लगभग दो सौ सालों के ब्रितानी शासन के बाद भारत आजाद हुआ। एक तरह से 1757 में ब्रितानी शासन कायम हुआ और यहीं से उसके विरुद्ध संघर्ष भी शुरू हो गया, जो 1947 तक बराबर जारी रहा। इसकी प्रकृति, ढंग और नजरिया हमेशा और हर जगह एक से नहीं रहे। इसमें कई उतार-चढ़ाव आए और कई मोड़-पड़ावों से गुजर कर यह अपनी मंजिल तक पहुंचा। ब्रितानी शासन के शुरुआती सौ सालों, मतलब 1757 से 1857 तक शासन कंपनी सरकार का था, जिसकी नीयत अपने व्यापारिक हितों क लिए ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों के राजनीतिक अधिकार हासिल करना रही। इसने व्यापार के नाम पर जम कर लूट-खसोट की। इसके व्यापारिक एकाधिकार और राजनीतिक वर्चस्व के विरुद्ध इस दौरान कई आंदोलन हुए। ये आंदोलन ज्यादातर क्षेत्रीय थे और वंचित जमीदारों, सैनिकों, किसानों और धार्मिक नेताओं द्वारा चलाए गए थे। इस सबकी चरम परिणति 1857 के पहले विद्रोह के रूप में हुइ, जो दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ। अब कंपनी सरकार की जगह ब्रितानी साम्राज्य ने ले ली।
आधुनिक किस्म की राजनीति और साम्राज्यवाद के विरोध की शुरुआत यों तो राजा राममोहन राय और डोरजियो जैसे लोगों ने पहले ही कर दी थी, लेकिन 1857 के विद्रोह की असफलता के बाद इसमें तेजी आई। शिक्षित भारतीयों की पहल पर कई संगठन कायम हुए। साम्राज्यवाद के खराब नतीजों पर बहस-मुबाहिसे की शुरुआत हुई। 1857 में कांग्रेस की स्थापना हुई, जो धीरे-धीरे एक देशव्यापी संगठन बन गया। आरंभ में इस संगठन से जुड़ने वाले लोगों का रवैया साम्राज्य के भीतर ही कुछ सुधारों और अधिकारों की मांग करने तक सीमित रहा, लेकिन कुछ समय बाद इसका चरित्र बदल गया। इसका कायाकल्प ऐसे संगठन के रूप में हुआ, जिसने लगभग एक सदी तक ब्रितानी शासन के विरुद्ध भारतीय जनसाधारण के संघर्ष का नेतृत्व किया।
व्यापक राष्ट्रीय भावना और आधुनिक राजनीतिक विचारों का प्रसार बीसवीं सदी के शुरुआती पचास सालों के दौरान हुआ। चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में जनांदोलनों को सफल नेतृत्व देने के बाद 1920 में गांधीजी ने राश्ट्रीय संघर्ष की बागडोर संभाली। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन व्यापक हुआ-इसमें जनभागीदारी बढ़ी और इसकी पहुंच और प्रभाव का दायरा बढ़कर देशव्यापी हो गया। अब संघर्ष के तौर तरीके भी बदल गए-अहिंसा और सत्याग्रह आंदोलन के मुख्य हथियार हो गए। जैसे-जैसे राष्ट्रीय संघर्ष व्यापक और उग्र हुआ, ब्रितानी शासन का दमन और अत्याचार भी बढ़ गए। इसी बीच रूसी क्रांति हुई। राष्ट्रीय संघर्ष के नेतृत्वकर्ताओं, खासकर नेहरू और उनके युवा सहयोगियों की मनोदशाओं और नजरिये में इससे कुछ आधारभूत तब्दीलियां हुईं। उन्होंने राष्ट्रीय संघर्ष में समाजवाद के लक्ष्य को भी शामिल कर लिया। संघर्ष के जो कई अलग-अलग तौर-तरीके थे, उनके चलते नेतृत्व में सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे कई नाम जुड़े। इसी बीच दो विश्व युद्ध हुए, जिनका व्यापक और गहरा प्रभाव राश्ट्रीय आंदोलन पर हुआ।
ब्रितानी शासन के विरुद्ध चला दो सौ सालों का यह आंदोलन देशव्यापी था। शुरुआत में यह अभिजात और पढ़े-लिखे तबकों तक सीमित था, लेकिन आगे चलकर देश के जनसाधारण ने भी कुछ हद तक इसमें भागीदारी की। खास तौर पर गांधीजी के नेतृत्व संभालने के बाद यह समाज के सब तबकों में फैल गया। उन्नीसवीं सदी के दौरान शुरू हुए पुनरुत्थान और समाज सुधार संबंधी आंदोलन भी इस व्यापक राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण घटक थे। इनके कारण फैले उदार और लोकतांत्रिक विचारों से सदियों पुराने धार्मिक और सामाजिक ढांचे में भी रद्दोबदल शुरू हुए। गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों का भी व्यापक प्रभाव पड़ा। इनसे सामाजिक जीवन में उथल-पुथल ओर आत्मालोचन शुरू हुआ। इस व्यापक और गहरी उठापटक का तत्कालीन हिंदी कवि सक्रियता पर भी असर पड़ा। हिंदी की कवि सक्रियता इस दौरान दो रूप अख्तियार करती है। पहली पकार की सक्रियता छायावादी थी-यह इतिहास से कटी जान पड़ती है, लेकिन कुछ हद तक यह अपने समय के राजनीतिक-सामाजिक नवोन्मेष की ही परोक्ष सांस्कृतिक अभिव्यक्ति थी। दूसरी प्रकार की सक्रियता आंदोलन से सीधे संबंधित थी। इसके कवि, सुभद्राकुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन आंदोलन में भागीदार भी थे। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों को कविता से गहरा लगाव था। राष्ट्रीय भावना के कवि माखनलाल चतुर्वेदी पर तिलक का गहरा प्रभाव था, जिन्होंने क्रांतिकारी के रूप में ही अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी।
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हिंदीभाषी क्षेत्रों में कविता को बतौर हथियार तो इस्तेमाल किया गया, लेकिन यह बहुत प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुई। एक तो हिंदीभाषी क्षेत्र बंगाल और महाराष्ट्र जैसे प्रांतों की तुलना में पिछड़ा हुआ था और यहां पर सामंती-अर्धसामंती निश्प्राण सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों की जकड़बंदी बहुत मजबूत थी, इसलिए यहां की कविता अपने देश के इतिहास और समाज के संबंध में कोई युक्तिसंगत नजरिया नहीं बना पाई। दूसरे, हिंदी कविता की परंपरा में प्रतिष्ठान विरोध को कोई खास सम्मान और स्वीकृति कभी नहीं मिली थी, इसलिए ब्रितानी साम्राज्यवाद के विरोध में यह आरंभ में दुविधा की शिकार रही। फिर हिंदीभाषी क्षेत्रों में आजादी से पहले साक्षरता बहुत कम थी और यहां संचार के साधन बहुत सीमित थे, इसलिए इस कविता की पहुंच और प्रभाव का दायरा भी बहुत सीमित रहा।
उन्नीसवीं सदी के दौरान हिंदी भाषी क्षेत्रों में सामंती-अर्धसामंती व्यवस्था का दबदबा था और इसे ब्रितानी शासन का संरक्षण, समर्थन और प्रोत्साहन भी हासिल था। इस दौरान एक नए पूंजीपति वर्ग का उदय तो हो रहा था, लेकन यह पूरी तरह इसी सामंती व्यवस्था से जकड़ा हुआ था। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय और इसका नेतृत्व करने वाले लोग भी संबंधों की इस जकड़न से पूरी तरह आजाद नहीं थे। अंग्रेजों की अधीनता के संबंध में ये लोग असमंजस के शिकार थे। अंग्रेजों की पराधीनता इनके जातीय स्वाभिमान को चुभती थी, लेकिन ज्यादातर लोग सोचते थे कि उनकी आकांक्षाएं विदेशी आधिपतय के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष के द्वारा नहीं, वरन ब्रितानी पूंजीपती वर्ग की सहायता और संरक्षण से ही पूरी हो सकती हैं। यह दुविधा हिंदी के भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि कवियों की कविता में भी साफ-साफ दिखाई पड़ती है। इन्होंने ´किय सनाथ भोली भारत की प्रजा अनाथन´ कहकर रानी विक्टोरिया की सराहना भी की और ´हिंदी हिंदू और हिंदुस्तान´ का जयगान भी किया।
राश्ट्रीय आंदोलन हिंदी भाषी क्षेत्रों में कुछ हद तक लोकप्रिय तो हुआ, लेकिन इसका यहां के जनसाधारण के आचार-विचार पर कोई निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा। आधुनिक विचारों की जड़ें यहां मजबूत नहीं हो पाई, इसलिए बंगाल और महाराष्ट्र की तरह समाज सुधार का कोई बड़ा आंदोलन यहां नहीं हुआ। दरअसल सड़ी-गली धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं की जड़ें यहां इतनी गहरी और मजबूत थीं कि युक्तियुक्तता, वैज्ञानिक विचार और रहन-सहन का आधुनिक ढंग यहां नहीं फैल पाए। बंगाल और महाराष्ट्र इस मामले में अग्रणी थे। बंगाल में राजा राममोहन राय का ब्रह्म समाज और महाराष्ट्र में महादेव गोविंद रानाडे का प्रार्थना समाज सोच के मामले में कुछ हद तक वैज्ञानिक और प्रगतिशील थे, जबकि हिंदी भाशी क्षेत्रों में चले समाज सुधार आंदोलनों का स्वर मुख्यतया पुनरुत्थानवादी था। ये लोग पश्चिम की ´भौतिकवादी संस्कृति´ की तुलना में भारत की ´आध्यात्मिक संस्कृति´ को खड़ा करते थे और इनकी निगाह में इसकी सुरक्षा के लिए पुरानी धार्मिक परंपराओं को पुनरुत्थान जरूरी था। पुनरुत्थान की यही चेतना हिंदी भाषी क्षेत्रों की कविता में केन्द्रीय सरोकार रही है। मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, माखनलाल चतुर्वेदी आदि सभी कवियों का आग्रह अतीत की पुनर्रचना का है। मैथिलीशरण गुप्त की ´भारत-भारती´ आद्यंत पुनरुत्थान की चेतना से ओतप्रोत है।
राष्ट्रीय आंदोलन से यह भी अपेक्षित था, कि यह देश के इतिहास ओर समाज के संबंध में जनसाधारण में वैज्ञानिक और युक्तिसंगत सोच का विकास करता। दुर्भाग्य से हिंदी भाषी क्षेत्रों में ऐसा नहीं हुआ। यहां सक्रिय कवियों ने भी यह नहीं किया। ब्रितानी उपनिवेशवाद और आर्थिक साम्राज्यवाद ने भारतीय अर्थव्यवस्था और उद्योग धंधों को चौपट कर दिया था, लेकिन इसकी कोई समझ इस दौरान की हिंदी कविता में नहीं मिलती। हिंदी के इन राश्ट्रीय कवियों का इतिहास बोध भी संकीर्ण सोच के कारण कुछ हद तक गड़बड़ लगता है। इनमें से कुछ कवियों ने तो ब्रितानी उपनिवेशवाद की तुलना में मुगलों की पराधीनता को अधिक घातक और हानिकारक ठहराया है, जो ऐतिहासिक सच्चाई नहीं है। युक्तिसंगत ओर उदार समझ के अभाव में इन अधिकांश कवियों का नजरिया भी समाज में दलितों और स्त्रियों की हैसियत को लेकर भी दो टूक नहीं है।
इन कवियों में अतीत प्रेम और पुनरुत्थान की चेतना इतनी प्रबल है कि इनकी सोच वर्णाश्रम व्यवस्था, पितृसत्तात्मक समाज और पारंपरिक धर्म के दायरे से बाहर नहीं निकलती। यहां तक कि इन्होंने अपने गिने-चुने नवाचारों को भी खोज-खाजकर शास्त्र सम्मत ठहराने का प्रयास किया। समाज में स्त्रियों की दोयम दर्जे की हैसियत भी इन राश्ट्रीय कवियों की चिंता और सरोकार नहीं बन पाई। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय महिला कवयित्रियों की ज्यादातर उठापटक भी पारंपरिक पितृसत्तात्मक सामाजिक चार दीवारी तक ही सीमित रही। कवियों के ही क्यों, राष्ट्रीय आंदोलन के पितामह महात्मा गांधी के विचार भी स्त्रियों के संबंध में कुछ हद तक दकियानूसी थे। ´हिंद स्वराज´ में ब्रिटेन की कामकाजी महिलाओं के संबंध में उनकी टिप्पणी का तत्कालीन स्त्री समर्थकों ने विरोध किया था। अपनी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद कथाकार प्रेमचंद के विचार भी स्त्रियों के संबंध में कमोबेश ऐसे ही थे। महादेवी वर्मा की विद्यापीठ की छात्राओं की संबोधित करते हुए उन्होंने आशंका व्यक्त की थी कि नए माहौल की हवा लगने से लडकियां बिगड़ जाएंगी। हिंदी कवियों का दलितों के प्रति नजरिया भी युक्तिसंगत और वैज्ञानिक नहीं है। गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों से दलितों के प्रति हिंदी कविता में सहानुभूति तो बढ़ी, लेकिन दुर्भाग्य से इस संबंध में इसका नजरिया वैज्ञानिक और युक्तिसंगत नहीं हो पाया। दलितों की हैसियत या उनके सामाजिक उत्थान को सरोकार बनाने वाली कोई हिंदी कृति राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान नहीं लिखी गई।
राष्ट्रीय आंदोलन देशव्यापी था, लेकिन सभी क्षेत्रों में इसकी प्रकृति ओर ढंग एक जैसे नहीं थे। हिंदी भाषी क्षेत्र में पारंपरिक सामंती-अर्धसामंती सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों का दबदबा ज्यादा था, इसलिए यहां के राष्ट्रीय आंदोलन मे में बंगाल या महाराष्ट्र जैसी धार नहीं थी। इसके अंतर्विरोधों और अंतर्बाधाओं ने ही यहां की कविता को भी बहुत असरकारी निर्णायक भूमिका मे खड़ा नहीं होने दिया।
Sunday, 12 July 2009
Tuesday, 2 June 2009
इतिहास और आख्यान की जुगलबंदी
उपनिवेशकालीन दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी विद्रोह पर एकाग्र हरिराम मीणा की रचना धूणी तपे तीर को यों तो उपन्यास की संज्ञा दी गई है, लेकिन यह इतिहास और दस्तावेज भी है। गल्प के अनुशासन में होने के कारण यह एक औपन्यासिक रचना है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज होने के कारण इसका साहित्येतर महत्व भी बहुत है। यह रचना हिंदी में साहित्य की साहित्येतर अनुशासनों के साथ बढ़ रही निकटता और इससे होने वाली अंतिर्कयाओं की भी साक्ष्य है।
हिंदी में किसी घटना या व्यक्ति पर गहन और व्यापक शोध आधारित उपन्यास लिखने की कोई समृद्व परपंरा नही है। हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यासों की जो परपंरा है , उसमें शामिल अधिकांश उपन्यास पुनरुत्थान की चेतना से ओतप्रोत है। खास बात यह है कि इनमें तथ्यों को कल्पना से पुष्ट और विस्तृत करने के बजाय विकृत गया है। इनमें दूरस्थ अतीत की केवल कल्पनाप्रधान पुनर्रचना और अमूर्तन है। हरिराम मीणा की यह रचना हिंदी में अपनी तरह की पहली रचना है, जो उपनिवेशकालीन निकट अतीत के एक आदिवासी विद्रोह पर की गई गहन और व्यापक शोध पर आधारित है और जिसमें तथ्यों को कल्पना से विकृत या अमूर्त करने के बजाय पुष्ट और विस्तृत किया गया है।
यह रचना राजस्थान के दक्षिणी भूभाग में उपनिवेशकाल के दौरान ब्रिटिश-सामंती गठजोड़ के विरुद्ध हुए आदिवासी विद्रोह पर आधारित है। यह विद्रोह कोई मामूली उपद्रव या उत्पात नहीं था। उपनिवेशकाल से पहले तक अपनी जमीन और जंगलों पर आदिवासियों का सहज और निर्विवाद स्वामित्व था। सामंतों की उनके वर्चस्व वाले इलाकों में पहुंच और दखलंदाजी सीमित थी और वे अपने इलाकों में खुदमुख्तार थे। अंग्रेजो से संधियों के बाद रियासती सामंतो ने जंगल और जमीन पर आदिवासियों के इस पारंपरिक स्वामित्व और वर्चस्व में दखलंदांजी शुरू कर की। उनके रखवाली और बोलाई जैसे पारंपरिक अधिकार छीन लिए गए। अंग्रजों के समर्थन और सहयोग से आदिवासियों का दमन और शोषण भी बढ़ गया। इसके लिए खैरवाड़ा में मेवाड़ भील कोर की स्थापना की गई। वंचित और दमित-शोषित आदिवासियों में धीरे-धीरे असंतोष बढने लगा और विद्रोह होने लगे। पहला सफल विद्रोह बारापाल और पडोना में हुआ और धीरे-धीरे यह दूसरे इलाकों में भी फैल गया। इसकी चरम परिणति 1913 के मानगढ़ विद्रोह में हुई। यह केवल एक क्षेत्रीय विद्रोह नहीं था। यह तत्कालीन राजपुताना की आदिवासी बहुल मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और कुशलगढ़ के साथ गुजरात की पड़ोसी ईडर और संतरामपुर रियासतों तक विस्तृत था। इसका नेतृत्व 1858 में डूंगरपुर रियासत के बांसिया गांव में उत्पन्न बनजारा जाति के समाज सुधारक और क्रांतिकारी गोविदंगरु ने किया, जिन्हें आदिवासियों का व्यापक समर्थन और सहयोग प्राप्त था। गोविंद गुरु ने आदिवासी नायक पूंजा के साथ मिल कर संप सभा के माध्यम से तीन दशकों तक निरंतर आदिवासियों में पहले जागृति का काम किया। उन्होंने इसके लिए गांव-फलियों में संप सभाएं और धूणियां कायम कीं। उन्होंने आदिवासियों में सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन के लिए आंदोलन चलाए। खास तौर पर आदिवासियों में शराब के व्यापक चलन के विरुद्व उन्होंने सफल मुहिम चलाई, जिसका परिणाम यह हुआ कि बांसवाडा रियासत में 1913 में शराब की खपत 18,740 गैलन से घटकर केवल 5,154 गैलन रह गई। उन्होने घूम-घूम कर गांव-फलियों में जागृति और अन्याय-अत्याचार के प्रतिकार के लिए समर्पित और निषठावान कार्यकर्ताओं का एक संगठन खडा किया। अंतत: 1913 में आरपार की लड़ाई शुरू हुई। गोविंद गुरु के आह्वान पर 25,000 आदिवासी रणनीतिक महत्व के पहाड़ मानगढ़ पर एकत्रित हुए। अंग्रेजों ने इस विद्रोह के दमन के लिए रियासती फौजों के साथ अपनी सात सैनिक कंपनियां लगाई। विद्रोह को नृशंसतापूर्वक कुचल दिया गया। इस दौरान लगभग 1500 आदिवासी मारे गए, इतने ही घायल हुए और 900 विद्रोही आदिवासियों को गोविंद गुरु सहित गिरफ्तार कर लिया गया।
यह एक संगठित, सुनियोजित, दीर्घकालीन और तैयारी के बाद किया गया विद्रोह था, जिसमें शहीद होने वोले आदिवासियों की संख्या जलियावाला हत्याकांड से चार गुना अधिक थी। विडंबना यह है कि इतिहास में इसका उल्लेख नहीं है। राजस्थान के सामंतो का विस्तृत इतिहास लिखने वाले गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसके संबंध में केवल इतना ही लिखकर किनारा कर लिया कि “मानगढ़ पर एकत्रित कुछ भीलों ने उत्पात मचा रखा था। फौज को गोलियां चलानी पड़ी। कुछ भील मारे गए।“ इस विद्राह से संबंधित पर्याप्त अभिलेख हैं, लोक साक्ष्य हैं, लेकिन अभी तक उनको एक जगह एकत्रित नहीं किया गया था। इस रचना में लेखक ने पहली बार इन सभी को गहन और व्यापक शोध के बाद एक जगह एकत्रित किया है और इस तरह इस विद्रोह को एक मुकम्मिल पहचान देने की कोशिश की है।
इतिहास के साथ यह कृति एक रचनात्मक आख्यान भी है। लेखक इसमें बहुत कौशल के साथ संयम में रहकर इतिहास को रचना में ढालता है। यह मुश्किल काम है, लेकिन लेखक ने इसे खूबी के साथ अंजाम दिया है। वह इसमें तथ्य की जमीन पर मजबूती से अपने पांव जमा कर फिर अपनी कल्पना को ढील देता है। इस रचना में ऐसे कई प्रसंग हैं, जो तथ्य और कल्पना के असाधारण संयोग से संभव हुए हैं। मेवाड़ भील कोर को रायफल देने के लिए आयोजित उत्सव, पालपा के जागीरदार के विरुद्ध दड़वाह की जमीन के लिए आदिवासी संघर्ष के प्रसंग इसके अच्छे उदाहरण हैं। मानगढ़ विद्रोह का दैनंदिन विवरण भी तथ्य और कल्पना के संयोग के कारण ही इसमे बहुत बसरदार बन गया है। चरित्रों के गठन और विस्तार में भी लेखक ने यही किया है। गोविंद गुरु के चरित्र मेके गठन और निर्माण में तथ्यों को कल्पना से ही विस्तार दिया गया है। लोक में उनकी छवि धार्मिक आधार वाले संत-महात्मा की थी और मूलत: वे एक समाज सुधारक और क्रांतिकारी थे, लेकिन लेखक कल्पना के सहारे उनके इन दोनों रूपों को मिला कर एक नई छवि गढता है। इसमें पूंजा और कमली के चरित्र भी इस तरह गढ़े गए हैं। अलबत्ता लेखक ने कुरिया का चरित्र गढ़ने में कल्पना की अतिरिक्त छूट ली है। कुरिया की ऊहापोह और अंतर्सघर्ष को लेखक कल्पना के सहारे खास दिशा देता ल है। कुल मिला कर इतिहास, दस्तावेज , लोककथाएं, लोकगीत, जनश्रृतियां आदि इस कृति में लेखक की कल्पना के साथ घुल मिल कर एक रचनात्मक आख्यानन का रूप ले लेते है।
