Tuesday 2 June 2009

इतिहास और आख्यान की जुगलबंदी

उपनिवेशकालीन दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी विद्रोह पर एकाग्र हरिराम मीणा की रचना धूणी तपे तीर को यों तो उपन्यास की संज्ञा दी गई है, लेकिन यह इतिहास और दस्तावेज भी है। गल्प के अनुशासन में होने के कारण यह एक औपन्यासिक रचना है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज होने के कारण इसका साहित्येतर महत्व भी बहुत है। यह रचना हिंदी में साहित्य की साहित्येतर अनुशासनों के साथ बढ़ रही निकटता और इससे होने वाली अंतिर्कयाओं की भी साक्ष्य है।

हिंदी में किसी घटना या व्यक्ति पर गहन और व्यापक शोध आधारित उपन्यास लिखने की कोई समृद्व परपंरा नही है। हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यासों की जो परपंरा है , उसमें शामिल अधिकांश उपन्यास पुनरुत्थान की चेतना से ओतप्रोत है। खास बात यह है कि इनमें तथ्यों को कल्पना से पुष्ट और विस्तृत करने के बजाय विकृत गया है। इनमें दूरस्थ अतीत की केवल कल्पनाप्रधान पुनर्रचना और अमूर्तन है। हरिराम मीणा की यह रचना हिंदी में अपनी तरह की पहली रचना है, जो उपनिवेशकालीन निकट अतीत के एक आदिवासी विद्रोह पर की गई गहन और व्यापक शोध पर आधारित है और जिसमें तथ्यों को कल्पना से विकृत या अमूर्त करने के बजाय पुष्ट और विस्तृत किया गया है।

यह रचना राजस्थान के दक्षिणी भूभाग में उपनिवेशकाल के दौरान ब्रिटिश-सामंती गठजोड़ के विरुद्ध हुए आदिवासी विद्रोह पर आधारित है। यह विद्रोह कोई मामूली उपद्रव या उत्पात नहीं था। उपनिवेशकाल से पहले तक अपनी जमीन और जंगलों पर आदिवासियों का सहज और निर्विवाद स्वामित्व था। सामंतों की उनके वर्चस्व वाले इलाकों में पहुंच और दखलंदाजी सीमित थी और वे अपने इलाकों में खुदमुख्तार थे। अंग्रेजो से संधियों के बाद रियासती सामंतो ने जंगल और जमीन पर आदिवासियों के इस पारंपरिक स्वामित्व और वर्चस्व में दखलंदांजी शुरू कर की। उनके रखवाली और बोलाई जैसे पारंपरिक अधिकार छीन लिए गए। अंग्रजों के समर्थन और सहयोग से आदिवासियों का दमन और शोषण भी बढ़ गया। इसके लिए खैरवाड़ा में मेवाड़ भील कोर की स्थापना की गई। वंचित और दमित-शोषित आदिवासियों में धीरे-धीरे असंतोष बढने लगा और विद्रोह होने लगे। पहला सफल विद्रोह बारापाल और पडोना में हुआ और धीरे-धीरे यह दूसरे इलाकों में भी फैल गया। इसकी चरम परिणति 1913 के मानगढ़ विद्रोह में हुई। यह केवल एक क्षेत्रीय विद्रोह नहीं था। यह तत्कालीन राजपुताना की आदिवासी बहुल मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और कुशलगढ़ के साथ गुजरात की पड़ोसी ईडर और संतरामपुर रियासतों तक विस्तृत था। इसका नेतृत्व 1858 में डूंगरपुर रियासत के बांसिया गांव में उत्पन्न बनजारा जाति के समाज सुधारक और क्रांतिकारी गोविदंगरु ने किया, जिन्हें आदिवासियों का व्यापक समर्थन और सहयोग प्राप्त था। गोविंद गुरु ने आदिवासी नायक पूंजा के साथ मिल कर संप सभा के माध्यम से तीन दशकों तक निरंतर आदिवासियों में पहले जागृति का काम किया। उन्होंने इसके लिए गांव-फलियों में संप सभाएं और धूणियां कायम कीं। उन्होंने आदिवासियों में सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन के लिए आंदोलन चलाए। खास तौर पर आदिवासियों में शराब के व्यापक चलन के विरुद्व उन्होंने सफल मुहिम चलाई, जिसका परिणाम यह हुआ कि बांसवाडा रियासत में 1913 में शराब की खपत 18,740 गैलन से घटकर केवल 5,154 गैलन रह गई। उन्होने घूम-घूम कर गांव-फलियों में जागृति और अन्याय-अत्याचार के प्रतिकार के लिए समर्पित और निषठावान कार्यकर्ताओं का एक संगठन खडा किया। अंतत: 1913 में आरपार की लड़ाई शुरू हुई। गोविंद गुरु के आह्वान पर 25,000 आदिवासी रणनीतिक महत्व के पहाड़ मानगढ़ पर एकत्रित हुए। अंग्रेजों ने इस विद्रोह के दमन के लिए रियासती फौजों के साथ अपनी सात सैनिक कंपनियां लगाई। विद्रोह को नृशंसतापूर्वक कुचल दिया गया। इस दौरान लगभग 1500 आदिवासी मारे गए, इतने ही घायल हुए और 900 विद्रोही आदिवासियों को गोविंद गुरु सहित गिरफ्तार कर लिया गया।

