Thursday 12 November 2009

साहित्य के समक्ष ग्लॉबलाइजेशन, बाजार और मीडिया की चुनौतियां

विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं और संस्कृतियों का मेल और एकरूपीकरण ग्लॉबलाइजेशन है, जिसकी शु़रुआत पंद्रहवीं सदी में उस समय हुई, जब कुछ साहसी यूरोपीय व्यापार की मंशा से नए देशों की खोज में निकले। ग्लॉबलाइजेशन का पहला चरण 1492 में कोलंबस की नयी और पुरानी दुनिया के बीच व्यापार का मार्ग प्रशस्त करने वाली यात्रा से शुरू होकर 1800 तक चलता है। इसने दुनिया को सिकोड़ कर बड़ी से मध्यम आकार में बदल दिया। इस चरण में परिवर्तन का मुख्य घटक और ग्लॉबल एकीकरण की चालक शक्ति देशों की ताकत मतलब बाहुबल, वायु शक्ति और बाद में वाष्प शक्ति को सर्जनात्मक ढंग से प्रयुक्त कर फैलाने की सामर्थ्य थी। विश्व को एक साथ गूंथकर ग्लॉबल एकीकरण का काम इस दौरान देशों और सरकारों ने किया। ग्लॉबलाइजेशन का दूसरा चरण 1800 से शुरू होकर 2000 में समाप्त हुआ, लेकिन यह पहले और दूसरे महायुद्ध के अवसाद से अवरुद्ध हुआ। इस चरण में परिवर्तन का मुख्य घटक और ग्लॉबल एकीकरण की चालक शक्ति बहुराष्ट्रीय कंपनियां थीं। श्रम और बाजारों की तलाश में ये कंपनियां ग्लॉबल हुईं। इस चरण के पूर्वाद्ध में ग्लॉबल एकीकरण की प्रक्रिया को परिवहन की लागत कम हो जाने से बल मिला, जो भाप के इंजिन और रेल-मोटर के कारण संभव हुआ। इस चरण के उत्तरार्द्ध में ग्लॉबल एकीकरण की प्रक्रिया दूर संचार की कीमतें गिर जाने से द्रुत हुई और यह तार, टेलीफोन, पर्सनल कंप्यूटर, सैटेलाइट, फाइबर ऑप्टिक केबल और वल्र्ड वाइड वेब के आरंभिक संस्करण के विस्फोटक प्रसार से संभव हुआ। दुनिया इस चरण में मध्यम से छोटे आकार में तब्दील हो गई। इस चरण में ग्लॉबल अर्थव्यवस्था का जन्म भी हुआ। यह इस अर्थ में कि अब सूचनाओं और वस्तुओं का एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक पर्याप्त मात्रा में यह संचलन हो रहा था। ग्लॉबलाइजेशन की प्रक्रिया में वर्ष 2000 मील का पत्थर साबित हुआ। विख्यात पत्रकार और द वल्र्ड इज फ्लैट नामक बहुचर्चित किताब के लेखक थॉमस एल. फ्रीडमेन के अनुसार इस वर्ष से ग्लॉबलाइजेशन का तीसरा महान चरण शुरू होता है। पहले चरण के ग्लॉबलाइजेशन में चालक शक्ति ग्लॉबल होते हुए देश थे, दूसरे चरण के ग्लॉबलाइजेशन में चालक शक्ति ग्लॉबल होती हुई बहुराष्ट्रीय कंपनियां थीं, जबकि इस तीसरे चरण में ग्लॉबलाइजेशन की चालक शक्ति व्यक्तियों को ग्लोबल स्तर पर सहभागी और प्रतिद्वंद्वी होने की नयी सुलभ ताकत है। व्यक्तियों और समूहों को विश्व स्तर पर सहभागी और प्रतिद्वंद्वी होने में सक्षम बनाने का काम अब हॉर्सपॉवर या हार्डवेयर नहीं, सॉफ्टवेयर कर रहा है, जिसने ग्लॉबल ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क के साथ जुड़कर विश्व के तमाम लोगों को निकटस्थ पड़ोसी बना दिया है। फ्रीडमेन कहते हैं कि दुनिया अब छोटे से नन्ही और सममतल हो गई है। दुनिया के समतल हो जाने का आशय स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं कि “कंप्यूटर, ई-मेल, नेटविर्कंग, टेलीकान्फ्रेंसिंग और द्रुत और नए सॉफ्टवेयर के प्रयोगों द्वारा विश्व इतिहास के किसी भी विगत समय की तुलना में दुनिया के ज्यादा लोग अलग-अलग हिस्सों में होते हुए भी अलग-अलग तरह के कामों के लिए समान धरातल पर एक ही समय में मिलजुल कर या प्रतिस्पर्धी रूप में काम कर सकते हैं।”

