Saturday 19 April 2008

राजस्थान में 1857 का विद्रोह

1857 का देशव्यापी विप्लव राजस्थान में भी फैला, लेकिन बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली आदि प्रांतों की तुलना में यहां के हालात अलग किस्म के थे। ब्रिटिश शासित अजमेर-मेरवाड़ा को छोड़कर राजस्थान की सभी रियासतों का आतंरिक शासन सामंत शासकों के हाथों में था। ये सभी रियासतें अलग-अलग सांधियों के द्वारा अंग्रेज सरकार के नियंत्रण में थीं। इन रियासतों के सामंत अपनी बेहद कमजोर स्थिति के कारण अपने अस्तित्व के लिए पूरी तरह अंग्रेजों पर निर्भर थे, इसलिए विद्रोह के दौरान उन्होंने अंग्रेजों की भरपूर मदद की। उन्होंने इस दौरान विद्रोह को कुचलने और अंग्रेजों की सुरक्षा के काम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। राजस्थान के जनसाधारण में अंग्रेजों के प्रति नफरत और गुस्सा था, जो इस दौरान कई दूसरे रूपों में व्यक्त हुआ, लेकिन कोटा और आऊवा को छोड़कर यह कहीं भी व्यापक जन प्रतिरोध का रूप नहीं ले पाया। दरअसल सदियों से अलग-थलग पड़ी राजस्थान की छोटी-छोटी रियासतों के वंचित-पीिड़त जनसाधारण में कुछ हद तक देश प्रेम तो था, लेकिन अभी उसमें राजनीतिक चेतना नहीं के बराबर थी। अंग्रेजों की मौजूदगी से जागीरदार सामंतों को सर्वाधिक नुकसान हुआ। शासकों के तरफदार अंग्रेज उन्हें परंपरा से प्राप्त विशेषाधिकारों से वंचित कर सामंत से करदाता में बदलने के लिए आमादा थे,1 इसलिए वे विद्रोही सैनिकों के साथ हो गए और उन्होंने उनकी खूब मदद भी की।
मध्यकाल के अंतिम चरण में केन्द्रीय मुगल सत्ता के कमजोर हो जाने के बाद राजस्थान की रियासतों में माहौल लगभग अराजकता का था। मराठों और पिंडारियों के निरंतर आक्रमण और लूटमार से यहां का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया और अर्थ व्यवस्था चौपट हो गई। उच्छृंखल जागीरदारों और सामंतों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और द्वेष से हालात इनते बिगड़ गए थे कि यहां शासन जैसी कोई चीज नहीं रही और स्वेच्छाचार बढ़ गया।2 इन हालातों से तंग आकर 1823 तक आते-आते सभी रियासतों ने सुरक्षा और संरक्षण के वचन पर कंपनी सरकार से संधियां कर लीं। इन रियासतों में कंपनी सरकार ने अपने पॉलिटिकल एजेंट नियुक्त कर दिए, जिन्होंने धीरे-धीरे रियासतों की बागडोर अपने हाथों में ले ली। 1857 के विप्लव से पहले तक राजपुताना रेजिडेंसी की सभी रियासतों का नियंत्रण एजेंट टू गर्वनर जनरल (एजीजी) के हाथ में था, जिसका मुख्यालय अजमेर में था। राजपुताना में इस समय छह ब्रिटिश छावनियां नसीराबाद, देवली, नीमच, ऐरनपुरा, खेरवाड़ा और ब्यावर में थीं, जिनमें सभी सैनिक भारतीय थे। मेरठ में हुए विद्रोह की सूचना एजीजी पैट्रिक लॉरेंस की 19 मई को माउंट आबू में मिली। लॉरेंस ने तत्काल एक पत्र तैयार कर राजस्थान की सभी रियासतों के शासकों को भिजवाया, जिसमें उसने रियासतों को कंपनी सरकार के प्रति निष्ठावान रहने, विद्रोहियों को कुचलने और यथावश्यकता अपनी सेवाएं कंपनी सरकार को प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।3 लॉरेंस तत्काल माउंट आबू से अजमेर गया और उसने अपनी तमाम ताकत अजमेर, जो राजपुताना के केन्द्र में था और जहां कंपनी सरकार का खजाना और शास्त्रागार थे, झोंक दी।4 राजपुताना की ब्रिटिश छावनियों के सैनिक भारतीय थे, इसलिए उसने डीसा से यूरोपियन सैनिकों को अजमेर पहुंचने के निर्देश दिए। जोधपुर के नरेश तख्तसिंह ने भी अपनी सेना उसके निर्देश पर अजमेर की सुरक्षा के लिए भेजी।5