हिंदी के कहानी-उपन्यासों में क्षेत्रीय भूगोल और प्रकृति की मौजूदगी कभी भी ध्यानाकर्षक और उल्लेखनीय हैसियत नही बना पाई, लेकिन इस रचना में ऐसा हुआ है। दक्षिणी राजस्थान का खास भूगोल और प्रकृति अपनी समग्रता यहां मौजूद हैं। यहां के पहाड़ों, नदी-नालों आदि का इतना सूक्ष्म और विस्तृत विवरण इस रचना में आया है कि लगता है जैसे लेखक वहीं का रचा-बसा हो। खास उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें प्रकृति मानवीय जीवन अलग नहीं, उसके साथ अविभाज्य रूप में मौजूद है। मानवीय सुख-दुख, द्वंद,और हास-परिहास यहां के धरती-आकाश, चांद-सूरज धूप-छाया, बादल-बरसात और तारों के साथ आते हैं। प्रकृति इसमें आदिवासियों के सुख-दुख के साथ अपना रूप और रंग बदलती लगती है। उपन्यास में एक जगह ओले गिरने से बना जीवन और का प्रकृति का संयुक्त दृश्य इस तरह है:
“इस दरम्यान चांद घटाओं से घिर चुका था। कुछेक तारे ही पूर्वी गोलार्द्व में टिमटिमा रहे थे। गांव के सर के ठीक ऊपर जोरदार बिजली कौंघी और बादलों की गड़गड़ाहट से सारा अंचल कांप उठा। इक्की-दुक्की बूंदें कहीं-कहीं गिरी तो गिरी, ओलों की बारिश आरंभ हो गई। लपलपाती विद्युत कौधं, घन-घर्जन और तड़ातड़ उपल वृष्टि ...।
वागड़ प्रदेश के इस अंचल की पहाड़ियों के चैन में खलल पड़ा, जंगल की शांत मुद्रा भंग हुई और गांव-गांव का बच्चा-बच्चा जाग गया। प्रौढ़ औरतों ने अपनी झौपडियों से काली हांडिया बाहर फैंकी। बुजुर्ग महिलाओं ने पत्थर की चक्की के पाटों को उल्टी दिशा में फिराया.....।“
ऐसा की एक प्राकृतिक दृश्य इस रचना में उस समय का है जब आदिवासियों में अन्याय और अयाचार के विरुद्व असंतोष और प्रतिकार की भावनाएं गहरा कर बाहर आने के लिए तैयार हैं:
“वागड़ प्रदेश के जंगलों में पलाश के पेड़ों की बेतरतीब शाखाएं फूलों के गुच्छों से लदी हुई थीं। पत्ते तो नाम के थे। दहकते अंगारों से सुर्ख फूल , जैसे जंगल में चारों और आग लगी हो। खेत-खलिहान सूने हो चुके थे। पतझड़ के बाद चैत में फूटी नन्ही कोंपलें अब किशोर हो गयी थीं। जंगल के बीच-बीच में यहां-वहां अमलतास के पेड़ अपने पीले फूलों को टहनियों के गर्भ में पाले हुए थे। सागौन के लम्बे दरख्त जंगल के पहरेदारों से प्रतीत हो रहे थे। इमली, महुआ, सरेस, बरगद, पीपल, जामून, आम के वृक्ष अपनी सघनता के कारण गम्भीर व शांत दिखायी दे रहे थे। मौसम का मिजाज गर्म होता जा रहा था।“
इतिहास और आख्यान के संतुलित और संयमित मेल से बनी इस रचना का आस्वाद पारंपरिक औपन्यासिक रचनाओं से अलग तरह का है। कुछ विधायी दकियानूसों को यह अच्छा नहीं लगेगा, पर उनकी बहुत चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अच्छी रचनाएं हमेशा अनुशासन तोड़ कर ही होती है।
समीक्ष्य पुस्तक: धूणी तपे तीर, साहित्य उपक्रम, जनवरी, 2008, पृष्ठ संख्या:376, मूल्य:100 रुपए
संस्कृति मीमांसा,मार्च-अप्रैल,2009 में प्रकाशित
हिंदी में किसी घटना या व्यक्ति पर गहन और व्यापक शोध आधारित उपन्यास लिखने की कोई समृद्व परपंरा नही है। हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यासों की जो परपंरा है , उसमें शामिल अधिकांश उपन्यास पुनरुत्थान की चेतना से ओतप्रोत है। खास बात यह है कि इनमें तथ्यों को कल्पना से पुष्ट और विस्तृत करने के बजाय विकृत गया है। इनमें दूरस्थ अतीत की केवल कल्पनाप्रधान पुनर्रचना और अमूर्तन है। हरिराम मीणा की यह रचना हिंदी में अपनी तरह की पहली रचना है, जो उपनिवेशकालीन निकट अतीत के एक आदिवासी विद्रोह पर की गई गहन और व्यापक शोध पर आधारित है और जिसमें तथ्यों को कल्पना से विकृत या अमूर्त करने के बजाय पुष्ट और विस्तृत किया गया है।
यह रचना राजस्थान के दक्षिणी भूभाग में उपनिवेशकाल के दौरान ब्रिटिश-सामंती गठजोड़ के विरुद्ध हुए आदिवासी विद्रोह पर आधारित है। यह विद्रोह कोई मामूली उपद्रव या उत्पात नहीं था। उपनिवेशकाल से पहले तक अपनी जमीन और जंगलों पर आदिवासियों का सहज और निर्विवाद स्वामित्व था। सामंतों की उनके वर्चस्व वाले इलाकों में पहुंच और दखलंदाजी सीमित थी और वे अपने इलाकों में खुदमुख्तार थे। अंग्रेजो से संधियों के बाद रियासती सामंतो ने जंगल और जमीन पर आदिवासियों के इस पारंपरिक स्वामित्व और वर्चस्व में दखलंदांजी शुरू कर की। उनके रखवाली और बोलाई जैसे पारंपरिक अधिकार छीन लिए गए। अंग्रजों के समर्थन और सहयोग से आदिवासियों का दमन और शोषण भी बढ़ गया। इसके लिए खैरवाड़ा में मेवाड़ भील कोर की स्थापना की गई। वंचित और दमित-शोषित आदिवासियों में धीरे-धीरे असंतोष बढने लगा और विद्रोह होने लगे। पहला सफल विद्रोह बारापाल और पडोना में हुआ और धीरे-धीरे यह दूसरे इलाकों में भी फैल गया। इसकी चरम परिणति 1913 के मानगढ़ विद्रोह में हुई। यह केवल एक क्षेत्रीय विद्रोह नहीं था। यह तत्कालीन राजपुताना की आदिवासी बहुल मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और कुशलगढ़ के साथ गुजरात की पड़ोसी ईडर और संतरामपुर रियासतों तक विस्तृत था। इसका नेतृत्व 1858 में डूंगरपुर रियासत के बांसिया गांव में उत्पन्न बनजारा जाति के समाज सुधारक और क्रांतिकारी गोविदंगरु ने किया, जिन्हें आदिवासियों का व्यापक समर्थन और सहयोग प्राप्त था। गोविंद गुरु ने आदिवासी नायक पूंजा के साथ मिल कर संप सभा के माध्यम से तीन दशकों तक निरंतर आदिवासियों में पहले जागृति का काम किया। उन्होंने इसके लिए गांव-फलियों में संप सभाएं और धूणियां कायम कीं। उन्होंने आदिवासियों में सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन के लिए आंदोलन चलाए। खास तौर पर आदिवासियों में शराब के व्यापक चलन के विरुद्व उन्होंने सफल मुहिम चलाई, जिसका परिणाम यह हुआ कि बांसवाडा रियासत में 1913 में शराब की खपत 18,740 गैलन से घटकर केवल 5,154 गैलन रह गई। उन्होने घूम-घूम कर गांव-फलियों में जागृति और अन्याय-अत्याचार के प्रतिकार के लिए समर्पित और निषठावान कार्यकर्ताओं का एक संगठन खडा किया। अंतत: 1913 में आरपार की लड़ाई शुरू हुई। गोविंद गुरु के आह्वान पर 25,000 आदिवासी रणनीतिक महत्व के पहाड़ मानगढ़ पर एकत्रित हुए। अंग्रेजों ने इस विद्रोह के दमन के लिए रियासती फौजों के साथ अपनी सात सैनिक कंपनियां लगाई। विद्रोह को नृशंसतापूर्वक कुचल दिया गया। इस दौरान लगभग 1500 आदिवासी मारे गए, इतने ही घायल हुए और 900 विद्रोही आदिवासियों को गोविंद गुरु सहित गिरफ्तार कर लिया गया।
यह एक संगठित, सुनियोजित, दीर्घकालीन और तैयारी के बाद किया गया विद्रोह था, जिसमें शहीद होने वोले आदिवासियों की संख्या जलियावाला हत्याकांड से चार गुना अधिक थी। विडंबना यह है कि इतिहास में इसका उल्लेख नहीं है। राजस्थान के सामंतो का विस्तृत इतिहास लिखने वाले गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसके संबंध में केवल इतना ही लिखकर किनारा कर लिया कि “मानगढ़ पर एकत्रित कुछ भीलों ने उत्पात मचा रखा था। फौज को गोलियां चलानी पड़ी। कुछ भील मारे गए।“ इस विद्राह से संबंधित पर्याप्त अभिलेख हैं, लोक साक्ष्य हैं, लेकिन अभी तक उनको एक जगह एकत्रित नहीं किया गया था। इस रचना में लेखक ने पहली बार इन सभी को गहन और व्यापक शोध के बाद एक जगह एकत्रित किया है और इस तरह इस विद्रोह को एक मुकम्मिल पहचान देने की कोशिश की है।
इतिहास के साथ यह कृति एक रचनात्मक आख्यान भी है। लेखक इसमें बहुत कौशल के साथ संयम में रहकर इतिहास को रचना में ढालता है। यह मुश्किल काम है, लेकिन लेखक ने इसे खूबी के साथ अंजाम दिया है। वह इसमें तथ्य की जमीन पर मजबूती से अपने पांव जमा कर फिर अपनी कल्पना को ढील देता है। इस रचना में ऐसे कई प्रसंग हैं, जो तथ्य और कल्पना के असाधारण संयोग से संभव हुए हैं। मेवाड़ भील कोर को रायफल देने के लिए आयोजित उत्सव, पालपा के जागीरदार के विरुद्ध दड़वाह की जमीन के लिए आदिवासी संघर्ष के प्रसंग इसके अच्छे उदाहरण हैं। मानगढ़ विद्रोह का दैनंदिन विवरण भी तथ्य और कल्पना के संयोग के कारण ही इसमे बहुत बसरदार बन गया है। चरित्रों के गठन और विस्तार में भी लेखक ने यही किया है। गोविंद गुरु के चरित्र मेके गठन और निर्माण में तथ्यों को कल्पना से ही विस्तार दिया गया है। लोक में उनकी छवि धार्मिक आधार वाले संत-महात्मा की थी और मूलत: वे एक समाज सुधारक और क्रांतिकारी थे, लेकिन लेखक कल्पना के सहारे उनके इन दोनों रूपों को मिला कर एक नई छवि गढता है। इसमें पूंजा और कमली के चरित्र भी इस तरह गढ़े गए हैं। अलबत्ता लेखक ने कुरिया का चरित्र गढ़ने में कल्पना की अतिरिक्त छूट ली है। कुरिया की ऊहापोह और अंतर्सघर्ष को लेखक कल्पना के सहारे खास दिशा देता ल है। कुल मिला कर इतिहास, दस्तावेज , लोककथाएं, लोकगीत, जनश्रृतियां आदि इस कृति में लेखक की कल्पना के साथ घुल मिल कर एक रचनात्मक आख्यानन का रूप ले लेते है।
हिंदी के कहानी-उपन्यासों में क्षेत्रीय भूगोल और प्रकृति की मौजूदगी कभी भी ध्यानाकर्षक और उल्लेखनीय हैसियत नही बना पाई, लेकिन इस रचना में ऐसा हुआ है। दक्षिणी राजस्थान का खास भूगोल और प्रकृति अपनी समग्रता यहां मौजूद हैं। यहां के पहाड़ों, नदी-नालों आदि का इतना सूक्ष्म और विस्तृत विवरण इस रचना में आया है कि लगता है जैसे लेखक वहीं का रचा-बसा हो। खास उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें प्रकृति मानवीय जीवन अलग नहीं, उसके साथ अविभाज्य रूप में मौजूद है। मानवीय सुख-दुख, द्वंद,और हास-परिहास यहां के धरती-आकाश, चांद-सूरज धूप-छाया, बादल-बरसात और तारों के साथ आते हैं। प्रकृति इसमें आदिवासियों के सुख-दुख के साथ अपना रूप और रंग बदलती लगती है। उपन्यास में एक जगह ओले गिरने से बना जीवन और का प्रकृति का संयुक्त दृश्य इस तरह है:
“इस दरम्यान चांद घटाओं से घिर चुका था। कुछेक तारे ही पूर्वी गोलार्द्व में टिमटिमा रहे थे। गांव के सर के ठीक ऊपर जोरदार बिजली कौंघी और बादलों की गड़गड़ाहट से सारा अंचल कांप उठा। इक्की-दुक्की बूंदें कहीं-कहीं गिरी तो गिरी, ओलों की बारिश आरंभ हो गई। लपलपाती विद्युत कौधं, घन-घर्जन और तड़ातड़ उपल वृष्टि ...।
वागड़ प्रदेश के इस अंचल की पहाड़ियों के चैन में खलल पड़ा, जंगल की शांत मुद्रा भंग हुई और गांव-गांव का बच्चा-बच्चा जाग गया। प्रौढ़ औरतों ने अपनी झौपडियों से काली हांडिया बाहर फैंकी। बुजुर्ग महिलाओं ने पत्थर की चक्की के पाटों को उल्टी दिशा में फिराया.....।“
ऐसा की एक प्राकृतिक दृश्य इस रचना में उस समय का है जब आदिवासियों में अन्याय और अयाचार के विरुद्व असंतोष और प्रतिकार की भावनाएं गहरा कर बाहर आने के लिए तैयार हैं:
“वागड़ प्रदेश के जंगलों में पलाश के पेड़ों की बेतरतीब शाखाएं फूलों के गुच्छों से लदी हुई थीं। पत्ते तो नाम के थे। दहकते अंगारों से सुर्ख फूल , जैसे जंगल में चारों और आग लगी हो। खेत-खलिहान सूने हो चुके थे। पतझड़ के बाद चैत में फूटी नन्ही कोंपलें अब किशोर हो गयी थीं। जंगल के बीच-बीच में यहां-वहां अमलतास के पेड़ अपने पीले फूलों को टहनियों के गर्भ में पाले हुए थे। सागौन के लम्बे दरख्त जंगल के पहरेदारों से प्रतीत हो रहे थे। इमली, महुआ, सरेस, बरगद, पीपल, जामून, आम के वृक्ष अपनी सघनता के कारण गम्भीर व शांत दिखायी दे रहे थे। मौसम का मिजाज गर्म होता जा रहा था।“
इतिहास और आख्यान के संतुलित और संयमित मेल से बनी इस रचना का आस्वाद पारंपरिक औपन्यासिक रचनाओं से अलग तरह का है। कुछ विधायी दकियानूसों को यह अच्छा नहीं लगेगा, पर उनकी बहुत चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अच्छी रचनाएं हमेशा अनुशासन तोड़ कर ही होती है।
समीक्ष्य पुस्तक: धूणी तपे तीर, साहित्य उपक्रम, जनवरी, 2008, पृष्ठ संख्या:376, मूल्य:100 रुपए
संस्कृति मीमांसा,मार्च-अप्रैल,2009 में प्रकाशित
Thursday, 9 April 2009
जीवन की पुनर्रचना
अन्य कथेतर गद्य विधाओं में जीवनी सर्वाधिक प्राचीन है। पश्चिम में जीवनी लेखन बहुत पहले से शुरू हो गया था। युनानी जेनोफोन और प्लूटार्क तथा रोमन टैसिटस और सेयेटोनियस जैसे जीवनीकार वहां 1800 वर्ष पहले हो गए थे। आरंभ में जीवनियां विशिष्ट व्यक्तियों-राजाओं और धर्मगुरुओं की लिखी जाती थीं, लेकिन उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में इसमें बदलाव हुए। अब जीवनियां सामान्य व्यक्तियों की भी लिखी जाती हैं। भारतीय परंपरा में भी जीवनी राजप्रशस्ति, चरित वर्णन आदि रूपों में बहुत पहले से विद्यमान है। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजी साहित्य के संपर्क-संसर्ग के बाद यहां भी आधुनिक जीवनी लेखन की शुरुआत हुई। पश्चिम में जीवनी अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप है।
जीवनी का आशय और अर्थ तय करने का काम स्वयं जीवनीकारों ने भी किया है और आलोचकों ने भी। दरअसल यह इतना स्पष्ट साहित्य रूप है कि इस संबंध में कोई खास विवाद नहीं है। जीवनी किसी व्यक्ति विशेश के जीवन का वृत्तांत है। अंग्रेजी में इसके लिए लाइफ और बायोग्राफी शब्दों का प्रयोग होता है। जीवनी में किसी व्यक्ति विशेश के व्यतीत जीवन की पुनर्रचना होती है। हैरी हुडनी, एडगर एलन पो आदि विख्यात लोगों के जीवनीकार कैनेथ सिल्वर मेन ने जीवनी को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ´´किसी अन्य व्यक्ति के जीवन की विश्वसनीय प्रमाणों वाली आख्यानात्मक नाटकीय प्रस्तुति की जीवनी कह सकते है।´´ कुछ साहित्य आलोचक जीवनी को साहित्य रूप मानने के विरुद्ध है। उनके अनुसार इसमें तथ्य और पत्रकारीय शैली का इस्तेमाल होता है। जीवनी का रूप जीवनीकार और लक्ष्य जीवन के संबंध पर निर्भर करता है। जीवनीकार जब जीवनी शुरू करता है, तो उसे खुद पता नहीं होता कि यह आगे जाकर क्या रूप ग्रहण करेगी। विख्यात जीवनीकार माइकेल हॉलरॉयड का कहना था कि ´´जीवनी एक ऐसी विधा है, जिसमें जीवनीकार आरंभ में चरित नायक से शादी तो कर लेता है, पर उसकी निभेगी कि नहीं, यह जीवनीकार को भी पता नहीं होता।´´ जीवनी की परिभाषा देने का काम हिंदी में भी हुआ है। बाबू गुलाबराय ने जीवनी में चरित्र वर्णन में कलात्मकता पर खास तौर पर जोर दिया है। उनके अपने शब्दों में ´´जीवनी लेखक अपने चरित नायक के अंतर-बाह्य स्वरूप का चित्रण कलात्मक ढंग से करता है। इस चित्रण में वह अनुपात और शालीनता का पूरा ध्यान रखता हुआ सहृयता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ अपने चरित नायक के गुण दोष मय सजीव व्यक्तित्व का एक आकर्षक शैली में उद्घाटन करता है।´´ इस तरह जीवनी किसी व्यक्ति विशेश के जीवन पर एकाग्र ऐसा साहित्य रूप है, जिसमें तथ्य, इतिहास, कला, कल्पना आदि सभी का योग रहता है।
जीवनकार लक्ष्य व्यक्ति के जीवन में जब कुछ खास देखता है, तभी वह उसे जीवनी के रूप में ढालने के लिए पे्ररित होता है। आम तौर पर लोगों का जीवन कमोबेश एक जैसा होता है। उनके दैनंदिन जीवन में कोई खास बात नहीं होती, लेकिन फिर भी मनुश्य मन के भीतर के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा जीवनकारों को जीवनी लिखने के लिए प्रवृत्त करती है। कथाकार अरुणप्रकाश के शब्दों में कहें तो ´´एक मनुष्य हर तरह का जीवन एक जन्म में नहीं जी सकता, इसीलिए वह दूसरों के जीवनानुभव में शिरकत करना चाहता है, क्योंकि वह यह भी जानता है कि रोजमर्रापन की पुनरावृत्ति के बावजूद हर मनुश्य में कुछ न कुछ विशिश्ट होता है। हर जीत और हार का रंग अलग-अलग होता है और रंग एक भी हुआ, तो रंगआभा अलग-अलग होती है।´´ दुनिया के सब लोगों की जीवनियां नहीं होती, और जिन लोगों के जीवनियां लिखी जाती हैं वे खास होते हैं। उनका जीवन समृद्ध और खास, मतलब लीक से हटकर होता है। वे पारंपरिक जीवन से हटकर अपने जीवन में कुछ ऐसा नया जोड़ते हैं, जो दूसरों के दैनंदिन जीवन से अलग और खास होता है।
आम तौर पर जीवनी में किसी व्यक्ति का संपूर्ण जीवन होता है, पर इसके अपवाद भी मिलते हैं। अक्सर जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को जीवनी के दायरे में लेता है। वह उसके जन्म और जन्म से पहले की परिस्थितियों से आरंभ करता है और क्रमश: उसके निधन और बाद के हालतों तक जाता है। इस तरह उसका लक्ष्य अपने चरित नायक के संपूर्ण जीवन की पुनर्रचना होता है। लेकिन यह कोई नियम नहीं है। जीवनी कई बार लक्ष्य व्यक्ति के जीवन काल में लिखी जाती है, तब उसमें संपूर्ण जीवन की पुनर्रचना संभव नहीं होती। कभी-कभी लक्ष्य व्यक्ति के जीवन का कोई भाग या खंड भी जीवनी का रूप ले लेता है। आरंभिक दौर में जीवनियों में व्यवस्था और अनुशासन होता था। जीवनीकार व्यक्ति के समग्र जीवन को रूपायित करते थे, लेकिन अब हालात बदल गए है। जीवनीकार अब लक्ष्य व्यक्ति के जीवन की पुनर्रचना में स्वच्छंद रहते हैं। वे व्यक्ति के जीवन के किसी एक या एकाधिक खंडों और पहलुओं को जीवनी का आधार बनाते हैं। नयी जीवनियों में लक्ष्य व्यक्ति का जीवन भी क्रमश: विकसित नहीं होता। अब कई जीवनीकार व्यक्तित्व को पहले प्रस्तुत कर फिर घटनाओं के संस्मरणों से उसे पुश्ट करते हैं। स्पष्ट है कि जीवनी में संपूर्ण जीवन आए, ऐसा कोई नियम नहीं है। यह जीवनीकार की दृष्टि और विवेक पर निर्भर है कि वह लक्ष्य व्यक्ति के जीवन से क्या ले और क्या छोड़ दे।
जीवनी में वस्तुपरकता बहुत आवश्यक तत्त्व है। जीवनी इस कारण इतिहास के निकट लगती है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन को तथ्यों को आधार पर गढ़ता है। तथ्यों पर निर्भरता ही जीवनी को विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाती है। अन्य साहित्यिक विधाओं में कल्पना का सहारा लिया जा सकता है, लेकिन जीवनी में वस्तुपरकता के बिना काम नहीं चलता। वस्तुपरकता तथ्यों से आती है इसलिए तथ्यों की अवहेलना या उनके साथ छेड़छाड़ से जीवनी की प्रमाणिकता संदिग्ध हो जाती है। कथाकार अरुणप्रकाश के अनुसार ´´वस्तुपरकता ही अच्छी जीवनी का सबसे बड़ा निकश है, जिसका निर्वहन प्रमाण, तर्क और प्रस्तुति में संतुलन के जरिए किया जाता है।´´ यह सही है कि जीवनी कुछ हद तक इतिहास है और उसकी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के लिए वस्तुपरकता जरूरी है, लेकिन अंतत: जीवनी एक साहित्य रूप है इसलिए इसे नीरस नहीं होना चाहिए। जीवनी में कुछ अंश तक कल्पना या कथातत्त्व भी चाहिए, लेकिन यह तथ्य के इदगिर्द ही रहे, तो अच्छा है। तथ्य जीवनी की रीढ है, लेकिन ´´केवल तथ्य किसी चरित नायक को जीवंत नहीं बना सकते। बल्कि कोरे तथ्य जीवनी को उबाउ बनाएंगे। इसके लिए जीवनीकार कुछ तथ्यों को छोड़ता ही नहीं, तथ्यों के अंबार में से सटीक तथ्य चुनता भी है। वह तथ्यों के क्रम में भी हेर-फेर करता है।´´