ग्लॉबलाइजेशन में मुक्त बाजार की निर्णायक भूमिका है। बाजार के जादू की अवधारणा नयी नहीं है। आधुनिक अर्थ व्यवस्थाओं के जनक कहे जाने वाले एडम स्मिथ ने लगभग 250 साल पहले अपनी विख्यात किताब दी वेल्थ ऑफ नेशन्स में खरीदने वालों और बेचने वालों की समानता को आधार मानकर बाजार को मनुष्य और देशों की आर्थिक समृद्धि की कुंजी सिद्ध किया था। मुक्त बाजार के समर्थन में आज भी यही तर्क दिया जा रहा है। स्मिथ का मुक्त बाजार सीमित था, लेकिन अब यह बहुत व्यापक हो गया है। गत सदी में हुई संचार क्रांति और ब्रेटनवुड्स समझौते के ढह जाने के बाद बाजार पूरी तरह मुक्त और गतिशील हो गया है। कंप्यूटर, फाइबर ऑप्टिक्स, सैटेलाइट्स और इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के लघुकरण से सामग्री और सेवाओं के उत्पादन, वितरण और विक्रय में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। बाजार के निर्णायक और सर्वोपरि हैसियत में आ जाने का दूसरा महत्वपूर्ण कारण ग्लॉबल अर्थव्यवस्था में आया संरचनात्मक परिवर्तन है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रेटन वूड्स में 44 देशों में विश्व व्यापार और मुद्रा परिवर्तन के लिए जो समझौता हुआ, वो 1980 के आसपास ब्रिटेन और अमरीका में मुक्त बाजार समर्थक सरकारों के उदय और बाद में रूस में राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था के बिखर जाने से ढह गया। अब यहां की अर्थव्यवस्थाएं राज्य के नियंत्रण से मुक्त हो गईं। यहां कंपनियों को उत्पादन की लागत कम करने और निवेशकर्ताओं को अधिकतम लाभांश देने के लिए विश्व में कहीं भी जाने की छूट मिल गई। आगे चलकर भारत सहित विश्व के कई और देशों ने भी यही रास्ता अिख्तयार किया। 1997 में पूर्वी एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं के ढह जाने और इन दिनों आई विश्वव्यापी मंदी से ग्लॉबल और मुक्त बाजार के संबंध में कुछ लोगों में यह समझ बनी है कि इसमें सब कुछ वैसा नहीं है, जैसा अपेक्षित था, लेकिन इसके ज्यादातर उत्साही समर्थक इसकी सफलता के संबंध में अभी भी आश्वस्त हैं।
ग्लॉबलाइजेशन के दौरान पहले हार्डवेयर और फिर सॉफ्टवेयर की जो तकनीकी क्रांति हुई है, उसने मीडिया के स्वरूप और चरित्र में भी आधारभूत परिवर्तन कर दिए हैं। संचार तकनीक के विकास और ग्लॉबलाइजेशन ने अब मीडिया को बहुत शक्तिशाली बना दिया है। आरंभिक अवस्था में जब संचार के साधन नहीं थे, तो मीडिया की हैसियत स्वायत्त नहीं थी, लेकिन अब यह स्वायत्त है। यह संदेश के पुनरुत्पादन की प्रक्रिया में संदेश को नया रूप देने और संदेश को नया गढ़ने में सक्षम है। मार्शल मैक्लुहान के शब्दों में अब मीडियम ही संदेश है। ग्लॉबलाइजेशन के दूसरे चरण में जो बहुराष्ट्रीय कंपनियां अस्तित्व में आईं, उन्होंने इस मीडिया की ताकत को पूरी तरह अपने व्यापारिक हितों के पोषण में झोंक दिया है।