नसीराबाद और नीमच छावनी में सैनिक विद्रोह
राजस्थान में विद्रोह की शुरुआत नसीराबाद छावनी से हुई। दरअसल नसीराबाद छावनी में मेरठ, जहां विद्रोह हो चुका था, से आए नैटिव इन्फेंट्री के सैनिकों के कारण माहौल में उत्तेजना थी। अंग्रेज अधिकारियों ने इसी समय कुछ ऐसे निर्णय लिए, जिनसे इन सैनिकों में यह विश्वास दृढ़ हो गया कि उन्हें कुचला जाएगा। इन अधिकारियों ने छावनी में गश्त का काम बम्बई लॉन्सर्स को सौंप दिया और तोपों में गोला बारूद भर दिया। उन्होंने अजमेर से नैटिव इन्फेंट्री के सैनिकों को हटाकर उनके स्थान पर मेर रेजिमेंट के सैनिकों को लगा दिया गया। इसके अतिरिक्त छद्म वेश में विद्रोही समर्थक छावनी में यह प्रचार कर रहे थे कि कारतूसों में चबीZ लगी हुई है। नतीजतन 28 मई, 1857 को नसीराबाद छावनी के सैनिकों ने बगावत कर दी। उन्होंने छावनी को तहस-नहस का लूट लिया और वे दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गए।6 जयपुर और जोधपुर रियासतों की सेनाओं ने इनका पीछा किया, लेकिन सहानुभूति के कारण वे इनसे नहीं लड़ीं। नसीराबाद के विद्रोह की सूचना नीमच छावनी में पहुंचते ही वहां भी माहौल उत्तेजनापूर्ण हो गया। छावनी के कमांडर कर्नल एबॉट के सभी प्रयत्नों के बावजूद 3 जून, 1857 को रात्रि 11 बजे नीमच छावनी में भी विद्रोह हो गया। विद्रोहियों ने छावनी में आग लगा दी। कुछ अंग्रेज सैनिक अधिकारी मारे गए और शेष इधर-उधर भटकते रहे, जिनको बाद में मेवाड़ रियासत के पॉलिटिकल एजेंट के नेतृत्व आई मेवाड़ी सेना ने सुरक्षित उदयपुर पहुंचा दिया, जहां उनके आतिथ्य के सभी इंतजाम किए गए। विद्रोही दिल्ली की ओर कूच करने से पहले शाहपुरा और फिर निम्बाहेड़ा गए, जहां जागारीदारों और जनसाधारण ने उनका स्वागत किया।7 नीमच के विद्रोही सैनिकों ने देवली की छावनी का भी लूटा। वहां की सैनिक टुकड़ी उनके साथ मिल गई। यहां से विद्रोही टोंक पहुंचे, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ। टोंक के नवाब की सेना के कई सैनिक भी विद्रोहियों में शामिल हो गए। विद्रोही इसके बाद दिल्ली की ओर कूच कर गए। मेवाड़ रियासत ने संकट की इस घड़ी में अंग्रेजों की भरपूर मदद की। 6 जून, 1857 को मेवाड़, कोटा, बूंदी और झालावाड़ रियासतों की सेनाओं की सहायता से केप्टिन लॉयड ने नीमच पर फिर आधिपत्य कायम कर लिया। नीमच की स्थिति सुदृढ़ करने के लिए एजीजी लॉरेंस ने वहां से रियासती सेनाओं को हटाकर यूरोपीय सैनिकों की एक टुकड़ी तैनात कर दी। नीमच छावनी में 12 अगस्त, 1857 को फिर विद्रोह हुआ, जिसमें एक अंग्रेज अधिकारी मारा गया, लेकिन मेवाड़ की सेना के सहयोग से यहां शांति कायम कर दी गई और संदिग्ध भारतीय सैनिकों को तोप से उड़ा दिया गया।