Friday 15 August 2008

गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक का वैशिष्ट्य

आजादी के बाद के सपनों के पराभव और मोहभंग की कन्नड़ में रचित नाट्यकृति तुगलक का आधुनिक भारतीय नाटक साहित्य में खास महत्व है। यह कृति उस समय लिखी गई जब आधुनिक भारतीय नाटक साहित्य में ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विषयों पर पुनरुत्थान मूलक नाटक लेखन का जोर था। हिंदी में जयशंकर प्रसाद, सेठ गोविंददास, हरिकृष्ण प्रेमी आदि नाटककार इतिहास और मिथों का नाट्य रूपांतरण कर रहे थे। उनका उद्देश्य भारतीय अतीत की भव्य और महान छवि गढ़ने का था। गिरीश कारनाड ने ऐसे समय में इतिहास में अपने समय और समाज के द्वंद्व और चिंता को विन्यस्त किया। यह बाद में हिंदी सहित कई आधुनिक भारतीय भाशाओं में भी लोकप्रिय हुई।

तुगलक में इतिहास या मिथक के रूपक में अपने समय और समाज की विन्यस्त करने का गिरीश कारनाड की पद्धति भी इस तरह के और आधुनिक भारतीय नाटकों की तुलना में खास तरह की है। इस नाटक की खास बात यह है कि इसमें हमारा समय और समाज है, लेकिन यह इतिहास को कहीं भी विकृत नहीं करता। पहला राजा भी इसी तरह का नाटक है, लेकिन उसमें आरोपण इतना वर्चस्वकारी है कि मिथक विकृत हो जाता है। गिरीश कारनाड इतिहास पर अपने समय और समाज के द्वंद्व और चिंता का आरोपण इतने सूक्ष्म ढंग से करते हैं कि इससे मुहम्मद बिन तुगलक का ऐतिहासिक चरित्र और समय, दोनों ही अप्रभावित रहते हैं। कल्पना का पुट इस नाटक में है, लेकिन यह इतिहास के ज्ञात तथ्यों पर भारी नहीं पड़ती।

अपनी रंग योजना के लिहाज से भी तुगलक एक विशिष्ट रचना है। अपनी अन्य समकालीन आधुनिक भारतीय नाट्य रचनाओं से अलग इसमें मंच, संगीत, प्रकाश आदि को निर्देशकीय सूझबूझ और कल्पना पर छोड़ा गया है। इस नाटक में रंग निर्देश बहुत कम हैं। निर्देशक को पूरी छूट दी गई है कि वह इस नाटक का मंचन प्रयोगधर्मी ढंग से कर सके। इब्राहिम अलकाजी ने अपनी कल्पना और सूझबूझ से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के मुक्ताकाशी मंच पर इसका मंचन किया था। उन्होंने इसमें यथार्थवादी और प्रयोगवादी, दोनों प्रकार की शैलियां प्रयुक्त कीं। उन्होंने इसके लिए मुगलकालीन स्थापत्य विशेषज्ञों और ग्रंथों का भी सहयोग लिया।

आधुनिक भारतीय नाटकों में तुगलक इस अर्थ में भी खास है कि इसमें भव्य और महान कथानक है। इस महानता और भव्यता को सम्मूर्त करने के लिए नाटककार ने सभी कोशिशं की हैं। उसने मंच स्थापत्य इस तरह का रखा है कि यह भव्यता उससे व्यक्त होती है। नाटककार ने कथानक की भव्यता और महानता बरकरार रखने के लिए खास प्रकार की अभिजात उर्दू का प्रयोग किया है। इस नाटक की भाषा में मुगल दरबारों की रवायतों और अदब-कायदों का इस्तेमाल हुआ है। नाटककार और इसके निर्देशक ने इस संबंध में पर्याप्त शोध कार्य किया है।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि आधुनिक भारतीय नाटक साहित्य में अपनी कतिपय खास विशेषताओं के कारण तुगलक का अलग और महत्वपूर्ण स्थान है।

3 comments:

Udan Tashtari said...

स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

बहुत सटीक और संतुलित मूल्यांकन है. बधाई.

Anonymous said...

kripaya thoda aur vistararit kare