यह एक संगठित, सुनियोजित, दीर्घकालीन और तैयारी के बाद किया गया विद्रोह था, जिसमें शहीद होने वोले आदिवासियों की संख्या जलियावाला हत्याकांड से चार गुना अधिक थी। विडंबना यह है कि इतिहास में इसका उल्लेख नहीं है। राजस्थान के सामंतो का विस्तृत इतिहास लिखने वाले गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसके संबंध में केवल इतना ही लिखकर किनारा कर लिया कि “मानगढ़ पर एकत्रित कुछ भीलों ने उत्पात मचा रखा था। फौज को गोलियां चलानी पड़ी। कुछ भील मारे गए।“ इस विद्राह से संबंधित पर्याप्त अभिलेख हैं, लोक साक्ष्य हैं, लेकिन अभी तक उनको एक जगह एकत्रित नहीं किया गया था। इस रचना में लेखक ने पहली बार इन सभी को गहन और व्यापक शोध के बाद एक जगह एकत्रित किया है और इस तरह इस विद्रोह को एक मुकम्मिल पहचान देने की कोशिश की है।

इतिहास के साथ यह कृति एक रचनात्मक आख्यान भी है। लेखक इसमें बहुत कौशल के साथ संयम में रहकर इतिहास को रचना में ढालता है। यह मुश्किल काम है, लेकिन लेखक ने इसे खूबी के साथ अंजाम दिया है। वह इसमें तथ्य की जमीन पर मजबूती से अपने पांव जमा कर फिर अपनी कल्पना को ढील देता है। इस रचना में ऐसे कई प्रसंग हैं, जो तथ्य और कल्पना के असाधारण संयोग से संभव हुए हैं। मेवाड़ भील कोर को रायफल देने के लिए आयोजित उत्सव, पालपा के जागीरदार के विरुद्ध दड़वाह की जमीन के लिए आदिवासी संघर्ष के प्रसंग इसके अच्छे उदाहरण हैं। मानगढ़ विद्रोह का दैनंदिन विवरण भी तथ्य और कल्पना के संयोग के कारण ही इसमे बहुत बसरदार बन गया है। चरित्रों के गठन और विस्तार में भी लेखक ने यही किया है। गोविंद गुरु के चरित्र मेके गठन और निर्माण में तथ्यों को कल्पना से ही विस्तार दिया गया है। लोक में उनकी छवि धार्मिक आधार वाले संत-महात्मा की थी और मूलत: वे एक समाज सुधारक और क्रांतिकारी थे, लेकिन लेखक कल्पना के सहारे उनके इन दोनों रूपों को मिला कर एक नई छवि गढता है। इसमें पूंजा और कमली के चरित्र भी इस तरह गढ़े गए हैं। अलबत्ता लेखक ने कुरिया का चरित्र गढ़ने में कल्पना की अतिरिक्त छूट ली है। कुरिया की ऊहापोह और अंतर्सघर्ष को लेखक कल्पना के सहारे खास दिशा देता ल है। कुल मिला कर इतिहास, दस्तावेज , लोककथाएं, लोकगीत, जनश्रृतियां आदि इस कृति में लेखक की कल्पना के साथ घुल मिल कर एक रचनात्मक आख्यानन का रूप ले लेते है।