8 इन्हीं दिनों फिरोज नामक एक व्यक्ति ने अपने को मुगल बादशाह का वंशज घोषित कर मंदसौर पर अधिकार कर लिया। उसकी योजना निम्बाहेड़ा पर अधिकार करने के थी, जो नीमच छावनी के निकट था इसलिए अंग्रेज सैनिक अधिकारियों ने मेवाड़ की सेना के सहयाग से 19 सितंबर, 1857 को निम्बाहेड़ा पर अधिकार कर लिया। निम्बाहेड़ा के बागी हाकिम ने 8 नवंबर को नीमच पर चढ़ाई कर छावनी को आग लगा दी। अंतत: मध्य भारत का पॉलिटिकल एजेंट कर्नल डयरेंड मऊ से एक बड़ी सेना लेकर पहले मंदसौर आया और फिर नीमच आया, जिससे बागी भाग गए और नीमच पर फिर ब्रिटिश आधिपत्य कायम हो गया।9
आऊवा में संग्राम
अंग्रेजों और जोधपुर रियासत के विरुद्ध आऊवा का विद्रोह कुछ हद तक सुनियोजित और दीघZकालीन था। इस विद्रोह को अंजाम देने में जोधपुर रियासत के आऊवा और अन्य ठिकानों के बागी जागीरदारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसमें सहयोग ऐरनपुरा छावनी के बागी सैनिकों ने दिया। खास बात यह है कि इस विप्लव में आऊवा क्षेत्र के जनसाधारण ने भी विद्रोहियों का साथ दिया।10 जोधपुर रियासत और अंग्रेजों के विरुद्ध मारवाड़ क्षेत्र में जो असंतोष था वो इस विद्रोह के रूप में प्रकट हुआ। 1857 की शुरुआत में मारवाड़ की स्थिति बहुत खराब थी। जोधपुर नरेश के विरुद्ध जागीरदारों में असंतोष इस समय चरम पर था। असंतुष्ट और नाराज जागीरदार आऊवा के ठाकुर कुशालसिंह के नेतृत्व में जोधपुर रियासत के विरुद्ध संगठित हो चुके थे।11 अगस्त, 1857 में ऐरनपुरा (िशवगंज) छावनी की एक टुकड़ी सैन्य अभ्यास के लिए माउंट आबू गई हुई थी। इस टुकड़ी को सिरोही रियासत के रोहुआ ठिकाने के बागी जागीरदार के विरुद्ध अनादरा में तैनात किया गया। इस सैनिक टुकड़ी ने अन्य छावनियों में हुए विद्रोह की सूचना मिलने पर 21 अगस्त, 1857 को विद्रोह कर दिया। टुकड़ी के सैनिकों ने माउंट आबू पर चढ़कर गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें एजीजी का पुत्र एण्लॉरेंस घायल हो गया।12 उत्तर में माउंट आबू पर मौजूद यूरोपियन अधिकारियों और सैनिकों ने भी गोलीबारी की। धुंध के कारण विद्रोही पीछे हट गए और माउंट आबू से उतर कर ऐरनपुरा छावनी आ गए, जहां पहले ही विद्रोह हो चुका था। विद्रोहियों ने छावनी और रेलवे स्टेशन को लूट लिया और पाली के रास्ते से दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गए। सिरोही रियासत के मुंशी नियामत अली खां ने सेना के साथ विद्रोहियों का पीछा किया और अंग्रेज अधिकारियों को छुड़ा कर सकुशल सिरोही ले आया, जहां उनकी सुरक्षा और आतिथ्य के व्यापक प्रबंध किए गए।13 विद्रोही दिल्ली को ओर बढ़ रहे थे, लेकिन जोधपुर के किलेदार अनाड़सिंह के सेना सहित पाली में होने की सूचना पर वे आऊवा के निकट स्थित एक गांव में पहुंच गए, जहां से कुछ सैनिक दिल्ली चले गए और शेष को आऊवा का बागी ठाकुर अपनी सेवा में ले आया। जोधपुर रियासत से नाराज आसोप, गूलर, आलनियावास, लांबिया, बांता, भिंवालिया, बाजावास आदि ठिकानों के जागीरदार भी सैनिकों सहित आऊवा पहुंच गए। अनाड़सिंह ने जोधपुर की सेना के साथ आऊवा के निकट स्थित बिठोडा गांव में डेरा डाला। एजीजी लॉरेंस के निर्देश पर लेिफ्टनेंट हेथकोट युद्ध रणनीति तय करने के लिए अनाड़सिंह के साथ आया। 