ग्लॉबजाइजेशन और उसमें बाजार की सर्वोपरि नियामक के हैसियत से संस्कृति सबसे अधिक प्रभावित हुई है। संस्कृति के उपभोग की कामना को संचार क्रांति और मीडिया विस्फोट से पंख ल गए है। बाजार इसका जमकर फायदा उठा रहा है। उसने संस्कृति को उद्योग में तब्दील कर दिया है। विश्व भर में सांस्कृतिक उत्पादों का व्यापार 1980 के बाद तेजी से बढ़ रहा है। विकासशील देशों में बढ़ोतरी की यह दर सबसे अधिक है। 1980 में यहां इनका व्यापार मूल्य लगभग 50 बीलियन डालर था, जो अब बढ़कर 200 के आसपास पहुंच गया है। फिलहाल भारत में केवल टीवी उद्योग 20,000 करोड़ रुपए सालाना का कूता जाता है और अनुमान है कि यह 22 प्रतिशत की दर से बढ़कर 50,000 करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच सकता है। औद्योगीकरण के साथ-साथ संचार क्रांति और मीडिया विस्फोट से सांस्कृतिक संक्रमण और एकरूपीकरण की प्रक्रिया भी बहुत तेज हो गई है। साहित्य भी एक सांस्कृतिक उत्पाद है इसलिए औद्योगीकरण और तीव्रगति संक्रमण तथा एकरूपीकरण का उस पर गहरा और व्यापक असर हुआ है। औद्योगीकरण के मामले में अभी इसमें असमंजस है, इसलिए अन्य सांस्कृतिक उत्पादों की तुलना में बाजार में यह कोई खास जगह नहीं बना पाया है। एक और खास बात इसके संबंध में यह है कि तमाम परिवर्तनों के बाद भी इसका आवयविक संगठन बहुत पुराना है, जो तीव्र गति सांस्कृतिक संक्रमण और एकरूपीकरण के साथ तालमेल बिठाने में पिछड़ रहा है। इस कारण या तो यह हाशिए पर है या फिर यह अपने को बदलने की जद्दोजहद में लगा हुआ है।

संस्कृति के औद्योगीकरण की प्रक्रिया से पारंपरिक साहित्य में जबर्दस्त बेचैनी है। आरंभिक आंशिक प्रतिरोध के बाद थोडे़ असमंजस के साथ इसमें बाजार की जरूरतों के अनुसार ढलने की प्रक्रिया की शुरुआत हो गई है। साहित्य को उत्पाद मानकर उसकी मार्केटिंग हो रही है। इसका नतीजा यह हुआ कि साहित्य की घटती लोकप्रियता के बावजूद पिछले कुछ सालों से भारत में भी पुस्तकों की ब्रिक्री में असाधारण वृद्धि हुई है। एक सूचना के अनुसार यहां 70,000 पुस्तकें प्रतिवर्ष छपती हैं और ये 10 से 12 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही हैं। साहित्य भी अब साबुन या नूडल्स की तरह उत्पाद है, इसलिए इसकी मार्केटिंग के लिए फिल्म अभिनेताओं का सहारा लेने की बात की जा रही है। इंडिया टुडे कॉनक्लेव, 2004 में शामिल विश्व विख्यात अमरीकी प्रकाशक अल्फ्रेड ए. नॉफ के भारतीय मूल के अध्यक्ष और संपादक सन्नी मेहता ने प्रस्ताव किया कि “कुछ साल पहले अमरीकी टीवी के लोकप्रिय प्रस्तोता ऑप्रा विनफ्रे के साप्ताहिक टीवी बुक क्लब शुरू करने के बाद पुस्तकों की बिक्री काफी बढ़ गई थी। कल्पना की जा सकती है कि अगर आज अमिताभ बच्चन या ऐश्वर्या राय भारत में टीवी पर ऐसा कार्यक्रम शुरू कर दें तो क्या कमाल हो सकता हैं।“ मीडिया में चर्चित और विख्यात होने के कारण सलमान रश्दी, विक्रम सेठ और अरुंधती राय की किताबें तेजी से लोकप्रिय हुई हैं। यह मार्केटिंग का ही कमाल है कि विक्रम सेठ को उनकी गैर औपन्यासिक कृति टू लाइव्स के लिए बतौर अग्रिम 13 लाख पाउंड दिए गए। साहित्यिक किताबों की मार्केटिंग के लिए अब नई-नई रणनीतियां ईजाद की जा रही हैं। अब कई वेबसाइट्स हैं, जो किताबें खरीदने के लिए पाठकों को प्रलोभन देती हैं। हिंदी में भी अब किताब को कमोडिटी का दर्जा दिया जा रहा है और हिंदी प्रकाशन व्यवसाय का कारपोरेटराइजेशन हो रहा है। यही नहीं, हिंदी के प्रकाशक अब प्लेयर की तरह बाजार में उतर रहे हैं।

