Thursday 7 February 2008

बेगानी शादी में हिंदी दैनिक

बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में हुई संचार क्रांति और ग्लॉबलाइजेशन की प्रक्रिया से हिंदी दैनिकों के चरित्र और रीति-नीति में आधारभूत तब्दीलियां हुई हैं। अब ये लाभकमाऊ लोकप्रिय संस्कृति के मकड़जाल में उलझ कर धीरे-धीरे अपने बुनियादी सरोकारों से कट रहे हैं। जोधपुर में पिछले दिनों हुआ हॉलीवुड अभिनेत्री लिज हर्ले और भारतीय मूल के उद्योगपति अरुण नायर की शादी का तमाषा आम हिंदी भाशी जन साधारण के लिए बेगाना था, लेकिन हिंदी दैनिकों ने इसको कवर करने में अपनी सारी ताकत झौंक दी। इस शादी की पल-पल की ब्यौरेवार खबरें देने में इन्होंने अंग्रेजी दैनिकों को भी पीछे छोड़ दिया। यही नहीं, इस तमाषे में जनसाधारण की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए इन्होंने अंग्रेजी टेबलॉइड अखबारों की तरह कयास लगाने और अयथार्थ को यथार्थ बनाकर पेश करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।
शादी या तमाशा
यह विवाह सही मायने में विवाह नहीं था। यह मूलत: मनोरंजन प्रधान ओर लाभकमाऊ उस लोकप्रिय संस्कृति का ही एक रूप था, जिसको बीसवीं सदी के अंतिम दषकों में मास मीडिया ने अपनी व्यावसायिक जरूरतों के तहत पैदा किया है। दरअसल यह एक तीन दिवसीय ग्रैंड ‘ाो था, जिसका सीधा सबंध मीडिया के अर्थषास्त्र से है। इंग्लैंड के ग्लूकेस्टरषायर सुडेले दुर्ग के चर्च से लगाकर जोधपुर और नागौर में हुए इस संपूर्ण आयोजन के कवरेज के अधिकार एक मीडिया घराने ने पहले ही खरीद लिए थे। आयोजन ही इस तरह से किया गया था कि यह मीडिया के लिए उपयोगी हो। यह भव्य और ‘ााही लगे, इसलिए सभी आयोजन जोधपुर के उम्मेद भवन और मेहरानगढ़ तथा नागौर के अहिछत्रगढ़ में किए गए। आयोजन भव्य इसमें ‘ाामिल देष-विदेष की फिल्म, टीवी, फैषन उद्योग और ‘ााही राजघरानों से जुड़ी सिलेब्रिटिज के कारण भी था। देष से प्रीटी जिंटा-नेष वाडिया, परमेष्वर गोदरेज, गौतम सिंघानिया, आरती-कैलाष सुरेन्द्रनाथ और रोहित बल इसमें ‘ाामिल हुए। इसी तरह विदेष से जूली लीबोइच, केट हर्ले, तानिया ब्रायर, प्रिंस पावलोस, डेविड फिर्नस, लियोनार्ड लॉडर, ब्रूस होइकेसेमा, रोबर्ट फोरेZस्ट और सेयिट करागोजोलु ने इसमें षिरकत की। मनोरंजन का तामझाम भी बहुत भव्य और उच्च कोटि का था। नागौर के अहिछत्रगढ़ में लुई बैंक्स ने पाष्चात्य संंगीत, रवि चारी ने सितार और षिवमणि ने भारतीय संगीत पेष किया। विख्यात विचारक थियोडोर एडोनोZ ने लोकप्रिय संस्कृति के संबंध में एक जगह लिखा है कि Þयह अभिजात कला और जनमानस के कलारूपों की एक अजीब खिचड़ी तैयार करती है।ß यह खिचड़ी इस आयोजन में सब ओर देखने को मिली। इस विवाह में मंत्रोच्चारण, मेहंदी, बारात और क्रिकेट मैच सब एक साथ थे। इसमें लंगा-मांगणयारों के लोक गायन के साथ लुइ बैंक्स, रवि चारी और षिवमणि भी थे। तेरहताली, कालबेलिया, घूमर और गैर लोक नृत्यों के साथ इसमें डीजे पर झूमने का प्रबंध भी था। खिचड़ी यहां परिधानों और भोजन में भी थी। लिज और अरुण के परिधानों में साड़ी, स्कर्ट, जींस, शेरवानी, पाजामा, साफा आदि सब शामिल थे। भोजन में भी मैिक्सकन, इटेलियन, कांटिनेंटल व्यंजनों के साथ राजस्थानी केर-सांगरी, दाल-बाटी-चूरमा और बेसन गट्टा एक साथ परोसे गए। शराब भी इसमें विदेशी और हैरिटेज, दोनों तरह की उपलब्ध करवायी गई।
देशी मुर्गी विदेशी बोल