8 सितंबर को भीषण लड़ाई हुई, जिसमें जोधपुर रियासत और अंग्रेजों की सेना की शर्मनाक पराजय हुई। अनाड़सिंह मारा गया और हेथकोट को मैदान छोड़ना पड़ा।14 एजीजी लॉरेंस इस पराजय से आहत था क्योंकि यह कंपनी सरकार की प्रतिष्ठा पर धब्बा थी। एजीजी लॉरेंस लॉरेंस ने अजमेर में सेना एकत्र की और 18 सितंबर, 1857 को आऊवा पहुंच कर उसने विद्रोहियों पर आक्रमण का दिया। जोधपुर का पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेसन भी सेना सहित आऊवा पहुंच गया और गलती से विद्रोहियों के हाथ पड़ कर मारा गया। उसके शव को विद्रोहियों ने आऊवा के किले के बाहर स्थित वृक्ष पर लटका दिया।15 एजीजी लॉरेंस इस लड़ाई में परास्त हुआ और उसे निराश होकर मैदान छोड़ना पड़ा। यह पराजय अंग्रेजों के लिए अपमानजनक थी, क्योंकि लॉरेंस राजपुताना में कंपनी सरकार का सर्वोच्च सैनिक कमांडर था।16 मेसन का वध और उसके शव को वृक्ष पर टांगने की कार्यवाही इस बात का सबूत थी कि जनसाधारण में अंग्रेजों के प्रति नफरत की भावना बहुत ज्यादा थी। आऊवा के विद्रोही दिल्ली के संपर्क में भी थे। वहां से संदेश मिलने पर 10 अक्टूबर, 1857 को जोधपुर लीजन के बागी सैनिकों ने आसोप, गूलर और आलनियावास के ठाकुरों और उनके सैनिकों के साथ दिल्ली की ओर कूच किया।17 जोधपुर नरेश के आदेश पर कुचामन ठाकुर केसरीसिंह ने सेनापति कुशलराज के साथ विद्रोहियों का नारनौल तक पीछा किया। 16 नवंबर की नारनौल में ब्रिगेडियर गराड़ के नेतृत्व में अंग्रेज सेना और विद्रोहियों के बीच घमासान युद्ध हुआ, जिसमें गराड़ की मृत्यु हो गई, लेकिन जीत ब्रिटिश सेना की हुई। विद्रोही बिखर गए और मारवाड़ के बागी ठाकुरों को यहां-वहां शरण लेनी पड़ी। उनकी जागीरें जब्त कर ली गईं।18 दिल्ली पर फिर कंपनी का आधिपत्य कायम हो जाने से जोधपुर नरेश और अंग्रेजों का मनोबल ऊंचा और स्थिति सुदृढ़ हो गई थी। 20 जनवरी, 1858 को ब्रिगेडियर होम्स ने एक बड़े सैनिक लवाजमे और तोपखाने के साथ आऊवा का घेर लिया। जोधपुर रियासत की सेना भी इस अभियान में होम्स के साथ थी। भीषण लड़ाई हुई, जिसमें ग्रामवासियों ने भी भाग लिया। आऊवा का ठाकुर मेवाड़ के सामंतों से मदद प्राप्त करने के लिए रात्रि में किला छोड़कर बाहर पलायन कर गया।19 अंग्रेजों ने आऊवा के किलेदार को रिश्वत देकर अपनी ओर मिला लिया, जिससे उसने किले का दरवाजा खोल दिया। ब्रिटिश सेना ने किले को ध्वस्त कर दिया और गांव में जम कर लूटमार की। उसने जनसाधारण पर भी निर्मम अत्याचार किए।20 जनसाधारण की निगाह में आऊवा का संघषZ कालों और गोरों की लड़ाई थी। इस संबंध में कई लोकगीत आऊवा क्षेत्र में अभी भी प्रचलित हैं।
कोटा में विप्लव
आऊवा के बाद राजस्थान में 1857 कि विप्लव का सबसे अधिक असर कोटा में हुआ। कोटा का विप्लव यों तो हाड़ौती के पॉजिटिकल एजेंट मेजर बर्टन की कोटा नरेश को दी गई गोपनीय सलाह से भड़का, लेकिन जिस तरह से सेना, सरकारी तंत्र और जनसाधारण ने विद्रोहियों का साथ दिया, उससे लगता है कि वहां ब्रिटिश विरोधी भावनाएं और असंतोष पहले से ही चरम पर थे।