।

Wednesday 11 March 2009

यादों से बुनी और बनी रचना

संस्मरण फिलहाल एक लोकप्रिय साहित्य विधा है। लोगों में संस्मरण लिखने की होड़ लगी हुई है। हिंदी में भी संस्मरण खूब लिखे जा रहे हैं। संस्मरणों की बढ़ती हुई लोकप्रियता पर टिप्पणी करते हुए विलियम जिंसर लिखते है कि ´´यह संस्मरण का युग है। बीसवीं सदी के अंत से पहले अमरीकी धरती पर व्यक्तिगत आख्यान की ऐसी जबर्दस्त फसल कभी नहीं हुई थी। हर किसी के पास कहने के लिए एक कथा है और हर कोई कथा कह रहा है।´´ हिंदी के रचनाकार भी संस्मरण लिखने में हाथ आजमा रहे है। विश्वनाथप्रसाद त्रिपाठी, काशीनाथसिंह आदि लेखकों ने हिंदी में संस्मरण विधा को नयी पहचान दी है।

संस्मरण, वर्तमान मे अतीत के बारे में लिखे जाते हैं। संस्मरण स्मृति पर आधारित होता है। संस्मरण लेखक अपने जीवन से संबंधित किसी घटना, व्यक्ति, अनुभव आदि की स्मृति के आधार पर पुनर्रचना करता है। संस्मरण अतीत और दोनों से संबंधित होता है। संस्मरण लेखक अतीत और वर्तमान के आधार पर अतीत की स्मृतियों को खोजता-खंगालता है और उनमें से किसी एक पर अपने को एकाग्र करता है। यह एकाग्रता व्यक्ति, घटना आदि किसी पर भी हो सकती है। संस्मरण में संपूर्ण जीवन नहीं होता। इसमें जीवन का कोई खंड या टुकड़ा ही आ पाता है। जीवन का कोई खास समय या घटना या व्यक्ति संस्मरण में उभरकर सामने आता है।

संस्मरण और सच्चाई में गहरा संबंध है। सच्चाई संस्मरण की पहचान है। पाठक संस्मरण में दिलचस्पी इसलिए लेते हैं, क्योंकि यह सच के करीब माना जाता है। संस्मरण में सच्चाई या यथार्थ स्मृति के माध्यम से आता है और कुछ लोगों का मानना है कि स्मृति में सच्चाई दब या कट-छंट जाती है इसलिए संस्मरण सच नहीं होता। स्मृति वर्तमान अतीत का स्मरण है इसलिए यह वर्तमान से आविष्ट और प्रभावित होती है और सच इसमें विकृत से जाता है। स्मृति और सच कथाकार अरुणप्रकाश के शब्दों में ´´एक दूसरे के रिश्तेदार जरूर है, पर ये जुड़वां संतानें तो कतई नहीं है।´´ स्मृति पूर्ण सत्य नहीं है इसलिए संस्मरण में सत्य नहीं, अक्सर सत्यांश होता है। विख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार एंथनी पॉवेल ने इसीलिए एक जगह लिखा है कि ´´संस्मरण कभी भी पूरी तरह सच नहीं हो सकते, क्योंकि बीती हुई हर बात, हर घटना, हर परिस्थिति को संस्मरण में शामिल करना संभव नहीं है।´´

संस्मरण सहित सभी कथेतर गद्य विधाएं अपनी वस्तुपरकता के लिए जानी जाती हैं। कथाप्रधान साहित्यिक विधाएं, जैसे कहानी, नाटक, उपन्यास आदि में कल्पना सर्वोपरि होती है, लेकिन संस्मरण पूरी तरह कल्पना पर निर्भर नहीं होते। संस्मरण में तथ्य और वस्तुपरकता न हो तो, उसका महत्व कम हो जाएगा। संस्मरण लेखक अपनी स्मृति के सहारे अतीत को इस तरह पुनर्जीवित करता है कि कुछ हद तक उसकी वस्तुपरकता बनी रहती है। यह सही है कि वर्तमान के राग-विराग और सरोकार संस्मरण में अतीत को पूरी तरह तथ्यात्मक और वस्तुपरक नहीं रहने देते, लेकिन पाठक फिर भी उसमें तथ्यों की तलाश करता ही है। संस्मरण लेखक का आत्म, उसका दृष्टिकोण अक्सर यथार्थ की वस्तुपरकता को प्रभावित करता है। यहीं कारण है कि दो भिन्न संस्मरणकार एक यथार्थ को कई बार अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। कुछ लोगों के अनुसार तो संस्मरण वस्तुपरक नहीं, आत्मपरक लेखन है।

संस्मरण कलात्मक कथा साहित्य की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन इसके शिल्प ढांचे का इस्तेमाल इनमें होता है। संस्मरण में रोचकता और पठनीयता बनाए रखने के लिए संस्मरण लेखक अक्सर कथा तत्त्वों का इस्तेमाल करता है। वह संवाद, नाटकीयता और भाशायी कौशल का इस्तेमाल करके संस्मरण की पाठकों के लिए रोचक और पठनीय बनाता है। उर्दू में इस्मत चुगताई और हिंदी में काशीनाथसिंह, विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी आदि के संस्मरणों में कथा तत्त्वों का खूब इस्तेमाल हुआ है। इस्मत के संस्मरण अपनी नाटकीयता और भाशायी कौशल के कारण बहुत रोचक और पठनीय हो गए हैं। काशीनाथसिंह के संस्मरणों में रोचकता का तत्व बहुत अधिक है। उनकी संस्मरण पुस्तक काशी का अस्सी आद्यंत पठनीय है। चरित्रांकन, वातावरण निर्माण आदि भी कथात्मक विधाओं के तत्व है, जिनका प्रयोग संस्मरणों में होता है। महादेवी के संस्मरणों में चरित्रांकन बहुत अच्छी तरह से हुआ है। यह सही है कि संस्मरण में तथ्य और यथार्थ जरूरी है, लेकिन कथात्मक विधाओं के संवाद, नाटकीयता, चरित्रांकन, भाशायी कौशल आदि तत्वों से इनमें रोचकता और पठनीयता आ जाती है।

