Tuesday 12 February 2008

सामंतों के सहयोग से कुचला गया 1857 का विद्रोह

1857 के विद्रोह का व्यापक गहरा असर राजस्थान में भी हुआ, लेकिन अंग्रेजों ने सामंतों के सहयोग से इसको सफलता पूर्वक कुचल दिया। दरअसल मराठों-पिंडारियों की लूटमार,आपसी प्रतिद्वंद्विता और द्वेष तथा जागीरदारों के स्वेच्छाचार से जर्जर और कमजोर हो गई राजस्थान के रियासतों के सामंत अपने अस्तित्व के लिए अंग्रेजों पर निर्भर थे इसलिए विप्लवकाल में इनकी सुरक्षा और संरक्षण में उन्होंने अपनी सारी ताकत झौंक दी। उन्होंने संकट के इस घड़ी में अंग्रेजों की ढाल बनकर विद्रोहियों के इरादे नाकाम कर दिए। मेरठ में हुए विप्लन की सूचना माउंटआबू में जैसे ही राजपुताना के एजीजी पैट्रिक लारैंस को मिली उसने एक घोषणा पत्र जारी कर सभी सामंतों को विद्रोहियों को कुचलने, कंपनी सरकार के प्रति निष्ठा रखने और यथावश्यक अपनी सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए कहा। राजभक्त और निष्ठावान सामंतों ने इस पर अमल करने में देर नहीं की। अधिकांश सामंतों ने विद्रोहियों के दमन के लिए अपनी सेना और संसाधन कंपनी सरकार की सेवा में प्रस्तुत कर दिए। मेवाड़ नरेश स्वरूपसिंह ने अंग्रेजों की भरपूर मदद की। नीमच छावनी में हुए विद्रोह के दमन में मेवाड़ी सेना की निर्णायक भूमिका थी। केिप्टन शॉवर्स ने मेवाड़ी सेना के सहयोग से ही नीमच छावनी भागे हुए 40 अंग्रेज अधिकारियों, महिलाओं और बच्चों को सकुशल उदयपुर पहुंचाया, जहां नरेश ने उनको पिछोला झील स्थित जगमंदिर में ठहराया और इनके आतिथ्य और सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए। इन अंग्रेज शरणार्थियों ने स्वीकार किया कि यदि महाराणा हमारा शत्रु हो जाता तो संसार में हमें बचाने वाला कोई नहीं था। कोठारिया, सलूंबर और भींडर के जागीरदारों को निरंतर ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के बावजूद स्वरूपसिंह की सजगता और सक्रियता से मेवाड़ में खुले विद्रोह की कोई बड़ी घटना नहीं हुई। विप्लवकाल में एकाधिक बार आए तांत्या के पांव भी यहां मेवाड़ के सेना ने ही नहीं जमने दिए। राजस्थान की दूसरी बड़ी रियासत जोधपुर के नरेश तखतसिंह ने भी अपनी बेहद कमजोर स्थिति के कारण विप्लव के दौरान अंग्रेजों की तरफदारी की। उसने मॉक मेसन के आदेश पर विप्लवकाल के आरंभ में अपनी सेना अजमेर की रक्षा के लिए भेजी। उसकी सेना ने दिल्ली की ओर बढ़ रहे नसीराबाद के विद्रोही सैनिकों का भी पीछा किया। एकाधिक बार मुंह की खाने के बावजूद जोधपुर की सेना आऊवा के विरुद्ध सभी अभियानों में शामिल रही। तखतसिंह के आदेश पर कुचामन ठाकुर केसरीसिंह ने सेनापति कुशलराज के साथ आऊवा के विद्रोहियों का नारनौता तक पीछा किया। अंतत: आऊवा का पतन हुआ, जिसमें जोधपुर की सेना ब्रिगेडियर होम्स के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जयपुर नरेश रामसिंह का रवैया भी इस दौरान पूरी तरह ब्रिटिश समर्थक था। फौजदार सादुल्ला खां, नवाब विलायत अली खां, मिया उस्मान खां आदि ने जयपुर में ब्रिटिश विरोधी माहौल बनाने की कोिशश की, लेकिन नरेश ने अंग्रेज अधिकारियों के परामशZ पर इनको दंडित किया। टोंक के जनसाधारण में इस दौरान ब्रिटिश विरोधी भावनाएं बहुत प्रबल थीं, लेकिन वहां का नवाब वजीरूद्दोला कंपनी सरकार के प्रति निष्ठावान बना रहा। उसने ब्रिटिश विरोधी अपने मामा मीर आलम खां के विरूद्ध सैनिक भेजे, जिनसे लड़ते हुए वह मारा गया। करौली और धौलपुर नरेशों ने भी इस दौरान अंग्रेजों को सहयोग किया। धौलपुर नरेश भगवतसिंह के मथुरा में विप्लव शांत करने के लिए अपनी सेना भेजी और उसने ग्वालियर से भाग कर आए ब्रिटिश अधिकारियों को अपने यहां प्रश्रय दिया। करौली नरेष मदनपाल ने इस दौरान अपनी सेनाओं को कंपनी सरकार की सेवा में आगरा भेज दिया। उसने विद्रोहियों के दमन के लिए कोटा में भी सेना भेजी। विप्लवकाल में अंग्रेजों के प्रति निष्ठा प्रदिशZत करने में बीकानेर नरेश सरदारसिंह ने तो सभी सामंतों को पीछे छोड़ दिया। बीकानेर की सेना ने सिरसा, हांसी और हिंसार में लेिफ्टनेंट वानकोर्ट लैंड के विप्लव विरोधी अभियानों में हिस्सा लिया। हिंसार और