अब उत्पाद मानकर साहित्य की मार्केटिंग ही नहीं हो रही है, बाजार की मांग के अनुसार इसके सरोकार, वस्तु, शिल्प आदि में भी बदलाव किए जा रहे हैं। इसमें मनोरंजन, उत्तेजना और सनसनी पैदा करने वाले तत्त्वों की घुसपैठ बढ़ी है। इस कारण पिछले कुछ वर्षों से साहित्य में भी राजनेताओं, उच्चाधिकारियों, अभिनेताओं और खिलाड़ियों के व्यक्तिगत जीवन से पर्दा उठाने वाली आत्मकथात्मक, संस्मरणात्मक और जीवनीपरक रचनाओं की स्वीकार्यता बढ़ी है। बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की की यौन लीलाओं के वत्तांत का हिन्दी रूपांतरण मैं शर्मिंदा हूं को साहित्य के एक विख्यात प्रकाशक ने प्रकाशित किया और यह हिन्दी पाठकों में हाथों-हाथ बिक गया। हिन्दी में ही नेहरू और लेडी माउंटबेटन एडविना के प्रणय संबंधों पर आधारित केथरिन क्लैमां के फ्रेंच उपन्यास ने पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित की। इसी तरह विख्यात पत्रिका हंस में राजेन्द्र यादव द्वारा चर्चित प्रसंग होना और सोना एक औरत के साथ को हिन्दी की साहित्यिक बिरादरी ने चटखारे लेकर पढ़ा और सराहा। हिन्दी की श्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं में भी जाने-अनजाने मनोरंजन और उत्तेजना पैदा करने वाले तत्त्वों की मात्रा पिछले दस-बारह सालों में बढ़ी है। मैत्रेयी पुष्पा के साहित्यिक उपन्यासों में रति क्रियाओं के दृश्य अलग से पहचाने जा सकते हैं, विजयमोहनसिंह की कहानियों में सेक्स जबरन ठूंसा गया लगता है तथा अशोक वाजपेयी की कविताओं में रति की सजग मौजूदगी को भी इसी निगाह से देखा जा सकता है। सुरेन्द्र वर्मा का हिन्दी उपन्यास दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता तो संपूर्ण ही ऐसा है। साहित्य में साधारण की जगह असाधारण का आग्रह बाजार की मांग के कारण निरंतर बढ़ रहा है। यूरोपीय और अमरीकी बाजारों में भारतीय और अफ्रीकी लेखकों की किताबें बेस्ट सेलर सूचियों में शामिल हो रही हैं और पुरस्कारों से नवाजी जा रही हैं। हिंदी में भी अज्ञात या अल्पज्ञात जनजातीय यथार्थ पर आधारित अल्मा कबूतरी और रेत जैसे उपन्यास खासे लोकप्रिय हुए हैं।