संस्मरण का स्वरूप और चरित्र अब बहुत बदल गया है। कभी संस्मरण का उद्देश्य प्रेरणा होता था, विख्यात और महान व्यक्ति अपने जीवन के संस्मण पे्ररणा देने के लिए लिखते थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है। अब संस्मरण जीवन के अज्ञात प्रसंगों-प्रकरणों के अनावरण की विधा हो गई है। अब कई बार संस्मरण का उपयोग लोग दृश्य पर अपनी उपस्थिति को ध्यानाकर्षक बनाने के लिए भी करते हैं। वे लोग जो विमर्श में नहीं हैं, इसमें अपनी वापसी के लिए भी संस्मरण लिखते हैं। विख्यात लेखक देनियल हेरिस के अनुसार ´´संस्मरण खुद के हाशियाकरण से निबटने की कोशिश है।´´ हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका हंस में प्रकाशित मेरे विश्वासघात श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित संस्मरण कमोबेश ऐसे ही हैं। संस्मरण अब साहित्य की परिधि से निकल कर जीवन के दूसरे क्षेत्रों में पहुंच गए है। फिल्म अभिनेता, क्रिकेट खिलाड़ी, उद्योगपति और राजनेता भी अब अपने संस्मरण लिख रहे है।

संस्मरण ऐसी साहित्यिक विधा है, जिसका कहानी, उपन्यास, नाटक आदि से आदान-प्रदान और अंतर्क्रिया का रिश्ता है। आत्मकथा और डायरी तो इसकी सहोदर विधाएं हैं। आत्मकथा तो एक तरह से संस्मरण ही है। यह अवश्य है कि संस्मरण आत्मकथा की तुलना में बहुत छोटा होता है। कुछ लोग संस्मरण को आत्मकथा का फ्लैश कहते है। जीवनी भी संस्मरण की साथी विधा है, क्योंकि दोनों अतीत पर एकाग्र हैं। संस्मरण अपने संबंध में खुद लेखक लिखता है, जबकि जीवनी दूसरे के द्वारा लिखी जाती है। रेखा चित्र तो कभी-कभी संस्मरण जैसे ही लगते हैं। यों रेखाचित्र में स्टिल लाइफ होती है, लेकिन बहुत यह संस्मरण जैसा हो जाता है। डायरी पश्चिम की लोकप्रिय साहित्यिक विधा है, लेकिन हिंदी में अभी इसकी जड़ें मजबूत नहीं हुई हैं। यह भी संस्मरण की निकट विधा है, अलबत्ता इसका पृथक् अनुशासन है। यह संस्मरण की तुलना में लंबी होती है और इसमें लेखक वर्तमान के साथ आगे बढ़ता है।

हिंदी में शुरू से ही संस्मरण लिखे जाते रहे हैं। अन्य कथेतर गद्य विधाओं की तुलना में संस्मरण की हिंदी में समृद्ध परंपरा है। आरंभिक संस्मरण लेखकों में पदमसिंह शर्मा, जनार्दन प्रसाद द्विज और शांतिप्रसाद द्विवेदी हैं, जिनकी क्रमश: पदमराग (1929), चरित्र रेखा (1943) और पंच चिह्न (1946) नामक संस्मरण रचनाएं उल्लेखनीय हैं। हिंदी संस्मरण को पहचान महादेवी वर्मा ने दी। उनकी दोनों कृतियों-स्मृति की रेखाएं (1943) और अतीत चलचित्र (1941) को हिंदी जगत में व्यापक सम्मान मिला। मोहनलाल महतो वियोगी, प्रभाकर माचवे और विष्णु प्रभाकर ने संस्मरण लिखे हैं। आजादी के बाद संस्मरण लेखन में गति आई। इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम राजेन्द्र यादव, कृश्णा सोबती, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथसिंह और कशीनाथ सिंह ने किया है। कृष्णा सोबती की हम हशमत, राजेन्द्र यादव की औरों के बहाने, रवीन्द्र कालिया की सृजन के साथी और दूधनाथसिंह की लौट आ ओ धार नामक संस्मरण कृतिर्यों की साहित्यिक जगत में खूब चर्चा हुई है। हिंदी संस्मरण विधा को नए रूप और चरित्र के साथ इधर काशीनाथ सिंह ने प्रस्तुत किया है। उनकी रचना याद हो कि न याद हो और काशी के अस्सी ने संस्मरण के स्वरूप और आस्वाद को कुछ हद तक बदल दिया है। विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी की संस्मरण पुस्तक नंगातलाई का गांव की भी हिंदी में खूब चर्चा हुई है।

