Sunday 27 September 2009

गोरा का पुनर्पाठ



रवीन्द्रनाथ कागोरा पुनरुत्थान में अंतर्निहित बंधे हुए, क्षुद्र और विछिन्न हिंदुत्व के छद्म को उजागर करनेवाला विलक्षण और क्लासिक उपन्यास है। यह सही मायने में संकीर्ण हिंदुत्व का साहसपूर्ण और ओजस्वी जवाब है। प्रस्तुत है इस उपन्यास का पुनर्पाठ:


संकीर्णता के प्रतिरोध की सकारात्मक रणनीति

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत की सामाजिक चिंताओं में अतीत सर्वोपरि था, लेकिन इस दौरान अपने रचनाकार को रूप देने वाले रवींद्रनाथ ठाकुर की दृष्टि अतीत के बजाय भविश्य की ओर थी। चेतना पुनरुत्थान की हो या समाज सुधार की, इस दौरान अतीत की आलोचना और पुनरावलोकन ही विमर्श पर काबिज थे। रवींद्रनाथ का नजरिया इससे अलग था। वे द्रष्टा थे-वे बिजली की तरह सत्य का साक्षात्कार करते थे और पल भर में उसके समग्र रूप को पकड़ लेते थे। उन्होंने भी अपने अतीत और वर्तमान को समझा, पहचाना, लेकिन वे वहीं अटक नहीं गए। यहां से उन्होंने भविष्य को देखा। पुनरुत्थान में अंतनिर्हित संकीर्ण हिंदुत्व के जिस संकट से हम बीसवीं सदी के अंतिम समय में रूबरू हुए, उसके खतरे को उन्होंने लगभग सौ वर्ष पहले ही भांप लिया था। उनके उपन्यास गोरा में इस संकीर्ण हिंदुत्व की पहचान और प्रत्याख्यान, दोनों हैं।

रवींद्रनाथ का समय व्यापक सामाजिक उथल-पुथल का था। पुनरुत्थान और समाज सुधार की चेतना ने भारतीय समाज और उसमें भी खास तौर पर रवींद्रनाथ के अपने बंगाली समाज को भीतर तक उद्वेलित कर रखा था। उसमें एक तरफ बंकिमचंद्र और अरविंद घोष जैस नेता थे, जो हिंदू पुनरुत्थानवाद पर जोर दे रहे थे, जबकि दूसरी ओर राजाराम मोहनराय थे, जिनका आग्रह पश्चिम के युक्तिसंगत और वैज्ञानिक नजरिए से हिंदू सामाजिक मान्यताओं और रीति रिवाजों को निरर्थक सिद्ध कर समाज सुधार का था। पुनरुत्थान और समाज सुधार की ये धाराएं इस दौरान के बंगाली समाज में इस गहराई से सक्रिय थीं कि यह पारंपरिक हिंदू और आधुनिक और उदार, ब्राह्म समाज जैसे दो वर्गों में बंट गया था। रवींद्रनाथ बंकिमचंद्र से प्रभावित थे और ब्राह्म समाज से भी उनका गहरा संबंध था। वे इस नवजागरण के पुरस्कर्ताओं में से एक थे, लेकिन उन्होंने इन दो परस्पर विरोधी धाराओं के अतिवाद से अपने को अलग रखा। पुनर्जागरण आंदोलन में अंतनिZहित संकीर्ण हिंदुत्व के खतरे को वे इसीलिए समझ पाए। गोरा का प्रकाशन 1917 में हुआ, लेकिन 1895 में ही उन्होंने कथित पुनर्जागरण आंदोलन में छिपे संकीर्ण हिंदुत्व की असलियत और खतरे की ओर संकेत कर दिया था। बंगीय साहित्य परिशद में दिए गए अपने एक व्याख्यान में उन्होंने कहा कि ´´आज हम साहित्य की धारा को पकड़े हुए हिंदुत्व के उस बृहत, प्रबल, बहुमुखी, सचल, तटगठनशील, सजीव स्रोत पर बहते हुए इस काल से उस काल में नहीं जा सकते। आज हम उसी सूखे रास्ते के बीच-बीच अपनी अभिरुचि और आवश्यकता के अनुसार तालाब खोदकर उसी को हिंदुत्व कह कर पुकारते हैं। यह बंधा हुआ, क्षुद्र, विच्छिन्न हिंदुत्व हमारा व्यक्तिगत संबंध है, उसमें कोई मेरा हिंदुत्व है, कोई तेरा हिंदुत्व है, वह कण्व-कणाद, राघव-कौरव, नंद-उपनंद और हमारे सर्वसाधारण का तरंगित-प्रवाहित अखंड विपुल हिंदुत्व है कि नहीं, इसमें संदेह है।´´

