Tuesday 22 June 2010

नागार्जुन और उनकी यायावर कविता


अपनी धर्मपत्नी
आदरणीया श्रीमती
अपराजिता देवी के
चंद लफ्जों के मुताबिक
‘हम तो आज तक
इन्हें समझ नहीं पाए!’
नागार्जुन के व्यक्ति और कवि के संबंध में उनकी पत्नी की यह टिप्पणी अक्षरशः सही है। किसी को समझने के लिए कोई पहचान बनानी पड़ती है- इसके लिए तुलना सामान्यीकरण और वर्गीकरण करना पड़ता हैं, लेकिन नागार्जुन का जीवन और कविता इसकी अनुमति नहीं देते। उनकी कोई पहचान बनाना बहुत मुश्किल काम है- वे अपनी कोई पहचान बनने ही नहीं देते। वे इसके बनने से पहले ही इसको ध्वस्त करके आगे निकल जाते हैं। उनके जीवन और कविता में इस निरंतर विचलन और अस्थिरता के कारण इतना वैविध्य, विस्तार और विषमता है कि उनको किसी सामान्यीकरण में बांधा ही नहीं जा सकता। अपने को ध्वस्त करने और फिर इसको लांघ कर आगे बढ़ जाने की इस आदत के कारण नागार्जुन की कविता में जीवन की ऐसी समृद्धि और विविधता संभव हुई है, जो हिन्दी कविता में अन्यत्र दुर्लभ है।