Tuesday 17 February 2009

चंद्रधर शर्मा गुलेरी होने का मतलब

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानियां हमारी विरासत का हिस्सा है। विरासत के साहित्य की आलोचना और मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि यह अपने समय से कितना आगे है। मतलब यह कि अपने समय के साहित्य की प्रचलित रूढ़ियों का अतिक्रमण कर इसने अपने को जीवंत और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए कथ्य, शिल्प, भाषा और तकनीक के स्तर पर कुछ नवीन और मौलिक संभव किया है या नहीं ? गुलेरी की साहित्यिक सक्रियता की अवधि कम है। उनका जन्म 1883 ई. में हुआ और 1922 ई. में उनका निधन हो गया। उन्होंने कुल तीन ही कहानियां लिखीं। पहली सुखमय जीवन 1911 ई. में भारत मित्र में छपी। दूसरी उसने कहा था, जो उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ कहानी है, 1915 ई. में छपी। उनकी तीसरी कहानी बुद्ध का कांटा है। यह हिंदी कहानी के विकास का आरंभिक समय था। प्रेमचंद इस समय सक्रिय थे, लेकिन उन्होंने अपनी श्रेष्ठ यथार्थदर्शी कहानियां बाद में लिखीं। 1915 ई. प्रकाशित पंच परमेश्वर कहानी उनकी कहानी-कला के उत्कर्ष की प्रतिनिधि रचना नहीं है। इससे पूर्व की उनकी कहानियां बहुत अनगढ़ और अपरिपक्व कहानियां हैं। किशोरीलाल गोस्वामी की इंदुमती रामचंद्र शुक्ल की ग्यारह वर्ष का समय और बंग महिला की दुलारी बाई जैसी कहानियां सही मायने में कहानियां नहीं हैं। दरअसल इनका ढ़ांचा पारंपरिक है- इनमें अलौकिक चमत्कार, कूतुहल, शिक्षा-उपदेश, त्याग-बलिदान और प्रेम-वियोग आदि के वृत्तांत हैं। सबसे खास बात यह है कि कहानीकार की मौजूदगी इनमें बहुत मुखर है।

गुलेरी की कहानी-कला अपने समय इस कहानी-कला से आगे की है। गुलेरी पर भी अपने समय का प्रभाव है-उसकी प्रचलित रूढ़ियों का साफ प्रभाव उनकी पहली कहानी सुखमय जीवन पर है। यह कहानी वैसी ही है जैसी उस दौर की अन्य कहानियां हैं। यह कहानी नहीं, वृत्तांत भर है-इसमें शिल्प और तकनीक का कोई मौलिक नवोन्मेष नहीं है। लेकिन उन्होंने अपनी अगली कहानी उसने कहा था में अपने समय को बहुत पीछे छोड़ दिया है। शिल्प और तकनीक का जो उत्कर्ष प्रेमचंद ने अपने जीवन के अंतिम चरण में 1936 ई. के आसपास कफन और पूस की रात में अर्जित कि नहीं या है, गुलेरी ने इस कहानी में उसे 1915 ई. में ही साध लिया। यह यों ही संभव नहीं हुआ। इसे संभव किया गुलेरी के असाधारण व्यक्तित्व ने। गुलेरी 1915 ई में महज 32 वर्ष के थे। युवा होने के कारण उनमें नवाचार का साहस था। उम्र-दराज आदमी जिस तरह की दुविधाओं और संकोचों से घिर जाता है, गुलेरी उनसे सर्वथा मुक्त थे। अंग्रेजी कहानी इस समय अपने विकास के शिखर पर थी और उसमें प्रयोगों की भी धूम थी, जिनसे गुलेरी बखूबी वाकिफ थे। कम लोगों को जानकारी है कि गुलेरी उपनिवेशकाल में अंग्रेजों द्वारा सामंतों की शिक्षा के लिए अजमेर में स्थापित विख्यात आधुनिक शिक्षण संस्थान मेयो कॉलेज में अध्यापक थे और आधुनिक अंग्रेजी साहित्य के अच्छे जानकार थे। दरअसल नवाचार के साहस और आधुनिक अंग्रेजी साहित्य की विशेषज्ञता के कारण ही गुलेरी अपने समय से आगे की कहानी लिख पाए।

टॉमस मान एक जगह कहते हैं- ´´घटना आपके साथ हो सकती है, हुई होगी। बहुत-सी घटनाएं मेरे साथ होती हैं, वे आर्ट नहीं हैं। आर्ट तो मैं उसे अपनी प्रक्रिया से गुजारकर बनाऊंगा।´´ गुलेरीजी की कहानी-कला की खासियत यही है। पहले की और उनके अपने समय की कहानियों में घटनाएं हैं-उनके ब्यौरे और वृत्तांत हैं। गुलेरी पहली बार घटनाओं को एक प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का-कहानी का रूप देते हैं। यह हिंदी कहानी में एक तरह से पहली बार होता है। गुलेरी घटनाओं को आर्ट का रूप देने-कहानी बनाने के लिए जिस प्रक्रिया से गुजारते हैं उसमें सबसे पहला काम वे यह करते हैं कि वे अपने कहानीकार को अदृश्य कर देते हैं। उनकी कहानी में कहानीकार अपनी तरफ से बहुत कम बोलता है। उसमें दृश्य आते हैं, संवाद आते हैं, वस्तुस्थितियां आती हैं और कभी छोटी-मोटी टीप से कहानीकार इनको आपस में जोड़ देता है। उसने कहा था इस लिहाज से निर्दोष कहानी है। कहानीकार यहां लगभग अनुपस्थित है। वह वस्तुस्थिति को जीवंत दृश्यों के चाक्षुष बिंबों साक्षात कर देता है। इस कहानी का नायक बालक लहनासिंह जब सुनता है कि “कुड़माई हो गई” तो वह विचलित हो जाता है, लेकिन कहानीकार उसके इस विचलन के कारण होने वाले क्षोभ का यह कहकर वर्णन नहीं करता कि उसे क्रोध आ गया या वह परेशान हो गया। वह इस विचलन या क्षोभ को चाक्षुष बिम्बों से सम्मूर्त करता है। वह लिखता है- ´´रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया व एक छबड़ीवाले की दिनभर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले ठेले में दूध उड़ेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई, तब कहीं घर पहुंचा।´´ खास बात यह है कि इस कहानी में कहानीकार की अपनी टीप-टिप्पणियां गिनी-चुनी ही हैं। कहानी का दूसरा और तीसरा भाग तो संवादों से आगे बढ़ता है। कहानी का आरंभ, जिसमें 1890 ई. के अमृतसर शहर के बाजार का दृश्य है, बहुत जीवंत बन पड़ा है।