21 कोटा नरेश रामसिंह ब्रिटिश समर्थक था और विद्रोह के बाद नीमच पर पुन: आधिपत्य के लिए किए गए सैन्य अभियान में उसकी सेनाएं भी शामिल थीं। कोटा रियासत की राजकीय सेना और कोटा कंटिन्जेंट के सैनिकों में विद्रोहियों द्वारा प्रचारित चबीZ वाले कारतूसों और आटे में सूअर और गाय की हडि्डयों का चूरा होने की खबर से उत्तेजना व्याप्त थी। कोटा एजेंसी से नरेश के सेवा मुक्त वकील जयदलाल और राजकीय सेना के रिसालदार मेहराब खां द्वारा इस आशय का पर्चा बांटने से स्थिति और भी विस्फोट हो गई।22 इसी बीच 12 अक्टूबर, 1857 को मेजर बर्टन नीमच से कोटा लौटा और 14 अक्टूबर को उसने कोटा नरेश से भेंट कर कुछ ब्रिटिश विरोधी सैनिक अधिकारियों को राजकीय सेना से हटाने और दंडित करने का परामशZ दिया। यह बात संबंधित अधिकारियों तक पहुंच गई।23
15 अक्टूबर, 1857 को कोटा की राजकीय सेना ने विद्रोह कर दिया। कोटा कंटिन्जेंट के सैनिक भी इसमें शामिल हो गए। विद्रोही सैनिकों ने रेजिडेंसी को घेर लिया। उन्होंने मेजर बर्टन और उसके दोनों बेटों की हत्या कर दी। उन्होंने रेजिडेंसी के डाक्टर सेल्डर तथा कोटा डिसपेंसरी के डाक्टर सेविल कांटम को भी मारा डाला। विद्रोहियों ने मेजर बर्टन के सिर को नगर में घुमाया और फिर तोप से उड़ा दिया।24 विद्रोहियों के नेता जयदलाल और मेहराब खां ने इसके बाद प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। कोटा नरेश की स्थिति बहुत दयनीय थी। उसने वस्तुस्थिति स्पष्ट कर सहायता की याचना करते हुए एजीजी को पत्र लिखा, जिसकी जानकारी विद्रोहियों को मिल गई। उन्होंने कोटा नरेश के महल पर आक्रमण कर दिया। विवश होकर उसे विद्रोहियों से समझौता करना पड़ा, जिसके अनुसार नरेश ने जयदयाल और मेहराब खां को अपना मुख्य प्रशासक नियुक्त कर दिया। 6 महीने तक कोटा विद्रोहियों के कब्जे में रहा और इस दौरान विद्रोहियों का साथ नहीं देने वाले कई प्रमुख व्यक्ति मौत के घाट उतार दिए गए। कोटा नरेश ने इस दौरान बूंदी, झालावाड़ आदि रियासतों के शासकों से सहायता मांगी, लेकिन उसे निराशा हाथ लगी। करौली की सेना के आ जाने के बाद हालात बदलने लगे। हाड़ौती के राजपूत सामंतों ने भी नरेश का साथ दिया। नतीजा यह हुआ कि विद्रोही कमजोर पड़ कर पीछे हट गए पर नगर का अधिकांश भाग अभी भी उनके कब्जे में था।25 मार्च, 1858 में मेजर जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में 5,500 सैनिकों की फौज ने आक्रमण कर विद्रोहियों को खदेड़ दिया। मेहराब खां और जयदयाल भागने में सफल हो गए, लेकिन बाद में उनको गिरफ्तार कर फांसी की सजा दे दी गई।26 कोटा पर आधिपत्य कायम हो जाने के बाद अंग्रेजों ने बदले की भावना से जनसाधारण पर निर्मम अत्याचार किए। कवि सूर्यमल्ल मिश्रण ने केडाणा ठाकुर को लिखे एक पत्र में इनका वर्णन करते हुए लिखा कि अंग्रेजों ने कोटा नगर को लूटा, स्त्रियों का सतीत्व नष्ट किया, बहुत से आदमियों को फांसी के फंदे पर लटकाया तथा बहुतों को गोली से उड़ा दिया गया।ष्27
भरतपुर-धौलपुर में विद्रोह
