Sunday 12 July 2009

राष्ट्रीय आंदोलन और हिंदी कविता

लगभग दो सौ सालों के ब्रितानी शासन के बाद भारत आजाद हुआ। एक तरह से 1757 में ब्रितानी शासन कायम हुआ और यहीं से उसके विरुद्ध संघर्ष भी शुरू हो गया, जो 1947 तक बराबर जारी रहा। इसकी प्रकृति, ढंग और नजरिया हमेशा और हर जगह एक से नहीं रहे। इसमें कई उतार-चढ़ाव आए और कई मोड़-पड़ावों से गुजर कर यह अपनी मंजिल तक पहुंचा। ब्रितानी शासन के शुरुआती सौ सालों, मतलब 1757 से 1857 तक शासन कंपनी सरकार का था, जिसकी नीयत अपने व्यापारिक हितों क लिए ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों के राजनीतिक अधिकार हासिल करना रही। इसने व्यापार के नाम पर जम कर लूट-खसोट की। इसके व्यापारिक एकाधिकार और राजनीतिक वर्चस्व के विरुद्ध इस दौरान कई आंदोलन हुए। ये आंदोलन ज्यादातर क्षेत्रीय थे और वंचित जमीदारों, सैनिकों, किसानों और धार्मिक नेताओं द्वारा चलाए गए थे। इस सबकी चरम परिणति 1857 के पहले विद्रोह के रूप में हुइ, जो दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ। अब कंपनी सरकार की जगह ब्रितानी साम्राज्य ने ले ली।

आधुनिक किस्म की राजनीति और साम्राज्यवाद के विरोध की शुरुआत यों तो राजा राममोहन राय और डोरजियो जैसे लोगों ने पहले ही कर दी थी, लेकिन 1857 के विद्रोह की असफलता के बाद इसमें तेजी आई। शिक्षित भारतीयों की पहल पर कई संगठन कायम हुए। साम्राज्यवाद के खराब नतीजों पर बहस-मुबाहिसे की शुरुआत हुई। 1857 में कांग्रेस की स्थापना हुई, जो धीरे-धीरे एक देशव्यापी संगठन बन गया। आरंभ में इस संगठन से जुड़ने वाले लोगों का रवैया साम्राज्य के भीतर ही कुछ सुधारों और अधिकारों की मांग करने तक सीमित रहा, लेकिन कुछ समय बाद इसका चरित्र बदल गया। इसका कायाकल्प ऐसे संगठन के रूप में हुआ, जिसने लगभग एक सदी तक ब्रितानी शासन के विरुद्ध भारतीय जनसाधारण के संघर्ष का नेतृत्व किया।

व्यापक राष्ट्रीय भावना और आधुनिक राजनीतिक विचारों का प्रसार बीसवीं सदी के शुरुआती पचास सालों के दौरान हुआ। चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में जनांदोलनों को सफल नेतृत्व देने के बाद 1920 में गांधीजी ने राश्ट्रीय संघर्ष की बागडोर संभाली। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन व्यापक हुआ-इसमें जनभागीदारी बढ़ी और इसकी पहुंच और प्रभाव का दायरा बढ़कर देशव्यापी हो गया। अब संघर्ष के तौर तरीके भी बदल गए-अहिंसा और सत्याग्रह आंदोलन के मुख्य हथियार हो गए। जैसे-जैसे राष्ट्रीय संघर्ष व्यापक और उग्र हुआ, ब्रितानी शासन का दमन और अत्याचार भी बढ़ गए। इसी बीच रूसी क्रांति हुई। राष्ट्रीय संघर्ष के नेतृत्वकर्ताओं, खासकर नेहरू और उनके युवा सहयोगियों की मनोदशाओं और नजरिये में इससे कुछ आधारभूत तब्दीलियां हुईं। उन्होंने राष्ट्रीय संघर्ष में समाजवाद के लक्ष्य को भी शामिल कर लिया। संघर्ष के जो कई अलग-अलग तौर-तरीके थे, उनके चलते नेतृत्व में सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे कई नाम जुड़े। इसी बीच दो विश्व युद्ध हुए, जिनका व्यापक और गहरा प्रभाव राश्ट्रीय आंदोलन पर हुआ।