कहानी में वृत्तांत की तकनीक बहुत पुरानी है। गुलेरी ने खुद सुखमय जीवन में इसको काम में लिया था। पहले यह हुआ, उसके बाद यह और अंत में यह। गुलेरी को वृत्तांत को प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का रूप देना था, इसलिए उन्होंने यह तकनीक छोड़कर दूसरी अधिक कारगर तकनीक, जिससे घटना अपनी यथार्थ नाटकीयता में खुल जाए, अपनायी। उसने कहा था में उन्होंने घटनाओं की यथार्थ निरंतरता के क्रम को बदल दिया। सबसे पहले उन्होंने बालक लहनासिंह और आठ वर्षीय बालिका के बीच बने अस्पष्ट रागात्मक संबंध को उठाया। कहानी का दूसरा भाग पच्चीस वर्ष बाद फ्रांस की भूमि पर युद्ध के मोर्चे पर डटे सिक्ख सिपाहियों की बातचीत से शुरू होता है। इनमें सुबेदार हजारासिंह, उसका बेटा बोधासिंह और लहनासिंह शामिल हैं। लहनासिंह मोर्चे पर स्वयं कष्ट सहकर बोधासिंह और हजारासिंह के कुशल क्षेम के लिए समर्पित है। कहानी के तीसरा भाग महत्वपूर्ण है। यहीं आकर कहानी का विकास होता है-जर्मन सैनिकों के हमले से घायल लहनासिंह बीमार बोधासिंह और उसके पिता सूबेदार हजारासिंह को मोर्चे से वापस भेज देता है। अब घायल और मरणासन्न लहनासिंह अर्धचेतन अवस्था में लगभग सपने में अतीत को समरण करता है। यहीं आकर पहली बार पाठक को पता चलता है कि अमृतसर बाजार की आठ वर्षीय बालिका, जो अब सूबेदार हजारासिंह की पत्नी और बोधासिंह की मां है, को लहनासिंह ने एक भेंट में दोनों की रक्षा करने का वचन दिया था। कहानी घटनाओं की निरंतरता में आए व्यवधान से रोचक और नाटकीय हो जाती है। उसका उत्कर्ष इस व्यवधान से और पुष्ट और प्रभावी हो जाता। सुबेदार की पत्नी होरों से लहनासिंह की भेंट की घटना कहानीकार फ्लेशबैक पद्धति से बयान करता है। यह घटना फ्लेशबैक से आयी हुई होकर भी घायल और मरणासन्न लहनासिंह के अर्धचेतन अवस्था में निकले संवादों में गुंथकर आर्ट का रूप ले लेती है। हिंदी कहानी में फ्लेशबैक का भी यह शायद पहला इस्तेमाल है।

ब्यौरों या विवरणों की भाषा में जान नहीं होती। अक्सर वे अन्य व्यक्ति का कथन या बयान होते है। गुलेरी की कहानी उसने कहा था में ब्यौरे नहीं हैं। इसमें चाक्षुष बिंब है, इसमें संवाद और संवादों से सम्मूर्त होती वस्तुस्थितियां हैं, इसलिए इसकी भाषा में भी जान है। इसमें जीवन की हलचल और जीवन का ठंडा-गर्म है। गुलेरी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के गुलेर गांव के रहने वाले थे, इसलिए अमृतसर की संस्कृति और भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। उसने कहा था की जान इसमें विन्यस्त पंजाबी भाषा और उसका मुहावरा है। छोटे-छोटे वाक्यों वाली बोलचाल की, रोजमर्रा व्यवहार की पंजाबी जबान के छौंक ने इस कहानी को बहुत असरदार बना दिया है। इस कहानी की खड़ी बोली में यह मुहावरा इस तरह घुलमिलकर या रच-बसकर आया है कि उसके पंजाबी होने का अलग से अहसास ही नहीं होता।

प्रेम उदातीकृत रूप में गुलेरी के पहले की और उनके समय की कई कहानियों मे आया था। गुलेरी की खासियत यह है कि उन्होंने इसे प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का रूप दिया। यह आर्ट कहानी की आर्ट थी और हिंदी में इसे पहली बार इसे गुलेरी ने संभव किया।

डेली न्यूज,15फरवरी,2009 के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग में प्रकाशित