पुनरुत्थान में अंतर्निहित इसे बंधे हुए, क्षुद्र और विछिन्न हिंदुत्व के छद्म को उजागर करने के लिए उन्होंने बाद में गोरा जैसे विलक्षण और क्लासिक उपन्यास की रचना की। यह संकीर्ण हिंदुत्व का साहसपूर्ण और ओजस्वी जवाब था। गोरा एक ऐसे कट्टर और रूढिवादी हिंदू युवक की कथा है, जो अंतत: इस पहचान से मुक्त होकर एक सामान्य मानवीय अस्तित्व रह जाता है। हिंदू धर्म, जाति और कर्मकांड में दुराग्रह की सीमा तक आस्था रखने वाले युवक गोरा को जब पता चलता है कि वह हिंदू की जगह आयरिश माता-पिता की संतान है, तो एक झटके के साथ उसकी धर्म-जाति की पहचान धराशायी हो जाती है और वह जाति, रंग और धर्म विहीन मनुष्य रह जाता है। उसे लगता है कि वह एक संकीर्ण सत्य से मुक्त होकर बृहत सत्य के सामने आ खड़ा हुआ है। वह पाता है कि वह अब सबका है और सब उसके हैं। गोरा की यह मुक्ति अतिनाटकीय है, लेकिन यह इस सत्य को उद्घाटित करती है कि जाति, धर्म और रंग की पहचान जन्म से नहीं, जन्म के बाद संस्कार से बनती है, इसलिए निरर्थक है। उपन्यास के आरंभ में आनंदमयी कहती है कि ´दुनिया में जात लेकर कोई नहीं जन्मता´ और अंत में गोरा सभी संकीर्णताओं से छुटकारा पाकर इस बहुत बड़े सत्य की गोद में आ गिरता है।

पुनरुत्थान में अंतर्निहित संकीर्ण हिंदुत्व स्त्री-पुरुष समानता का भी विरोधी था। उसका नजरिया स्त्रियों को घर के भीतर तक सीमित रखने का था। गोरा की राय में ´´लड़कियां घर के काम में पूरा मन न लगा पाएं, तो उनके कर्तव्य की एकाग्रता नष्ट होती है। गोरा में रवींद्रनाथ इस धारणा के औचित्य को गलत सिद्ध करने के लिए एकाधिक स्वतंत्र विवेक और व्यक्तित्व वाले मजबूत स्त्री चरित्रों की रचना करते हैं। ये स्त्री चरित्र घर के बाहर के भी हैं और घर की चार दीवारी के भीतर के भी हैं। इस उपन्यास की नायिका सुचरिता पूरी तरह स्वतंत्र और अपने विवेक पर निर्भर स्त्री चरित्र है। धर्म, जाति और विचार के दायरे से बाहर निकलकर वह अपने हृदय और सत्य के साथ है। गोरा का लालन-पालन कर बड़ा करने वाली उसकी मां आनंदमयी की सक्रियता घर की चार दीवारी के भीतर तक सीमित है, लेकिन बावजूद इसके वह सहज ही स्वतंत्र दृष्टिकोण वाली स्त्री है। उसने अपने अनुभव से सत्य को पा लिया है और वह जाति, रंग और धर्म की संकीर्णताओं से सहज ही मुक्त है।

गोरा अपने समय से आगे की रचना है, लेकिन यह उससे मुक्त नहीं है। यह अपने समय में गहराई तक धंसी हुई और उससे ओतप्रोत रचना है। गोरा में आया बंगाली समाज हिंदू और ब्राह्म में बंटा हुआ है, लेकिन यह विभाजन बहुत संश्लिष्ट किस्म का है। रवींद्रनाथ इस ऊपर से विभाजित दिखने वाले समाज को भीतरी तहों में जाकर इसके अंतर्विरोधों और द्वंद्वों के यथार्थ को समेटने के लिए कई चरित्रों, कथाओं और आनुषंगिक कथाओं का विधान करते हैं। उनके चरित्र एकरेखीय नहीं हैं। इनके अंतर्विरोधों और द्वंद्वों की विलक्षण समझ रवींद्रनाथ को है। गोरा का मित्र विनय हिंदू है, ब्राह्म धर्म को स्वीकार कर ललिता से विवाह करना चाहता है, लेकिन परेश बाबू से कहता है कि ´´मेरे जीवन में धर्म विश्वास अभी विकसित नहीं हुआ है। इतना भी समझ सका हूं वह भी आपको देखकर। धर्म की मुझे अपने जीवन में सच्ची आवश्यकता नहीं हुई और उसमें सच्चा विश्वास नहीं उत्पन्न हुआ इसलिए मैं कल्पना और युक्ति कौशल से अब तक अपने समाज में प्रचलित धर्म की ही तरह-तरह की सूक्ष्म व्याख्या करके केवल अपने तर्क करने की निपुणता बढ़ाता रहा हूं।´´