ब्रिटिश शासित आगरा आदि क्षेत्रों 1857 का जो विप्लव हुआ, उसका गहरा असर राजस्थान की सीमावर्ती भरतपुर और धौलपुर रियासतों में हुआ। मथुरा में भड़के विद्रोह के तत्काल बाद हुडल में तैनात भरतपुर रियासत की एक सैनिक टुकडी ने भी विद्रोह कर दिया। भरतपुर के कुख्यात पॉलिटिकल एजेंट मेजर मारीशन से भरतपुर नरेश ने माहौल प्रतिकूल होने के कारण भरतपुर छोड़ने का आग्रह किया, लेकिन वह वहीं कार्यरत रहा। अंतत: शाबगंज के निकट जब ब्रिटिश सेना विद्रोहियों से पराजित हो गई, तो उसे उच्चाधिकारियों ने तत्काल भरतपुर छोड़ देने के निर्देश दिए। भरतपुर का जनसाधारण आश्वस्त था कि ब्रिटिश शासन का अंत निकट है, इसलिए उसने विद्रोहियों का साथ दिया और उनकी मदद की।28 धौलपुर रियासत में विद्रोहियों का दबदबा भरतपुर से भी ज्यादा रहा। यहां गुर्जर नेता देवा ने अपनी जाति के 3000 लोगों के साथ इरादत नगर की तहसील और खजाने से दो लाख रुपए लूट लिए। इंदौर और ग्वालियर के विद्रोही मिल कर धौलपुर में प्रविष्ट हुए और उन्होंने दबाव डालकर वहां की सत्ता अपने हाथ में ले ली। राव रामचंद्र और हीरालाल के नेतृत्व में विद्रोहियों के एक समूह ने धौलपुर से तोपें आदि लेकर आगरा पर आक्रमण किया। अंतत: पटियाला नरेश ने 2000 सिक्ख सैनिक और तोपखाना भेज कर धौलपुर नरेश को बागियों से मुक्त कराया।29 टोंक रियासत का नवाब अंग्रेजों का समर्थक था, लेकिन वहां के सैनिकों और जनसाधारण में ब्रिटिश विरोधी भावनाएं बहुत प्रबल थीं। नीमच के विद्रोही सैनिक जब टोंक पहुंचे, तो वहां के सैनिकों और जनसाधारण ने उनका स्वागत किया। टोंक से छह सौ मुजाहिद विद्रोहियों के साथ आगरा गए। टोंक के नवाब का मामा मीर आलम खां कंपनी सरकार की खुली मुखालपत करता था इसलिए उसके विरुद्ध सेना भेजी गई। मीर आलम खां इस अभियान में लड़ते हुए मारा गया।
मेवाड़-जयपुर में असंतोष
1857 के विप्लव के दौरान राजस्थान की दो बड़ी रियासतों, उदयपुर और जयपुर में विद्रोही निरंतर सक्रिय तो रहे, लेकिन यहां कोई बड़ी घटना नहीं हुई। दोनों रियासतों के शासक अंग्रेजों से उपकृत थे, इसलिए उन्होंने विद्रोहियों को कुचलने के लिए अंग्रेजों की सेवा में अपनी सेनाएं भेजीं। मेवाड़ में नरेश और उसके सामंतों के बीच परंपरागत विशेषाधिकारों को लेकर भीषण संघषZ चल रहा था। विद्रोह की सूचना मिलते ही एजीजी जार्ज लॉरैंस ने पॉलिटिकल एजेंट केिप्टन शॉवर्स का उदयपुर भेजा और एक निजी पत्र लिखकर नरेश को मेवाड़ में शांति बनाए रखने निर्देश दिए।30 मेवाड़ के जनसाधारण में इस समय ब्रिटिश विरोधी भावनाएं जोर पर थीं। शावर्स जब उदयपुर पहुंच कर नगर के मार्ग से होकर नरेश से मिलने महल गया तो लोगों ने उसे गालियां निकालीं और उसका अपमान किया। नरेश ने विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजों की सभी संभव मदद की। मेवाड़ के जागीरदार सामंतों ने नरेश से अपने मतभेदों के कारण विद्रोहियों का साथ दिया। सलूंबर के सामंत केसरीसिंह, कोठारिया के सामंत जोधसिंह आदि अंग्रेजों के विरुद्ध गतिविधियों में निरंतर सक्रिय रहे। इन्होंने विद्रोहियों को शरण दी और उनकी मदद भी की। बिठुर से भाग कर नाना साहब जब कोठारिया पहुंचा, तो जोधसिंह ने उसको अपने यहां शरण दी।31 केसरीसिंह और जोधसिंह की वीरता और साहस पर चारणों ने गीत लिखे। विप्लव की समाप्ति के बाद तांत्या टोपे एकाधिक बार राजस्थान आया और सरकारी सेना से पराजित होकर मेवाड़ की तरफ गया, तो ब्रिटिश विरोधी सामंतों ने उसकी रसद आदि देकर मदद की।