जीवनी में चरित्र-चित्रण का बहुत महत्व है। जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के अंतर्बाह्य, दोनों रूपों को उजागर करता है। यह आवश्यक है कि जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के शरीर, मुद्रा आदि के साथ उसमें अंतर्निहित भय, उर्जा, उल्लास और अवसाद को भी चित्रित करे। जीवनी में चरित्र का क्रमिक विकास होता है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के विभिन्न चरणों का क्रमश: इस तरह से वर्णन करता है कि उसका चरित्र निरंतर विकसित होकर अपनी अंतिम परिणति तक पहुंचता है। जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति की चारित्रिक विशेशताओं की केवल नामोल्लेख नहीं करता। वह घटनाओं के वर्णन से इन चरित्रिक विशेशताओं को उजागर करता है। पहले जीवनियां केवल महान् और सकारात्मक चरित्रों की लिखी जाती थी और जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति की लघुता और दोशों पर नहीं जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। जीवनीकार अब महानता के झांसे में नहीं आता, वह चरित नायक का शिकार करता है। आस्कर वाइल्ड ने जीवनीकारों के दृष्टिकोण में आए इस बदलाव की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि ´´पहले हम अपने नायकों को मानक बनाकर पेश किया करते थे। आधुनिक तरीका उन्हें अश्लील सिद्ध करने का है।´´ जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के चरित्र निर्धारण में कभी-कभी मनोविश्लेशण का तरीका काम में लेता है। शरतचंद्र के जीवन पर आधारित आवारा मसीहा में विष्णु प्रभाकर कहीं-कहीं ऐसा ही करते हैं।
स्व विवेक और स्वेच्छा से लिखी गई जीवनियां दबाव से लिखी गई जीवनियों की तुलना में अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय होती हैं। मध्यकाल और उससे पहले राजा, सामंत आदि अपने आश्रित रचनाकारों से अपनी प्रशस्तिपरक जीवनियां लिखवाते थे। यह काम लोभवश दबाव में होता था, इसलिए इनमें सच्चाई कम, अतिरंजना ज्यादा होती थीं। रासो और चरित रचनाएं इसी श्रेणी की रचनाएं हैं। स्व विवेक या स्वेच्छा से लिखी रचनाएं भी मध्यकाल और उससे पहले की कई हैं और इनका सम्मान भी खूब होता है। नाभादास की भक्तमाल ऐसी ही रचना है, जो मध्यकालीन संत-भक्तों के जीवन के संबंध में आधारभूत सामग्री उपलब्ध करवाती है। दबाव में जीवनी लिखने का काम अभी भी जारी है। राजनेता, उद्योगपति, क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म अभिनेता आदि की जीवनियां स्वविवेक से कम, दबाव में अधिक लिखी गई हैं।
लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के संबंध में जानकारी के स्रोत जितने ज्यादा और विविध होंगे, जीवनी उतनी ही असरदार बनेगी। जीवनीकार अक्सर इस संबंध में प्रकाशित अन्य पुस्तकों और लेखों का सहयोग लेता है। वह लक्ष्य व्यक्ति की डायरी, पत्राचार आदि का भी उपयोग करता है। वह उसके मित्र-परिचितों से साक्षात्कार-भेंट करता और उससे संबंधित नगरों-स्थानों आदि का भ्रमण करता है। यह लक्ष्य व्यक्तित्व पर निर्भर करता है कि उससे संबंधित सामग्री कहां मिलेगी। राजनीतिक व्यक्तित्वों का जीवन सार्वजनिक होता है इसलिए उनसे संबंधित दस्तावेज खूब मिल जाते हैं। गांधी- नेहरू के जीवन के संबंध में हमारे यहां दस्तावेज खूब मिलते हैं। साहित्यकारों का जीवन रहस्यमय होता है और उनके व्यक्तिगत जीवन के संबंध में जानकारियां कम मिलती हैं। जीवनीकार से यह अपेक्षित है कि वह अपनी स्रोत सामग्री का इस्तेमाल बहुत ध्यानपूर्वक करे। इसमें अनेक मोन सत्य और मुखर झूठ भरे होते है, जिनकी निर्ममता से छानबीन बहुत जरूरी है। अमृतराय ने कलम का सिपाही और विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा में स्रोत सामग्री की छानबीन और शोध बहुत अच्छी तरह से की। इसका उपयोग भी इन्होंने बहुत कौशल और रचनात्मक ढंग से किया है।
पश्चिम में जीवनी लेखन और उसकी स्वीकार्यता को लेकर हमेशा से माहौल उत्साह का रहा है, जबकि हमारे यहां इस संबंध में शुरू से ही गहरी उदासीनता है। विद्वान इसका कारण हमारी अलग संस्कृति को मानते है। दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दिलचस्पी अंग्रेजी समाज में पागलपन की हद तक है, जबकि भारतीय एक-दूसरे के निजी जीवन में ताकझांक को गलत मानते हैं। इसके अलावा भारतीय समाज मिथक-विदग्ध समाज है। इतिहास में उसकी दिलचस्पी बहुत कम है और जीवनी मिथक नहीं, इतिहास है। रासो और चरित रचनाओं को छोड़ दें तो हिंदी में जीवनी लेखन की शुरुआत उपनिवेशकाल में हुई। कार्तिक प्रसाद खत्री ने 1893 में मीराबाई का जीवन चरित्र लिखा। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पूर्व आधुनिक कालीन साहित्यकारों और धर्माचार्यों की जीवनियां लिखीं। इस युग को दो जीवनीकारों, रमाशंकर व्यास और देवीप्रसाद मुंसिफ का इस क्षेत्र में योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। व्यास ने भारतेंदु की साहित्यिक जीवनी लिखी, जबकि मुंसिफ ने मीरा, रहीम और सूरदास के अलावा बाबर, हुमायुं, शेरशाह, अकबर, राणा सांगा, बीकाजी, जैतसी, मानसिंह आदि की जीवनियां लिखीं। देवीप्रसाद मुंसिफ ने लगभग तीस जीवनियां लिखीं, लेकिन आलोचकों ने उनको कभी अपनी निगाह में नहीं लिया। हिंदी समाज में जीवनी को लेकर उदासीनता इस हद तक है कि साहित्यिक दृष्टि से मूल्यवान जीवनियां यहां कुल चार-पांच ही लिखी गई हैं। नवजागरणकालीन साहित्यकारों-प्रेमचंद, सुमद्राकुमारी चौहान और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पर क्रमश: अमृतराय की कलम का सिपाही, सुधा चौहान की मिला तेज से तेज और रामविलास शर्मा की निराला की साहित्य साधना नामक जीवनियां ही साहित्यिक महत्व की हैं। गहरी संबद्धता और मनोयोग से लिखी ये जीवनियां इन युगांतरकारी साहित्यकारों के जीवन और साहित्य की हमारी समझ को विस्तृत और गहरा करती है। विख्यात बंगला साहित्यकार शरतचंद्र के नाटकीय और घटनापूर्ण जीवन पर एकाग्र विष्णु प्रभाकर की आवारा मसीहा और कवि आलोचक मुक्तिबोध के जीवन संघर्ष पर आधारित विष्णुचंद्र शर्मा की मुक्तिबोध की आत्मकथा भी ऐसी ही उल्लेखनीय रचनाएं है।
जीवनी का आशय और अर्थ तय करने का काम स्वयं जीवनीकारों ने भी किया है और आलोचकों ने भी। दरअसल यह इतना स्पष्ट साहित्य रूप है कि इस संबंध में कोई खास विवाद नहीं है। जीवनी किसी व्यक्ति विशेश के जीवन का वृत्तांत है। अंग्रेजी में इसके लिए लाइफ और बायोग्राफी शब्दों का प्रयोग होता है। जीवनी में किसी व्यक्ति विशेश के व्यतीत जीवन की पुनर्रचना होती है। हैरी हुडनी, एडगर एलन पो आदि विख्यात लोगों के जीवनीकार कैनेथ सिल्वर मेन ने जीवनी को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ´´किसी अन्य व्यक्ति के जीवन की विश्वसनीय प्रमाणों वाली आख्यानात्मक नाटकीय प्रस्तुति की जीवनी कह सकते है।´´ कुछ साहित्य आलोचक जीवनी को साहित्य रूप मानने के विरुद्ध है। उनके अनुसार इसमें तथ्य और पत्रकारीय शैली का इस्तेमाल होता है। जीवनी का रूप जीवनीकार और लक्ष्य जीवन के संबंध पर निर्भर करता है। जीवनीकार जब जीवनी शुरू करता है, तो उसे खुद पता नहीं होता कि यह आगे जाकर क्या रूप ग्रहण करेगी। विख्यात जीवनीकार माइकेल हॉलरॉयड का कहना था कि ´´जीवनी एक ऐसी विधा है, जिसमें जीवनीकार आरंभ में चरित नायक से शादी तो कर लेता है, पर उसकी निभेगी कि नहीं, यह जीवनीकार को भी पता नहीं होता।´´ जीवनी की परिभाषा देने का काम हिंदी में भी हुआ है। बाबू गुलाबराय ने जीवनी में चरित्र वर्णन में कलात्मकता पर खास तौर पर जोर दिया है। उनके अपने शब्दों में ´´जीवनी लेखक अपने चरित नायक के अंतर-बाह्य स्वरूप का चित्रण कलात्मक ढंग से करता है। इस चित्रण में वह अनुपात और शालीनता का पूरा ध्यान रखता हुआ सहृयता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ अपने चरित नायक के गुण दोष मय सजीव व्यक्तित्व का एक आकर्षक शैली में उद्घाटन करता है।´´ इस तरह जीवनी किसी व्यक्ति विशेश के जीवन पर एकाग्र ऐसा साहित्य रूप है, जिसमें तथ्य, इतिहास, कला, कल्पना आदि सभी का योग रहता है।
जीवनकार लक्ष्य व्यक्ति के जीवन में जब कुछ खास देखता है, तभी वह उसे जीवनी के रूप में ढालने के लिए पे्ररित होता है। आम तौर पर लोगों का जीवन कमोबेश एक जैसा होता है। उनके दैनंदिन जीवन में कोई खास बात नहीं होती, लेकिन फिर भी मनुश्य मन के भीतर के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा जीवनकारों को जीवनी लिखने के लिए प्रवृत्त करती है। कथाकार अरुणप्रकाश के शब्दों में कहें तो ´´एक मनुष्य हर तरह का जीवन एक जन्म में नहीं जी सकता, इसीलिए वह दूसरों के जीवनानुभव में शिरकत करना चाहता है, क्योंकि वह यह भी जानता है कि रोजमर्रापन की पुनरावृत्ति के बावजूद हर मनुश्य में कुछ न कुछ विशिश्ट होता है। हर जीत और हार का रंग अलग-अलग होता है और रंग एक भी हुआ, तो रंगआभा अलग-अलग होती है।´´ दुनिया के सब लोगों की जीवनियां नहीं होती, और जिन लोगों के जीवनियां लिखी जाती हैं वे खास होते हैं। उनका जीवन समृद्ध और खास, मतलब लीक से हटकर होता है। वे पारंपरिक जीवन से हटकर अपने जीवन में कुछ ऐसा नया जोड़ते हैं, जो दूसरों के दैनंदिन जीवन से अलग और खास होता है।
आम तौर पर जीवनी में किसी व्यक्ति का संपूर्ण जीवन होता है, पर इसके अपवाद भी मिलते हैं। अक्सर जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को जीवनी के दायरे में लेता है। वह उसके जन्म और जन्म से पहले की परिस्थितियों से आरंभ करता है और क्रमश: उसके निधन और बाद के हालतों तक जाता है। इस तरह उसका लक्ष्य अपने चरित नायक के संपूर्ण जीवन की पुनर्रचना होता है। लेकिन यह कोई नियम नहीं है। जीवनी कई बार लक्ष्य व्यक्ति के जीवन काल में लिखी जाती है, तब उसमें संपूर्ण जीवन की पुनर्रचना संभव नहीं होती। कभी-कभी लक्ष्य व्यक्ति के जीवन का कोई भाग या खंड भी जीवनी का रूप ले लेता है। आरंभिक दौर में जीवनियों में व्यवस्था और अनुशासन होता था। जीवनीकार व्यक्ति के समग्र जीवन को रूपायित करते थे, लेकिन अब हालात बदल गए है। जीवनीकार अब लक्ष्य व्यक्ति के जीवन की पुनर्रचना में स्वच्छंद रहते हैं। वे व्यक्ति के जीवन के किसी एक या एकाधिक खंडों और पहलुओं को जीवनी का आधार बनाते हैं। नयी जीवनियों में लक्ष्य व्यक्ति का जीवन भी क्रमश: विकसित नहीं होता। अब कई जीवनीकार व्यक्तित्व को पहले प्रस्तुत कर फिर घटनाओं के संस्मरणों से उसे पुश्ट करते हैं। स्पष्ट है कि जीवनी में संपूर्ण जीवन आए, ऐसा कोई नियम नहीं है। यह जीवनीकार की दृष्टि और विवेक पर निर्भर है कि वह लक्ष्य व्यक्ति के जीवन से क्या ले और क्या छोड़ दे।
जीवनी में वस्तुपरकता बहुत आवश्यक तत्त्व है। जीवनी इस कारण इतिहास के निकट लगती है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन को तथ्यों को आधार पर गढ़ता है। तथ्यों पर निर्भरता ही जीवनी को विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाती है। अन्य साहित्यिक विधाओं में कल्पना का सहारा लिया जा सकता है, लेकिन जीवनी में वस्तुपरकता के बिना काम नहीं चलता। वस्तुपरकता तथ्यों से आती है इसलिए तथ्यों की अवहेलना या उनके साथ छेड़छाड़ से जीवनी की प्रमाणिकता संदिग्ध हो जाती है। कथाकार अरुणप्रकाश के अनुसार ´´वस्तुपरकता ही अच्छी जीवनी का सबसे बड़ा निकश है, जिसका निर्वहन प्रमाण, तर्क और प्रस्तुति में संतुलन के जरिए किया जाता है।´´ यह सही है कि जीवनी कुछ हद तक इतिहास है और उसकी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के लिए वस्तुपरकता जरूरी है, लेकिन अंतत: जीवनी एक साहित्य रूप है इसलिए इसे नीरस नहीं होना चाहिए। जीवनी में कुछ अंश तक कल्पना या कथातत्त्व भी चाहिए, लेकिन यह तथ्य के इदगिर्द ही रहे, तो अच्छा है। तथ्य जीवनी की रीढ है, लेकिन ´´केवल तथ्य किसी चरित नायक को जीवंत नहीं बना सकते। बल्कि कोरे तथ्य जीवनी को उबाउ बनाएंगे। इसके लिए जीवनीकार कुछ तथ्यों को छोड़ता ही नहीं, तथ्यों के अंबार में से सटीक तथ्य चुनता भी है। वह तथ्यों के क्रम में भी हेर-फेर करता है।´´
जीवनी में चरित्र-चित्रण का बहुत महत्व है। जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के अंतर्बाह्य, दोनों रूपों को उजागर करता है। यह आवश्यक है कि जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के शरीर, मुद्रा आदि के साथ उसमें अंतर्निहित भय, उर्जा, उल्लास और अवसाद को भी चित्रित करे। जीवनी में चरित्र का क्रमिक विकास होता है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के विभिन्न चरणों का क्रमश: इस तरह से वर्णन करता है कि उसका चरित्र निरंतर विकसित होकर अपनी अंतिम परिणति तक पहुंचता है। जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति की चारित्रिक विशेशताओं की केवल नामोल्लेख नहीं करता। वह घटनाओं के वर्णन से इन चरित्रिक विशेशताओं को उजागर करता है। पहले जीवनियां केवल महान् और सकारात्मक चरित्रों की लिखी जाती थी और जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति की लघुता और दोशों पर नहीं जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। जीवनीकार अब महानता के झांसे में नहीं आता, वह चरित नायक का शिकार करता है। आस्कर वाइल्ड ने जीवनीकारों के दृष्टिकोण में आए इस बदलाव की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि ´´पहले हम अपने नायकों को मानक बनाकर पेश किया करते थे। आधुनिक तरीका उन्हें अश्लील सिद्ध करने का है।´´ जीवनीकार लक्ष्य व्यक्ति के चरित्र निर्धारण में कभी-कभी मनोविश्लेशण का तरीका काम में लेता है। शरतचंद्र के जीवन पर आधारित आवारा मसीहा में विष्णु प्रभाकर कहीं-कहीं ऐसा ही करते हैं।
स्व विवेक और स्वेच्छा से लिखी गई जीवनियां दबाव से लिखी गई जीवनियों की तुलना में अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय होती हैं। मध्यकाल और उससे पहले राजा, सामंत आदि अपने आश्रित रचनाकारों से अपनी प्रशस्तिपरक जीवनियां लिखवाते थे। यह काम लोभवश दबाव में होता था, इसलिए इनमें सच्चाई कम, अतिरंजना ज्यादा होती थीं। रासो और चरित रचनाएं इसी श्रेणी की रचनाएं हैं। स्व विवेक या स्वेच्छा से लिखी रचनाएं भी मध्यकाल और उससे पहले की कई हैं और इनका सम्मान भी खूब होता है। नाभादास की भक्तमाल ऐसी ही रचना है, जो मध्यकालीन संत-भक्तों के जीवन के संबंध में आधारभूत सामग्री उपलब्ध करवाती है। दबाव में जीवनी लिखने का काम अभी भी जारी है। राजनेता, उद्योगपति, क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म अभिनेता आदि की जीवनियां स्वविवेक से कम, दबाव में अधिक लिखी गई हैं।
लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के संबंध में जानकारी के स्रोत जितने ज्यादा और विविध होंगे, जीवनी उतनी ही असरदार बनेगी। जीवनीकार अक्सर इस संबंध में प्रकाशित अन्य पुस्तकों और लेखों का सहयोग लेता है। वह लक्ष्य व्यक्ति की डायरी, पत्राचार आदि का भी उपयोग करता है। वह उसके मित्र-परिचितों से साक्षात्कार-भेंट करता और उससे संबंधित नगरों-स्थानों आदि का भ्रमण करता है। यह लक्ष्य व्यक्तित्व पर निर्भर करता है कि उससे संबंधित सामग्री कहां मिलेगी। राजनीतिक व्यक्तित्वों का जीवन सार्वजनिक होता है इसलिए उनसे संबंधित दस्तावेज खूब मिल जाते हैं। गांधी- नेहरू के जीवन के संबंध में हमारे यहां दस्तावेज खूब मिलते हैं। साहित्यकारों का जीवन रहस्यमय होता है और उनके व्यक्तिगत जीवन के संबंध में जानकारियां कम मिलती हैं। जीवनीकार से यह अपेक्षित है कि वह अपनी स्रोत सामग्री का इस्तेमाल बहुत ध्यानपूर्वक करे। इसमें अनेक मोन सत्य और मुखर झूठ भरे होते है, जिनकी निर्ममता से छानबीन बहुत जरूरी है। अमृतराय ने कलम का सिपाही और विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा में स्रोत सामग्री की छानबीन और शोध बहुत अच्छी तरह से की। इसका उपयोग भी इन्होंने बहुत कौशल और रचनात्मक ढंग से किया है।
पश्चिम में जीवनी लेखन और उसकी स्वीकार्यता को लेकर हमेशा से माहौल उत्साह का रहा है, जबकि हमारे यहां इस संबंध में शुरू से ही गहरी उदासीनता है। विद्वान इसका कारण हमारी अलग संस्कृति को मानते है। दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दिलचस्पी अंग्रेजी समाज में पागलपन की हद तक है, जबकि भारतीय एक-दूसरे के निजी जीवन में ताकझांक को गलत मानते हैं। इसके अलावा भारतीय समाज मिथक-विदग्ध समाज है। इतिहास में उसकी दिलचस्पी बहुत कम है और जीवनी मिथक नहीं, इतिहास है। रासो और चरित रचनाओं को छोड़ दें तो हिंदी में जीवनी लेखन की शुरुआत उपनिवेशकाल में हुई। कार्तिक प्रसाद खत्री ने 1893 में मीराबाई का जीवन चरित्र लिखा। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पूर्व आधुनिक कालीन साहित्यकारों और धर्माचार्यों की जीवनियां लिखीं। इस युग को दो जीवनीकारों, रमाशंकर व्यास और देवीप्रसाद मुंसिफ का इस क्षेत्र में योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। व्यास ने भारतेंदु की साहित्यिक जीवनी लिखी, जबकि मुंसिफ ने मीरा, रहीम और सूरदास के अलावा बाबर, हुमायुं, शेरशाह, अकबर, राणा सांगा, बीकाजी, जैतसी, मानसिंह आदि की जीवनियां लिखीं। देवीप्रसाद मुंसिफ ने लगभग तीस जीवनियां लिखीं, लेकिन आलोचकों ने उनको कभी अपनी निगाह में नहीं लिया। हिंदी समाज में जीवनी को लेकर उदासीनता इस हद तक है कि साहित्यिक दृष्टि से मूल्यवान जीवनियां यहां कुल चार-पांच ही लिखी गई हैं। नवजागरणकालीन साहित्यकारों-प्रेमचंद, सुमद्राकुमारी चौहान और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पर क्रमश: अमृतराय की कलम का सिपाही, सुधा चौहान की मिला तेज से तेज और रामविलास शर्मा की निराला की साहित्य साधना नामक जीवनियां ही साहित्यिक महत्व की हैं। गहरी संबद्धता और मनोयोग से लिखी ये जीवनियां इन युगांतरकारी साहित्यकारों के जीवन और साहित्य की हमारी समझ को विस्तृत और गहरा करती है। विख्यात बंगला साहित्यकार शरतचंद्र के नाटकीय और घटनापूर्ण जीवन पर एकाग्र विष्णु प्रभाकर की आवारा मसीहा और कवि आलोचक मुक्तिबोध के जीवन संघर्ष पर आधारित विष्णुचंद्र शर्मा की मुक्तिबोध की आत्मकथा भी ऐसी ही उल्लेखनीय रचनाएं है।
Wednesday, 11 March 2009
यादों से बुनी और बनी रचना