जाति, धर्म और रंग की संकीर्णताओं के विरोध का शोरगुल फिलहाल हमारे यहां बहुत है, लेकिन इसका कोई व्यापक और गहरा असर समाज पर हुआ हो, ऐसा नहीं लगता। दरअसल कमजोरी प्रतिरोध की रणनीति में है। यह विरोध एक तो समाज के दायरे से बाहर जाकर किया गया विरोध है और दूसरे यह अतिवाद का शिकार है। लगभग सौ साल पहले इस संकीर्णता के प्रतिरोध की जो सकारात्मक रणनीति रवींद्रनाथ ने गोरा में अख्तियार की थी उसकी आज सबसे अधिक जरूरत है। रवींद्रनाथ का यह प्रतिरोध एक तो अतिवाद से मुक्त था और दूसरे यह समाज के दायरे से बाहर जाकर नहीं, भीतर रह कर था। रवींद्रनाथ समाज के दायरे से बाहर जाकर विरोध करने की निरर्थकता को जानते थे। उन्होंने गोरा के मुख से इसीलिए कहलवाया था कि ´´आपसे मेरा अनुरोध है कि आप भारतवर्ष के भीतर प्रवेश कीजिए। इसकी सारी अच्छाइयों-बुराइयों के बीच खड़ी होइए, जो त्रुटियां हैं उनका भीतर से संशोधन कीजिए।´´



गोरा का कथा सार

गोरा का नायक है गौरमोहन, जिसे सब गोरा कहकर पुकारते थे। उसके शरीर का रंग एकदम गोरा झक था। लंबाई करीब छ: फुट, सीना चौड़ा, दोनों हाथ की मुट्ठियां मानो बाघ के पैर के पंजे हों। गले की आवाज इतनी भारी और गंभीर थी कि अचानक कान में पड़े तो आदमी चौंक उठे। ....उसका व्यक्तित्व सबसे अलग था, ऐसा लगता था जैसे अपने आस-पास से उसका विशेश संबंध न हो, उसके बीच वह जैसे अटपटे ढंग से अचानक उठ खड़ा हुआ हो। कॉलेज के पंडितजी उसे ´रजतगिरी´ कहते थे। आईरिश वंशीय गोरा का जन्म 1857 के गदर के समय इटावा में हुआ था। जन्म के बाद ही उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई और कृष्णदयाल की पत्नी आनंदमयी ने उसका लालन-पालन किया। वह उन्हें ही अपना माता-पिता समझता था। बाद में थोड़ा बड़ा होने पर केशव बाबू का भाशण सुनकर वह ब्राह्म समाज की ओर आकृष्ट हुआ। कृष्णदयाल के घर रोज ही पंडित लोग आया करते थे। मौका मिलते ही गोरा उनसे वाद-विवाद करने बैठ जाता। हरचंद विद्यावगीश से उसने वेदांत पढ़ना शुरू किया। इसी समय एक अंग्रेज मिशनरी ने हिन्दू शास्त्र और समाज की कटु आलोचना करते हुए भारत वासियों को तर्क-युद्ध के लिए ललकारा तो गोरा उससे युद्ध के लिए प्रस्तुत हो गया। कुछ दिनों तक अखबारों में चिट्ठी-पत्री चलती रही। वह बंद होने पर उसने ´हिन्दूइज्म´ नाम से एक किताब लिखना शुरू किया। थोड़े दिनों बाद ही उसने इस काम को अपने ही तर्कों द्वारा व्यर्थ प्रमाणित कर दिया। बोला-´विदेशियों की अदालत में हमारा ही देश मुजरिम की तरह खड़ा हो और विदेशियों द्वारा बनाये कानून द्वारा उसका विचार हो, यह हम कभी न बरदाश्त करेंगे।´ गोरा धीरे-धीरे कट्टर और रूढ़िवादी हिंदू बन गया। उसने संध्या पूजा शुरू कर दी, चुटिया रख ली और खानपान का विचार करने लगा।