32 राजस्थान की जयपुर रियासत के नरेश ने 1857 के विप्लव के दौरान कंपनी सरकार के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी, लेकिन यहां के कुछ प्रमुख व्यक्ति ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में निरंतर सक्रिय रहे। फौजदार सादुल्ला खां, नवाब विलायत अली, मियां उस्मान खंा आदि दिल्ली के निरंतर संपर्क में थे और इन्होंने जयपुर में ब्रिटिश विरोधी माहौल बनाने की कोिशश की। जयपुर के पॉलिटिकल एजेंट को जब इस संबंध में पता लगा तो उसने जयपुर नरेश को इसकी सूचना दी और नरेश ने इन व्यक्तियों को दंडित किया।33
1857 के विप्लव की नसीराबाद में भड़की चिनगारी ने जल्दी ही आग में बदल कर तमाम राजस्थान को अपनी चपेट में ले लिया। राजस्थान में हुए इस विद्रोह में अंग्रेजी सरकार से असंतुष्ट सैनिकों और सामंत शासकों से नाराज जागीरदारों की अहम् भूमिका थी। राजस्थान के जनसाधारण में इस दौरान ब्रिटिश विरोधी भावनाएं अपने चरम पर थीं और ये कई तरह से व्यक्त भी हुईं, लेकिन आऊवा और कोटा को छोड़कर अन्य स्थानों पर ये व्यापक जन प्रतिरोध को जन्म नहीं दे पाईं। अंग्रेजों ने सामंतों के सहयोग से विद्रोह को बहुत जल्दी कुचल दिया। यदि विद्रोह लंबा चलता, तो राजस्थान में भी धीरे-धीरे इसमें जनसाधारण की भागीदारी बढ़ जाने की संभावना थी। इसके कुछ लक्षण भी विद्रोह के अंतिम चरण में दिखाई पड़ने लगे थे। नसीराबाद सैनिक छावनी के अधिकारी आईण्टीण् प्रिचार्ड ने लिखा भी है कि ष्विद्रोह का आरंभ सैनिक गदर के रूप में हुआ, लेकिन बाद में इसके स्वरूप में परिवर्तन आ गया था।34
राजस्थान की रियासतों के सामंत शासक 1857 के विद्रोह की सफलता में सबसे बड़ी बाधा सिद्ध हुए। पारस्परिक द्वेष और प्रतिद्वंद्विता तथा मराठों और पिंडारियों की लूटपाट से उनकी हालत इतनी कमजोर हो गई थी कि अपने अस्तित्व के लिए अंग्रेजों की मौजूदगी उनको अपरिहार्य लगती थी। सामंतों के इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा के शब्दों में सरकार अंग्रेजी की सहायता लोगों के वास्ते ऐसी फायदेमंद हुई, जैसी कि सूखती हुई खेती के लिए बारिश होती है।ष्35 सामंत शासकों ने विप्लव के दौरान विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजों की सभी संभव मदद की। सामंत शासकों को यह अंग्रेजों के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करने का स्वर्णिम अवसर जैसा लगा और वे बढ़-चढ़ कर विद्रोह के दमन और अंग्रेजों की सुरक्षा के काम में जुट गए। नाथूराम खड़्गावत के अनुसार उन्होंने विप्लव रूपी बाढ़ को रोकने में बांध की भूमिका निभाई।36इसके बदले में अंग्रेजों ने सामंत शासकों को पुरस्कृत किया। विद्रोह की असफलता से सामंतों के लिए मुिश्कलें पैदा करने वाले जागीरदारों का प्रतिरोध कमजोर पड़ गया। वंचित-पीिड़त जनसाधारण की ओर से कोई खास प्रतिरोध पहले ही नहीं था। अंग्रेजों की सरपरस्ती में सामंत अब पूरी तरह निश्चिंत हो गए।
1857 का विद्रोह सफल हो गया होता तो राजस्थान में शायद सामंतवाद के विरुद्ध भी प्रतिरोध के बीज पड़ जाते। विद्रोह की असफलता से यहां सामंतवाद की जड़ें और भी मजबूत और गहरी हो गईं। अंग्रेजों ने इनमें इतना खाद-पानी दिया कि लगभग एक सदी तक सामंतवाद यहां खूब फला-फूला और इसके विरुद्ध प्रतिरोध की धार हमेशा कमजोर रही।