संस्मरण फिलहाल एक लोकप्रिय साहित्य विधा है। लोगों में संस्मरण लिखने की होड़ लगी हुई है। हिंदी में भी संस्मरण खूब लिखे जा रहे हैं। संस्मरणों की बढ़ती हुई लोकप्रियता पर टिप्पणी करते हुए विलियम जिंसर लिखते है कि ´´यह संस्मरण का युग है। बीसवीं सदी के अंत से पहले अमरीकी धरती पर व्यक्तिगत आख्यान की ऐसी जबर्दस्त फसल कभी नहीं हुई थी। हर किसी के पास कहने के लिए एक कथा है और हर कोई कथा कह रहा है।´´ हिंदी के रचनाकार भी संस्मरण लिखने में हाथ आजमा रहे है। विश्वनाथप्रसाद त्रिपाठी, काशीनाथसिंह आदि लेखकों ने हिंदी में संस्मरण विधा को नयी पहचान दी है।
संस्मरण, वर्तमान मे अतीत के बारे में लिखे जाते हैं। संस्मरण स्मृति पर आधारित होता है। संस्मरण लेखक अपने जीवन से संबंधित किसी घटना, व्यक्ति, अनुभव आदि की स्मृति के आधार पर पुनर्रचना करता है। संस्मरण अतीत और दोनों से संबंधित होता है। संस्मरण लेखक अतीत और वर्तमान के आधार पर अतीत की स्मृतियों को खोजता-खंगालता है और उनमें से किसी एक पर अपने को एकाग्र करता है। यह एकाग्रता व्यक्ति, घटना आदि किसी पर भी हो सकती है। संस्मरण में संपूर्ण जीवन नहीं होता। इसमें जीवन का कोई खंड या टुकड़ा ही आ पाता है। जीवन का कोई खास समय या घटना या व्यक्ति संस्मरण में उभरकर सामने आता है।
संस्मरण और सच्चाई में गहरा संबंध है। सच्चाई संस्मरण की पहचान है। पाठक संस्मरण में दिलचस्पी इसलिए लेते हैं, क्योंकि यह सच के करीब माना जाता है। संस्मरण में सच्चाई या यथार्थ स्मृति के माध्यम से आता है और कुछ लोगों का मानना है कि स्मृति में सच्चाई दब या कट-छंट जाती है इसलिए संस्मरण सच नहीं होता। स्मृति वर्तमान अतीत का स्मरण है इसलिए यह वर्तमान से आविष्ट और प्रभावित होती है और सच इसमें विकृत से जाता है। स्मृति और सच कथाकार अरुणप्रकाश के शब्दों में ´´एक दूसरे के रिश्तेदार जरूर है, पर ये जुड़वां संतानें तो कतई नहीं है।´´ स्मृति पूर्ण सत्य नहीं है इसलिए संस्मरण में सत्य नहीं, अक्सर सत्यांश होता है। विख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार एंथनी पॉवेल ने इसीलिए एक जगह लिखा है कि ´´संस्मरण कभी भी पूरी तरह सच नहीं हो सकते, क्योंकि बीती हुई हर बात, हर घटना, हर परिस्थिति को संस्मरण में शामिल करना संभव नहीं है।´´
संस्मरण सहित सभी कथेतर गद्य विधाएं अपनी वस्तुपरकता के लिए जानी जाती हैं। कथाप्रधान साहित्यिक विधाएं, जैसे कहानी, नाटक, उपन्यास आदि में कल्पना सर्वोपरि होती है, लेकिन संस्मरण पूरी तरह कल्पना पर निर्भर नहीं होते। संस्मरण में तथ्य और वस्तुपरकता न हो तो, उसका महत्व कम हो जाएगा। संस्मरण लेखक अपनी स्मृति के सहारे अतीत को इस तरह पुनर्जीवित करता है कि कुछ हद तक उसकी वस्तुपरकता बनी रहती है। यह सही है कि वर्तमान के राग-विराग और सरोकार संस्मरण में अतीत को पूरी तरह तथ्यात्मक और वस्तुपरक नहीं रहने देते, लेकिन पाठक फिर भी उसमें तथ्यों की तलाश करता ही है। संस्मरण लेखक का आत्म, उसका दृष्टिकोण अक्सर यथार्थ की वस्तुपरकता को प्रभावित करता है। यहीं कारण है कि दो भिन्न संस्मरणकार एक यथार्थ को कई बार अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। कुछ लोगों के अनुसार तो संस्मरण वस्तुपरक नहीं, आत्मपरक लेखन है।
संस्मरण कलात्मक कथा साहित्य की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन इसके शिल्प ढांचे का इस्तेमाल इनमें होता है। संस्मरण में रोचकता और पठनीयता बनाए रखने के लिए संस्मरण लेखक अक्सर कथा तत्त्वों का इस्तेमाल करता है। वह संवाद, नाटकीयता और भाशायी कौशल का इस्तेमाल करके संस्मरण की पाठकों के लिए रोचक और पठनीय बनाता है। उर्दू में इस्मत चुगताई और हिंदी में काशीनाथसिंह, विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी आदि के संस्मरणों में कथा तत्त्वों का खूब इस्तेमाल हुआ है। इस्मत के संस्मरण अपनी नाटकीयता और भाशायी कौशल के कारण बहुत रोचक और पठनीय हो गए हैं। काशीनाथसिंह के संस्मरणों में रोचकता का तत्व बहुत अधिक है। उनकी संस्मरण पुस्तक काशी का अस्सी आद्यंत पठनीय है। चरित्रांकन, वातावरण निर्माण आदि भी कथात्मक विधाओं के तत्व है, जिनका प्रयोग संस्मरणों में होता है। महादेवी के संस्मरणों में चरित्रांकन बहुत अच्छी तरह से हुआ है। यह सही है कि संस्मरण में तथ्य और यथार्थ जरूरी है, लेकिन कथात्मक विधाओं के संवाद, नाटकीयता, चरित्रांकन, भाशायी कौशल आदि तत्वों से इनमें रोचकता और पठनीयता आ जाती है।
संस्मरण का स्वरूप और चरित्र अब बहुत बदल गया है। कभी संस्मरण का उद्देश्य प्रेरणा होता था, विख्यात और महान व्यक्ति अपने जीवन के संस्मण पे्ररणा देने के लिए लिखते थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है। अब संस्मरण जीवन के अज्ञात प्रसंगों-प्रकरणों के अनावरण की विधा हो गई है। अब कई बार संस्मरण का उपयोग लोग दृश्य पर अपनी उपस्थिति को ध्यानाकर्षक बनाने के लिए भी करते हैं। वे लोग जो विमर्श में नहीं हैं, इसमें अपनी वापसी के लिए भी संस्मरण लिखते हैं। विख्यात लेखक देनियल हेरिस के अनुसार ´´संस्मरण खुद के हाशियाकरण से निबटने की कोशिश है।´´ हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका हंस में प्रकाशित मेरे विश्वासघात श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित संस्मरण कमोबेश ऐसे ही हैं। संस्मरण अब साहित्य की परिधि से निकल कर जीवन के दूसरे क्षेत्रों में पहुंच गए है। फिल्म अभिनेता, क्रिकेट खिलाड़ी, उद्योगपति और राजनेता भी अब अपने संस्मरण लिख रहे है।
संस्मरण ऐसी साहित्यिक विधा है, जिसका कहानी, उपन्यास, नाटक आदि से आदान-प्रदान और अंतर्क्रिया का रिश्ता है। आत्मकथा और डायरी तो इसकी सहोदर विधाएं हैं। आत्मकथा तो एक तरह से संस्मरण ही है। यह अवश्य है कि संस्मरण आत्मकथा की तुलना में बहुत छोटा होता है। कुछ लोग संस्मरण को आत्मकथा का फ्लैश कहते है। जीवनी भी संस्मरण की साथी विधा है, क्योंकि दोनों अतीत पर एकाग्र हैं। संस्मरण अपने संबंध में खुद लेखक लिखता है, जबकि जीवनी दूसरे के द्वारा लिखी जाती है। रेखा चित्र तो कभी-कभी संस्मरण जैसे ही लगते हैं। यों रेखाचित्र में स्टिल लाइफ होती है, लेकिन बहुत यह संस्मरण जैसा हो जाता है। डायरी पश्चिम की लोकप्रिय साहित्यिक विधा है, लेकिन हिंदी में अभी इसकी जड़ें मजबूत नहीं हुई हैं। यह भी संस्मरण की निकट विधा है, अलबत्ता इसका पृथक् अनुशासन है। यह संस्मरण की तुलना में लंबी होती है और इसमें लेखक वर्तमान के साथ आगे बढ़ता है।
हिंदी में शुरू से ही संस्मरण लिखे जाते रहे हैं। अन्य कथेतर गद्य विधाओं की तुलना में संस्मरण की हिंदी में समृद्ध परंपरा है। आरंभिक संस्मरण लेखकों में पदमसिंह शर्मा, जनार्दन प्रसाद द्विज और शांतिप्रसाद द्विवेदी हैं, जिनकी क्रमश: पदमराग (1929), चरित्र रेखा (1943) और पंच चिह्न (1946) नामक संस्मरण रचनाएं उल्लेखनीय हैं। हिंदी संस्मरण को पहचान महादेवी वर्मा ने दी। उनकी दोनों कृतियों-स्मृति की रेखाएं (1943) और अतीत चलचित्र (1941) को हिंदी जगत में व्यापक सम्मान मिला। मोहनलाल महतो वियोगी, प्रभाकर माचवे और विष्णु प्रभाकर ने संस्मरण लिखे हैं। आजादी के बाद संस्मरण लेखन में गति आई। इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम राजेन्द्र यादव, कृश्णा सोबती, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथसिंह और कशीनाथ सिंह ने किया है। कृष्णा सोबती की हम हशमत, राजेन्द्र यादव की औरों के बहाने, रवीन्द्र कालिया की सृजन के साथी और दूधनाथसिंह की लौट आ ओ धार नामक संस्मरण कृतिर्यों की साहित्यिक जगत में खूब चर्चा हुई है। हिंदी संस्मरण विधा को नए रूप और चरित्र के साथ इधर काशीनाथ सिंह ने प्रस्तुत किया है। उनकी रचना याद हो कि न याद हो और काशी के अस्सी ने संस्मरण के स्वरूप और आस्वाद को कुछ हद तक बदल दिया है। विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी की संस्मरण पुस्तक नंगातलाई का गांव की भी हिंदी में खूब चर्चा हुई है।
संस्मरण, वर्तमान मे अतीत के बारे में लिखे जाते हैं। संस्मरण स्मृति पर आधारित होता है। संस्मरण लेखक अपने जीवन से संबंधित किसी घटना, व्यक्ति, अनुभव आदि की स्मृति के आधार पर पुनर्रचना करता है। संस्मरण अतीत और दोनों से संबंधित होता है। संस्मरण लेखक अतीत और वर्तमान के आधार पर अतीत की स्मृतियों को खोजता-खंगालता है और उनमें से किसी एक पर अपने को एकाग्र करता है। यह एकाग्रता व्यक्ति, घटना आदि किसी पर भी हो सकती है। संस्मरण में संपूर्ण जीवन नहीं होता। इसमें जीवन का कोई खंड या टुकड़ा ही आ पाता है। जीवन का कोई खास समय या घटना या व्यक्ति संस्मरण में उभरकर सामने आता है।
संस्मरण और सच्चाई में गहरा संबंध है। सच्चाई संस्मरण की पहचान है। पाठक संस्मरण में दिलचस्पी इसलिए लेते हैं, क्योंकि यह सच के करीब माना जाता है। संस्मरण में सच्चाई या यथार्थ स्मृति के माध्यम से आता है और कुछ लोगों का मानना है कि स्मृति में सच्चाई दब या कट-छंट जाती है इसलिए संस्मरण सच नहीं होता। स्मृति वर्तमान अतीत का स्मरण है इसलिए यह वर्तमान से आविष्ट और प्रभावित होती है और सच इसमें विकृत से जाता है। स्मृति और सच कथाकार अरुणप्रकाश के शब्दों में ´´एक दूसरे के रिश्तेदार जरूर है, पर ये जुड़वां संतानें तो कतई नहीं है।´´ स्मृति पूर्ण सत्य नहीं है इसलिए संस्मरण में सत्य नहीं, अक्सर सत्यांश होता है। विख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार एंथनी पॉवेल ने इसीलिए एक जगह लिखा है कि ´´संस्मरण कभी भी पूरी तरह सच नहीं हो सकते, क्योंकि बीती हुई हर बात, हर घटना, हर परिस्थिति को संस्मरण में शामिल करना संभव नहीं है।´´
संस्मरण सहित सभी कथेतर गद्य विधाएं अपनी वस्तुपरकता के लिए जानी जाती हैं। कथाप्रधान साहित्यिक विधाएं, जैसे कहानी, नाटक, उपन्यास आदि में कल्पना सर्वोपरि होती है, लेकिन संस्मरण पूरी तरह कल्पना पर निर्भर नहीं होते। संस्मरण में तथ्य और वस्तुपरकता न हो तो, उसका महत्व कम हो जाएगा। संस्मरण लेखक अपनी स्मृति के सहारे अतीत को इस तरह पुनर्जीवित करता है कि कुछ हद तक उसकी वस्तुपरकता बनी रहती है। यह सही है कि वर्तमान के राग-विराग और सरोकार संस्मरण में अतीत को पूरी तरह तथ्यात्मक और वस्तुपरक नहीं रहने देते, लेकिन पाठक फिर भी उसमें तथ्यों की तलाश करता ही है। संस्मरण लेखक का आत्म, उसका दृष्टिकोण अक्सर यथार्थ की वस्तुपरकता को प्रभावित करता है। यहीं कारण है कि दो भिन्न संस्मरणकार एक यथार्थ को कई बार अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। कुछ लोगों के अनुसार तो संस्मरण वस्तुपरक नहीं, आत्मपरक लेखन है।
संस्मरण कलात्मक कथा साहित्य की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन इसके शिल्प ढांचे का इस्तेमाल इनमें होता है। संस्मरण में रोचकता और पठनीयता बनाए रखने के लिए संस्मरण लेखक अक्सर कथा तत्त्वों का इस्तेमाल करता है। वह संवाद, नाटकीयता और भाशायी कौशल का इस्तेमाल करके संस्मरण की पाठकों के लिए रोचक और पठनीय बनाता है। उर्दू में इस्मत चुगताई और हिंदी में काशीनाथसिंह, विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी आदि के संस्मरणों में कथा तत्त्वों का खूब इस्तेमाल हुआ है। इस्मत के संस्मरण अपनी नाटकीयता और भाशायी कौशल के कारण बहुत रोचक और पठनीय हो गए हैं। काशीनाथसिंह के संस्मरणों में रोचकता का तत्व बहुत अधिक है। उनकी संस्मरण पुस्तक काशी का अस्सी आद्यंत पठनीय है। चरित्रांकन, वातावरण निर्माण आदि भी कथात्मक विधाओं के तत्व है, जिनका प्रयोग संस्मरणों में होता है। महादेवी के संस्मरणों में चरित्रांकन बहुत अच्छी तरह से हुआ है। यह सही है कि संस्मरण में तथ्य और यथार्थ जरूरी है, लेकिन कथात्मक विधाओं के संवाद, नाटकीयता, चरित्रांकन, भाशायी कौशल आदि तत्वों से इनमें रोचकता और पठनीयता आ जाती है।
संस्मरण का स्वरूप और चरित्र अब बहुत बदल गया है। कभी संस्मरण का उद्देश्य प्रेरणा होता था, विख्यात और महान व्यक्ति अपने जीवन के संस्मण पे्ररणा देने के लिए लिखते थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है। अब संस्मरण जीवन के अज्ञात प्रसंगों-प्रकरणों के अनावरण की विधा हो गई है। अब कई बार संस्मरण का उपयोग लोग दृश्य पर अपनी उपस्थिति को ध्यानाकर्षक बनाने के लिए भी करते हैं। वे लोग जो विमर्श में नहीं हैं, इसमें अपनी वापसी के लिए भी संस्मरण लिखते हैं। विख्यात लेखक देनियल हेरिस के अनुसार ´´संस्मरण खुद के हाशियाकरण से निबटने की कोशिश है।´´ हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका हंस में प्रकाशित मेरे विश्वासघात श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित संस्मरण कमोबेश ऐसे ही हैं। संस्मरण अब साहित्य की परिधि से निकल कर जीवन के दूसरे क्षेत्रों में पहुंच गए है। फिल्म अभिनेता, क्रिकेट खिलाड़ी, उद्योगपति और राजनेता भी अब अपने संस्मरण लिख रहे है।
संस्मरण ऐसी साहित्यिक विधा है, जिसका कहानी, उपन्यास, नाटक आदि से आदान-प्रदान और अंतर्क्रिया का रिश्ता है। आत्मकथा और डायरी तो इसकी सहोदर विधाएं हैं। आत्मकथा तो एक तरह से संस्मरण ही है। यह अवश्य है कि संस्मरण आत्मकथा की तुलना में बहुत छोटा होता है। कुछ लोग संस्मरण को आत्मकथा का फ्लैश कहते है। जीवनी भी संस्मरण की साथी विधा है, क्योंकि दोनों अतीत पर एकाग्र हैं। संस्मरण अपने संबंध में खुद लेखक लिखता है, जबकि जीवनी दूसरे के द्वारा लिखी जाती है। रेखा चित्र तो कभी-कभी संस्मरण जैसे ही लगते हैं। यों रेखाचित्र में स्टिल लाइफ होती है, लेकिन बहुत यह संस्मरण जैसा हो जाता है। डायरी पश्चिम की लोकप्रिय साहित्यिक विधा है, लेकिन हिंदी में अभी इसकी जड़ें मजबूत नहीं हुई हैं। यह भी संस्मरण की निकट विधा है, अलबत्ता इसका पृथक् अनुशासन है। यह संस्मरण की तुलना में लंबी होती है और इसमें लेखक वर्तमान के साथ आगे बढ़ता है।
हिंदी में शुरू से ही संस्मरण लिखे जाते रहे हैं। अन्य कथेतर गद्य विधाओं की तुलना में संस्मरण की हिंदी में समृद्ध परंपरा है। आरंभिक संस्मरण लेखकों में पदमसिंह शर्मा, जनार्दन प्रसाद द्विज और शांतिप्रसाद द्विवेदी हैं, जिनकी क्रमश: पदमराग (1929), चरित्र रेखा (1943) और पंच चिह्न (1946) नामक संस्मरण रचनाएं उल्लेखनीय हैं। हिंदी संस्मरण को पहचान महादेवी वर्मा ने दी। उनकी दोनों कृतियों-स्मृति की रेखाएं (1943) और अतीत चलचित्र (1941) को हिंदी जगत में व्यापक सम्मान मिला। मोहनलाल महतो वियोगी, प्रभाकर माचवे और विष्णु प्रभाकर ने संस्मरण लिखे हैं। आजादी के बाद संस्मरण लेखन में गति आई। इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम राजेन्द्र यादव, कृश्णा सोबती, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथसिंह और कशीनाथ सिंह ने किया है। कृष्णा सोबती की हम हशमत, राजेन्द्र यादव की औरों के बहाने, रवीन्द्र कालिया की सृजन के साथी और दूधनाथसिंह की लौट आ ओ धार नामक संस्मरण कृतिर्यों की साहित्यिक जगत में खूब चर्चा हुई है। हिंदी संस्मरण विधा को नए रूप और चरित्र के साथ इधर काशीनाथ सिंह ने प्रस्तुत किया है। उनकी रचना याद हो कि न याद हो और काशी के अस्सी ने संस्मरण के स्वरूप और आस्वाद को कुछ हद तक बदल दिया है। विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी की संस्मरण पुस्तक नंगातलाई का गांव की भी हिंदी में खूब चर्चा हुई है।
Tuesday, 17 February 2009
चंद्रधर शर्मा गुलेरी होने का मतलब
चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानियां हमारी विरासत का हिस्सा है। विरासत के साहित्य की आलोचना और मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि यह अपने समय से कितना आगे है। मतलब यह कि अपने समय के साहित्य की प्रचलित रूढ़ियों का अतिक्रमण कर इसने अपने को जीवंत और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए कथ्य, शिल्प, भाषा और तकनीक के स्तर पर कुछ नवीन और मौलिक संभव किया है या नहीं ? गुलेरी की साहित्यिक सक्रियता की अवधि कम है। उनका जन्म 1883 ई. में हुआ और 1922 ई. में उनका निधन हो गया। उन्होंने कुल तीन ही कहानियां लिखीं। पहली सुखमय जीवन 1911 ई. में भारत मित्र में छपी। दूसरी उसने कहा था, जो उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ कहानी है, 1915 ई. में छपी। उनकी तीसरी कहानी बुद्ध का कांटा है। यह हिंदी कहानी के विकास का आरंभिक समय था। प्रेमचंद इस समय सक्रिय थे, लेकिन उन्होंने अपनी श्रेष्ठ यथार्थदर्शी कहानियां बाद में लिखीं। 1915 ई. प्रकाशित पंच परमेश्वर कहानी उनकी कहानी-कला के उत्कर्ष की प्रतिनिधि रचना नहीं है। इससे पूर्व की उनकी कहानियां बहुत अनगढ़ और अपरिपक्व कहानियां हैं। किशोरीलाल गोस्वामी की इंदुमती रामचंद्र शुक्ल की ग्यारह वर्ष का समय और बंग महिला की दुलारी बाई जैसी कहानियां सही मायने में कहानियां नहीं हैं। दरअसल इनका ढ़ांचा पारंपरिक है- इनमें अलौकिक चमत्कार, कूतुहल, शिक्षा-उपदेश, त्याग-बलिदान और प्रेम-वियोग आदि के वृत्तांत हैं। सबसे खास बात यह है कि कहानीकार की मौजूदगी इनमें बहुत मुखर है।
गुलेरी की कहानी-कला अपने समय इस कहानी-कला से आगे की है। गुलेरी पर भी अपने समय का प्रभाव है-उसकी प्रचलित रूढ़ियों का साफ प्रभाव उनकी पहली कहानी सुखमय जीवन पर है। यह कहानी वैसी ही है जैसी उस दौर की अन्य कहानियां हैं। यह कहानी नहीं, वृत्तांत भर है-इसमें शिल्प और तकनीक का कोई मौलिक नवोन्मेष नहीं है। लेकिन उन्होंने अपनी अगली कहानी उसने कहा था में अपने समय को बहुत पीछे छोड़ दिया है। शिल्प और तकनीक का जो उत्कर्ष प्रेमचंद ने अपने जीवन के अंतिम चरण में 1936 ई. के आसपास कफन और पूस की रात में अर्जित कि नहीं या है, गुलेरी ने इस कहानी में उसे 1915 ई. में ही साध लिया। यह यों ही संभव नहीं हुआ। इसे संभव किया गुलेरी के असाधारण व्यक्तित्व ने। गुलेरी 1915 ई में महज 32 वर्ष के थे। युवा होने के कारण उनमें नवाचार का साहस था। उम्र-दराज आदमी जिस तरह की दुविधाओं और संकोचों से घिर जाता है, गुलेरी उनसे सर्वथा मुक्त थे। अंग्रेजी कहानी इस समय अपने विकास के शिखर पर थी और उसमें प्रयोगों की भी धूम थी, जिनसे गुलेरी बखूबी वाकिफ थे। कम लोगों को जानकारी है कि गुलेरी उपनिवेशकाल में अंग्रेजों द्वारा सामंतों की शिक्षा के लिए अजमेर में स्थापित विख्यात आधुनिक शिक्षण संस्थान मेयो कॉलेज में अध्यापक थे और आधुनिक अंग्रेजी साहित्य के अच्छे जानकार थे। दरअसल नवाचार के साहस और आधुनिक अंग्रेजी साहित्य की विशेषज्ञता के कारण ही गुलेरी अपने समय से आगे की कहानी लिख पाए।