गोरा का एक मित्र था विनय। ब्राह्म समाज के परेश बाबू कृष्णदयाल के बचपन के मित्र थे। उनके परिवार के साथ विनय का घनिष्ठ संबंध था। इसे लेकर गोरा बराबर विनय पर आपेक्ष किया करता। यहां तक कि हिंदू समाज के आचार-विचार के प्रति निश्ठा की कमी देखकर उसको अपनी मां आनंदमयी के हाथ का भोजन करने में असुविधा होने लगी। एक बार कृश्णदयाल बाबू के कहने पर गोरा परेश बाबू का कुशल समाचार लेने गया। परेश बाबू के यहां विनय पहले से ही बैठा था। उसकी उपस्थिति की ओर गोरा ने ध्यान ही नहीं दिया। साकार उपासना के प्रति परेश बाबू की स्त्री वरदासुंदरी की उपेक्षा का भाव देखकर वह बोला-`´जो निराकार है वह संपूर्ण नहीं है। जिस प्रकार शब्द में अर्थ निहित रहता है उसी प्रकार आकार में निराकार निहित रहता है।´´ ब्राह्म समाज के हारान बाबू ने बंगालियों के दोश बताए, तो गोरा ने बडे़ गंभीर स्वर में इसका विरोध किया। एक दिन भोजन के बाद रात में गोरा और विनय छत पर चटाई बिछाकर बैठे। विनय अपने आंतरिक भाव को छिपा न सका। परेश बाबू के परिवार में हुए अपने प्रथम प्रेम की चर्चा उसने गोरा से की। गोरा की दृष्टि में प्रेम आदि सदा अत्यंत तुच्छ और त्याज्य रहे, पर विनय की इस अनुभूति ने गोरा को आकृष्ट किया।

गोरा रोज मुहल्ले के निम्न वर्ग के लोगों के यहां आता-जाता। पढ़े-लिखे लोगों के यहां उसका ऐसा सहज आना-जाना नहीं था। गोरा को वे लोग ´दादा ठाकुर´ कहते। इसी बीच आनंदमयी के सौतेले बेटे महिम की लड़की के साथ विनय की और परेश बाबू की बेटी के साथ गोरा के विवाह की बात उठी। गोरा बोला- मैंने जब से अपनी मां को देखा है, जाना है, तब से मुझे संसार की सारी स्त्रियां उसी रूप में दिखलाई पड़ती हैं। गोरा के मत से स्थूल दृष्टि से स्त्रियां रात्रि की तरह प्रच्छन्न होती हैं।