नागार्जुन का जीवन सामान्य नहीं था। उसमें जन्म, स्थान, जाति व्यवसाय आदि कोई संस्कार जम ही नहीं पाया। वे अपने बचपन के ठक्कन मिसर को ध्वस्त कर वैद्यनाथ मिश्र हुए, लेकिन उनकी यह पहचान भी दीर्घकालीन नहीं हुई। वे इसको ध्वस्त कर यात्री और नागार्जुन हुए, लेकिन इसको लांघने में भी उनको ज्यादा समय नहीं लगा। जन्म उनका मिथिलांचल के दरभंगा जिले के तरौनी गांव में हुआ। पिता गोकुल मिश्र विधुर थे और वे अपने इस मातृहीन बालक को कंधे पर बिठा कर रिश्तेदारों में यहां-वहां डोलते रहते थे। उनकी यह यायावरी ही संस्कार के रूप में बाल ठक्कन मिसर के मन-मस्तिष्क में स्थायी रूप से जम गई। आरंभिक संस्कृत शिक्षा उनकी गांव में ही हुई। वे मेधावी थे और ऐसे बच्चों को मिथिलांचल में सम्पन्न गृहस्थों द्वारा अपने आश्रय में रखकर पढ़ाने का रिवाज था, इसलिए ढक्कन मिसर की आगे की शिक्षा मधुबनी जिले के गनौली गांव के संपन्न गृहस्थ रघुनाथ झा के यहां हुई। अपने ठक्कन मिसर को पीछे छोड़ कर पंडित वैद्यनाथ मिश्र बनने के लिए वे बनारस गए। यहां उन्होंने पांडित्य की पारंपरिक शिक्षा के साथ साहित्य के संस्कार भी अर्जित किए। यह उनके मिथिला की परंपरा और ज्ञान से परिपूर्ण वैदेह बनने का दौर था, लेकिन इस दौरान ही उनके भीतर यात्री-नागार्जुन भी उग रहा था। धीरे-धीरे उनका यही रूप बड़ा होकर उनके वैद्यनाथ मिश्र पर भारी पड़ने लगा। बनारस से वे कलकत्ता गए। यहां वे आर्य समाज और बौद्ध दर्शन से प्रभावित हुए। बाद में बौद्ध दर्शन के प्रति उनका झुकाव बढ़ता ही चला गया। राहुल सांस्कृत्यायन इस दौर में उनके आदर्श थे। वे भ्रमण करते हुए दक्षिण भारत पहुंचे और यहां से श्रीलंका चले गए। यहां के विख्यात बौद्ध विहार विद्यालंकार परिवेण में पहले उन्होंने अध्यापन किया और बाद में बौद्ध धर्म दीक्षित हो गए। यहां रहकर उन्होने बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया। यहीं उन्होंने संस्कृत, सिंहली, पालि, हिंदी आदि भाषाओं में भी महारत हासिल की। यहां उनका नया नामकरण नाजार्जुन हुआ। यह उनकी नई पहचान थी, लेकिन नागार्जुन ने इसको भी स्थायी नहीं होने दिया। सहजानंद सरस्वती के आह्वान पर अंग्रेजी राज और जमीदारों विरुद्ध चलने वाले किसानों के संघर्ष में सहभागी होने के लिए वे बिहार लौट आए। उन्होंने भिक्षु वेश छोड़ दिया और फिर से और गृहस्थ हो गए। लेकिन गृहस्थ, मतलब पुत्र, पति और पिता वे सही मायने में कभी नहीं हुए। उनमें गृहस्थ का अभिभावक भाव विकसित ही नहीं हुआ। वे तरौनी-दरभंगा-पटना-कलकत्ता-इलाहाबाद-बनारस-जयपुर-विदिशा-दिल्ली-जहरीखाल और न जाने कहां-कहां की यात्राएं करते रहे, यहां-वहां होने वाले जनांदोलनों में भाग लेते रहे और क्भी-कभार जेल भी जाते रहे। अपने घर-परिवार के लिए वे हमेशा दुर्लभ रहे। उनके बेटे शोभाकांत के अनुसार “कभी-कभी लगता है कि इस बहुआयामी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के भीतर शायद एक ऐसा सेल है, जिसके भीतर वैद्यनाथ मिश्र को बंद कर दिया गया हो और एक भारी-भरकम ताला डाल दिया गया। उस ताले की चाभी फक्कड़ नागार्जुन अपनी यात्रा के क्रम में कहीं रखकर भूल गए हैं।” नागार्जुन जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी शामिल हुए। उन्होंने कहा कि “सत्ता प्रतिष्ठानों की दुर्नीतियों के विरोध में एक जनयुद्ध चल रहा है, जिसमें मेरी हिस्सेदारी सिर्फ वाणी की ही नहीं कर्म की हो, इसीलिए मैं आज से अनशन पर हूं, कल जेल भी जा सकता हूं।” लेकिन इससे भी उनका जल्दी ही मोहभंग हो गया। आगे चलकर उनको यह आंदोलन खिचड़ी विप्लव लगा और इसमें अपनी भागीदारी पर उनरको ग्लानि हुई। उन्होंने इस संबंध में लिखा कि खिचड़ी विप्लव देखा हमने/हमने क्रांति विलास। इस तरह वे आजीवन अपनी पहचान लांघते रहे। वे किसी के भी और कहीं के नहीं हुए। अपने संबंध में सही लिखा कि कहां नहीं हूं,/ कौन नहीं हूं/जहां चाहिए वहां मिलूंगा/-सबके लेखे सदा सुलभ मैं।