टॉमस मान एक जगह कहते हैं- ´´घटना आपके साथ हो सकती है, हुई होगी। बहुत-सी घटनाएं मेरे साथ होती हैं, वे आर्ट नहीं हैं। आर्ट तो मैं उसे अपनी प्रक्रिया से गुजारकर बनाऊंगा।´´ गुलेरीजी की कहानी-कला की खासियत यही है। पहले की और उनके अपने समय की कहानियों में घटनाएं हैं-उनके ब्यौरे और वृत्तांत हैं। गुलेरी पहली बार घटनाओं को एक प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का-कहानी का रूप देते हैं। यह हिंदी कहानी में एक तरह से पहली बार होता है। गुलेरी घटनाओं को आर्ट का रूप देने-कहानी बनाने के लिए जिस प्रक्रिया से गुजारते हैं उसमें सबसे पहला काम वे यह करते हैं कि वे अपने कहानीकार को अदृश्य कर देते हैं। उनकी कहानी में कहानीकार अपनी तरफ से बहुत कम बोलता है। उसमें दृश्य आते हैं, संवाद आते हैं, वस्तुस्थितियां आती हैं और कभी छोटी-मोटी टीप से कहानीकार इनको आपस में जोड़ देता है। उसने कहा था इस लिहाज से निर्दोष कहानी है। कहानीकार यहां लगभग अनुपस्थित है। वह वस्तुस्थिति को जीवंत दृश्यों के चाक्षुष बिंबों साक्षात कर देता है। इस कहानी का नायक बालक लहनासिंह जब सुनता है कि “कुड़माई हो गई” तो वह विचलित हो जाता है, लेकिन कहानीकार उसके इस विचलन के कारण होने वाले क्षोभ का यह कहकर वर्णन नहीं करता कि उसे क्रोध आ गया या वह परेशान हो गया। वह इस विचलन या क्षोभ को चाक्षुष बिम्बों से सम्मूर्त करता है। वह लिखता है- ´´रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया व एक छबड़ीवाले की दिनभर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले ठेले में दूध उड़ेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई, तब कहीं घर पहुंचा।´´ खास बात यह है कि इस कहानी में कहानीकार की अपनी टीप-टिप्पणियां गिनी-चुनी ही हैं। कहानी का दूसरा और तीसरा भाग तो संवादों से आगे बढ़ता है। कहानी का आरंभ, जिसमें 1890 ई. के अमृतसर शहर के बाजार का दृश्य है, बहुत जीवंत बन पड़ा है।
कहानी में वृत्तांत की तकनीक बहुत पुरानी है। गुलेरी ने खुद सुखमय जीवन में इसको काम में लिया था। पहले यह हुआ, उसके बाद यह और अंत में यह। गुलेरी को वृत्तांत को प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का रूप देना था, इसलिए उन्होंने यह तकनीक छोड़कर दूसरी अधिक कारगर तकनीक, जिससे घटना अपनी यथार्थ नाटकीयता में खुल जाए, अपनायी। उसने कहा था में उन्होंने घटनाओं की यथार्थ निरंतरता के क्रम को बदल दिया। सबसे पहले उन्होंने बालक लहनासिंह और आठ वर्षीय बालिका के बीच बने अस्पष्ट रागात्मक संबंध को उठाया। कहानी का दूसरा भाग पच्चीस वर्ष बाद फ्रांस की भूमि पर युद्ध के मोर्चे पर डटे सिक्ख सिपाहियों की बातचीत से शुरू होता है। इनमें सुबेदार हजारासिंह, उसका बेटा बोधासिंह और लहनासिंह शामिल हैं। लहनासिंह मोर्चे पर स्वयं कष्ट सहकर बोधासिंह और हजारासिंह के कुशल क्षेम के लिए समर्पित है। कहानी के तीसरा भाग महत्वपूर्ण है। यहीं आकर कहानी का विकास होता है-जर्मन सैनिकों के हमले से घायल लहनासिंह बीमार बोधासिंह और उसके पिता सूबेदार हजारासिंह को मोर्चे से वापस भेज देता है। अब घायल और मरणासन्न लहनासिंह अर्धचेतन अवस्था में लगभग सपने में अतीत को समरण करता है। यहीं आकर पहली बार पाठक को पता चलता है कि अमृतसर बाजार की आठ वर्षीय बालिका, जो अब सूबेदार हजारासिंह की पत्नी और बोधासिंह की मां है, को लहनासिंह ने एक भेंट में दोनों की रक्षा करने का वचन दिया था। कहानी घटनाओं की निरंतरता में आए व्यवधान से रोचक और नाटकीय हो जाती है। उसका उत्कर्ष इस व्यवधान से और पुष्ट और प्रभावी हो जाता। सुबेदार की पत्नी होरों से लहनासिंह की भेंट की घटना कहानीकार फ्लेशबैक पद्धति से बयान करता है। यह घटना फ्लेशबैक से आयी हुई होकर भी घायल और मरणासन्न लहनासिंह के अर्धचेतन अवस्था में निकले संवादों में गुंथकर आर्ट का रूप ले लेती है। हिंदी कहानी में फ्लेशबैक का भी यह शायद पहला इस्तेमाल है।
ब्यौरों या विवरणों की भाषा में जान नहीं होती। अक्सर वे अन्य व्यक्ति का कथन या बयान होते है। गुलेरी की कहानी उसने कहा था में ब्यौरे नहीं हैं। इसमें चाक्षुष बिंब है, इसमें संवाद और संवादों से सम्मूर्त होती वस्तुस्थितियां हैं, इसलिए इसकी भाषा में भी जान है। इसमें जीवन की हलचल और जीवन का ठंडा-गर्म है। गुलेरी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के गुलेर गांव के रहने वाले थे, इसलिए अमृतसर की संस्कृति और भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। उसने कहा था की जान इसमें विन्यस्त पंजाबी भाषा और उसका मुहावरा है। छोटे-छोटे वाक्यों वाली बोलचाल की, रोजमर्रा व्यवहार की पंजाबी जबान के छौंक ने इस कहानी को बहुत असरदार बना दिया है। इस कहानी की खड़ी बोली में यह मुहावरा इस तरह घुलमिलकर या रच-बसकर आया है कि उसके पंजाबी होने का अलग से अहसास ही नहीं होता।
प्रेम उदातीकृत रूप में गुलेरी के पहले की और उनके समय की कई कहानियों मे आया था। गुलेरी की खासियत यह है कि उन्होंने इसे प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का रूप दिया। यह आर्ट कहानी की आर्ट थी और हिंदी में इसे पहली बार इसे गुलेरी ने संभव किया।
डेली न्यूज,15फरवरी,2009 के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग में प्रकाशित
गुलेरी की कहानी-कला अपने समय इस कहानी-कला से आगे की है। गुलेरी पर भी अपने समय का प्रभाव है-उसकी प्रचलित रूढ़ियों का साफ प्रभाव उनकी पहली कहानी सुखमय जीवन पर है। यह कहानी वैसी ही है जैसी उस दौर की अन्य कहानियां हैं। यह कहानी नहीं, वृत्तांत भर है-इसमें शिल्प और तकनीक का कोई मौलिक नवोन्मेष नहीं है। लेकिन उन्होंने अपनी अगली कहानी उसने कहा था में अपने समय को बहुत पीछे छोड़ दिया है। शिल्प और तकनीक का जो उत्कर्ष प्रेमचंद ने अपने जीवन के अंतिम चरण में 1936 ई. के आसपास कफन और पूस की रात में अर्जित कि नहीं या है, गुलेरी ने इस कहानी में उसे 1915 ई. में ही साध लिया। यह यों ही संभव नहीं हुआ। इसे संभव किया गुलेरी के असाधारण व्यक्तित्व ने। गुलेरी 1915 ई में महज 32 वर्ष के थे। युवा होने के कारण उनमें नवाचार का साहस था। उम्र-दराज आदमी जिस तरह की दुविधाओं और संकोचों से घिर जाता है, गुलेरी उनसे सर्वथा मुक्त थे। अंग्रेजी कहानी इस समय अपने विकास के शिखर पर थी और उसमें प्रयोगों की भी धूम थी, जिनसे गुलेरी बखूबी वाकिफ थे। कम लोगों को जानकारी है कि गुलेरी उपनिवेशकाल में अंग्रेजों द्वारा सामंतों की शिक्षा के लिए अजमेर में स्थापित विख्यात आधुनिक शिक्षण संस्थान मेयो कॉलेज में अध्यापक थे और आधुनिक अंग्रेजी साहित्य के अच्छे जानकार थे। दरअसल नवाचार के साहस और आधुनिक अंग्रेजी साहित्य की विशेषज्ञता के कारण ही गुलेरी अपने समय से आगे की कहानी लिख पाए।
टॉमस मान एक जगह कहते हैं- ´´घटना आपके साथ हो सकती है, हुई होगी। बहुत-सी घटनाएं मेरे साथ होती हैं, वे आर्ट नहीं हैं। आर्ट तो मैं उसे अपनी प्रक्रिया से गुजारकर बनाऊंगा।´´ गुलेरीजी की कहानी-कला की खासियत यही है। पहले की और उनके अपने समय की कहानियों में घटनाएं हैं-उनके ब्यौरे और वृत्तांत हैं। गुलेरी पहली बार घटनाओं को एक प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का-कहानी का रूप देते हैं। यह हिंदी कहानी में एक तरह से पहली बार होता है। गुलेरी घटनाओं को आर्ट का रूप देने-कहानी बनाने के लिए जिस प्रक्रिया से गुजारते हैं उसमें सबसे पहला काम वे यह करते हैं कि वे अपने कहानीकार को अदृश्य कर देते हैं। उनकी कहानी में कहानीकार अपनी तरफ से बहुत कम बोलता है। उसमें दृश्य आते हैं, संवाद आते हैं, वस्तुस्थितियां आती हैं और कभी छोटी-मोटी टीप से कहानीकार इनको आपस में जोड़ देता है। उसने कहा था इस लिहाज से निर्दोष कहानी है। कहानीकार यहां लगभग अनुपस्थित है। वह वस्तुस्थिति को जीवंत दृश्यों के चाक्षुष बिंबों साक्षात कर देता है। इस कहानी का नायक बालक लहनासिंह जब सुनता है कि “कुड़माई हो गई” तो वह विचलित हो जाता है, लेकिन कहानीकार उसके इस विचलन के कारण होने वाले क्षोभ का यह कहकर वर्णन नहीं करता कि उसे क्रोध आ गया या वह परेशान हो गया। वह इस विचलन या क्षोभ को चाक्षुष बिम्बों से सम्मूर्त करता है। वह लिखता है- ´´रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया व एक छबड़ीवाले की दिनभर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले ठेले में दूध उड़ेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई, तब कहीं घर पहुंचा।´´ खास बात यह है कि इस कहानी में कहानीकार की अपनी टीप-टिप्पणियां गिनी-चुनी ही हैं। कहानी का दूसरा और तीसरा भाग तो संवादों से आगे बढ़ता है। कहानी का आरंभ, जिसमें 1890 ई. के अमृतसर शहर के बाजार का दृश्य है, बहुत जीवंत बन पड़ा है।
कहानी में वृत्तांत की तकनीक बहुत पुरानी है। गुलेरी ने खुद सुखमय जीवन में इसको काम में लिया था। पहले यह हुआ, उसके बाद यह और अंत में यह। गुलेरी को वृत्तांत को प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का रूप देना था, इसलिए उन्होंने यह तकनीक छोड़कर दूसरी अधिक कारगर तकनीक, जिससे घटना अपनी यथार्थ नाटकीयता में खुल जाए, अपनायी। उसने कहा था में उन्होंने घटनाओं की यथार्थ निरंतरता के क्रम को बदल दिया। सबसे पहले उन्होंने बालक लहनासिंह और आठ वर्षीय बालिका के बीच बने अस्पष्ट रागात्मक संबंध को उठाया। कहानी का दूसरा भाग पच्चीस वर्ष बाद फ्रांस की भूमि पर युद्ध के मोर्चे पर डटे सिक्ख सिपाहियों की बातचीत से शुरू होता है। इनमें सुबेदार हजारासिंह, उसका बेटा बोधासिंह और लहनासिंह शामिल हैं। लहनासिंह मोर्चे पर स्वयं कष्ट सहकर बोधासिंह और हजारासिंह के कुशल क्षेम के लिए समर्पित है। कहानी के तीसरा भाग महत्वपूर्ण है। यहीं आकर कहानी का विकास होता है-जर्मन सैनिकों के हमले से घायल लहनासिंह बीमार बोधासिंह और उसके पिता सूबेदार हजारासिंह को मोर्चे से वापस भेज देता है। अब घायल और मरणासन्न लहनासिंह अर्धचेतन अवस्था में लगभग सपने में अतीत को समरण करता है। यहीं आकर पहली बार पाठक को पता चलता है कि अमृतसर बाजार की आठ वर्षीय बालिका, जो अब सूबेदार हजारासिंह की पत्नी और बोधासिंह की मां है, को लहनासिंह ने एक भेंट में दोनों की रक्षा करने का वचन दिया था। कहानी घटनाओं की निरंतरता में आए व्यवधान से रोचक और नाटकीय हो जाती है। उसका उत्कर्ष इस व्यवधान से और पुष्ट और प्रभावी हो जाता। सुबेदार की पत्नी होरों से लहनासिंह की भेंट की घटना कहानीकार फ्लेशबैक पद्धति से बयान करता है। यह घटना फ्लेशबैक से आयी हुई होकर भी घायल और मरणासन्न लहनासिंह के अर्धचेतन अवस्था में निकले संवादों में गुंथकर आर्ट का रूप ले लेती है। हिंदी कहानी में फ्लेशबैक का भी यह शायद पहला इस्तेमाल है।
ब्यौरों या विवरणों की भाषा में जान नहीं होती। अक्सर वे अन्य व्यक्ति का कथन या बयान होते है। गुलेरी की कहानी उसने कहा था में ब्यौरे नहीं हैं। इसमें चाक्षुष बिंब है, इसमें संवाद और संवादों से सम्मूर्त होती वस्तुस्थितियां हैं, इसलिए इसकी भाषा में भी जान है। इसमें जीवन की हलचल और जीवन का ठंडा-गर्म है। गुलेरी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के गुलेर गांव के रहने वाले थे, इसलिए अमृतसर की संस्कृति और भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। उसने कहा था की जान इसमें विन्यस्त पंजाबी भाषा और उसका मुहावरा है। छोटे-छोटे वाक्यों वाली बोलचाल की, रोजमर्रा व्यवहार की पंजाबी जबान के छौंक ने इस कहानी को बहुत असरदार बना दिया है। इस कहानी की खड़ी बोली में यह मुहावरा इस तरह घुलमिलकर या रच-बसकर आया है कि उसके पंजाबी होने का अलग से अहसास ही नहीं होता।
प्रेम उदातीकृत रूप में गुलेरी के पहले की और उनके समय की कई कहानियों मे आया था। गुलेरी की खासियत यह है कि उन्होंने इसे प्रक्रिया से गुजारकर आर्ट का रूप दिया। यह आर्ट कहानी की आर्ट थी और हिंदी में इसे पहली बार इसे गुलेरी ने संभव किया।
डेली न्यूज,15फरवरी,2009 के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग में प्रकाशित
Wednesday, 21 January 2009
दास्तान-ए-यायावरी
आधुनिक कथेतर गद्य विधाओं में यात्रा वृत्तांत भी प्राचीन साहित्यिक विधा है। समय के साथ इसके स्वरूप और चरित्र में बदलाव होते रहे हैं। इतिहास, आत्म चरित्र आदि के प्रति अनास्था और उदासीनता के कारण भारत में यात्रा वृत्तांतों की समृद्ध और निरंतर परंपरा नहीं मिलती। विश्व के अन्य देशों में स्थिति इससे भिन्न है। वहां यात्रा और उसके अनुभवों को लिपिबद्ध करने का उत्साह है। फाहियान, ह्वेत्सांग, इब्न बतूता, अल बरूनी, मार्केपोलो बर्नियर आदि कई साहसी यात्री हुए हैं, जिन्होंने दूरस्थ देशों और स्थानों की अपनी यात्राओं के रोमांचक वृत्तांत लिखे। आज ये वृत्तांत धरोहर की तरह हैं, जिनसे हमें अपने अतीत समझने में मदद मिलती है। यों तो हमारे देश में रामायण, हर्ष चरित्र, कादंबरी आदि में यात्रा वृत्तांत के लक्षण मिल जाएंगे, लेकिन हिंदी में सही मायने में यात्रा वृत्तांत की शुरुआत उपनिवेशकाल में हुई। अंग्रेजी साहित्य के संपर्क-संसर्ग से हिंदी में साहित्यिक यात्रा वृत्तांत लिखे जाने लगे और धीरे-धीरे इनका विधायी ढांचा भी अस्तित्व में आया।
यात्रा वृत्तांत क्या है, इसे लेकर कई धारणाएं मौजूद हैं। कुछ लोगों के लिए यह आख्यान है, कुछ लोग इसे वृत्तांत कहते हैं, जबकि कुछ अन्य के अनुसार यह भी एक किस्म का संस्मरण है। यात्रा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। अज्ञात के प्रति मनुष्य मन में स्वाभाविक जिज्ञासा है, जो उसे नए और दूरस्थ स्थानों की यात्रा के लिए प्रेरित करती है। मनुश्य यात्राएं करता है और यात्रा के अपने अनुभवों को लिपिबद्ध भी करता है, जो यात्रा वृत्तांत या यात्रा आख्यान कहे जाते हैं। लेखक अपने विश्वास और धारणाओं के साथ यात्रा पर निकलता है और नयी जगहों और लोगों के बीच जाता है। इस तरह यात्रा धारणाओं और विश्वासों में उथल-पुथल और अंतर्क्रिया का कारण बनती है। यात्री इस उथल-पुथल और अंतर्क्रिया की पहचान कर दर्ज करता है। यात्रा वृत्तांत की परिभाषा करते हुए कथाकार अरुणप्र्रकाश लिखते हैं कि ´´यात्रा आख्यान यात्रा के क्रम में हुई घटनाओं, दृश्यों और यात्री के इन अनुभवों के प्रति निजी भावनाओं का वर्णन है।´´ डॉ. रघुवंश एक साहित्यिक विधा के रूप में यात्रा वृत्तांत का संबंध उसके लेखक की सौंदर्य दृष्टि से जोड़ते हैं। उनके अनुसार सौंदर्य बोध की दृष्टि से उल्लास की भावना से प्रेरित होकर यात्रा करने वाले यायाकर एक प्रकार से साहित्यिक मनोवृत्ति के माने जा सकते हैं और उनकी मुक्त अभिव्यक्ति को यात्रा वृत्तांत कहा जाता है। इस तरह यात्रा वृत्तांत उसके लेखक का अंतरंग और बहिरंग, दोनों होता है। यात्री वृत्तांत में अपने बहिरंग को अपने अंतरंग के साथ हमारे सामने रखता है। कहा जा सकता है कि ´´यात्रा वृत्तांत नई, खुलती हुई दुनिया, अनजान लोगों-समाजों-सभ्यताओं-संस्कृतियों-जीवन शैलियों को स्वयं में समेटता है पर लेखक के निजी विकास का भी आईना होता है।´´
वस्तुपरकता यात्रा वृत्तांत की जान है। यात्रा वृत्तांत में लेखक जो देखता-खोजता है, उसका यथातथ्य वर्णन करता है। यात्रा वृत्तांत भी यात्रा के बाद स्मृति के आधार पर लिखे जाते हैं, इसलिए यात्री यात्रा के दौरान तथ्यों को डायरी, नोट बुक आदि में दर्ज कर लेता है। संस्मरण में जो आत्मपरकता होती है या जो कल्पना का पुट होता है, यात्रा वृत्तांत में नहीं होता। इसमें लेखक को अपने स्मृति को वस्तुपरक बनाए रखना पड़ता है। वह सजग रहकर अपने आत्म को स्मृति पर हावी होने से रोकता है। वस्तुपरक होने के कारण यात्रा वृत्तांत में कल्पना के लिए कोई जगह नहीं है। कल्पना कई बार यात्रा वृत्तांत में इस्तेमाल होती है, लेकिन उसकी भूमिका इसमें आटे में नमक की तरह ही है। यात्रा वृत्तांत में कल्पना यथार्थ को विस्थापित नहीं करती। कुछ लोग यात्रा वृत्तांत को उसकी तथ्य निर्भरता और वस्तुपरकता के कारण साहित्य नहीं मानते। विख्यात लेखक मेरी किंग्सले ने एक जगह लिखा भी है कि "यात्रा आख्यान की पुस्तक से कोई साहित्य की अपेक्षा नहीं करता।"
यात्रा वृत्तांत के लेखक का जीवन प्रति नजरिया अक्सर बहुत मस्ती का और फक्कडना होता है। एक ही प्रकार के रोजमर्रा जीवन से उसे ऊब होती है और स्थिर प्रकार का जीवन उसे बांधता है। यह बात कमोबेश सभी घुमक्कड़ यात्रा वृत्तांत लेखकों ने स्वीकार की है। विख्यात घुम्मकड़ लेखक राहुल सांस्कृत्यायन के अनुसार ´´ जिसने एक बार घुमक्कड़ धर्म अपना लिया, उसे पेंशन कहां, उसे विश्राम कहां ? आखिर में हडि्डयां कटते ही बिखर जाएंगी। आजीवन यायावर रहे अज्ञेय ने भी यही बात दूसरे शब्दों में कही है। वे लिखते है, ´´यायावर को भटकते हुए चालीस बरस हो गए, किंतु इस बीच न तो वह अपने पैरों तले घास जमने दे सका है, न ठाठ जमा सका है, न क्षितिज को कुछ निकट ला सका है... उसके तारे छूने की तो बात ही क्या।...यायावर न समझा है कि देवता भी जहां मंदिर में रूके कि शिला हो गए, और प्राण संचार की पहली शर्त है कि गति:गति: गति।´´ यात्रा वृत्तांत का रूपबंध निबंध के रूप बंध जैसा होता है, लेकिन कथात्मक गद्य विधाओं के रूप बंध के कुछ तत्त्व भी इसमें इस्तेमाल किए जाते हैं। यात्रा वृत्तांत का रूपबंध वस्तुपरक और तथ्यात्मक होता है और कभी-कभी इसमें विवरण आत्मपरक भी होते हैं, लेकिन तथ्य विमुख प्राय: नहीं होते। सही मायने में यात्रा वृत्तांत एक तरह का आईना है। ´´यात्रा के सुख-दुख, उसकी विश्वसनीयता के उपकरण और सादा बयानी उसका हुनर है।´´ यात्रा वृत्तांत के रूपबंध में कथात्मक गद्य विधाओं की नाटकीयता, कुतूहल आदि तत्त्व भी प्रयुक्त होते हैं, लेकिन यह आवश्यक है कि इनके इस्तेमाल से यथार्थ में विकृति नहीं आए। यात्रा वृत्तांत का रूपबंध जब कथात्मक होने लग जाए, तो समझना चाहिए कि लेखक भटक गया है। आधुनिककाल में नहीं, पर पहले कथात्मक विधाओं वाले रूपबंध में भी यात्रा वृत्तांत लिखे गए हैं, लेकिन इनको बाद में वृत्तांत की जगह कथात्मक आख्यान ही माना गया है। यात्रा वृत्तांत एकाधिक शैलियों और रूपों में लिखे गए हैं। कुछ यात्रा वृत्तांत ऐसे हैं, जिनको यात्रोपयोगी साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। इनमें स्थानों और देशों के संबंध विस्तृत और उपयोगी जानकारियां दी गइ हैं। राहुल सांस्कृत्यायन की हिमालय परिचय और मेरी यूरोप यात्रा ऐसी ही रचनाएं हैं। इनसे अलग अज्ञेय की अरे यायावर रहेगा याद और निर्मल वर्मा की चीड़ों पर चांदनी जैसी रचनाओं में महज जानकारियों से आगे इनके लेखकों की अंतर्यात्रा भी दिखाई पड़ती है।