गोरा अपने विचारों पर दृढ़ रहता था। परेश बाबू के यहां आकर उसने हारान बाबू के साथ तर्क शुरू किया। गोरा के मुख पर अवज्ञा भरी हंसी, उसकी घृणापूर्ण भृकुटी, आत्म मर्यादा का गौरव तथा असंदिग्ध विश्वास फिर दिखलाई पड़ा। हारान बाबू के जाने के बाद गोरा का परिचय हुआ सुचरिता से। सुचरिता परेश बाबू के मित्र की कन्या थी और उनके ही आश्रय में पल रही थी। एक शिक्षित लड़की में गोरा ने औद्धत्य और प्रगल्भता की ही आशा की थी। किंतु सुचरिता की बौद्धिक प्रखरता और सलज्ज नम्रता से अभिभूत होकर वह बोला-´´भारत की अपनी एक विशेश प्रकृति है, विशेश शक्ति है, विशेष सत्य है। आपसे मेरा अनुरोध है कि आप भारतवर्ष के भीतर प्रवेश कीजिए। इसकी सारी अच्छाइयों-बुराइयों के बीच खड़ी होइए, जो त्रुटियां हैं उनका भीतर से संशोधन कीजिए।........त्रुटियों के विरुद्ध खड़े होकर.....देश के कोई काम न आइएगा।´´ नरेश बाबू के घर से निकल कर वह पहुंचा गंगा किनारे। उस काले जल के घने अंधकार, नगर के अव्यक्त कोलाहल, नक्षत्रों के धुंधले आलोक में गोरा के संकल्पमय जीवन में एक स्त्री छवि आई। इसका सामना करने के लिए उसने मुट्ठियां कस लीं। तभी बुद्धि से आलोकित और नम्रता से मृदु सुचरिता के दो नेत्रों की दृ उसके मुख पर स्थित हो गयी। पर गोरा को लगा यह दुर्बलता ठीक नहीं। भोजन के बाद पीठ पर एक पोटली बांध कुछेक भक्तों के साथ वह ग्रैंड ट्रंक रोड पर चल पड़ा। कलकत्ता के पढ़े-लिखे भद्र लोगों के समाज से परे भारतवर्ष का ग्रामीण समाज कितना विच्छिन्न है, संकीर्ण हैं, दुर्बल है, इसका प्रथम साक्षात्कार गोरा को इस दौरान हुआ। चरघोषपुर पहुंचने पर उसने पाया कि गांव नील-कर साहबों के अधीन है। गोरा मैजिस्ट्रेट के पास गया। मैजिस्ट्रेट ने गांववालों को ही दोशी बतलाया। गोरा ने उसके उत्तर में कहा, ´सत्य इतना ही है कि गांव वाले निभीZक हैं और स्वाधीनता के प्रति सजग भी।´ गोरा ने चरघोषपुर की प्रजा की ओर से जमानत के लिए दरख्वास्त दी। वकील की खोज में गोरा कलकत्ता की ओर चल पड़ा। रास्ते में छात्रों के एक दल को पुलिस द्वारा अपमानित होते और मार खाते देख गोरा पुलिस से उलझ पड़ा आर उनसे मारपीट करने के फलस्वरूप खुद ही जेल में पहुंच गया। एक महीने बाद जेल से लौटने पर गोरा स्वयं को अपवित्र लगने लगा। इस बीच विनय ने परेश बाबू की लड़की ललिता से विवाह करने का निर्णय कर लिया था। यह सुनकर गोरा क्षुब्ध हो गया। जेल के बंधन से दो अधिष्ठात्री देवियां गोरा को बीच-बीच में मुक्त करती रहती थीं। एक चेहरा मां का था चिरपरिचित दूसरा बुद्धि से आलोकित नम्र सुंदर चेहरा सुचरिता का था। गोरा अपनी देशभक्ति को सुचरिता के साथ मिलकर समान दृष्टि से देखने के लिए व्यग्र था। गोरा कहता- ´´हमारे भारतवर्ष के लिए हम पुरुष तो केवल मेहनत कर सकते हैं, पर तुम न हुई तो प्रदीप जलाकर उसका वरण कौन करेगार्षोर्षो तुम यदि उसके पास से हटकर दूर चली गयी तो भारतवर्ष का रूप सुंदर न होगा।´´ गोरा की इस तरह की बातों से सुचरिता के संशयहीन नेत्रों से आंसू झरने लगते, उसका हृदय भूमिकम्प के समान आंदोलित होने लगता। धर्म विरुद्ध होने के कारण अपने घर से होने वाले विनय के विवाह में गोरा ने केवल बाधा ही नहीं पहुंचाई, वरन स्वयं शामिल होने में असमर्थता भी व्यक्त की। जेल की अपवित्रता दूर करने के लिए उसने एक प्रायिश्चत सभा का आयोजन किया। जेल से छूटने के बाद गोरा नियमपूर्वक गांव में भ्रमण के लिए निकलता। गोरा ने पहली बार लक्ष्य किया कि ग्रामीण समाज में सामाजिक आचार-विचार तथा लोकाचार आदि के बंधन िशक्षित लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक है। उसने यह भी पाया कि उनमें एकता का अभाव है। विनय के विवाह के दिन अपराह्न में गोरा कंधे पर चादर डालकर घूमने निकल पड़ा। घूमते-घूमते वह सुचरिता के मकान के सामने पहुंचा। देखा दरवाजा बंद है। सुचरिता किसी के यहां विवाह में गयी थी। सहसा उसे लगा सुचरिता का द्वार उसके लिए रुद्ध है। गोरा को लगा- ब्राह्मण के लिए तो संसार में नियम-संयम, धर्म-साधना, ज्ञान आदि ही मुख्य हैं, ये ही उसका गौरव है।