Wednesday 21 January 2009

दास्तान-ए-यायावरी

आधुनिक कथेतर गद्य विधाओं में यात्रा वृत्तांत भी प्राचीन साहित्यिक विधा है। समय के साथ इसके स्वरूप और चरित्र में बदलाव होते रहे हैं। इतिहास, आत्म चरित्र आदि के प्रति अनास्था और उदासीनता के कारण भारत में यात्रा वृत्तांतों की समृद्ध और निरंतर परंपरा नहीं मिलती। विश्व के अन्य देशों में स्थिति इससे भिन्न है। वहां यात्रा और उसके अनुभवों को लिपिबद्ध करने का उत्साह है। फाहियान, ह्वेत्सांग, इब्न बतूता, अल बरूनी, मार्केपोलो बर्नियर आदि कई साहसी यात्री हुए हैं, जिन्होंने दूरस्थ देशों और स्थानों की अपनी यात्राओं के रोमांचक वृत्तांत लिखे। आज ये वृत्तांत धरोहर की तरह हैं, जिनसे हमें अपने अतीत समझने में मदद मिलती है। यों तो हमारे देश में रामायण, हर्ष चरित्र, कादंबरी आदि में यात्रा वृत्तांत के लक्षण मिल जाएंगे, लेकिन हिंदी में सही मायने में यात्रा वृत्तांत की शुरुआत उपनिवेशकाल में हुई। अंग्रेजी साहित्य के संपर्क-संसर्ग से हिंदी में साहित्यिक यात्रा वृत्तांत लिखे जाने लगे और धीरे-धीरे इनका विधायी ढांचा भी अस्तित्व में आया।

यात्रा वृत्तांत क्या है, इसे लेकर कई धारणाएं मौजूद हैं। कुछ लोगों के लिए यह आख्यान है, कुछ लोग इसे वृत्तांत कहते हैं, जबकि कुछ अन्य के अनुसार यह भी एक किस्म का संस्मरण है। यात्रा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। अज्ञात के प्रति मनुष्य मन में स्वाभाविक जिज्ञासा है, जो उसे नए और दूरस्थ स्थानों की यात्रा के लिए प्रेरित करती है। मनुश्य यात्राएं करता है और यात्रा के अपने अनुभवों को लिपिबद्ध भी करता है, जो यात्रा वृत्तांत या यात्रा आख्यान कहे जाते हैं। लेखक अपने विश्वास और धारणाओं के साथ यात्रा पर निकलता है और नयी जगहों और लोगों के बीच जाता है। इस तरह यात्रा धारणाओं और विश्वासों में उथल-पुथल और अंतर्क्रिया का कारण बनती है। यात्री इस उथल-पुथल और अंतर्क्रिया की पहचान कर दर्ज करता है। यात्रा वृत्तांत की परिभाषा करते हुए कथाकार अरुणप्र्रकाश लिखते हैं कि ´´यात्रा आख्यान यात्रा के क्रम में हुई घटनाओं, दृश्यों और यात्री के इन अनुभवों के प्रति निजी भावनाओं का वर्णन है।´´ डॉ. रघुवंश एक साहित्यिक विधा के रूप में यात्रा वृत्तांत का संबंध उसके लेखक की सौंदर्य दृष्टि से जोड़ते हैं। उनके अनुसार सौंदर्य बोध की दृष्टि से उल्लास की भावना से प्रेरित होकर यात्रा करने वाले यायाकर एक प्रकार से साहित्यिक मनोवृत्ति के माने जा सकते हैं और उनकी मुक्त अभिव्यक्ति को यात्रा वृत्तांत कहा जाता है। इस तरह यात्रा वृत्तांत उसके लेखक का अंतरंग और बहिरंग, दोनों होता है। यात्री वृत्तांत में अपने बहिरंग को अपने अंतरंग के साथ हमारे सामने रखता है। कहा जा सकता है कि ´´यात्रा वृत्तांत नई, खुलती हुई दुनिया, अनजान लोगों-समाजों-सभ्यताओं-संस्कृतियों-जीवन शैलियों को स्वयं में समेटता है पर लेखक के निजी विकास का भी आईना होता है।´´

वस्तुपरकता यात्रा वृत्तांत की जान है। यात्रा वृत्तांत में लेखक जो देखता-खोजता है, उसका यथातथ्य वर्णन करता है। यात्रा वृत्तांत भी यात्रा के बाद स्मृति के आधार पर लिखे जाते हैं, इसलिए यात्री यात्रा के दौरान तथ्यों को डायरी, नोट बुक आदि में दर्ज कर लेता है। संस्मरण में जो आत्मपरकता होती है या जो कल्पना का पुट होता है, यात्रा वृत्तांत में नहीं होता। इसमें लेखक को अपने स्मृति को वस्तुपरक बनाए रखना पड़ता है। वह सजग रहकर अपने आत्म को स्मृति पर हावी होने से रोकता है। वस्तुपरक होने के कारण यात्रा वृत्तांत में कल्पना के लिए कोई जगह नहीं है। कल्पना कई बार यात्रा वृत्तांत में इस्तेमाल होती है, लेकिन उसकी भूमिका इसमें आटे में नमक की तरह ही है। यात्रा वृत्तांत में कल्पना यथार्थ को विस्थापित नहीं करती। कुछ लोग यात्रा वृत्तांत को उसकी तथ्य निर्भरता और वस्तुपरकता के कारण साहित्य नहीं मानते। विख्यात लेखक मेरी किंग्सले ने एक जगह लिखा भी है कि "यात्रा आख्यान की पुस्तक से कोई साहित्य की अपेक्षा नहीं करता।"