ब्रितानी शासन के विरुद्ध चला दो सौ सालों का यह आंदोलन देशव्यापी था। शुरुआत में यह अभिजात और पढ़े-लिखे तबकों तक सीमित था, लेकिन आगे चलकर देश के जनसाधारण ने भी कुछ हद तक इसमें भागीदारी की। खास तौर पर गांधीजी के नेतृत्व संभालने के बाद यह समाज के सब तबकों में फैल गया। उन्नीसवीं सदी के दौरान शुरू हुए पुनरुत्थान और समाज सुधार संबंधी आंदोलन भी इस व्यापक राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण घटक थे। इनके कारण फैले उदार और लोकतांत्रिक विचारों से सदियों पुराने धार्मिक और सामाजिक ढांचे में भी रद्दोबदल शुरू हुए। गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों का भी व्यापक प्रभाव पड़ा। इनसे सामाजिक जीवन में उथल-पुथल ओर आत्मालोचन शुरू हुआ। इस व्यापक और गहरी उठापटक का तत्कालीन हिंदी कवि सक्रियता पर भी असर पड़ा। हिंदी की कवि सक्रियता इस दौरान दो रूप अख्तियार करती है। पहली पकार की सक्रियता छायावादी थी-यह इतिहास से कटी जान पड़ती है, लेकिन कुछ हद तक यह अपने समय के राजनीतिक-सामाजिक नवोन्मेष की ही परोक्ष सांस्कृतिक अभिव्यक्ति थी। दूसरी प्रकार की सक्रियता आंदोलन से सीधे संबंधित थी। इसके कवि, सुभद्राकुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन आंदोलन में भागीदार भी थे। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों को कविता से गहरा लगाव था। राष्ट्रीय भावना के कवि माखनलाल चतुर्वेदी पर तिलक का गहरा प्रभाव था, जिन्होंने क्रांतिकारी के रूप में ही अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी।

राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हिंदीभाषी क्षेत्रों में कविता को बतौर हथियार तो इस्तेमाल किया गया, लेकिन यह बहुत प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुई। एक तो हिंदीभाषी क्षेत्र बंगाल और महाराष्ट्र जैसे प्रांतों की तुलना में पिछड़ा हुआ था और यहां पर सामंती-अर्धसामंती निश्प्राण सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों की जकड़बंदी बहुत मजबूत थी, इसलिए यहां की कविता अपने देश के इतिहास और समाज के संबंध में कोई युक्तिसंगत नजरिया नहीं बना पाई। दूसरे, हिंदी कविता की परंपरा में प्रतिष्ठान विरोध को कोई खास सम्मान और स्वीकृति कभी नहीं मिली थी, इसलिए ब्रितानी साम्राज्यवाद के विरोध में यह आरंभ में दुविधा की शिकार रही। फिर हिंदीभाषी क्षेत्रों में आजादी से पहले साक्षरता बहुत कम थी और यहां संचार के साधन बहुत सीमित थे, इसलिए इस कविता की पहुंच और प्रभाव का दायरा भी बहुत सीमित रहा।

उन्नीसवीं सदी के दौरान हिंदी भाषी क्षेत्रों में सामंती-अर्धसामंती व्यवस्था का दबदबा था और इसे ब्रितानी शासन का संरक्षण, समर्थन और प्रोत्साहन भी हासिल था। इस दौरान एक नए पूंजीपति वर्ग का उदय तो हो रहा था, लेकन यह पूरी तरह इसी सामंती व्यवस्था से जकड़ा हुआ था। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय और इसका नेतृत्व करने वाले लोग भी संबंधों की इस जकड़न से पूरी तरह आजाद नहीं थे। अंग्रेजों की अधीनता के संबंध में ये लोग असमंजस के शिकार थे। अंग्रेजों की पराधीनता इनके जातीय स्वाभिमान को चुभती थी, लेकिन ज्यादातर लोग सोचते थे कि उनकी आकांक्षाएं विदेशी आधिपतय के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष के द्वारा नहीं, वरन ब्रितानी पूंजीपती वर्ग की सहायता और संरक्षण से ही पूरी हो सकती हैं। यह दुविधा हिंदी के भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि कवियों की कविता में भी साफ-साफ दिखाई पड़ती है। इन्होंने ´किय सनाथ भोली भारत की प्रजा अनाथन´ कहकर रानी विक्टोरिया की सराहना भी की और ´हिंदी हिंदू और हिंदुस्तान´ का जयगान भी किया।

राश्ट्रीय आंदोलन हिंदी भाषी क्षेत्रों में कुछ हद तक लोकप्रिय तो हुआ, लेकिन इसका यहां के जनसाधारण के आचार-विचार पर कोई निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा। आधुनिक विचारों की जड़ें यहां मजबूत नहीं हो पाई, इसलिए बंगाल और महाराष्ट्र की तरह समाज सुधार का कोई बड़ा आंदोलन यहां नहीं हुआ। दरअसल सड़ी-गली धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं की जड़ें यहां इतनी गहरी और मजबूत थीं कि युक्तियुक्तता, वैज्ञानिक विचार और रहन-सहन का आधुनिक ढंग यहां नहीं फैल पाए। बंगाल और महाराष्ट्र इस मामले में अग्रणी थे। बंगाल में राजा राममोहन राय का ब्रह्म समाज और महाराष्ट्र में महादेव गोविंद रानाडे का प्रार्थना समाज सोच के मामले में कुछ हद तक वैज्ञानिक और प्रगतिशील थे, जबकि हिंदी भाशी क्षेत्रों में चले समाज सुधार आंदोलनों का स्वर मुख्यतया पुनरुत्थानवादी था। ये लोग पश्चिम की ´भौतिकवादी संस्कृति´ की तुलना में भारत की ´आध्यात्मिक संस्कृति´ को खड़ा करते थे और इनकी निगाह में इसकी सुरक्षा के लिए पुरानी धार्मिक परंपराओं को पुनरुत्थान जरूरी था। पुनरुत्थान की यही चेतना हिंदी भाषी क्षेत्रों की कविता में केन्द्रीय सरोकार रही है। मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, माखनलाल चतुर्वेदी आदि सभी कवियों का आग्रह अतीत की पुनर्रचना का है। मैथिलीशरण गुप्त की ´भारत-भारती´ आद्यंत पुनरुत्थान की चेतना से ओतप्रोत है।