हिंदी में यात्रा वृत्तांत लेखन की जड़ें बहुत मजबूत और गहरी नहीं हैं। ´कुछ गिनती के लेखक और थोड़ी सी किताबे´ ही इस संबंध में मौजूद हैं। हिंदी में इस दिशा में पहल भारतेंदु हरिश्चंद्र 1877 में दिल्ली दरबार दर्पण लिखकर की। बाद में बाबू शिपप्रसाद गुप्त, मौलवी महेश प्रसाद, रामनारायण मिश्र और सत्यव्रत परिव्राजक ने भी यात्रा वृत्तांत से मिलती-जुलती कुछ रचनाएं लिखीं। इस दिशा सर्वाधिक उल्लेखनीय काम राहुल सांस्कृत्यायन ने किया। उन्होंने खूब देशाटन किया और तत्सम्बंधी अपने-अपने अनुभवों और विवरणों को घुमक्कड़ शास्त्र और वोल्गा से गंगा नामक रचनाओं में लिखा। अज्ञेय भी घुमक्कड़ थे-एक बूंद सहसा उछली और अरे यायावर रहेगा याद उनके यात्रावृत्तों के प्रसिद्ध संकलन हैं। एक आधुनिक भारतीय मन की चिंता और आत्मान्वेषण इन रचनाओं की खासियत है। रघुवंश के यात्रावृत्त संकलन हरी घाटी की भी पांचवें-छठे दशक में सराहना हुई। आजादी के बाद इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम निर्मल वर्मा ने किया। चीड़ों पर चांदनी और धुंध से उठती धुन उनके यात्रावृत्तों के प्रसिद्ध संकलन हैं। धुंध से उठती धुन में ऐसे यात्रावृत्त हैं, जिनमें भारतीय सभ्यता और संस्कृति को आधुनिक निगाह से समझने की कोशिश की गई है। हिमालय भारतीय रचनाकारों को अक्सर अपनी ओर आकृष्ट करता रहा है। हिमालय की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से रूबरू करवाने वाले यात्रावृत्तों की श्रृंखला स्फीति में बारिश, किन्नर >धर्मलोक और लद्दाख राग-विराग नाम से हिंदी में कृष्णनाथ ने लिखी।
यात्रा वृत्तांत क्या है, इसे लेकर कई धारणाएं मौजूद हैं। कुछ लोगों के लिए यह आख्यान है, कुछ लोग इसे वृत्तांत कहते हैं, जबकि कुछ अन्य के अनुसार यह भी एक किस्म का संस्मरण है। यात्रा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। अज्ञात के प्रति मनुष्य मन में स्वाभाविक जिज्ञासा है, जो उसे नए और दूरस्थ स्थानों की यात्रा के लिए प्रेरित करती है। मनुश्य यात्राएं करता है और यात्रा के अपने अनुभवों को लिपिबद्ध भी करता है, जो यात्रा वृत्तांत या यात्रा आख्यान कहे जाते हैं। लेखक अपने विश्वास और धारणाओं के साथ यात्रा पर निकलता है और नयी जगहों और लोगों के बीच जाता है। इस तरह यात्रा धारणाओं और विश्वासों में उथल-पुथल और अंतर्क्रिया का कारण बनती है। यात्री इस उथल-पुथल और अंतर्क्रिया की पहचान कर दर्ज करता है। यात्रा वृत्तांत की परिभाषा करते हुए कथाकार अरुणप्र्रकाश लिखते हैं कि ´´यात्रा आख्यान यात्रा के क्रम में हुई घटनाओं, दृश्यों और यात्री के इन अनुभवों के प्रति निजी भावनाओं का वर्णन है।´´ डॉ. रघुवंश एक साहित्यिक विधा के रूप में यात्रा वृत्तांत का संबंध उसके लेखक की सौंदर्य दृष्टि से जोड़ते हैं। उनके अनुसार सौंदर्य बोध की दृष्टि से उल्लास की भावना से प्रेरित होकर यात्रा करने वाले यायाकर एक प्रकार से साहित्यिक मनोवृत्ति के माने जा सकते हैं और उनकी मुक्त अभिव्यक्ति को यात्रा वृत्तांत कहा जाता है। इस तरह यात्रा वृत्तांत उसके लेखक का अंतरंग और बहिरंग, दोनों होता है। यात्री वृत्तांत में अपने बहिरंग को अपने अंतरंग के साथ हमारे सामने रखता है। कहा जा सकता है कि ´´यात्रा वृत्तांत नई, खुलती हुई दुनिया, अनजान लोगों-समाजों-सभ्यताओं-संस्कृतियों-जीवन शैलियों को स्वयं में समेटता है पर लेखक के निजी विकास का भी आईना होता है।´´
वस्तुपरकता यात्रा वृत्तांत की जान है। यात्रा वृत्तांत में लेखक जो देखता-खोजता है, उसका यथातथ्य वर्णन करता है। यात्रा वृत्तांत भी यात्रा के बाद स्मृति के आधार पर लिखे जाते हैं, इसलिए यात्री यात्रा के दौरान तथ्यों को डायरी, नोट बुक आदि में दर्ज कर लेता है। संस्मरण में जो आत्मपरकता होती है या जो कल्पना का पुट होता है, यात्रा वृत्तांत में नहीं होता। इसमें लेखक को अपने स्मृति को वस्तुपरक बनाए रखना पड़ता है। वह सजग रहकर अपने आत्म को स्मृति पर हावी होने से रोकता है। वस्तुपरक होने के कारण यात्रा वृत्तांत में कल्पना के लिए कोई जगह नहीं है। कल्पना कई बार यात्रा वृत्तांत में इस्तेमाल होती है, लेकिन उसकी भूमिका इसमें आटे में नमक की तरह ही है। यात्रा वृत्तांत में कल्पना यथार्थ को विस्थापित नहीं करती। कुछ लोग यात्रा वृत्तांत को उसकी तथ्य निर्भरता और वस्तुपरकता के कारण साहित्य नहीं मानते। विख्यात लेखक मेरी किंग्सले ने एक जगह लिखा भी है कि "यात्रा आख्यान की पुस्तक से कोई साहित्य की अपेक्षा नहीं करता।"
यात्रा वृत्तांत के लेखक का जीवन प्रति नजरिया अक्सर बहुत मस्ती का और फक्कडना होता है। एक ही प्रकार के रोजमर्रा जीवन से उसे ऊब होती है और स्थिर प्रकार का जीवन उसे बांधता है। यह बात कमोबेश सभी घुमक्कड़ यात्रा वृत्तांत लेखकों ने स्वीकार की है। विख्यात घुम्मकड़ लेखक राहुल सांस्कृत्यायन के अनुसार ´´ जिसने एक बार घुमक्कड़ धर्म अपना लिया, उसे पेंशन कहां, उसे विश्राम कहां ? आखिर में हडि्डयां कटते ही बिखर जाएंगी। आजीवन यायावर रहे अज्ञेय ने भी यही बात दूसरे शब्दों में कही है। वे लिखते है, ´´यायावर को भटकते हुए चालीस बरस हो गए, किंतु इस बीच न तो वह अपने पैरों तले घास जमने दे सका है, न ठाठ जमा सका है, न क्षितिज को कुछ निकट ला सका है... उसके तारे छूने की तो बात ही क्या।...यायावर न समझा है कि देवता भी जहां मंदिर में रूके कि शिला हो गए, और प्राण संचार की पहली शर्त है कि गति:गति: गति।´´ यात्रा वृत्तांत का रूपबंध निबंध के रूप बंध जैसा होता है, लेकिन कथात्मक गद्य विधाओं के रूप बंध के कुछ तत्त्व भी इसमें इस्तेमाल किए जाते हैं। यात्रा वृत्तांत का रूपबंध वस्तुपरक और तथ्यात्मक होता है और कभी-कभी इसमें विवरण आत्मपरक भी होते हैं, लेकिन तथ्य विमुख प्राय: नहीं होते। सही मायने में यात्रा वृत्तांत एक तरह का आईना है। ´´यात्रा के सुख-दुख, उसकी विश्वसनीयता के उपकरण और सादा बयानी उसका हुनर है।´´ यात्रा वृत्तांत के रूपबंध में कथात्मक गद्य विधाओं की नाटकीयता, कुतूहल आदि तत्त्व भी प्रयुक्त होते हैं, लेकिन यह आवश्यक है कि इनके इस्तेमाल से यथार्थ में विकृति नहीं आए। यात्रा वृत्तांत का रूपबंध जब कथात्मक होने लग जाए, तो समझना चाहिए कि लेखक भटक गया है। आधुनिककाल में नहीं, पर पहले कथात्मक विधाओं वाले रूपबंध में भी यात्रा वृत्तांत लिखे गए हैं, लेकिन इनको बाद में वृत्तांत की जगह कथात्मक आख्यान ही माना गया है। यात्रा वृत्तांत एकाधिक शैलियों और रूपों में लिखे गए हैं। कुछ यात्रा वृत्तांत ऐसे हैं, जिनको यात्रोपयोगी साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। इनमें स्थानों और देशों के संबंध विस्तृत और उपयोगी जानकारियां दी गइ हैं। राहुल सांस्कृत्यायन की हिमालय परिचय और मेरी यूरोप यात्रा ऐसी ही रचनाएं हैं। इनसे अलग अज्ञेय की अरे यायावर रहेगा याद और निर्मल वर्मा की चीड़ों पर चांदनी जैसी रचनाओं में महज जानकारियों से आगे इनके लेखकों की अंतर्यात्रा भी दिखाई पड़ती है।
हिंदी में यात्रा वृत्तांत लेखन की जड़ें बहुत मजबूत और गहरी नहीं हैं। ´कुछ गिनती के लेखक और थोड़ी सी किताबे´ ही इस संबंध में मौजूद हैं। हिंदी में इस दिशा में पहल भारतेंदु हरिश्चंद्र 1877 में दिल्ली दरबार दर्पण लिखकर की। बाद में बाबू शिपप्रसाद गुप्त, मौलवी महेश प्रसाद, रामनारायण मिश्र और सत्यव्रत परिव्राजक ने भी यात्रा वृत्तांत से मिलती-जुलती कुछ रचनाएं लिखीं। इस दिशा सर्वाधिक उल्लेखनीय काम राहुल सांस्कृत्यायन ने किया। उन्होंने खूब देशाटन किया और तत्सम्बंधी अपने-अपने अनुभवों और विवरणों को घुमक्कड़ शास्त्र और वोल्गा से गंगा नामक रचनाओं में लिखा। अज्ञेय भी घुमक्कड़ थे-एक बूंद सहसा उछली और अरे यायावर रहेगा याद उनके यात्रावृत्तों के प्रसिद्ध संकलन हैं। एक आधुनिक भारतीय मन की चिंता और आत्मान्वेषण इन रचनाओं की खासियत है। रघुवंश के यात्रावृत्त संकलन हरी घाटी की भी पांचवें-छठे दशक में सराहना हुई। आजादी के बाद इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम निर्मल वर्मा ने किया। चीड़ों पर चांदनी और धुंध से उठती धुन उनके यात्रावृत्तों के प्रसिद्ध संकलन हैं। धुंध से उठती धुन में ऐसे यात्रावृत्त हैं, जिनमें भारतीय सभ्यता और संस्कृति को आधुनिक निगाह से समझने की कोशिश की गई है। हिमालय भारतीय रचनाकारों को अक्सर अपनी ओर आकृष्ट करता रहा है। हिमालय की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से रूबरू करवाने वाले यात्रावृत्तों की श्रृंखला स्फीति में बारिश, किन्नर >धर्मलोक और लद्दाख राग-विराग नाम से हिंदी में कृष्णनाथ ने लिखी।
Sunday, 4 January 2009
अपना फसाना मतलब आत्मकथा
आत्मकथा भी अन्य गद्य विधाओं की तरह आधुनिक युग की देन है। युग-निर्माता तथा युगांतरकारी व्यक्तियों को जानने-समझने में आत्मकथाएं सब से अधिक मदद करती हैं। इन के द्वारा हम उन व्यक्तियों के निजी जीवन के आत्म-संघर्ष को, उनके समय की ऊहापोह और उथल-पुथल को जान सकते है। उनके अनुभवों से हम अपने समय और समाज को सही दिशा दे सकते हैं। आत्मकथा नयी विधा है, लेकिन अन्य गद्य विधाओं की तरह इसका भी एक विधायी अनुशासन और स्वरूप बन गया है। व्यक्ति और समाज के जीवन में बढ़ती हुई जटिलताओं से रूबरू होने के लिए रचनाकार समय-समय पर इस विधायी अनुशासन को तोड़ते भी रहते हैं।
आत्मकथा आत्मकथाकार द्वारा लिखा गया अपने जीवन का वृत्तांत है। जब व्यक्ति स्वयं अपने जीवन के संबंध में व्यवस्था और विस्तार से लिखता है, तो ऐसी रचना को आत्मकथा कहा जाता है। यह एक तरह से स्वलिखित जीवन-चरित्र और अपनी जीवन कहानी है। यह किसी व्यक्ति द्वारा लिखी गई अपनी जीवनी है। आत्मप्रकाशन की दूसरी साहित्यिक विधाओं-संस्मरण, डायरी, पत्र आदि से भी आत्मकथा का गहरा संबंध है। इन सभी रूपों का अपना अलग-अलग स्वरूप और अनुशासन है, लेकिन इन सभी में आत्म की मुखर उपस्थिति जरूर रहती है, इसलिए ये आत्मकथा से बहुत दूर और अलग नहीं हैं।
आत्मकथा सचेत भाव से लिखी जाती है, इसलिए इसका कोई प्रयोजन जरूर होता है। कुछ महान व्यक्ति आत्मकथा इसलिए लिखते हैं कि वे अपने व्यतीत जीवन का निर्मम और तटस्थ भाव से आत्मविश्लेशण कर सकें। वे ऐसा करके अपने अतीत का विश्लेशण और मूल्यांकन करते हैं। वे देखते हैं कि उन्होंने अपने अतीत में जो निर्णय लिए, जो काम किए, वे समय की कसौटी पर कितने खरे उतरे। नेहरू ने अपनी आत्मकथा मेरी कहानी यही सोचकर लिखी। इसकी प्रस्तावना में उन्होंने लिखा, ´´इस किताब को लिखने का खास मकसद यह था.....मैं पिछले दिनों हिंदुस्तान की उन घटनाओं का विवेचन भी कर लेना चाहता था, जिनसे मेरा ताल्लुक रहा है, ताकि उनके बारे में स्पष्टॅता के साथ सोच सकूं। आत्मजिज्ञासा के भाव से मैंने इसे शुरू किया और बहुत हद तक यही बराबर जारी रखा है।´´
आत्मकथा लिखने के पीछे कहीं यह मंशा भी रहती है कि अन्य लोग इससे पे्ररित होकर अपने जीवन को बेहतर ढंग से गढ सकें। रवीन्द्रनाथ ने लिखा भी है कि ´´महान व्यक्तियों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व आम आदमी के लिए दिशा-बोध का काम करता है।´´ अक्सर ऐसा होता भी है। हम अपने जीवन के भीतर इस तरह डूबे हुए रहते हैं कि उसकी बागडोर पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं होती। दूसरों के जीवन को हम अपेक्षाकृत तटस्थ भाव से देखते हैं, इसलिए उसके मोड़-तनावों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए इस समझ का उपयोग कर सकते हैं। यों तो हर जीवन विशिष्ट है। कोई जीवन किसी का आदर्श नहीं होता, लेकिन उस महान जीवन को दृश्टांत मानकर प्रेरणा तो ली ही जा सकती है। महात्मा गांधी ने इसीलिए अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ´´कोई मेरे लेखों को प्रमाणभूत न समझे। मैं तो सिर्फ यह चाहता हूं कि उनमें बताए प्रयोगों को दृष्टांत रूप मानकर सब अपने-अपने प्रयोग यथाशक्ति और यथामति करें। महान साहित्यकारों ने केवल कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए भी आत्मकथाएं लिखी हैं।
आत्मकथा की कुछ विधायी खासियतें भी है। आत्मकथा में आत्म और उसका संघर्ष तो अपेक्षित है ही। आत्मकथा इतिवृत्तात्मक वृत्तांत भर नहीं होती। जैसे व्यक्ति का जीवन सीधी रेखा नहीं होता उस की कथा भी सीधी, सरल और सपाट नहीं होती। जीवन में निर्णय-अनिर्णय, दुविधा-संकोच और सुख-दुख की उथल-पुथल चलती रहती है। आत्मतत्त्व निरंतर सक्रिय रहता है। स्व का यह अंत: संघर्ष आत्मकथा में आना चाहिए। इसका आशय यह नहीं है कि घटनापूर्ण और वस्तुमय बाह्य जीवन इसमें नहीं आता। दरअसल अंत: संघर्ष बाह्य जीवन में ही अभिव्यक्त होता है। आत्मकथा में आत्मसंघर्ष के साथ-साथ कथा भी जरूरी है। आत्मकथाकार को अपना जीवन-वृत्तांत कुछ इस तरह बयान करना चाहिए कि पाठक को उसमें कहानी जैसा मजा आए। मतलब यह कि उसमें कहानी का जादू- कुतूहल और रोचकता होनी चाहिए। लंबे विश्लेशण-विवेचन और घटनाओं के ब्यौरे आत्मकथा को दस्तावेजी बना देते हैं। उर्दू की विख्यात कथाकार इस्मत चुगताई की आत्मकथा कागजी है पैरहन इस दृष्टि से एक आदर्श आत्मकथा है। इसमें जीवंत आत्मसंघर्ष को जादुई कथाविधान में बयान किया गया है।
आत्मकथा लिखते समय पूरी तरह आत्मनिरपेक्ष बने रहना मुश्किल काम है। गांधीजी ने इसलिए इसे तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन कर्म कहा है। अक्सर आत्मकथाकार सचेत रहकर आत्मकथा लिखते समय उन प्रसंगों-घटनाओं का जिक्र नहीं करते, जो खास समय और समाज में खराब मानी जाती हैं। कभी-कभी जब उनका आत्म प्रबल होता है तो यह प्रबलता आत्ममुग्धता की तरफ जाती है। आत्ममुग्धता से किया हुआ कोई भी विश्लेशण और मूल्यांकन सही नहीं होता। अहम की प्रबलता आम बात है। इसी भय से क्रांतिकारी और चिंतक एम.एन. राय ने अपनी आत्मकथा ही नहीं लिखी।
आत्मकथा और संस्मरण में अंतर है। आत्मकथा एक दीर्घकाय स्वलिखित जीवन-वृतांत है, जबकि संस्मरण घटना या व्यक्ति पर एक एकाग्र छोटी रचना है। आत्मकथा में स्व केन्द्र में है। यदि इसमें इतर भी है तो पूरी तरह इस स्व से संबद्ध और इसको व्यक्त करने के लिए है, जबकि संस्मरण में इतर, मतलब दूसरा प्रमुख है। जीवनी किसी महापुरूश व्यक्ति पर लिखी किसी अन्य व्यक्ति की रचना है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के संबंध में विभिन्न स्रोतों से जानकारियां एकत्र करता है और उन्हें व्यवस्थित रूप देकर उस व्यक्ति की जीवनी लिखता है। डायरी में दैनंदिन की घटनाओं का अंकन किया जाता है। इसमें धटनाओं पर तत्काल प्रतिक्रिया होती है। डायरी आत्मपरक ही हो, यह भी जरूरी नहीं है। आधुनिक जीवन जैसे-जैसे जटिल होता जा रहा है, आत्मकथा, संस्मरण, डायरी आदि के विधागत दायरे टूटते प्रतीत हो रहे हैं। इधर हिंदी में ऐसी कई रचनाएं आ गई हैं, जिन्हें किसी विधायी चौखटे में नहीं रखा जा सकता। गगन गिल की रचना दिल्ली में उनींदे इसका अच्छा उदाहरण है।
हमारे यहां आत्मकथाएं मुख्यतया आधुनिककाल में लिखी गई। आधुनिक हिंदी का विकास बीसवीं सदी में हुआ और आधुनिक शिक्षा का माध्यम तो यह आजादी के बाद बनी, इसलिए आजादी के आंदोलन में सक्रिय कुछ महापुरुषों ने अपनी आत्मकथाएं अंग्रेजी में भी लिखीं। हिंदीतर भारतीय भाशाओं में उर्दू, बंगला, पंजाबी, मराठी और कन्नड़ आदि में भी आत्म कथाएं लिखी गईं। राजनेताओं द्वारा लिखी गई आत्मकथाओं में महात्मा गांधी की सत्य के प्रयोग, जवाहरलाल नेहरू की मेरी कहानी, राजेन्द्र प्रसाद और अब्दुल कलाम आजाद की आत्मकथाएं खासतौर से लोकप्रिय हुई हैं। अन्य राजनेताओं में राधाकृष्णन, जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई की आत्मकथाएं प्रकाशित हुई हैं। विख्यात क्रांतिकारियों में से सुभाषचंद बोस, गणेशशंकर विद्यार्थी और रामप्रसाद बिस्मिल ने भी अपनी आत्मकथाएं लिखी हैं। हिंदीतर भारतीय भाषाओं में बंगला में लिखित रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा जीवन स्मृति, उर्दू में लिखित इस्मत चुगताई की कागजी है पैरहन और अमृता प्रतीम की रसीदी टिकट का विशेश महत्व है। हिंदी में जैन कवि बनारसीदास की अर्धकथा की गणना पहली आत्मकथा के रूप में होती है। आधुनिककाल के प्रारंभिक चरण में भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कुछ आप बीती-कुछ जग बीती, स्वामी श्रद्धानंद की कल्याण पथ का पथिक, पांडेय बेचन शर्मा की अपनी खबर और शिवपूजन सहाय की वे दिन वे लोग, जैसी आत्मकथाओं के नाम लिए जा सकते हैं। आगे चलकर आत्मकथा-लेखन में प्रौढ़ता आई। राहुल सांकृत्यायन ने विस्तार से मेरी जीवन यात्रा नाम से अपनी आत्मकथा लिखी। कवि हरिवंशराय बच्चन ने चार खंडों-क्या भूलूं, क्या याद करू, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक में अपनी आत्मकथा लिखी, जो काफी लोकप्रिय हुई। हिंदी के कुछ साहित्यकारों, अज्ञेय, फणीश्वरनाथ रेणु, हरिशंकर परसाई ने व्यवस्थित आत्मकथाएं तो नहीं लिखीं, लेकिन यहां-वहां अपना आत्म-वृत्तांत लिखा, जो बाद में संकलित होकर प्रकाशित हुआ।
आत्मकथा आत्मकथाकार द्वारा लिखा गया अपने जीवन का वृत्तांत है। जब व्यक्ति स्वयं अपने जीवन के संबंध में व्यवस्था और विस्तार से लिखता है, तो ऐसी रचना को आत्मकथा कहा जाता है। यह एक तरह से स्वलिखित जीवन-चरित्र और अपनी जीवन कहानी है। यह किसी व्यक्ति द्वारा लिखी गई अपनी जीवनी है। आत्मप्रकाशन की दूसरी साहित्यिक विधाओं-संस्मरण, डायरी, पत्र आदि से भी आत्मकथा का गहरा संबंध है। इन सभी रूपों का अपना अलग-अलग स्वरूप और अनुशासन है, लेकिन इन सभी में आत्म की मुखर उपस्थिति जरूर रहती है, इसलिए ये आत्मकथा से बहुत दूर और अलग नहीं हैं।
आत्मकथा सचेत भाव से लिखी जाती है, इसलिए इसका कोई प्रयोजन जरूर होता है। कुछ महान व्यक्ति आत्मकथा इसलिए लिखते हैं कि वे अपने व्यतीत जीवन का निर्मम और तटस्थ भाव से आत्मविश्लेशण कर सकें। वे ऐसा करके अपने अतीत का विश्लेशण और मूल्यांकन करते हैं। वे देखते हैं कि उन्होंने अपने अतीत में जो निर्णय लिए, जो काम किए, वे समय की कसौटी पर कितने खरे उतरे। नेहरू ने अपनी आत्मकथा मेरी कहानी यही सोचकर लिखी। इसकी प्रस्तावना में उन्होंने लिखा, ´´इस किताब को लिखने का खास मकसद यह था.....मैं पिछले दिनों हिंदुस्तान की उन घटनाओं का विवेचन भी कर लेना चाहता था, जिनसे मेरा ताल्लुक रहा है, ताकि उनके बारे में स्पष्टॅता के साथ सोच सकूं। आत्मजिज्ञासा के भाव से मैंने इसे शुरू किया और बहुत हद तक यही बराबर जारी रखा है।´´