काशीपुर के बगीचे में प्रायिश्चत करना तय हुआ। पहले दिन गोरा बगीचे जाने के लिए तैयार हुआ। तभी सुचरिता की मौसी हरिमोहिनी आ गयी। हरिमोहिनी की इच्छा थी कि गोरा सुचरिता को कहीं और विवाह कर लने के लिए समझाए। इस बात से गोरा के मन को गहरी ठेस पहुंची, क्योंकि गोरा ने सुचरिता को एक प्रगाढ़ सत्य के रूप में देखा था। उस सत्य को कोई और कैसे प्राप्त कर सकता है। कृश्णदयाल गोरा के प्रायश्चित में बराबर बाधा खड़ी कर रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि गोरा अंतर से ब्राह्मण नहीं है। बगीचे में पहुंचकर गोरा स्नान करके उठा ही था कि समाचार मिला कि कृश्णदयाल की तबियत बहुत खराब हो गयी है। गोरा तुरंत घर लौट आया और वहीं उसे अपने जन्म का वृत्तांत सुनने को मिला। गोरा ने उद्विग्न भाव से मां की ओर देखा और अचानक ज्वालामुखी के विस्फोट की तरह उसके मुंह से शब्द फूट पड़े-´´मां, तुम मेरी मां नहीं हो..´´ एक-एक करके उसने अपने बारे में सब कुछ सुना। सुनने के साथ ही साथ ही उसकी शैशवकाल में बनी जीवन-भित्ति, उसके बाद का अतीत और आगे का सुनिर्दिष्ट भविष्य, सब लुप्त हो गए। उसकी मां नहीं, बाप नहीं, देश नहीं, जाति नहीं, नाम नहीं, गोत्र नहीं, इष्टदेव नहीं। उसका सब कुछ केवल मात्र एक विराट ´ना´ है।

परेश बाबू हमेशा शास्त्र द्वारा अनुमोदित अनुशासन तथा लोकाचार की अपेक्षा सत्य और हृदय को ही बड़ा मानते थे। ललिता का विवाह करके वे ब्राह्म समाज से च्युत हो गए थे। गोरा उनके पास गया। सुचरिता भी वहां उपस्थित थी। गोरा ने धरती पर सिर टेककर परेश बाबू से कहा- ´मैं हिंदू नहीं हूं...भारतवर्ष में उत्तर से लेकर दक्षिण तक के सभी मंदिरों के द्वार मेरे लिए रुद्ध हैं। आज सारे देश में किसी भी पंक्ति में बैठकर खाने का अधिकार मुझे नहीं है।´ गोरा ने अनुभव किया कि एक संकीर्ण भारतवर्ष का निर्माण करके, उस अभेद्य दुर्ग के भीतर अपनी भक्ति को सर्वथा निरापद रूप में स्थित करने के लिए उसने अपने चारों ओर से कितनी लड़ाई की थी, कितना युद्ध किया था। आज अचानक जाति-गोत्रहीन होकर सर्वथा मुक्त होकर वह एक बृहत सत्य के सामने आ खड़ा हुआ है। आज भारतवर्ष की सब जाति उसकी जाति है, सबका खाद्य उसका खाद्य है। गोरा अब ऐसे देवता का मंत्र चाहता था जो हिंदू, मुसलमान, ईसाई, ब्राह्म सबके हों, जिनका द्वार किसी विशेष जातिवालों के लिए कभी अवरुद्ध न हो, जो केवल हिंदुओं के देवता नहीं, वरन् सारे भारतवर्ष के देवता हों। सुचरिता का हाथ पकड़कर वह परेश बाबू के चरणों में नत हो गया।

संध्या समय घर लौटकर मां आनंदमयी के चरणों को अपने सिर पर रखकर गोरा बोला-´´मां, तुम्हीं मेरी मां हो। जिस मां को मैं खोजता घूम रहा था वे तो मेरे ही घर में उपस्थित थीं। तुम्हीं थी। तुम्हारी जाति नहीं, तुम्हें विचार नहीं, घृणा नहीं, तुम केवल कल्याण की मूर्ति हो। तुम्हीं मेरा भारतवर्ष हो।´´
डेली न्यूज के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग, 27 सितम्बर,2009 को प्रकाशित

4 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

जब तक पुनरुत्थानवाद रहेगा। गोरा हमेशा याद आता रहेगा।

sanjay vyas said...

आभार.मेरी लिए तो दस्तावेजी आलेख है.अतीत के प्रति मिथ्या गौरव की बोझिल गठरी से मुक्त होना ही मानवीय होना है. गुरुदेव की लेखनी को नमन.

pallav said...

badhiya aalekh.badhai.

DUSHYANT said...

badhai..dohree khushee hai..ek ye word verification to hataa len jaraa!