ग्लॉबलाइजेशन से होने वाले सांस्कृतिक एकरूपीकरण से साहित्यिक अभिव्यक्ति की वाहन अधिकांश अंग्रेजीतर भाषाओं का अस्तित्व संकट में आ गया है। सांस्कृतिक एकरूपीकरण के कारण अधिकांश लोकप्रिय सांस्कृतिक उत्पाद अंग्रेजी भाषा में है इसलिए इनकी लोकप्रियता के साथ अंग्रेजी का वर्चस्व और विस्तार भी तेजी बढ़ रहा है। भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद समाज के सभी वर्गों में अंग्रेजी का चलन बढ़ गया है। कैंब्रिज एनसाइक्लोपीडिया आफ द इंग्लिश लैंग्वेज के लेखक प्रोफेसर डेविड डाल्वी का मानना है कि बहुत जल्दी ही विश्व भर में सबसे ज्यादा अंग्रेजी बोलने वाले भारत में ही होंगे। अंग्रेजी की लोकप्रियता का असर विश्व की दूसरी भाषाओं को बदल भी रहा है। भारत में एक-दो दशकों में अंग्रेजी से प्रभावित हिंदी का नया संस्करण हिंगलिश चलन में आ गया है। प्रीतीश नंदी की यह टिप्पणी भले ही हिंदी साहित्यिक बिरादरी को अतिरंजना लगे, लेकिन इसमें कुछ सच्चाई तो है। वे लिखते हैं- “आप देख रहे हैं कि आजकल ज्यादा से ज्यादा हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी के संवाद इस्तेमाल किए जा रहे है और ज्यादातर हिंदी फिल्मों के गीत भी अंग्रेजी रैप की धुनों पर फिल्माएं जा रहे है। यहां तक कि ब्लैक और ब्लफमास्टर की तर्ज पर फिल्मों के शीर्षक भी अंग्रेजी में होने लगे हैं या फिर कम से कम प्यार के साइड इफैक्ट और टैक्सी नंबर दौ नो ग्यारह जैसे नामों के आधार पर हिंदी-अंग्रेजी का मिश्रण तो हो ही गया है। इस सबसे तो ऐसा लगता है कि हम अंग्रेजी को मिलाकर एक नई मातृभाषा रच रहे है।” विख्यात फिल्म अभिनेता विवेक ओबेराय से एक बार पूछा गया कि आप सपने किस भाषा में देखते है, तो उनका जवाब था हिंगलिश में और जब उनसे पूछा गया कि आप किस भाषा में सोचते हैं, तो उन्होंने कहा कि “भावना की बात हो तो हिन्दी में और विचार हो तो अंग्रेजी में। रस की बातें हिन्दी में होती है और अर्थ की बातें हो तो अंग्रेजी में।” हिन्दी के इस कायांतरण से गत दस-पंद्रह सालों के हिन्दी साहित्य की भाषा में भी असाधारण बदलाव आया है। यह अब पहले जैसी ठोस और ठस साहित्यिक भाषा नहीं रही। यह अब जनसाधारण की बोलचाल की बाजार की भाषा के निकट आ गई है। विख्यात कहानीकार उदयप्रकाश ने एक जगह स्वीकार किया कि “इधर हिन्दी में कई लेखक उभरकर आए हैं जो बाजार की भाषा में लिख रहे हैं और उनके विचार वही हैं, जो हमारे हैं। मुझे लगता है कि हम लोगों को भी जो उन मूल्यों के पक्ष में खड़े हैं, जिन पर आज संकट की घड़ी है, अपना एक दबाव बनाने के लिए बाजार की भाषा को अपनाना पड़ेगा।” यह बदलाव केवल साहित्य के गद्य रूपों की भाषा में ही नहीं, कविता की भाषा में भी हुआ है। यहां आग्रह अब सरलता का है और इसमें बोलचाल की भाषा की नाटकीयता एवं तनाव का रचनात्मक इस्तेमाल हो रहा है।