आत्मकथा लिखने के पीछे कहीं यह मंशा भी रहती है कि अन्य लोग इससे पे्ररित होकर अपने जीवन को बेहतर ढंग से गढ सकें। रवीन्द्रनाथ ने लिखा भी है कि ´´महान व्यक्तियों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व आम आदमी के लिए दिशा-बोध का काम करता है।´´ अक्सर ऐसा होता भी है। हम अपने जीवन के भीतर इस तरह डूबे हुए रहते हैं कि उसकी बागडोर पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं होती। दूसरों के जीवन को हम अपेक्षाकृत तटस्थ भाव से देखते हैं, इसलिए उसके मोड़-तनावों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए इस समझ का उपयोग कर सकते हैं। यों तो हर जीवन विशिष्ट है। कोई जीवन किसी का आदर्श नहीं होता, लेकिन उस महान जीवन को दृश्टांत मानकर प्रेरणा तो ली ही जा सकती है। महात्मा गांधी ने इसीलिए अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ´´कोई मेरे लेखों को प्रमाणभूत न समझे। मैं तो सिर्फ यह चाहता हूं कि उनमें बताए प्रयोगों को दृष्टांत रूप मानकर सब अपने-अपने प्रयोग यथाशक्ति और यथामति करें। महान साहित्यकारों ने केवल कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए भी आत्मकथाएं लिखी हैं।
आत्मकथा की कुछ विधायी खासियतें भी है। आत्मकथा में आत्म और उसका संघर्ष तो अपेक्षित है ही। आत्मकथा इतिवृत्तात्मक वृत्तांत भर नहीं होती। जैसे व्यक्ति का जीवन सीधी रेखा नहीं होता उस की कथा भी सीधी, सरल और सपाट नहीं होती। जीवन में निर्णय-अनिर्णय, दुविधा-संकोच और सुख-दुख की उथल-पुथल चलती रहती है। आत्मतत्त्व निरंतर सक्रिय रहता है। स्व का यह अंत: संघर्ष आत्मकथा में आना चाहिए। इसका आशय यह नहीं है कि घटनापूर्ण और वस्तुमय बाह्य जीवन इसमें नहीं आता। दरअसल अंत: संघर्ष बाह्य जीवन में ही अभिव्यक्त होता है। आत्मकथा में आत्मसंघर्ष के साथ-साथ कथा भी जरूरी है। आत्मकथाकार को अपना जीवन-वृत्तांत कुछ इस तरह बयान करना चाहिए कि पाठक को उसमें कहानी जैसा मजा आए। मतलब यह कि उसमें कहानी का जादू- कुतूहल और रोचकता होनी चाहिए। लंबे विश्लेशण-विवेचन और घटनाओं के ब्यौरे आत्मकथा को दस्तावेजी बना देते हैं। उर्दू की विख्यात कथाकार इस्मत चुगताई की आत्मकथा कागजी है पैरहन इस दृष्टि से एक आदर्श आत्मकथा है। इसमें जीवंत आत्मसंघर्ष को जादुई कथाविधान में बयान किया गया है।
आत्मकथा लिखते समय पूरी तरह आत्मनिरपेक्ष बने रहना मुश्किल काम है। गांधीजी ने इसलिए इसे तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन कर्म कहा है। अक्सर आत्मकथाकार सचेत रहकर आत्मकथा लिखते समय उन प्रसंगों-घटनाओं का जिक्र नहीं करते, जो खास समय और समाज में खराब मानी जाती हैं। कभी-कभी जब उनका आत्म प्रबल होता है तो यह प्रबलता आत्ममुग्धता की तरफ जाती है। आत्ममुग्धता से किया हुआ कोई भी विश्लेशण और मूल्यांकन सही नहीं होता। अहम की प्रबलता आम बात है। इसी भय से क्रांतिकारी और चिंतक एम.एन. राय ने अपनी आत्मकथा ही नहीं लिखी।
आत्मकथा और संस्मरण में अंतर है। आत्मकथा एक दीर्घकाय स्वलिखित जीवन-वृतांत है, जबकि संस्मरण घटना या व्यक्ति पर एक एकाग्र छोटी रचना है। आत्मकथा में स्व केन्द्र में है। यदि इसमें इतर भी है तो पूरी तरह इस स्व से संबद्ध और इसको व्यक्त करने के लिए है, जबकि संस्मरण में इतर, मतलब दूसरा प्रमुख है। जीवनी किसी महापुरूश व्यक्ति पर लिखी किसी अन्य व्यक्ति की रचना है। जीवनीकार अपने लक्ष्य व्यक्ति के जीवन के संबंध में विभिन्न स्रोतों से जानकारियां एकत्र करता है और उन्हें व्यवस्थित रूप देकर उस व्यक्ति की जीवनी लिखता है। डायरी में दैनंदिन की घटनाओं का अंकन किया जाता है। इसमें धटनाओं पर तत्काल प्रतिक्रिया होती है। डायरी आत्मपरक ही हो, यह भी जरूरी नहीं है। आधुनिक जीवन जैसे-जैसे जटिल होता जा रहा है, आत्मकथा, संस्मरण, डायरी आदि के विधागत दायरे टूटते प्रतीत हो रहे हैं। इधर हिंदी में ऐसी कई रचनाएं आ गई हैं, जिन्हें किसी विधायी चौखटे में नहीं रखा जा सकता। गगन गिल की रचना दिल्ली में उनींदे इसका अच्छा उदाहरण है।
हमारे यहां आत्मकथाएं मुख्यतया आधुनिककाल में लिखी गई। आधुनिक हिंदी का विकास बीसवीं सदी में हुआ और आधुनिक शिक्षा का माध्यम तो यह आजादी के बाद बनी, इसलिए आजादी के आंदोलन में सक्रिय कुछ महापुरुषों ने अपनी आत्मकथाएं अंग्रेजी में भी लिखीं। हिंदीतर भारतीय भाशाओं में उर्दू, बंगला, पंजाबी, मराठी और कन्नड़ आदि में भी आत्म कथाएं लिखी गईं। राजनेताओं द्वारा लिखी गई आत्मकथाओं में महात्मा गांधी की सत्य के प्रयोग, जवाहरलाल नेहरू की मेरी कहानी, राजेन्द्र प्रसाद और अब्दुल कलाम आजाद की आत्मकथाएं खासतौर से लोकप्रिय हुई हैं। अन्य राजनेताओं में राधाकृष्णन, जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई की आत्मकथाएं प्रकाशित हुई हैं। विख्यात क्रांतिकारियों में से सुभाषचंद बोस, गणेशशंकर विद्यार्थी और रामप्रसाद बिस्मिल ने भी अपनी आत्मकथाएं लिखी हैं। हिंदीतर भारतीय भाषाओं में बंगला में लिखित रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा जीवन स्मृति, उर्दू में लिखित इस्मत चुगताई की कागजी है पैरहन और अमृता प्रतीम की रसीदी टिकट का विशेश महत्व है। हिंदी में जैन कवि बनारसीदास की अर्धकथा की गणना पहली आत्मकथा के रूप में होती है। आधुनिककाल के प्रारंभिक चरण में भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कुछ आप बीती-कुछ जग बीती, स्वामी श्रद्धानंद की कल्याण पथ का पथिक, पांडेय बेचन शर्मा की अपनी खबर और शिवपूजन सहाय की वे दिन वे लोग, जैसी आत्मकथाओं के नाम लिए जा सकते हैं। आगे चलकर आत्मकथा-लेखन में प्रौढ़ता आई। राहुल सांकृत्यायन ने विस्तार से मेरी जीवन यात्रा नाम से अपनी आत्मकथा लिखी। कवि हरिवंशराय बच्चन ने चार खंडों-क्या भूलूं, क्या याद करू, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक में अपनी आत्मकथा लिखी, जो काफी लोकप्रिय हुई। हिंदी के कुछ साहित्यकारों, अज्ञेय, फणीश्वरनाथ रेणु, हरिशंकर परसाई ने व्यवस्थित आत्मकथाएं तो नहीं लिखीं, लेकिन यहां-वहां अपना आत्म-वृत्तांत लिखा, जो बाद में संकलित होकर प्रकाशित हुआ।
Tuesday, 9 December 2008
हिंदी में गद्य विधाओं का विकास
प्लासी की निर्णायक विजय के बाद अंग्रेजों की रीति-नीति में बदलाव हुए। उन्होंने यहां रेल, भाप के जहाज और तार की आधुनिक संचार-व्यवस्था का विस्तार किया। उन्होंने यहां के धार्मिक-सामाजिक मामलात में अब तक चली आ रही अहस्तक्षेप की नीति को छोड़कर ईसाई धर्म प्रचारकों को कार्य करने की छूट और सुविधाएं दी। उन्होंने शिक्षा के भी अंग्रेजीकरण का निर्णय लिया-इसके लिए संस्थाएं कायम कीं और उनमें साहित्य, इतिहास और विज्ञान के अध्ययन-अध्यापन के प्रबंध किए। यह सब उन्होंने अपने शासन की दृढ़ता और प्रभुत्व के विस्तार के लिए किया। उनका अनुमान यह था कि आधुनिक संचार-व्यवस्था उनके शासन और सैनिकों की दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंच को सुगम बनाएगी और उससे यहां की अकूत भौतिक संपदा का दोहन भी आसान होगा। ईसाई मिशनरियों के धर्म प्रचार से उन्हें लगता था कि यहां का जनसाधारण साम्राज्य और शासन के प्रति वफादार और सेवाभावी बनेगा। अंग्रेजी षिक्षा तो उनके लिए अपने प्रभुत्व और वर्चस्व के विस्तार का सबसे अहम् हथियार थी। उनको विष्वास था कि इस षिक्षा से यहां एक ऐसा वर्ग पैदा हो जाएगा, जो रक्त और रंग में भारतीय लेकिन बुद्धि, रुचि और नैतिकता की दृष्टि से पूरी तरह अंग्रेज होगा। ओ. मैले के अनुसार उपनिवेशवादियों को आशा थी कि इस शिक्षा से उत्पन्न ज्ञान, जनता को ब्रिटिश शासन का सम्मान करना सिखलाएगा और उनमें एक हद तक शासन के प्रति अपनत्व की भावना पैदा करेगा। लेकिन हुआ इससे भिन्न। उनका उद्देष्य था विनाष किन्तु हुआ पुनरुज्जीवन। ब्रिटिश शिक्षा के विस्तार से यहां जो नया पढ़ा-लिखा तबका तैयार हुआ, वह आधुनिक यूरोपीय विचारधाराओं, युक्तियुक्तता, उदारतावाद, स्वतंत्रता और जनवाद, मानवतावाद और समानता के संपर्क में आया। इन नए विचारों की रोशनी में उसने अपनी परंपरा, समय और समाज को नए सिरे से समझने-पहचानने की शुरुआत की और इस तरह समाज-सुधार और पुनरुत्थान के आंदोलन जोर पकड़ने लगे।
आधुनिक संचार-व्यवस्था, जो अंग्रेजों ने अपने प्रभुत्व और विस्तार के लिए कायम की थी, इन विचारों को देश भर में फैलाने में मददगार सिद्ध हुई। महादेव गोविंद रानाडे, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, सर सैयद अहमद खान नवजागरण के अग्रदूत बने। इस नवजागरण से राष्ट्रीय चेतना के विस्तार में भी मदद मिली। आगे चलकर धीरे-धीरे उपनिवेषवाद के विरुद्ध संघशZ के लिए जैसे-जैसे राजनीतिक चेतना उग्र और व्यापक होने लगी समाज-सुधार और पुनरुत्थान के स्वर मंद पड़ते गए। इस व्यापक नवाचार की उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के आरंभ के हिंदी में साहित्य के स्वरूप निर्धारण में निर्णायक भूमिका थी। यह उसकी नींव में पत्थरों की तरह इस्तेमाल हुआ। बीसवीं सदी में बहुत आगे जाकर भी हिंदी साहित्य में इसकी स्मृति और संस्कार बने रहे।
उन्नीसवीं सदी में जब नवजागरण आंदोलन चल रहे थे और आधुनिक आचार-विचार का विस्तार हो रहा था, तो इनकी प्रेरणा और प्रभाव से उत्तर भारत में खड़ी बोली हिंदी को आधुनिक गद्य की भाशा में बदलने की निर्णायक कोषिषें भी चल रही थीं। खड़ी बोली हिंदी को गद्य-भाशा में ढालने-संवारने का काम इस दौरान अंग्रेजों द्वारा भारतीयों की षिक्षा के लिए स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी के अध्यक्ष जॉन गिलक्राइस्ट की देखरेख में लल्लूलाल और सदल मिश्र ने किया। कुछ ऐसी कोशिशें कॉलेज से बाहर के लोगों-सैयद ईशा अल्ला खां और ईसाई धर्म प्रचारकों ने भी की। दयानंद सरस्वती ने भी सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखकर इस काम को आगे बढ़ाया। राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मणसिंह का भी हिंदी के आरंभिक गद्य का स्वरूप तय करने में महत्वपूर्ण योगदान है। इन्होंने शुरुआत में पाठ्योपयोगी किताबें लिखीं और कुछ अनुवाद किए।
ये तमाम कोषिषें साहिित्यक नहीं थीं- इनका उद्देष्य हिंदी में पठन-पाठन के लिए जरूरी आधार सामग्री सुलभ करवाने या धर्म-प्रचार तक सीमित था। इनसे हिंदी गद्य का रूप कुछ तय हुआ और पठन-पाठन और पत्रकारिता में इसका उपयोग भी होने लगा। नतीजा यह हुआ कि दुविधा और संकोच में उबरकर हिंदी में साहित्य को संभव करने का आत्मविष्वास आ गया। हिंदी में साहित्यकर्म की शुरुआत थोड़ी झिझक के साथ भारतेन्दु हरिष्चन्द्र ने की। अब तक साहित्य की भाशा ब्रज थी इसलिए इसे छोड़कर खड़ी बोली हिंदी में साहित्यकर्म के लिए प्रवृत्त होने में भारतेन्द्र हरिष्चन्द्र को थोड़ी असुविधा हुई। उन्होंने ब्रज में पूर्ववत कविकर्म जारी रखते हुए खड़ी बोली हिंदी साहित्य कर्म शुरू किया।
भारतेन्दु के समकालीन अन्य लोगों में, जिन्होंने ब्रज के साथ खड़ी बोली में साहित्यकर्म की शुरुआत की, बदरीनारायण चौधरी, ठाकुर जगमोहन सिंह, बालकृष्ण भट्ट, अंबिकादत्त व्यास और लाला श्रीनिवासदास प्रमुख हैं। कुल मिलाकर वस्तुस्थिति यह थी कि बीसवीं सदी की शुरूआत में जब हिंदी के विकास और संस्कार परिश्कार के काम की बागडोर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने संभाली, तो हिंदी अपने पांवों पर खड़ी हो चुकी थी और इसमें साहित्य की सभी आधुनिक गद्य विधाओं में लिखने की शुरूआत हो चुकी थी। 1903 में द्विवेदी जी सरस्वती के संपादक बने और इस पद पर रहकर उन्होंने हिंदी के साहित्यकारों और उदीयमान पाठकों के एक उदीयमान प्रांतीय समूह को साफ-सुथरी शिष्ट अभिव्यक्ति कला का प्रषिक्षण दिया। उन्होंने सरस्वती के माध्यम से हिंदी में गद्य का स्वीकृत और मानक रूप गढ़ा। गद्य का स्वरूप तय हो जाने के बाद इसमें लेखन की सक्रियता बढ़ी। कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना आदि के साथ जीवनी संस्मरण और यात्रा वृत्तांत जैसी कथेतर गद्य विधाओं में लेखन शुरू हुआ।
आधुनिक संचार-व्यवस्था, जो अंग्रेजों ने अपने प्रभुत्व और विस्तार के लिए कायम की थी, इन विचारों को देश भर में फैलाने में मददगार सिद्ध हुई। महादेव गोविंद रानाडे, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, सर सैयद अहमद खान नवजागरण के अग्रदूत बने। इस नवजागरण से राष्ट्रीय चेतना के विस्तार में भी मदद मिली। आगे चलकर धीरे-धीरे उपनिवेषवाद के विरुद्ध संघशZ के लिए जैसे-जैसे राजनीतिक चेतना उग्र और व्यापक होने लगी समाज-सुधार और पुनरुत्थान के स्वर मंद पड़ते गए। इस व्यापक नवाचार की उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के आरंभ के हिंदी में साहित्य के स्वरूप निर्धारण में निर्णायक भूमिका थी। यह उसकी नींव में पत्थरों की तरह इस्तेमाल हुआ। बीसवीं सदी में बहुत आगे जाकर भी हिंदी साहित्य में इसकी स्मृति और संस्कार बने रहे।
उन्नीसवीं सदी में जब नवजागरण आंदोलन चल रहे थे और आधुनिक आचार-विचार का विस्तार हो रहा था, तो इनकी प्रेरणा और प्रभाव से उत्तर भारत में खड़ी बोली हिंदी को आधुनिक गद्य की भाशा में बदलने की निर्णायक कोषिषें भी चल रही थीं। खड़ी बोली हिंदी को गद्य-भाशा में ढालने-संवारने का काम इस दौरान अंग्रेजों द्वारा भारतीयों की षिक्षा के लिए स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी के अध्यक्ष जॉन गिलक्राइस्ट की देखरेख में लल्लूलाल और सदल मिश्र ने किया। कुछ ऐसी कोशिशें कॉलेज से बाहर के लोगों-सैयद ईशा अल्ला खां और ईसाई धर्म प्रचारकों ने भी की। दयानंद सरस्वती ने भी सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखकर इस काम को आगे बढ़ाया। राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मणसिंह का भी हिंदी के आरंभिक गद्य का स्वरूप तय करने में महत्वपूर्ण योगदान है। इन्होंने शुरुआत में पाठ्योपयोगी किताबें लिखीं और कुछ अनुवाद किए।
ये तमाम कोषिषें साहिित्यक नहीं थीं- इनका उद्देष्य हिंदी में पठन-पाठन के लिए जरूरी आधार सामग्री सुलभ करवाने या धर्म-प्रचार तक सीमित था। इनसे हिंदी गद्य का रूप कुछ तय हुआ और पठन-पाठन और पत्रकारिता में इसका उपयोग भी होने लगा। नतीजा यह हुआ कि दुविधा और संकोच में उबरकर हिंदी में साहित्य को संभव करने का आत्मविष्वास आ गया। हिंदी में साहित्यकर्म की शुरुआत थोड़ी झिझक के साथ भारतेन्दु हरिष्चन्द्र ने की। अब तक साहित्य की भाशा ब्रज थी इसलिए इसे छोड़कर खड़ी बोली हिंदी में साहित्यकर्म के लिए प्रवृत्त होने में भारतेन्द्र हरिष्चन्द्र को थोड़ी असुविधा हुई। उन्होंने ब्रज में पूर्ववत कविकर्म जारी रखते हुए खड़ी बोली हिंदी साहित्य कर्म शुरू किया।
भारतेन्दु के समकालीन अन्य लोगों में, जिन्होंने ब्रज के साथ खड़ी बोली में साहित्यकर्म की शुरुआत की, बदरीनारायण चौधरी, ठाकुर जगमोहन सिंह, बालकृष्ण भट्ट, अंबिकादत्त व्यास और लाला श्रीनिवासदास प्रमुख हैं। कुल मिलाकर वस्तुस्थिति यह थी कि बीसवीं सदी की शुरूआत में जब हिंदी के विकास और संस्कार परिश्कार के काम की बागडोर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने संभाली, तो हिंदी अपने पांवों पर खड़ी हो चुकी थी और इसमें साहित्य की सभी आधुनिक गद्य विधाओं में लिखने की शुरूआत हो चुकी थी। 1903 में द्विवेदी जी सरस्वती के संपादक बने और इस पद पर रहकर उन्होंने हिंदी के साहित्यकारों और उदीयमान पाठकों के एक उदीयमान प्रांतीय समूह को साफ-सुथरी शिष्ट अभिव्यक्ति कला का प्रषिक्षण दिया। उन्होंने सरस्वती के माध्यम से हिंदी में गद्य का स्वीकृत और मानक रूप गढ़ा। गद्य का स्वरूप तय हो जाने के बाद इसमें लेखन की सक्रियता बढ़ी। कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना आदि के साथ जीवनी संस्मरण और यात्रा वृत्तांत जैसी कथेतर गद्य विधाओं में लेखन शुरू हुआ।
Saturday, 8 November 2008
विविध सरोकारों वाली पैनी व्यंग्य रचनाएं
हिंदी में साहित्यिक सक्रियता इस कदर कथा-कविता एकाग्र रही है कि उसमें कथेतर गद्य विधाओं की कोई खास पहचान नहीं बन पाई। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी आदि कुछ रचनाकारों ने अपनी असाधारण प्रतिभा से बीच में व्यंग्य को एक मुक्कमिल साहित्यिक अनुशासन की पहचान दिलवाई, लेकिन यह सिलसिला आगे नहीं बढ़ पाया। लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर मौजूदगी के बावजूद व्यंग्य को आज भी कथा-कविता की तुलना में इसलिए कमतर आंका जाता है, क्योंकि इसके पुस्तकाकार प्रकाशन अपेक्षाकृत कम हैं। इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल संपादक द्वय दुर्गाप्रसाद अग्रवाल और यश गोयल ने जमाने का दर्द नामक सद्य प्रकाशित संकलन के माध्यम से की है, जिसमें हमारे समय के महत्वपूर्ण छत्तीस व्यंग्यकारों की रचनाएं शामिल हैं।
हमारे जीवन के हर मोड़-पड़ाव पर मौजूद राजनीति सहित, नौकरशाही, उपभोक्तावाद, अपसंस्कृति, धर्म-अध्यात्म, भ्रष्टाचार, आडंबर आदि कई विषय इन रचनाओं में सरोकार के रूप में मौजूद हैं। राजनीति फिलहाल हमारे जीवन की धुरि है, इसलिए यहां शामिल रचनाओं में से सर्वाधिक इसी पर एकाग्र हैं। अतुल कनक, ईशमधु तलवार, फारूक आफरीदी, भगवतीलाल व्यास, मनोज वार्ष्णॆय़ॅ, रमेश खत्री आदि की रचनाएं हमारे समय की राजनीतिक विसंगतियों से बुनी गई हैं। अंग्रेजों से विरासत में मिले हमारे प्रशासनिक ढांचे की गड़बड़ों पर भी इन व्यंग्यकारों की निगाह गई है। अजय अनुरागी, अशोक राही, चंद्रकुमार वरठे, बुलाकी शर्मा, राजेशकुमार व्यास, सुरेन्द्र दुबे और हरदर्शन सहगल की यहां शामिल व्यंग्य हमारे प्रशासन तंत्र की विसंगतियों और अंतर्विरोधों को उभार कर सामने लाते हैं। गत दो-तीन दशकों में भारतीय मध्यवर्ग की धर्म और अध्यात्म में एकाएक दिलचस्पी बहुत बढ़ गई है। धर्म से जुड़े आडंबर और पाखंड पर भी इस संकलन में एकाधिक रचनाएं हैं। अनुराग वाजपेयी, यशवंत व्यास, यश गोयल और हेमेन्द्र चंडालिया के व्यंग्य इसी तरह के हैं। हमारे दैनंदिन सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में फिलहाल भूचाल जैसी स्थिति है। भ्रष्टाचार, अपसंस्कृति, दोहरा आचरण, उपभोक्तावाद जैसी कई बीमारियों ने इसे जकड़ रखा है। आदर्श शर्मा, दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, पूरन सरमा, देवेन्द्र इन्द्रेश, भगवान अटलानी, मदन केवलिया, रामविलास जांगिड, लक्ष्मीनारायण नंदवाना, शरद उपाध्याय, शरद केवलिया, देव कोठारी, मनोहर प्रभाकर, संजय कौशिक, बलवीरसिंह भटनागर, प्रभाशंकर उपाध्याय, यशवंत कोठारी और संपत सरल की यहां शामिल रचनाओं में हमारे विसंगतिपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के कई रंग मौजूद हैं।