राष्ट्रीय आंदोलन से यह भी अपेक्षित था, कि यह देश के इतिहास ओर समाज के संबंध में जनसाधारण में वैज्ञानिक और युक्तिसंगत सोच का विकास करता। दुर्भाग्य से हिंदी भाषी क्षेत्रों में ऐसा नहीं हुआ। यहां सक्रिय कवियों ने भी यह नहीं किया। ब्रितानी उपनिवेशवाद और आर्थिक साम्राज्यवाद ने भारतीय अर्थव्यवस्था और उद्योग धंधों को चौपट कर दिया था, लेकिन इसकी कोई समझ इस दौरान की हिंदी कविता में नहीं मिलती। हिंदी के इन राश्ट्रीय कवियों का इतिहास बोध भी संकीर्ण सोच के कारण कुछ हद तक गड़बड़ लगता है। इनमें से कुछ कवियों ने तो ब्रितानी उपनिवेशवाद की तुलना में मुगलों की पराधीनता को अधिक घातक और हानिकारक ठहराया है, जो ऐतिहासिक सच्चाई नहीं है। युक्तिसंगत ओर उदार समझ के अभाव में इन अधिकांश कवियों का नजरिया भी समाज में दलितों और स्त्रियों की हैसियत को लेकर भी दो टूक नहीं है।

इन कवियों में अतीत प्रेम और पुनरुत्थान की चेतना इतनी प्रबल है कि इनकी सोच वर्णाश्रम व्यवस्था, पितृसत्तात्मक समाज और पारंपरिक धर्म के दायरे से बाहर नहीं निकलती। यहां तक कि इन्होंने अपने गिने-चुने नवाचारों को भी खोज-खाजकर शास्त्र सम्मत ठहराने का प्रयास किया। समाज में स्त्रियों की दोयम दर्जे की हैसियत भी इन राश्ट्रीय कवियों की चिंता और सरोकार नहीं बन पाई। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय महिला कवयित्रियों की ज्यादातर उठापटक भी पारंपरिक पितृसत्तात्मक सामाजिक चार दीवारी तक ही सीमित रही। कवियों के ही क्यों, राष्ट्रीय आंदोलन के पितामह महात्मा गांधी के विचार भी स्त्रियों के संबंध में कुछ हद तक दकियानूसी थे। ´हिंद स्वराज´ में ब्रिटेन की कामकाजी महिलाओं के संबंध में उनकी टिप्पणी का तत्कालीन स्त्री समर्थकों ने विरोध किया था। अपनी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद कथाकार प्रेमचंद के विचार भी स्त्रियों के संबंध में कमोबेश ऐसे ही थे। महादेवी वर्मा की विद्यापीठ की छात्राओं की संबोधित करते हुए उन्होंने आशंका व्यक्त की थी कि नए माहौल की हवा लगने से लडकियां बिगड़ जाएंगी। हिंदी कवियों का दलितों के प्रति नजरिया भी युक्तिसंगत और वैज्ञानिक नहीं है। गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों से दलितों के प्रति हिंदी कविता में सहानुभूति तो बढ़ी, लेकिन दुर्भाग्य से इस संबंध में इसका नजरिया वैज्ञानिक और युक्तिसंगत नहीं हो पाया। दलितों की हैसियत या उनके सामाजिक उत्थान को सरोकार बनाने वाली कोई हिंदी कृति राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान नहीं लिखी गई।

राष्ट्रीय आंदोलन देशव्यापी था, लेकिन सभी क्षेत्रों में इसकी प्रकृति ओर ढंग एक जैसे नहीं थे। हिंदी भाषी क्षेत्र में पारंपरिक सामंती-अर्धसामंती सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों का दबदबा ज्यादा था, इसलिए यहां के राष्ट्रीय आंदोलन मे में बंगाल या महाराष्ट्र जैसी धार नहीं थी। इसके अंतर्विरोधों और अंतर्बाधाओं ने ही यहां की कविता को भी बहुत असरकारी निर्णायक भूमिका मे खड़ा नहीं होने दिया।

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