यात्रा वृत्तांत के लेखक का जीवन प्रति नजरिया अक्सर बहुत मस्ती का और फक्कडना होता है। एक ही प्रकार के रोजमर्रा जीवन से उसे ऊब होती है और स्थिर प्रकार का जीवन उसे बांधता है। यह बात कमोबेश सभी घुमक्कड़ यात्रा वृत्तांत लेखकों ने स्वीकार की है। विख्यात घुम्मकड़ लेखक राहुल सांस्कृत्यायन के अनुसार ´´ जिसने एक बार घुमक्कड़ धर्म अपना लिया, उसे पेंशन कहां, उसे विश्राम कहां ? आखिर में हडि्डयां कटते ही बिखर जाएंगी। आजीवन यायावर रहे अज्ञेय ने भी यही बात दूसरे शब्दों में कही है। वे लिखते है, ´´यायावर को भटकते हुए चालीस बरस हो गए, किंतु इस बीच न तो वह अपने पैरों तले घास जमने दे सका है, न ठाठ जमा सका है, न क्षितिज को कुछ निकट ला सका है... उसके तारे छूने की तो बात ही क्या।...यायावर न समझा है कि देवता भी जहां मंदिर में रूके कि शिला हो गए, और प्राण संचार की पहली शर्त है कि गति:गति: गति।´´ यात्रा वृत्तांत का रूपबंध निबंध के रूप बंध जैसा होता है, लेकिन कथात्मक गद्य विधाओं के रूप बंध के कुछ तत्त्व भी इसमें इस्तेमाल किए जाते हैं। यात्रा वृत्तांत का रूपबंध वस्तुपरक और तथ्यात्मक होता है और कभी-कभी इसमें विवरण आत्मपरक भी होते हैं, लेकिन तथ्य विमुख प्राय: नहीं होते। सही मायने में यात्रा वृत्तांत एक तरह का आईना है। ´´यात्रा के सुख-दुख, उसकी विश्वसनीयता के उपकरण और सादा बयानी उसका हुनर है।´´ यात्रा वृत्तांत के रूपबंध में कथात्मक गद्य विधाओं की नाटकीयता, कुतूहल आदि तत्त्व भी प्रयुक्त होते हैं, लेकिन यह आवश्यक है कि इनके इस्तेमाल से यथार्थ में विकृति नहीं आए। यात्रा वृत्तांत का रूपबंध जब कथात्मक होने लग जाए, तो समझना चाहिए कि लेखक भटक गया है। आधुनिककाल में नहीं, पर पहले कथात्मक विधाओं वाले रूपबंध में भी यात्रा वृत्तांत लिखे गए हैं, लेकिन इनको बाद में वृत्तांत की जगह कथात्मक आख्यान ही माना गया है। यात्रा वृत्तांत एकाधिक शैलियों और रूपों में लिखे गए हैं। कुछ यात्रा वृत्तांत ऐसे हैं, जिनको यात्रोपयोगी साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। इनमें स्थानों और देशों के संबंध विस्तृत और उपयोगी जानकारियां दी गइ हैं। राहुल सांस्कृत्यायन की हिमालय परिचय और मेरी यूरोप यात्रा ऐसी ही रचनाएं हैं। इनसे अलग अज्ञेय की अरे यायावर रहेगा याद और निर्मल वर्मा की चीड़ों पर चांदनी जैसी रचनाओं में महज जानकारियों से आगे इनके लेखकों की अंतर्यात्रा भी दिखाई पड़ती है।

हिंदी में यात्रा वृत्तांत लेखन की जड़ें बहुत मजबूत और गहरी नहीं हैं। ´कुछ गिनती के लेखक और थोड़ी सी किताबे´ ही इस संबंध में मौजूद हैं। हिंदी में इस दिशा में पहल भारतेंदु हरिश्चंद्र 1877 में दिल्ली दरबार दर्पण लिखकर की। बाद में बाबू शिपप्रसाद गुप्त, मौलवी महेश प्रसाद, रामनारायण मिश्र और सत्यव्रत परिव्राजक ने भी यात्रा वृत्तांत से मिलती-जुलती कुछ रचनाएं लिखीं। इस दिशा सर्वाधिक उल्लेखनीय काम राहुल सांस्कृत्यायन ने किया। उन्होंने खूब देशाटन किया और तत्सम्बंधी अपने-अपने अनुभवों और विवरणों को घुमक्कड़ शास्त्र और वोल्गा से गंगा नामक रचनाओं में लिखा। अज्ञेय भी घुमक्कड़ थे-एक बूंद सहसा उछली और अरे यायावर रहेगा याद उनके यात्रावृत्तों के प्रसिद्ध संकलन हैं। एक आधुनिक भारतीय मन की चिंता और आत्मान्वेषण इन रचनाओं की खासियत है। रघुवंश के यात्रावृत्त संकलन हरी घाटी की भी पांचवें-छठे दशक में सराहना हुई। आजादी के बाद इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम निर्मल वर्मा ने किया। चीड़ों पर चांदनी और धुंध से उठती धुन उनके यात्रावृत्तों के प्रसिद्ध संकलन हैं। धुंध से उठती धुन में ऐसे यात्रावृत्त हैं, जिनमें भारतीय सभ्यता और संस्कृति को आधुनिक निगाह से समझने की कोशिश की गई है। हिमालय भारतीय रचनाकारों को अक्सर अपनी ओर आकृष्ट करता रहा है। हिमालय की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से रूबरू करवाने वाले यात्रावृत्तों की श्रृंखला स्फीति में बारिश, किन्नर >धर्मलोक और लद्दाख राग-विराग नाम से हिंदी में कृष्णनाथ ने लिखी।