बाजार ने संस्कृति के उत्पाद और उद्योग में बदलने का लाभ यह हुआ है कि इसका उपयोग पहले की तरह अब कुछ वर्गों तक सीमित नहीं रहा। इसके उपभोग में जाति, धर्म, संप्रदाय और लैंगिक भेदभाव समाप्त हो गया है। साहित्य भी संस्कृति का एक रूप है, इसका भी व्यापक और त्वरित गति से जनतंत्रीकरण हुआ है। इस कारण अब साहित्यिक अभिव्यक्ति और इसके उपभोग की आकांक्षा समाज के सभी वर्गों में खुलकर व्यक्त हुई है। विश्व भर में दलित और स्त्री अस्मिताओं का उभार इसी कारण संभव हुआ है। इस दौरान भारतीय भाषाओं के साहित्य में दलित वर्ग के कई साहित्यकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई। हिन्दी में भी इस दौरान दलित विमर्श मुख्य धारा में आया। दलित वर्ग की तरह ही इधर साहित्य में अपनी अस्मिता के प्रति सचेत स्त्री रचनाकारों ने भी बड़ी संख्या में उपस्थिति दर्ज करवाई है। अंग्रेजी और हिन्दी की लगभग सभी लोकप्रिय और साहितयिक पत्र -पत्रिकाओं ने इस दौरान स्त्री रचनाओं पर विशेषांक प्रकाशित किए हैं। साहित्य के जनतंत्रीकरण का एक और लक्षण गत कुछ वर्षों की हिन्दी की साहित्यिक सक्रियता में खास तौर पर लक्षित किया जा सकता है। पहले हिन्दी की साहित्यिक सक्रियता और प्रकाशन के केन्द्र महानगरों में होते थे। अब ये वहां से शहरों, कस्बों और गांवों में फैल गए हैं। सूचनाओं की सुलभता के कारण दूरदराज के कस्बों-गांवों के रचनाकार आत्मविश्वास के साथ हिन्दी के समकालीन साहित्यिक विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं और अपनी पहचान बना रहे हैं।

ग्लॉबलाइजेशन के अंतिम चरण में व्यक्तियों और समूहों को ग्लॉबल स्तर पर सहभागी और प्रतिद्वंद्वी होने की जो नयी ताकत मिली है, उससे साहित्यिक अभिव्यक्ति की पारंपरिक अवधारणा पूरी तरह बदल जाने की संभावना है। अब साहित्यकार होने के लिए किसी पारंपरिक अर्हता की जरूरत नहीं है। इंटरनेट और वल्र्ड वाइड वेब से यह बहुत आसान हो गया हैं। अब साधारण व्यक्ति अपनी भावनाओं और विचारों को ब्लॉग लिखकर व्यक्त कर सकता है। एक सूचना के अनुसार रोज 1 लाख 20 हजार नए ब्लॉग बनाए जाते हैं और इस समय लगभग 1.2 करोड़ से ज्यादा वयस्क अमरीकियों ने ब्लॉग बना रखे हैं। टेक्नोराती पर इस समय 7 करोड़ से अधिक ब्लॉग देखे जा सकते हैं। अब हिंदी में भी ब्लॉग लिखने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। चिठ्ठा जगत पर 2004 से 2007 के बीच केवल 1000 ब्लॉग थे, लेकिन केवल एक वर्ष में यह संख्या बढ़कर अब 6000 के निकट पहुंच गई है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां और मीडिया बहुराष्ट्रीय पूंजी के नियंत्रण और निर्देशन में जिस उपभोक्तावाद और आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का प्रसार कर रहे हैं उसका प्रतिरोध मुख्यतया साहित्य में ही हो रहा है। यू.आर. अनंतमूर्ति ने पिछले दिनों एक जगह कहा था कि “जैसे टेलीविजन वाले करते हैं वैसे हमें नहीं करना चाहिए। हमें रेसिस्ट करना है, डिसक्रिमीनेट करना है।“ इस प्रतिरोध के कारण गत दस-पंद्रह सालों के हमारे साहित्य के सरोकारों और विषय वस्तु में बदलाव आया है। हिन्दी में भी यह बदलाव साफ देखा जा सकता है। मनुष्य को उसके बुनियादी गुण-धर्म और संवेदना से काटकर महज उपभोक्ता में तब्दील कर दिए जाने की प्रक्रिया का खुलासा करने वाली कई कविताएं इस दौरान हिन्दी में लिखी गई हैं। इसी तरह आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के दुष्परिणामों पर एकाग्र उपन्यास और कहानियां भी हिन्दी में कई प्रकाशित हुई हैं। उपभोक्तावाद और आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया इस दौरान हिन्दी कविता में पलायन की नई प्रवृत्ति के उभार में भी व्यक्त हुई है। कई कवि इस नई स्थिति से हतप्रभ और आहत होकर घर-गांव की बाल किशोरकालीन स्मृतियों में लौट गए हैं। इस कारण इधर की हिन्दी कविता में कहीं-कहीं वर्तमान यथार्थ से मुठभेड़ की जगह स्मृति की मौजूदगी बढ़ गई है।