हिंदी के कहानी-उपन्यासों में क्षेत्रीय भूगोल और प्रकृति की मौजूदगी कभी भी ध्यानाकर्षक और उल्लेखनीय हैसियत नही बना पाई, लेकिन इस रचना में ऐसा हुआ है। दक्षिणी राजस्थान का खास भूगोल और प्रकृति अपनी समग्रता यहां मौजूद हैं। यहां के पहाड़ों, नदी-नालों आदि का इतना सूक्ष्म और विस्तृत विवरण इस रचना में आया है कि लगता है जैसे लेखक वहीं का रचा-बसा हो। खास उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें प्रकृति मानवीय जीवन अलग नहीं, उसके साथ अविभाज्य रूप में मौजूद है। मानवीय सुख-दुख, द्वंद,और हास-परिहास यहां के धरती-आकाश, चांद-सूरज धूप-छाया, बादल-बरसात और तारों के साथ आते हैं। प्रकृति इसमें आदिवासियों के सुख-दुख के साथ अपना रूप और रंग बदलती लगती है। उपन्यास में एक जगह ओले गिरने से बना जीवन और का प्रकृति का संयुक्त दृश्य इस तरह है:
“इस दरम्यान चांद घटाओं से घिर चुका था। कुछेक तारे ही पूर्वी गोलार्द्व में टिमटिमा रहे थे। गांव के सर के ठीक ऊपर जोरदार बिजली कौंघी और बादलों की गड़गड़ाहट से सारा अंचल कांप उठा। इक्की-दुक्की बूंदें कहीं-कहीं गिरी तो गिरी, ओलों की बारिश आरंभ हो गई। लपलपाती विद्युत कौधं, घन-घर्जन और तड़ातड़ उपल वृष्टि ...।
वागड़ प्रदेश के इस अंचल की पहाड़ियों के चैन में खलल पड़ा, जंगल की शांत मुद्रा भंग हुई और गांव-गांव का बच्चा-बच्चा जाग गया। प्रौढ़ औरतों ने अपनी झौपडियों से काली हांडिया बाहर फैंकी। बुजुर्ग महिलाओं ने पत्थर की चक्की के पाटों को उल्टी दिशा में फिराया.....।“
ऐसा की एक प्राकृतिक दृश्य इस रचना में उस समय का है जब आदिवासियों में अन्याय और अयाचार के विरुद्व असंतोष और प्रतिकार की भावनाएं गहरा कर बाहर आने के लिए तैयार हैं:
“वागड़ प्रदेश के जंगलों में पलाश के पेड़ों की बेतरतीब शाखाएं फूलों के गुच्छों से लदी हुई थीं। पत्ते तो नाम के थे। दहकते अंगारों से सुर्ख फूल , जैसे जंगल में चारों और आग लगी हो। खेत-खलिहान सूने हो चुके थे। पतझड़ के बाद चैत में फूटी नन्ही कोंपलें अब किशोर हो गयी थीं। जंगल के बीच-बीच में यहां-वहां अमलतास के पेड़ अपने पीले फूलों को टहनियों के गर्भ में पाले हुए थे। सागौन के लम्बे दरख्त जंगल के पहरेदारों से प्रतीत हो रहे थे। इमली, महुआ, सरेस, बरगद, पीपल, जामून, आम के वृक्ष अपनी सघनता के कारण गम्भीर व शांत दिखायी दे रहे थे। मौसम का मिजाज गर्म होता जा रहा था।“

इतिहास और आख्यान के संतुलित और संयमित मेल से बनी इस रचना का आस्वाद पारंपरिक औपन्यासिक रचनाओं से अलग तरह का है। कुछ विधायी दकियानूसों को यह अच्छा नहीं लगेगा, पर उनकी बहुत चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अच्छी रचनाएं हमेशा अनुशासन तोड़ कर ही होती है।

समीक्ष्य पुस्तक: धूणी तपे तीर, साहित्य उपक्रम, जनवरी, 2008, पृष्ठ संख्या:376, मूल्य:100 रुपए
संस्कृति मीमांसा,मार्च-अप्रैल,2009 में प्रकाशित

3 comments:

Ratan Singh Shekhawat said...

पुस्तक समीक्षा के साथ बहुत अच्छी एतिहासिक जानकारी के लिए आभार | " धूणी तपे तीर " उपन्यास के लेखक हरिराम मीणा को शुभकामनाएँ !

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

आपने बहुत श्रम से इस बड़े उपन्यास की सर्वांगपूर्ण समीक्षा की है. बधाई.

प्रमोदपाल सिंह मेघवाल said...

सर,धूणी तपे तीर उपन्यास की समीक्षा के लिए आप तो उसमें पूरे रम गए।