Sunday 4 January 2009

अपना फसाना मतलब आत्मकथा

आत्मकथा भी अन्य गद्य विधाओं की तरह आधुनिक युग की देन है। युग-निर्माता तथा युगांतरकारी व्यक्तियों को जानने-समझने में आत्मकथाएं सब से अधिक मदद करती हैं। इन के द्वारा हम उन व्यक्तियों के निजी जीवन के आत्म-संघर्ष को, उनके समय की ऊहापोह और उथल-पुथल को जान सकते है। उनके अनुभवों से हम अपने समय और समाज को सही दिशा दे सकते हैं। आत्मकथा नयी विधा है, लेकिन अन्य गद्य विधाओं की तरह इसका भी एक विधायी अनुशासन और स्वरूप बन गया है। व्यक्ति और समाज के जीवन में बढ़ती हुई जटिलताओं से रूबरू होने के लिए रचनाकार समय-समय पर इस विधायी अनुशासन को तोड़ते भी रहते हैं।

आत्मकथा आत्मकथाकार द्वारा लिखा गया अपने जीवन का वृत्तांत है। जब व्यक्ति स्वयं अपने जीवन के संबंध में व्यवस्था और विस्तार से लिखता है, तो ऐसी रचना को आत्मकथा कहा जाता है। यह एक तरह से स्वलिखित जीवन-चरित्र और अपनी जीवन कहानी है। यह किसी व्यक्ति द्वारा लिखी गई अपनी जीवनी है। आत्मप्रकाशन की दूसरी साहित्यिक विधाओं-संस्मरण, डायरी, पत्र आदि से भी आत्मकथा का गहरा संबंध है। इन सभी रूपों का अपना अलग-अलग स्वरूप और अनुशासन है, लेकिन इन सभी में आत्म की मुखर उपस्थिति जरूर रहती है, इसलिए ये आत्मकथा से बहुत दूर और अलग नहीं हैं।

आत्मकथा सचेत भाव से लिखी जाती है, इसलिए इसका कोई प्रयोजन जरूर होता है। कुछ महान व्यक्ति आत्मकथा इसलिए लिखते हैं कि वे अपने व्यतीत जीवन का निर्मम और तटस्थ भाव से आत्मविश्लेशण कर सकें। वे ऐसा करके अपने अतीत का विश्लेशण और मूल्यांकन करते हैं। वे देखते हैं कि उन्होंने अपने अतीत में जो निर्णय लिए, जो काम किए, वे समय की कसौटी पर कितने खरे उतरे। नेहरू ने अपनी आत्मकथा मेरी कहानी यही सोचकर लिखी। इसकी प्रस्तावना में उन्होंने लिखा, ´´इस किताब को लिखने का खास मकसद यह था.....मैं पिछले दिनों हिंदुस्तान की उन घटनाओं का विवेचन भी कर लेना चाहता था, जिनसे मेरा ताल्लुक रहा है, ताकि उनके बारे में स्पष्टॅता के साथ सोच सकूं। आत्मजिज्ञासा के भाव से मैंने इसे शुरू किया और बहुत हद तक यही बराबर जारी रखा है।´´

आत्मकथा लिखने के पीछे कहीं यह मंशा भी रहती है कि अन्य लोग इससे पे्ररित होकर अपने जीवन को बेहतर ढंग से गढ सकें। रवीन्द्रनाथ ने लिखा भी है कि ´´महान व्यक्तियों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व आम आदमी के लिए दिशा-बोध का काम करता है।´´ अक्सर ऐसा होता भी है। हम अपने जीवन के भीतर इस तरह डूबे हुए रहते हैं कि उसकी बागडोर पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं होती। दूसरों के जीवन को हम अपेक्षाकृत तटस्थ भाव से देखते हैं, इसलिए उसके मोड़-तनावों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए इस समझ का उपयोग कर सकते हैं। यों तो हर जीवन विशिष्ट है। कोई जीवन किसी का आदर्श नहीं होता, लेकिन उस महान जीवन को दृश्टांत मानकर प्रेरणा तो ली ही जा सकती है। महात्मा गांधी ने इसीलिए अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ´´कोई मेरे लेखों को प्रमाणभूत न समझे। मैं तो सिर्फ यह चाहता हूं कि उनमें बताए प्रयोगों को दृष्टांत रूप मानकर सब अपने-अपने प्रयोग यथाशक्ति और यथामति करें। महान साहित्यकारों ने केवल कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए भी आत्मकथाएं लिखी हैं।

आत्मकथा की कुछ विधायी खासियतें भी है। आत्मकथा में आत्म और उसका संघर्ष तो अपेक्षित है ही। आत्मकथा इतिवृत्तात्मक वृत्तांत भर नहीं होती। जैसे व्यक्ति का जीवन सीधी रेखा नहीं होता उस की कथा भी सीधी, सरल और सपाट नहीं होती। जीवन में निर्णय-अनिर्णय, दुविधा-संकोच और सुख-दुख की उथल-पुथल चलती रहती है। आत्मतत्त्व निरंतर सक्रिय रहता है। स्व का यह अंत: संघर्ष आत्मकथा में आना चाहिए। इसका आशय यह नहीं है कि घटनापूर्ण और वस्तुमय बाह्य जीवन इसमें नहीं आता। दरअसल अंत: संघर्ष बाह्य जीवन में ही अभिव्यक्त होता है। आत्मकथा में आत्मसंघर्ष के साथ-साथ कथा भी जरूरी है। आत्मकथाकार को अपना जीवन-वृत्तांत कुछ इस तरह बयान करना चाहिए कि पाठक को उसमें कहानी जैसा मजा आए। मतलब यह कि उसमें कहानी का जादू- कुतूहल और रोचकता होनी चाहिए। लंबे विश्लेशण-विवेचन और घटनाओं के ब्यौरे आत्मकथा को दस्तावेजी बना देते हैं। उर्दू की विख्यात कथाकार इस्मत चुगताई की आत्मकथा कागजी है पैरहन इस दृष्टि से एक आदर्श आत्मकथा है। इसमें जीवंत आत्मसंघर्ष को जादुई कथाविधान में बयान किया गया है।