नागार्जुन के व्यक्ति की तरह उनके कवि ने भी आजीवन अपनी कोई एकरूप पहचान नहीं बनने दी। अपने संबंध में धारणा बनाने वालों को नागार्जुन का कवि अंगूठा दिखाकर हमेशा आगे निकल गया। उनकी कविता इतनी अलग और इतनी विविध है कि कविता के खेमेबाजोंजों को उसके बारे में राय कायम करने में हमेशा असुविधा हुई। खेमेबाज आलोचकों ने उसके बारे में धारणाएं बनाईं, उसको ऐसी या वैसी बताया, लेकिन नागार्जुन ने हमेशा नया कुछ करके सबको झुठला दिया। उनकी विख्यात कविता ‘प्रतिबद्ध’ कि पंक्तियां प्रतिबद्ध हूं/ संबद्ध हूं/ आबद्ध हूं......... जी हां, शतधा प्रतिबद्ध हूं पढ़कर लहालौट होने वालों को उन्होंने यह कह कर चौंका दिया कि तुमसे क्या झगड़ा है/ हमने तो रगड़ा है/ इनको भी, उनको भी, उनको भी, उनको भी! /दोस्त है, दुश्मन है/खास है, कामन है/ छांटो भी, मीजो भी/ धुनको भी! उन्होंने कलावादियों को भी जम कर धोया। एक जगह उनके बारे मे उन्होंने लिखा कि सर्वतंत्र स्वतंत्र, निर्लिप्त-निरंजन कलाकार/अंतरतर के प्रति सर्वथा ईमानदार। बड़ी-बड़ी तनखाह, प्रचुरतम रायल्टी/ एकमात्र शाश्वत सत्य के प्रति लायल्टी/बाकी सब ठीक है। उन्होंने वामपंथियों की भी बखिया उधेड़ी। उन्होंने लिखा कि क्रांति दूर है सच सच बतला/ बुद्धू, तुझको क्या दिखता र्है/ आ तेरे को सैर कराऊं/ घर में घुसकर क्या लिखता है। उनके यहां मार्क्स, लेनिन, ट्राट्स्की, अरविन्द आदि सब हैं, लेकिन सच केवल वही है जो उन्होंने देखा है, जिसके वे साक्षी है। उनका सच इसका या उसका सच नहीं है। यह उसके या इसके दबाव या लाग-लपेट में कहा गया सच नहीं है। यह कबीर की तरह साफ और दो टूक अनभै सांचा है। वे साफ कहते हैं कि जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं।/ जन कवि हूं मैं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं?“

जीवन में यायावरी कुछ हद तक नागार्जुन की व्यक्ति की सीमा समझी जाएगी, लेकिन कविता में तो यह उनकी ताकत है। इस यायावरी ने उनकी कविता की भावभूमि को असाधारण ढंग की विविधता और समृद्धि दी है। निराला के बाद नागार्जुन की कविता में पहली बार इतनी विषम भावभूमियों का एक साथ सफल निर्वाह दिखाई पड़ता है। नामवरसिंह के शब्द उधार लेकर कहें तो “विषम इतनी कि इस ऊंची-नीची भूमि में समतल आंखों की अभ्यस्त आंखें अकसर धोखा खा जाती है।” खास बात यह है कि इन विषम भावभूमियों पर आवाजाही में नागार्जुन कहीं भी असहज नहीं लगते। यह उनकी कविता ही है जिसमें एक साथ, दुख, संताप और संघर्ष भी है और रूप, रस और गंध भी है। वे मुग्ध और अभिभूत होते हैं और फिर इस पर पश्चाताप भी करते हैं। जीवन की ऐसी सहज और स्वाभाविक उठापटक हिंदी कविता में अन्यत्र दुर्लभ है। जीवन ही नहीं इसको धारण करने वाली नागार्जुन की भाषा के भी कई रंग और कई धरातल हैं। एकाधिक भाषाओं की जानकारी से उनकी कविता में अलग प्रकार की समृद्धि आई है। में उस्में संस्कृत से लगाकर ठेठ देशज शब्दों का सहज और अर्थपूर्ण इस्तेमाल मिल जाएगा। छंद भी उन्होंने कई इस्तेमाल किए।

नागार्जुन निरंतर चले- यायावरी उनके जीवन और कविता का स्वभाव रही। न तो वे कहीं ठहरे और न ही उन्होंने अपना कोई पक्का ठिकाना बनाया। शायद उन्हें पता था कि ठहरने का मतलब है बीमार होना। उन्होंने अपने बेटे शोभाकांत को एक बार हंस कर इसीलिए कहा था कि ‘‘जब भी बीमार पड़ूं, तो किसी नगर के लिए टिकिट लेकर ट्रेन में बैठा देना, स्वस्थ हो जाऊंगा।”
डेली न्यूज के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग में 20 जून, 2010 को प्रकाशित

1 comment:

pallav said...

नागार्जुन पर प्रचलित दृष्टियों से अलहदा विचार. सुचिंतित आलेख के लिए बधाई....