संदर्भ और टिप्पणियां
1.आई.टी. प्रिचार्ड : म्यूटिनीज इन राजपुताना, पृ.21,
2.आर.पी.व्यास: आधुनिक राजस्थान का वृहत् इतिहास, खंड-2, पृ.63
3.टी,आर.होम्स : हिस्ट्री ऑफ द इंडियन म्यूटिनी, पृ.148ण्
4.जी.एच ट्रेवोर : चैप्टर ऑफ द इंडियन म्यूटिनी, पृ.150
5.जबरसिंह : द ईस्ट इंडिया कंपनी एंड मारवाड़, पृ.11
6.नाथूराम खड़्गावत : राजस्थान्स रोल इन द स्ट्रगल ऑफ 1857, पृ.18
7.सी,एल.शॉवर्स : ए मिसिंग चेप्टर ऑफ द इंडियन म्यूटिनी, पृ.28
8.गौराशंकर हीराचंद ओझा : उदयपुर राज्य का इतिहास, पृ.772
9.वहीं, पृ.774
10.नाथूराम खड़्गावत : राजस्थान्स रोल इन द स्ट्रगल ऑफ 1857, पृ.27
11.आर.पी व्यास : आधुनिक राजस्थान का वृहत् इतिहास, खंड-2, पृ.67
12.केप्टिन हॉल की रिपोर्ट ( 28 अगस्त, 1857)
(विजयकुमार त्रिवेदी द्वारा उद्धृत, हिस्ट्री ऑफ सिरोही स्टेट, पृ.83)
13.गौरीशंकर हीराचंद ओझा : सिरोही राज्य का इतिहास,पृ. 311
14.हकीकत बही (जोधपुर) नंण् 18, पृ. 384
(आर.पी.व्यास द्वारा उद्धृत, आधुनिक राजस्थान का वृहत् इतिहास खंड 2, पृण् 90)
15.जी.एच.ट्रेवोर : चेप्टर ऑफ इंडियन म्यूटिनी, पृ.1
नाथूराम खड़्गावत के अनुसार मेसन युद्ध क्षेत्र में लड़ता हुआ मारा गया था।
- राजस्थान्स रोल इन द स्ट्रगल ऑफ 1857, पृ.34
16.सी.एल.शॉवर्स : ए मिसिंग चेप्टर ऑफ द इंडियन म्यूटिनी, पृ.108
17.नाथूराम खड़्गावत : राजस्थान्स रोल इन द स्ट्रगल ऑफ 1857, पृ.159
18.हकीकत बही (जोधपुर) नंण् 18 पृ.403
(नाथूराम खड़्गावत द्वारा उद्धृत, वही, पृ.44)
19.हकीकत बही (जोधपुर) नंण् 18, पृ. 403
(नाथूराम खडगावत द्वारा उदघृत, वहीं, पृ. 45)
20.हकीकत बही (जोधपुर) नंण् 18, पृ.409
(आर व्यास द्वारा उद्धृत, आधुनिक राजस्थान का वहत् इतिहास खंड 2, पृण्)
21.सी. एल शॉवर्स : ए मिसिंग चेप्टर ऑफ इंडियन म्यूटिनी, पृ.85
22.फो. पो. कंसलटेशन (31 सितंबर 1858) नंण्1-2
(एच,एस. शर्मा द्वारा उद्धृत, राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस प्रोसीडिंग्ज, वाल्यूम 13, पृ.205)
23.सूर्यमल्ल मिश्रण द्वारा नामली ठाकुर को लिखे पत्र में यह उल्लेख मिलता है।
- वीर सतसई (सं. कन्हैयालाल सहल),पृ. 72
24.नाथूराम खड़्गावत : राजस्थान्स रोल इनपृ. द स्ट्रगल ऑफ 1857, पृ.59
25.वही, पृण्63
26.एच,एस. शर्मा : हिस्ट्री कांग्रेस प्रोसिडिंग्ज, वाल्यूम 11, पृ.205-211
27.सूर्यमल्ल मिश्रण द्वारा कडाणा ठाकुर को लिखा गया पत्र।
- वीर सतसई (संण् कन्हैयालाल सहल), पृ.78
28.नाथूराम खड़्गावत : राजस्थान्स रोल इन द स्ट्रगल ऑफ 1857, पृ.72
29.वहीं, पृ.74
30.वहीं, पृ.258-61पृ.
31.वहीं,पृ .78
32.सी.एल. शॉवर्स का जार्ज लॉरेंस को लिखा गया पत्र (9 सितंबर, 1858)
(नाथूराम खड़्गावत द्वारा उद्धृत, वहीं, पृ 82)
33.एम.एल. शर्मा : हिस्ट्री ऑफ जयपुर स्टेट, पृ. 258
34.म्यूटिनीज इन राजपुताना, पृ. 277
35.सिरोही राज्य का इतिहास, पृ.291
36.राजस्थान्स रोल इन द स्ट्रगल ऑफ 1857, पृ.72
वसुधा,जन.-मार्च,2008 में प्रकशित

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