आत्मकथा लिखते समय पूरी तरह आत्मनिरपेक्ष बने रहना मुश्किल काम है। गांधीजी ने इसलिए इसे तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन कर्म कहा है। अक्सर आत्मकथाकार सचेत रहकर आत्मकथा लिखते समय उन प्रसंगों-घटनाओं का जिक्र नहीं करते, जो खास समय और समाज में खराब मानी जाती हैं। कभी-कभी जब उनका आत्म प्रबल होता है तो यह प्रबलता आत्ममुग्धता की तरफ जाती है। आत्ममुग्धता से किया हुआ कोई भी विश्लेशण और मूल्यांकन सही नहीं होता। अहम की प्रबलता आम बात है। इसी भय से क्रांतिकारी और चिंतक एम.एन. राय ने अपनी आत्मकथा ही नहीं लिखी।

आत्मकथा और संस्मरण में अंतर है। आत्मकथा एक दीर्घकाय स्वलिखित जीवन-वृतांत है, जबकि संस्मरण घटना या व्यक्ति पर एक एकाग्र छोटी रचना है। आत्मकथा में स्व केन्द्र में है। यदि इसमें इतर भी है तो पूरी तरह इस स्व से संबद्ध और इसको व्यक्त करने के लिए है, जबकि संस्मरण में इतर, मतलब दूसरा प्रमुख है। जीवनी किसी महापुरूश व्यक्ति पर लिखी किसी अन्य व्यक्ति की रचना है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के संबंध में विभिन्न स्रोतों से जानकारियां एकत्र करता है और उन्हें व्यवस्थित रूप देकर उस व्यक्ति की जीवनी लिखता है। डायरी में दैनंदिन की घटनाओं का अंकन किया जाता है। इसमें धटनाओं पर तत्काल प्रतिक्रिया होती है। डायरी आत्मपरक ही हो, यह भी जरूरी नहीं है। आधुनिक जीवन जैसे-जैसे जटिल होता जा रहा है, आत्मकथा, संस्मरण, डायरी आदि के विधागत दायरे टूटते प्रतीत हो रहे हैं। इधर हिंदी में ऐसी कई रचनाएं आ गई हैं, जिन्हें किसी विधायी चौखटे में नहीं रखा जा सकता। गगन गिल की रचना दिल्ली में उनींदे इसका अच्छा उदाहरण है।

हमारे यहां आत्मकथाएं मुख्यतया आधुनिककाल में लिखी गई। आधुनिक हिंदी का विकास बीसवीं सदी में हुआ और आधुनिक शिक्षा का माध्यम तो यह आजादी के बाद बनी, इसलिए आजादी के आंदोलन में सक्रिय कुछ महापुरुषों ने अपनी आत्मकथाएं अंग्रेजी में भी लिखीं। हिंदीतर भारतीय भाशाओं में उर्दू, बंगला, पंजाबी, मराठी और कन्नड़ आदि में भी आत्म कथाएं लिखी गईं। राजनेताओं द्वारा लिखी गई आत्मकथाओं में महात्मा गांधी की सत्य के प्रयोग, जवाहरलाल नेहरू की मेरी कहानी, राजेन्द्र प्रसाद और अब्दुल कलाम आजाद की आत्मकथाएं खासतौर से लोकप्रिय हुई हैं। अन्य राजनेताओं में राधाकृष्णन, जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई की आत्मकथाएं प्रकाशित हुई हैं। विख्यात क्रांतिकारियों में से सुभाषचंद बोस, गणेशशंकर विद्यार्थी और रामप्रसाद बिस्मिल ने भी अपनी आत्मकथाएं लिखी हैं। हिंदीतर भारतीय भाषाओं में बंगला में लिखित रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा जीवन स्मृति, उर्दू में लिखित इस्मत चुगताई की कागजी है पैरहन और अमृता प्रतीम की रसीदी टिकट का विशेश महत्व है। हिंदी में जैन कवि बनारसीदास की अर्धकथा की गणना पहली आत्मकथा के रूप में होती है। आधुनिककाल के प्रारंभिक चरण में भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कुछ आप बीती-कुछ जग बीती, स्वामी श्रद्धानंद की कल्याण पथ का पथिक, पांडेय बेचन शर्मा की अपनी खबर और शिवपूजन सहाय की वे दिन वे लोग, जैसी आत्मकथाओं के नाम लिए जा सकते हैं। आगे चलकर आत्मकथा-लेखन में प्रौढ़ता आई। राहुल सांकृत्यायन ने विस्तार से मेरी जीवन यात्रा नाम से अपनी आत्मकथा लिखी। कवि हरिवंशराय बच्चन ने चार खंडों-क्या भूलूं, क्या याद करू, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक में अपनी आत्मकथा लिखी, जो काफी लोकप्रिय हुई। हिंदी के कुछ साहित्यकारों, अज्ञेय, फणीश्वरनाथ रेणु, हरिशंकर परसाई ने व्यवस्थित आत्मकथाएं तो नहीं लिखीं, लेकिन यहां-वहां अपना आत्म-वृत्तांत लिखा, जो बाद में संकलित होकर प्रकाशित हुआ।