विस्फोटक प्रसार और व्यवसायीकरण के बावजूद हिंदी दैनिकों की जड़ें अब भी मुख्यतया क्षेत्रीय सरोकारों में हैं। ये इन्हीं से अपना खाद-पानी ग्रहण करते हैं। गत दो-तीन दषकों के दौरान इनकी पकड़ और पहुंच का दायरा कस्बायी और ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तृत इन बुनियादी सरोकारों के साथ गहरी प्रतिबद्धता के कारण ही हुआ है। बिजली, पानी, सड़क, भ्रश्टाचार, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों से जुड़ाव के कारण ही इन क्षेत्रों में हिंदी दैनिकों की साख भी बढ़ी है। लिज हर्ले और अरुण नायर के विवाह समारोहों की पल-पल ब्यौरेवार खबरें इन दैनिकों के पाठकों के लिए अजूबा थीं। इन दैनिकों का पाठक वर्ग न हॉलीवुड अभिनेत्री लिज हर्ले को जानता है, और न ही वह भारतीय मूल के उद्योगपति अरुण नायर से परिचित है। यह हो सकता है कि भारतीय महानगरों के अंग्रेजी खबरें पढ़ने-सुनने वाले कुछ अपवाद पाठकों की दिलचस्पी लिज हर्ले के सेफ्टीपिन परिधान और उसके रंगीन प्रेम प्रसंगों में हो, अन्यथा हिंदी भाशी क्षेत्रों के अधिकांष ‘ाहरी, कस्बायी और ग्रामीण पाठकों का इस तमाषे से कोई दूरदराज का भी संबंध नहीं था। खास बात यह थी कि इस प्रकरण में खबरें परोसने का हिंदी दैनिकों का तरीका भी अंग्रेजी के कुख्यात टेबलॉइड अखबारों जैसा था। इन्होंने टेबलॉइड अखबारों की तरह ही खबरों को रोचक बनाने के लिए उनको सनसनी और उत्तेजना की चाषनी में लपेट कर पेष किया। इन्होंने लिज-अरुण की वेषभूशा, समारोह में परोसे गए भोजन और इसमें जुटाए गए मनोरंजन के तामझाम के सूक्ष्म और विस्तृत ब्यौरे पेष किए। लिज की स्कर्ट के कलर और अरुण नायर की जिंस की ब्रांड तक की जानकारियां खबरों में जुटाई गईं। इन्होंने लिज-अरुण के मुंबई पहुंचने, वहां से जोधपुर के लिए रवानगी, जोधपुर में मेहंदी और ‘ाादी, नागौर में ‘ााही भोज और वापसी तक की पल-पल की खबरें दीं। विवाह समारोह के कवरेज के अधिकार पहले ही बेच दिए गए थे, इसलिए हिंदी दैनिकों की विवाह के आयोजनों में पहुंच सीमित थी, तो इन्होंने अपनी ताकत बाहरी तामझाम को कवर करने में लगाई। एक प्रमुख हिंदी दैनिक ने समारोह में लोक गायन के लिए आमंत्रित कलाकरों से बात कर ली। यही नहीं, एक दैनिक ने समारोह में साफों की आपूर्ति करने वालों और अतिथियों के आवागमन के लिए प्रयुक्त टैिक्सयों के चालकों की राय से कथा गढ ली। हद तो तब हो गई जब टेबलॉइड अखबारों की तर्ज पर लिज के गर्भवती होने के कयास की अंग्रेजी मीडिया में प्रचारित अषालीन खबर को हिंदी दैनिक भी ले उडे़। एक प्रमुख क्षेत्रीय हिंदी दैनिक ने एक विदेषी अखबार का हवाला देकर `लिज गर्भवती! शीषक‘ कथा में लिखा कि लिज शायद इस समय गर्भवती है। अखबार का कहना है कि शादी समारोह में लिज ने जो गाउन पहना था, उसमें उसका पेट कुछ उभरा हुआ दिख रहा था। हालांकि अखबार का कहना है कि यह गरिश्ठ भोजन और पेय पदार्थ लेने के कारण भी हो सकता है।
बेगानी शादीमें अब्दुला दीवाना
बीसवीं सदी के अंतिम दषकों में हुई केबल-सैटेलाइट टेलीविजन क्रांति से हिंदी भाशी उत्तर भारतीय क्षेत्रों में भी भारतीय किस्म की लोकप्रिय संस्कृति का विकास हुआ है। फिल्म, टीवी, फैशन आदि की कारोबारी संस्कृति अब यहां भी तेजी से फल-फूल रही है। फिल्म, टीवी, क्रिकेट, उद्योग आदि से जुड़ी सिलेब्रिटिज के बारे में जानने की भूख इधर हिंदी भाशी जनसाधारण में भी बढ़ी है इसलिए हिंदी दैनिकों में इनसे संबंधित सामग्री में भी इजाफा हुआ है। रवीना-अनिल या ऐष्वर्य-अभिशेक या राखी सावंत में हिंदी भाशी जन साधारण की दिलचस्पी है। इनसे उसका अपनापा और जुड़ाव भी है, इसलिए इनसे संबंधित खबरों की हिंदी दैनिकों में बहुतायत और निरंतरता समझ में आती है, लेकिन लिज-अरुण तो हिंदी भाशी पाठकों के लिए सर्वथा बेगाने और अपरिचित हैं। उनकी ‘ाादी में इनकी दिलचस्पी महज