बाजार और मीडिया साहित्य की शिल्प प्रविधि को भी अनजाने ढंग से प्रभावित कर बदलता है। साहित्यकार मीडिया का उपभोक्ता है इसलिए अनजाने ही उसकी कल्पनाशीलता इससे प्रभावित होती है। इसके अनुसार उसका अनुकूलीकरण होता है। खास तौर पर टीवी के कारण साहित्य की प्रविधि और शिल्प में जबर्दस्त बदलाव हुए हैं। दस-पंद्रह सालों के साहित्य में इस कारण दृश्य का आग्रह बढ़ गया है-यहां वर्णन पहले की तुलना में कम, दृश्य ज्यादा आ रहे हैं। इसी तरह पाठक अब पहले से सूचित है और पहले से ज्यादा जानता है, इसलिए इधर की रचनाओं में सूचनाएं कम हो गई हैं या असाधारण सूचनाएं बढ़ गई हैं। टीवी के प्रभाव के कारण ही लंबी कहानियों और उनके एपिसोडीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी है। साहित्य की पारंपरिक तकनीक रोचकता और रंजकता के पारंपरिक उपकरण ओवर एक्सपोजर से बासी हो गए हैं, इसलिए इधर के हिन्दी साहित्य में इनके विकल्पों के इस्तेमाल की सजगता दिखाई पड़ती है। रचनाकार पुराकथाओं या मिथकों की तरफ लौट रहे हैं और वर्णन की पुरानी शैलियों का नवीनीकरण हो रहा है। बाजार और मीडिया ने पारंपरिक साहित्य में एक और खास तब्दीली की है। अब साहित्यिक विधाओं का स्वरूपगत अनुशासन ढीला पड़ गया है। इनमें परस्पर अंतर्क्रिया और संवाद बढ़ रहा है। इसका असर हिन्दी में भी दिखाई पड़ने लगा है। इसी कारण हिन्दी में उपन्यास आत्मकथा की शक्ल और आत्मकथा उपन्यास की शक्ल में लिखे जा रहे हैं। कहानियां पटकथाएं लगती हैं और संस्मरण कहानी के दायरे में जा घुसे हैं। इसी तरह हिन्दी कविता ने भी अपने पारंपरिक औजारों का मोह लगभग छोड़ दिया है। यह अधिकांश बोलचाल की भाषा के पेच और खम के सहारे हो रही है।

ग्लॉबलाइजेशन और बाजार की सर्वोपरिता के इस दौर में साहित्य का नया रूप क्या होगा, यह अभी तय करना मुश्किल काम है। यह अवश्य है कि यह फिलहाल हाशिए पर है। आगे चलकर इसके कुछ रूप खत्म हो जाएंगे और कुछ पूरी तरह बदल जाएंगे। इस पर रोना-धोना तो होगा, लेकिन यह सब नक्कारखाने में तूती की तरह दब जाएगा।

जनसत्ता के दीपावली विशेषांक,2009 में प्रकाशित

4 comments:

Pandit Kishore Ji said...

achha gyaanvardhak lekh

chandrapal said...

bahut vaicharik aalekh hai..joek do baar aur padhne ki maang karta hai..... chandrapal,mumbai

Kaviraaj said...

बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।

आपका लेख अच्छा लगा।



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Rahul Singh said...

विस्‍तृत सूचना सहित वैचारिक, विश्‍लेषणपरक गंभीर लेख.