हांसी जिलों पर फिर ब्रिटिश आधिपत्य कायम करने में इसका महत्वपूर्ण योगदान था। हरियाणा में बीकानेर की सेना ने छह बार विद्रोहियों को परास्त किया। खास बात यह है कि बीकानेर नरेश स्वयं अपने सामंतों और मंत्रियों के साथ विद्रोहियों के दमन के लिए मोर्चे पर गया। सिरोही नरेश ने भी विद्रोह के दौरान राजभक्ति का निर्वाह किया। ऐरिनपुरा छावनी के विद्रोही सैनिक जब पाली की ओर बढ़ रहे थे, तो सिरोही के मुंशी नियामत अली ने उनका पीछा किया और बंदी लेिफ्टनेंट को नोली उनसे छुड़ाकर सिरोही ले आया। सिरोही नरेश ने ऐरिनपुरा से आए अंग्रेज परिवारों को अपने राजमहल में प्रश्रय दिया। इसी तरह जैसलमेर नरेश ने सिंघ से कोटा जाने वाली ब्रिटिश सेना को रसद आदि देकर मदद की, जबकि डूंगरपुर नरेश नीमच में विद्रोह की सूचना मिलने पर अपने जागीरदारों सहित खेरवाड़ा छावणी में विद्रोह रोकने के लिए केिप्टन कुक साथ लगभग 4 महीने तक रहा। कोटा में विद्रोह ने जन प्रतिरोध का रूप लिया, लेकिन यहां के नरेश की कंपनी सरकार के प्रति निष्ठा से यह सफल नहीं हो पाया। कोटा लगभग छह माह तक विद्रोहियों के अधीन रहा, लेकिन फिर भी नरेश की निष्ठा अपरिवर्तित रही। उसने विद्रोहियों के दबाव में जयदयाल और मेहरबान खां को अपना प्रशासनिक अधिकारी तो नियुक्त कर दिया, लेकिन वह एजीजी और अन्य नरेशों से सहायता प्राप्त करने के लिए निरंतर पत्राचार करता रहा। अंतत: उसके अनुरोध पर एजीजी पैट्रिक लारैंस ने मुंबई से सेना मंगवाई, जिसने जनरल एचजी, राबर्ट्स के नेतृत्व में अभियान कर विद्रोहियों को कोटा से खदेड़ दिया। राजभक्ति और निष्ठा प्रदिशZत करने वाले सामंतों को विजय के बाद ब्रिटिश सरकार ने खिलअत, उपहार, भूमि आदि प्रदान कर सम्मानित किया। बीकानेर को खिलअत के अतिरिक्त हिसार जिले के 41 गांव दिए गए, सिरोही राज्य पर चढ़ी खिराज की आधी रकम माफ कर दी गई, जैसलमेर को करौली को ऋण में खिलअत दी गई, छूट दी गई तथा मेवाड़ को खिलअत और उसके कुछ सामंतों और अधिकारियों को पुरस्कार और प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया गया।
1857 के विप्लव की नसीराबाद में भड़की चिनगारी ने जल्दी ही आग में बदल कर तमाम राजस्थान को अपनी चपेट में ले लिया। राजस्थान में हुए इस विद्रोह में अंग्रेजी सरकार से असंतुष्ट सैनिकों और सामंत शासकों से नाराज जागीरदारों की अहम् भूमिका थी। राजस्थान के जनसाधारण में इस दौरान ब्रिटिश विरोधी भावनाएं अपने चरम पर थीं और ये कई तरह से व्यक्त भी हुईं, लेकिन आऊवा और कोटा को छोड़कर अन्य स्थानों पर ये व्यापक जन प्रतिरोध को जन्म नहीं दे पाईं। अंग्रेजों ने सामंतों के सहयोग से विद्रोह को बहुत जल्दी कुचल दिया। यदि विद्रोह लंबा चलता, तो राजस्थान में भी धीरे-धीरे इसमें जनसाधारण की भागीदारी बढ़ जाने की संभावना थी। इसके कुछ लक्षण भी विद्रोह के अंतिम चरण में दिखाई पड़ने लगे थे। यहां की रियासतों के सामंत शासक 1857 के विद्रोह की सफलता में सबसे बड़ी बाधा सिद्ध हुए। सामंत शासकों उनको यह अंग्रेजों के प्रति अपनी निष्ठा प्रदिशZत करने का स्वणिZम अवसर जैसा लगा और वे बढ़-चढ़ कर विद्रोह के दमन और अंग्रेजों की सुरक्षा के काम में जुट गए। उन्होंने विप्लव रूपी बाढ़ को रोकने में बांध की भूमिका निभाई। विद्रोह की असफलता से सामंतों के लिए मुिश्कलें पैदा करने वाले जागीरदारों का प्रतिरोध कमजोर पड़ गया। वंचित-पीिड़त जनसाधारण की ओर से कोई खास प्रतिरोध पहले ही नहीं था। अंग्रेजों की सरपरस्ती में सामंत अब पूरी तरह नििश्ंचत हो गए। 1857 का विद्रोह सफल हो गया होता तो राजस्थान में शायद सामंतवाद के विरुद्ध भी प्रतिरोध के बीज पड़ जाते। विद्रोह की असफलता से यहां सामंतवाद की जड़ें और भी मजबूत और गहरी हो गईं। अंग्रेजों ने इनमें इतना खाद-पानी दिया कि लगभग एक सदी तक सामंतवाद यहां खूब फला-फूला और इसके विरुद्ध प्रतिरोध की धार हमेशा कमजोर रही।

1 comment:

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

1857 में राजस्थान में क्या हुआ, इस पर बहुत कम लिखा गया है. आपने इस कमी को पूरा करने का प्रशंसनीय काम किया है. बधाई.
उम्मीद है कि आप इस सिलसिले को ज़ारी रखेंगे.