दीवानगी ही कही जाएगी। एलिजाबेथ लिज हर्ले हॉलीवुड अभिनेत्री है, जिसका हिंदी भाशी जनसाधारण ने इससे पहले कभी नाम भी नहीं सुना। फिर कहते हैं कि हॉलीवुड में भी उसकी गिनती दोयम दर्जे की अभिनेत्रियों में होती है। अरुण नायर भारतीय मूल के उद्योगपति हैं, लेकिन उनके भारतीय संबंध के बारे में हिंदी पाठकों को कोई जानकारी नहीं है। इस विवाह के दौरान भी किसी भी हिंदी दैनिक ने यह जानकारी देने की जहमत नहीं उठाई। आम शहरी, कस्बाई और ग्रामीण हिंदी भाशी जन साधारण के पारंपरिक विष्वासों और संस्कारों हिसाब से यह विवाह भी नहीं था। यह इंग्लैंड के सुडेले दुर्ग के चर्च में संपन्न विवाह की भव्य तामझाम वाली फ्यूजन नाट्य प्रस्तुति भर थी। इस बेगानी और घालमेल नाट्य प्रस्तुति में हिंदी भाशी जनसाधारण की दिलचस्पी नगण्य ही थी, लेकिन हिंदी दैनिक सोत्साह इसकी पल-पल की खबरें जुटाने में लगे हुए थे। एक हिंदी दैनिक के ही ‘ाब्दों में कहें तो इस विवाह को कवर करने में Þमीडियाकर्मियों का जोष देखते ही बनता था।ß इन खबरों को अहमियत और जगह देने के मामले में भी हिंदी दैनिक अंग्रेजी दैनिकों से भी आगे थे। अंग्रेजी दैनिकों में इस शादी की खबरें अंदरूनी पृश्ठों पर थीं, जबकि हिंदी दैनिकों में इनको तीन-चार दिनों तक प्रमुखता के साथ पहले पृश्ठ पर जगह दी गई।
झूठ का भी सहारा
खबरों में अतिरंजना का पुट देने का महारत तो हिंदी दैनिकों के पास पहले से ही था, इस विवाह के कवरेज में इन्होंने कुछ हद तक अयथार्थ का यथार्थ की तरह पेष करने की मास मीडिया की नयी कला में भी हाथ आजमा लिए। विवाह से संबंधित समारोह जोधपुर के उम्मेद भवन पैलेस, मेहरानगढ़ और नागौर के अहिछत्रगढ तक सीमित थे। थोड़ी हलचल आवागमन बढ़ने के कारण हवाई अड्डे पर भी हुई। होटल और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े कुछ सीमित लोग ही इस आयोजन से व्यावसायिक कारणों से जुड़े हुए थे और शेष् अधिकांश् जन साधारण की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरे के कारण तमाषबीनों के लिए भी इन आयोजनों तक पहुंचने की कोई गुंजाइश नहीं थी। लेकिन हिंदी दैनिकों ने कथाएं गढ़ कर माहौल कुछ ऐसा बनाया जैसे जनसाधारण भी इसमें दिलचस्पी ले रहा है। विवाह के दिन एक हिंदी दैनिक ने जनसाधारण को भी जबरन इसमें ‘शामिल करते मुखपृश्ठ पर प्रकाषित शादी से राज परिवार दूर`शीषक कथा का उपशीषक दिया कि ´जनता पसोपेष में।` इसी तरह लिज-अरुण और मेहमानों के नागौर पहुंचने पर जुटी कुछ तमाषबीनों की भीड़ के संबंध में एक हिंदी दैनिक ने लिखा कि Þलिज-नायर को देखने के लिए पूरा नागौर शहर गांधी चौक में उमड़ पड़ा।ß
लोकप्रिय संस्कृति मुनाफे के लिए गढ़ी, वितरित और प्रसारित की जाती है और इसका मीडिया से गहरा और अविच्छिन्न संबंध है। हिंदी दैनिक इससे परहेज करेंगे या दूरी बरतेंगे, यह सोचना भी अब खामखयाली है। सही तो यह है कि ग्लॉबलाइजेषन तेज होने के साथ हिंदी दैनिकों की इस पर निर्भरता बढ़ती ही जाएगी। यह अवष्य है कि हिंदी दैनिकों को इस संबंध में फूंक-फूंक कर कदम रखने पड़ेंगे। सबसे पहले तो इन्हें अपने पांवों को अपनी ही जमीन पर मजबूती से जमाए रखना होगा।
लिज-अरुण की बेगानी शादीके कवरेज में जैसा उतावलापन इन्होंने दिखाया, वैसा ही आगे भी जारी रहा, तो ये अपनी जड़ों से कट जाएंगे। केबल-सैटेलाइट टेलीविजन के शुरुआती दौर में हमारे यहां आने वाले ग्लोबल मीडिया में से भी आज बचा हुआ वहीं है, जिसने अपनी जड़ें हमारे खाद-पानी में फैला लीं और जिन्होंने ऐसा नहीं किया हमारे यहां से उसकी दुकानदारी उठ गई है।

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