यहां संकलित रचनाओं की खास बात यह है कि इनमें हमारे समय और समाज की धड़कन साफ सुनाई पड़ती है। खास हमारे समय और समाज की विसंगतियों और अंतर्विरोध इनमें उभरकर सामने आते हैं। इन रचनाओं में सरोकारों का वैविध्य है, लेकिन खास बात यह है कि अपने आसपास और दैनंदिन जीवन से इनका रिश्ता बहुत गहरा और अटूट है।
व्यंग्य की धार और पैनापन कमोबेश इन सभी रचनाओं में हैं, लेकिन कहीं रचनाकर इनमें सतह पर साफ दिखाई पड़ने वाली विसंगतियों और अंतर्विरोधों पर ठहर गया है, जबकि कहीं वह इनके लिए सतह के नीचे गहरे में उतरा है। यहां संकलित कुछ रचनाएं सतह पर नहीं दिखाई देने वाली हमारे सांस्कृतिक-सामाजिक जीवन की विसंगतियों को उभारने वाली बहुत अर्थपूर्ण रचनाएं हैं, जिनका निहातार्थ पाठक मन में धीरे-धीरे खुलता है और गहरा असर करता है।
यशवंत व्यास की भगवान बड़ा दयालु है, अनुराग वाजपेयी की फिर नया अवतार, ईशमधु तलवार की वे बाघ हो गए, फारूक आफरीदी की बापू, यहां कुशल मंगल है संजय झाला की अपुन का गांधी कॉलेज और बुलाकी शर्मा की प्रकाशक का सुखी सफरनामा आदि रचनाओं में गहराई है। इन व्यंग्यों में रचनाकार कम, रचना ज्यादा है। भगवान बड़ा दयालु है और अपुन का गांधी कॉलेज जैसी व्यंग्य रचनाओं में निहितार्थ भाषा के खेल से उभरता है और इनसे कविता जैसा स्वाद आता है। इन रचनाओं की मम्मा ने परंपरागत अम्मा होने की चिंता को शाम के क्लब प्रोग्राम के पेपरवेट तले तबाया और बिटिया चली गई, फिर जब संस्कृति का चांद उनकी सदाशयता की चलनी से दिखाई देता है तो पतिव्रता होने का आनंद कितने गुना हो जाता होगा?, आदमी साला जड़स्थितप्रज्ञ हो गया है, न सुखेन सुखी, न दुखेन दु:खी जैसी पंक्तियां बहुत अर्थपूर्ण और सांकेतिक हैं।
अतिरंजना भी व्यंग्य का हथियार है। यहां शामिल कुछ रचनाओं में इसका बखूबी इस्तेमाल हुआ है। मनोहर प्रभाकर की घर-घर चैन चुरैया और आदर्श शर्मा की बाई! जीवन में पहले क्यूं न आई में यह साफ देखा जा सकता है। पुस्तक का प्रकान साफ-सुथरा और सुरुचिपूर्ण है।
विवेच्य पुस्तक
जमाने का दर्द (श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य संकलन) : विवेक पब्लिशिंग हाउस, धामाणी मार्केट, चौड़ा रास्ता, जयपुर, प्रथम संस्करण : 2008, मूल्य: 175 रुपए, पृष्ठ संख्या: 130
Sunday, 14 September 2008
गिरीश कारनाड के नाटक का तुगलक का मूल्यांकन
बहुमुखी प्रतिभा के धनी गिरीश कारनाड आधुनिक भारतीय नाटक और रंग जगत की महत्वपूर्ण शख्सियत है। नाटक उनका पहला प्रेम है, लेकिन फिल्मों में लेखन, अभिनय और निर्देशन में भी उन्होंने कीर्तिमान कायम किए हैं। उनके कन्नड नाटकों के कई आधुनिक भारतीय भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुए हैं। कन्नड रंग जगत में गिरीश कारनाड ने ऐतिहासिक और मिथकीय कथावस्तु वाले नाटक लिखकर अपनी अलग पहचान बनाई। उनके पहले नाटक ययाति की विषय वस्तु और रंग योजना इतनी नवीन थी कि कन्नड सहित दूसरी भारतीय भाषाओं इसको तत्काल ख्याति मिल गई। तुगलक ख्याति के मामले और भी आगे निकला। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में इब्राहिम अलकाजी के निर्देशन में हुए इसके मंचन से कारनाड आधुनिक रंगकर्मियों की पहली पंक्ति में आ गए। यह नाटक आदर्शवादी, स्पप्नदृश्टा और बुध्दिजीवी, लेकिन पागल के रूप में विख्यात भारतीय इतिहास के मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन तुगलक पर एकाग्र है।
कारनाड ने तुगलक के समय और समाज के रूपक में दरअसल आजादी के बाद के दो-तीन दशकों के यथार्थ और द्वंद्व को प्रस्तुत किया है। तुगलक की चरित्र योजना में इतिहास और कल्पना, दोनों का योग है। इसका मुख्य और केन्द्रीय चरित्र अपने ऐतिहासिक चरित्र से काफी मिलता-जुलता है। वह आदसर्शवादी, स्वप्नदृष्टा, बुध्दिवादी और वैज्ञानिक सोच वाला है, लेकिन अपारंपरिक कार्यों के कारण उसे तत्कालीन समाज के किसी भी तबके का सहयोग नहीं मिलता। तुगलक के अन्य चरित्र भी अपने तबकों के प्रतिनिधि पात्र हैं, लेकिन वे रक्त-मांस वाले जीवंत चरित्र है। तुगलक में रंग आयाम अंतनिर्हित है और इसकी खासियत यह है कि इसमें लेखक ने मंच परिकल्पना दृष्यबंध, संगीत आदि को निर्देशकीय कल्पना और सूझबूझ पर छोड़ दिया है। इसके मंचन में तत्कालीन समय और समाज की झलक मिलनी चाहिए। विख्यात रंगकर्मी इब्राहिम अलकाजी ने तत्कालीन उपलब्ध स्रोतों और वास्तु विषेशज्ञों की मदद से तैयार सांकेतिक और वस्तुपरक दृंष्यबंधों के आधार पर इसका मंचन किया है। तुगलक की भाषा और संवाद, अभिजातवर्गीय हैं। तुगलक के बुध्दिजीवी और कल्पनाषील व्यक्तित्व के अनुरूप इस नाटक की भाषा प्रांजल और गंभीर है। यह पात्रों की सामाजिक हैसियत के अनुसार बदलती है, लेकिन निम्न स्तर पर नहीं जाती। अपने समय और समाज के यथार्थ से पलायन और टाइप चरित्र सृष्टि के आरोपों के बावजूद तुगलक आधुनिक भारतीय नाट्य साहित्य की उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण रचना है।
तुगलक भारतीय नाट्य और रंग जगत की सर्वाधिक चर्चित कृतियों में से एक है। इसके कई आधुनिक भारतीय भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुए हैं। इसके प्रकाशन और मंचन से रंगकर्मी के रूप में गिरीशकारनाड को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। साहित्यालोचकों और रंगकर्मियों में तुगलक को लेकर पर्याप्त वाद विवाद हुआ है। कारनाड के आलोचकों का कहना है कि वे अपने अन्य नाटकों की तरह तुगलक में भी अपने समय और समाज के यथार्थ और द्वंद्व को व्यक्त करने के लिए तुगलक के रूपक का सहारा लेते हैं, जिससे यथार्थ विकृत रूप में सामने आता है। इसके विपरीत कारनाड के समर्थकों का कहना है कि इस नाटक में अतीत के दूरस्थ यथार्थ को माध्यम बनाकर कारनाड अधिक निश्पक्ष और निर्भीक ढंग से अपने समय के यथार्थ को समझते-समझाते हैं। विख्यात कन्नड साहित्यकार यू.आर. अनंतमूर्ति के अनुसार ´´कारनाड नाटक के कवि हैं। समसामयिक समस्याओं से निबटने के लिए इतिहास और मिथ का उपयोग उन्हें अपने समय पर टिप्पणी की मनोवैज्ञानिक दूरी प्रदान करता है। तुगलक बहुत सफल हुआ, क्योंकि यह एक यथार्थवादी नाटक नहीं था।``
तुगलक पर एक आरोप यह भी है कि उसके चरित्र रक्त-मांस के जीवंत और यथार्थ चरित्र नहीं हैं, ये अपने समय और समाज के वगीय प्रतिनिधि मात्र हैं। कारनाड के प्रशंसकों ने इस आरोप का भी खंडन किया है। उनके अनुसार तुगलक के चरित्र केवल टाइप चरित्र नहीं है, वे सजीव और खास प्रकार के व्यक्तित्व लिए हुए हैं। तुगलक के हिंदी अनुवाद के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में मंचन का निर्देशन करने वाले विख्यात रंगकर्मी इब्राहिम अलकाजी के शब्दों में ´´कारनाड की सूझबूझ कमी नहीं डगमगाती, उनके सभी चरित्र मांसमज्जा और प्राणों की उमंग से भरे-पूरे चरित्र हैं और प्रत्येक पात्र विशिष्ट बोली में बात करता है।``
यह सही है कि तुगलक अपने समय और समाज के यथार्थ में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता और उसके चरित्र भी कुछ हद अपने समाज के वर्गीय प्रतिनिधि हैं, लेकिन इससे एक रंग नाटक के रूप में तुगलक का महत्व कम नहीं होता। यथार्थवादी रंगमंच की सीमाएं हमारे सामने हैं और यह दर्शकों को उस तरह से प्रभावित करने में सक्षम नहीं है, जिस तरह मिथकीय और ऐतिहासिक रचनाएं करती हैं। कारनाड भव्य और महान चरित्र और घटना वाले इस नाटक के माध्यम से दर्शकों के मन में अपने समय और समाज के यथार्थ को चरितार्थ करने में सफल रहे हैं। यह कृति इस तरह रंगमंच और नाट्य लेखन को यथार्थवादी शैली से मुक्त करने की पहल करती है। इस नाटक के बाद न केवल कन्नड में, बल्कि अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं में कई महत्वपूर्ण मिथकीय और ऐतिहासिक रचनाएं सामने आई हैं।
कारनाड ने तुगलक के समय और समाज के रूपक में दरअसल आजादी के बाद के दो-तीन दशकों के यथार्थ और द्वंद्व को प्रस्तुत किया है। तुगलक की चरित्र योजना में इतिहास और कल्पना, दोनों का योग है। इसका मुख्य और केन्द्रीय चरित्र अपने ऐतिहासिक चरित्र से काफी मिलता-जुलता है। वह आदसर्शवादी, स्वप्नदृष्टा, बुध्दिवादी और वैज्ञानिक सोच वाला है, लेकिन अपारंपरिक कार्यों के कारण उसे तत्कालीन समाज के किसी भी तबके का सहयोग नहीं मिलता। तुगलक के अन्य चरित्र भी अपने तबकों के प्रतिनिधि पात्र हैं, लेकिन वे रक्त-मांस वाले जीवंत चरित्र है। तुगलक में रंग आयाम अंतनिर्हित है और इसकी खासियत यह है कि इसमें लेखक ने मंच परिकल्पना दृष्यबंध, संगीत आदि को निर्देशकीय कल्पना और सूझबूझ पर छोड़ दिया है। इसके मंचन में तत्कालीन समय और समाज की झलक मिलनी चाहिए। विख्यात रंगकर्मी इब्राहिम अलकाजी ने तत्कालीन उपलब्ध स्रोतों और वास्तु विषेशज्ञों की मदद से तैयार सांकेतिक और वस्तुपरक दृंष्यबंधों के आधार पर इसका मंचन किया है। तुगलक की भाषा और संवाद, अभिजातवर्गीय हैं। तुगलक के बुध्दिजीवी और कल्पनाषील व्यक्तित्व के अनुरूप इस नाटक की भाषा प्रांजल और गंभीर है। यह पात्रों की सामाजिक हैसियत के अनुसार बदलती है, लेकिन निम्न स्तर पर नहीं जाती। अपने समय और समाज के यथार्थ से पलायन और टाइप चरित्र सृष्टि के आरोपों के बावजूद तुगलक आधुनिक भारतीय नाट्य साहित्य की उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण रचना है।
तुगलक भारतीय नाट्य और रंग जगत की सर्वाधिक चर्चित कृतियों में से एक है। इसके कई आधुनिक भारतीय भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुए हैं। इसके प्रकाशन और मंचन से रंगकर्मी के रूप में गिरीशकारनाड को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। साहित्यालोचकों और रंगकर्मियों में तुगलक को लेकर पर्याप्त वाद विवाद हुआ है। कारनाड के आलोचकों का कहना है कि वे अपने अन्य नाटकों की तरह तुगलक में भी अपने समय और समाज के यथार्थ और द्वंद्व को व्यक्त करने के लिए तुगलक के रूपक का सहारा लेते हैं, जिससे यथार्थ विकृत रूप में सामने आता है। इसके विपरीत कारनाड के समर्थकों का कहना है कि इस नाटक में अतीत के दूरस्थ यथार्थ को माध्यम बनाकर कारनाड अधिक निश्पक्ष और निर्भीक ढंग से अपने समय के यथार्थ को समझते-समझाते हैं। विख्यात कन्नड साहित्यकार यू.आर. अनंतमूर्ति के अनुसार ´´कारनाड नाटक के कवि हैं। समसामयिक समस्याओं से निबटने के लिए इतिहास और मिथ का उपयोग उन्हें अपने समय पर टिप्पणी की मनोवैज्ञानिक दूरी प्रदान करता है। तुगलक बहुत सफल हुआ, क्योंकि यह एक यथार्थवादी नाटक नहीं था।``
तुगलक पर एक आरोप यह भी है कि उसके चरित्र रक्त-मांस के जीवंत और यथार्थ चरित्र नहीं हैं, ये अपने समय और समाज के वगीय प्रतिनिधि मात्र हैं। कारनाड के प्रशंसकों ने इस आरोप का भी खंडन किया है। उनके अनुसार तुगलक के चरित्र केवल टाइप चरित्र नहीं है, वे सजीव और खास प्रकार के व्यक्तित्व लिए हुए हैं। तुगलक के हिंदी अनुवाद के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में मंचन का निर्देशन करने वाले विख्यात रंगकर्मी इब्राहिम अलकाजी के शब्दों में ´´कारनाड की सूझबूझ कमी नहीं डगमगाती, उनके सभी चरित्र मांसमज्जा और प्राणों की उमंग से भरे-पूरे चरित्र हैं और प्रत्येक पात्र विशिष्ट बोली में बात करता है।``
यह सही है कि तुगलक अपने समय और समाज के यथार्थ में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता और उसके चरित्र भी कुछ हद अपने समाज के वर्गीय प्रतिनिधि हैं, लेकिन इससे एक रंग नाटक के रूप में तुगलक का महत्व कम नहीं होता। यथार्थवादी रंगमंच की सीमाएं हमारे सामने हैं और यह दर्शकों को उस तरह से प्रभावित करने में सक्षम नहीं है, जिस तरह मिथकीय और ऐतिहासिक रचनाएं करती हैं। कारनाड भव्य और महान चरित्र और घटना वाले इस नाटक के माध्यम से दर्शकों के मन में अपने समय और समाज के यथार्थ को चरितार्थ करने में सफल रहे हैं। यह कृति इस तरह रंगमंच और नाट्य लेखन को यथार्थवादी शैली से मुक्त करने की पहल करती है। इस नाटक के बाद न केवल कन्नड में, बल्कि अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं में कई महत्वपूर्ण मिथकीय और ऐतिहासिक रचनाएं सामने आई हैं।
Friday, 29 August 2008
भारतीय परिप्रेक्ष्य में आधुनिक कन्नड़ साहित्य
कन्नड़ साहित्य भारतीय साहित्य का अभिन्न अंग है। इसका विकास क्षेत्रीय जरूरतों के तहत अलग ढंग से हुआ है, लेकिन संपूर्ण आधुनिक भारतीय साहित्य से बहुत अलग नहीं है। इसके सरोकार, चिंताएं और आग्रह कमोबेश वही हैं, जो दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्य के हैं। कन्नड़ का प्राचीन साहित्य अपने पृथक् वैशिष्ट्य के बावजूद अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य की तरह संस्कृत से प्रभावित है। कन्नड़ में आधुनिक साहित्य की शुरुआत औपनिवेषिक शासन के दौरान हुई। संचार के साधनों के विकास और उसमें भी खास तौर पर छापाखाने के आगमन और अनुवादों में बढ़ोतरी के कारण भिन्न भाषाओं के साहित्यों के बीच आदान-प्रदान और संवाद बढ़ा। अंग्रेजी संपर्क के कारण भारतीय भाषाओं के साहित्य के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। इस सबसे कन्नड़ में अिस्मता की चेतना आई और यह सबसे पहले शब्द कोष और व्याकरण ग्रंथों की रचना में व्यक्त हुई। इसी दौरान कन्नड़ में संस्कृत और अंग्रेजी ग्रंथों के अनुवाद भी हुए। कन्नड़ की आरंभिक आधुनिक साहित्यकारों में मुदन्ना, पुटन्ना और गुलवादी वेंकट राव प्रमुख हैं। मंगेष राय ने कन्नड़ में पहली कहानी लिखी और लिखी, जबकि वेंकटराव ने इंदिरा नामक पहला सामाजिक उपन्यास लिखा। 1890 में कर्नाटक विद्यावर्द्धक संघ और 1915 में कन्नड़ साहित्य परिषद की स्थापनाएं हुईं, जिससे कन्नड़ में आधुनिक साहित्यिक चेतना का प्रसार हुआ।
हिंदी सहित सभी आधुनिक भारतीय भाशाओं के साहित्य में पुनरुत्थान, समाज सुधार, वैज्ञानिक चेतना और ज्ञानोदय के रूप में जो नवजागरण शुरू हुआ, उसने कन्नड़ में नवोदय के रूप लिया। मास्ति वेंकटेष आय्यंगर ने इस दौरान कथा साहित्य में, जबकि डी.आर. बेंद्रे ने कविता में नवजीवन का संचार किया। ये दोनों साहित्यकार कन्नड़ साहित्य में आधुनिक चेतना का प्रसार करने वाले सिद्ध हुए। मास्ति वेंकटेश की रचनाओं में पुनरुत्थान की चेतना सघन रूप व्यक्त हुई, तो बेंद्र की कविता में राश्ट्रीयता, परंपरानुराग, रहस्य, वैयिक्कता आदि नवोदय के सभी लक्षण प्रकट हुए। इनके अलावा नवोदय युग के साहित्यकारों में बी.एम. श्रीकांतैय्या और के. वी. पुट्टपा भी खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। दरअसल नवोदय आंदोलन की शुरुआत ही श्रीकांतैय्या के अनुवादों से हुई। इसके बाद नवोदय आंदोलन में शिवराम कारंथ, यू.आर. अनंतमूर्ति, लंकेश, भैरप्पा जैसे कई अग्रणी साहित्यकार जुड़ गए। गिरीश कारनाड और खंबार जैसे नाटककारों ने अपने निरंतर नवाचार और प्रयोगधर्मिता से इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। शिवराम कारंथ नवोदय आंदोलन के सर्वाधिक प्रभावी रचनाकार थे। उन्होंने कन्नड़ संस्कृति और साहित्य को दूर तक प्रभावित किया। कारंथ ने यथार्थवादी लेखन की कन्नड़ में जो परंपरा डाली, वो अभी तक जारी है। उनके लेखन से कन्नड़ के कई साहित्यकार प्रभावित हुए। कन्नड़ के विख्यात कथाकार यू.आर. अनंतमूर्ति ने एक जगह लिखा है कि ``इसी समय मैंने अपने महान् उपन्यासकारों में एक कारंथ का चोमना डुडी पढ़ा। यह अपनी जमीन को वापस चाहने वाले अछूत की त्रासद दास्तान है। अब तब मैं जिन रूमानी कहानियों का दीवाना था, वे मुझे बकवास लगने लगीं। मैंने जाना कि अगर अपने आसपास दिखने वाले यथार्थ को इतनी सुंदर कहानी में ढाला जा सकता है, तो फिर मुझे सिर्फ उन चीजों को बारीकी से देखने-परखने की जरूरत है। मेरे अग्रज, जो कारंथ की क्रांतिकारी विचारधारा से नफरत करते थे, वे भी उनकी लेखकीय कला की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते थे और उनके बारे में मुग्ध मन से बातें करते थे।´´
गत सदी के चौथे दशक में आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य पर मार्क्र्सवाद का गहरा प्रभाव हुआ। कन्नड़ साहित्य में भी प्रगतिवादी लेखन की नयी धारा शुरू हुई। इस धारा का नेतृत्व कन्नड़ में ए.एन. कृश्णराव ने किया। इसमें शामिल अन्य साहित्यकारों में टी.आर. सुब्बाराव, कटि्टमणि, निरंजन आदि प्रमुख हैं। प्रगतिवादी आंदोलन से ही आगे चलकर कन्नड़ में दो धाराएं-बंद्या और दलित साहित्य विकसित हुईं। दलित साहित्य में वंचित-दमित जातियों के कन्नड़भाशी साहित्यकारों ने हिस्सेदारी की। इस धारा के साहित्यकारों पर मराठी का विशेष प्रभाव था, क्योंकि मराठी में दलित साहित्य की समृद्ध परंपरा पहले से थी। यू.आर. अनंतमूर्ति और उनके वामपंथी तेवर वाले साहित्यकारों ने बंद्या साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन लेखकों ने राजनीतिक समझ के साथ अपने समय और समाज के यथार्थ को चित्रित किया। अनंतमूर्ति के घटश्राद्ध, संस्कार और भारतीपुर जैस उपन्यासों ने यथार्थ के कई नए आयाम उद्घाटित किए। आगे चलकर चंद्रषेखर पाटिल ने बंद्या और सिद्धलिंगैया ने दलित साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्पष्ट है कि आधुनिक कन्नड़ साहित्य के सरोकार, चेतना, वस्तु आदि भी कमाबेश वहीं हैं, जो सभी आधुनिक भाषाओं के हैं। यह अवश्य़ है कि कन्नड़ की अपनी परंपरा और क्षेत्रीय जरूरतों के अनुसार इनका विकास अलग तरह से हुआ है।
हिंदी सहित सभी आधुनिक भारतीय भाशाओं के साहित्य में पुनरुत्थान, समाज सुधार, वैज्ञानिक चेतना और ज्ञानोदय के रूप में जो नवजागरण शुरू हुआ, उसने कन्नड़ में नवोदय के रूप लिया। मास्ति वेंकटेष आय्यंगर ने इस दौरान कथा साहित्य में, जबकि डी.आर. बेंद्रे ने कविता में नवजीवन का संचार किया। ये दोनों साहित्यकार कन्नड़ साहित्य में आधुनिक चेतना का प्रसार करने वाले सिद्ध हुए। मास्ति वेंकटेश की रचनाओं में पुनरुत्थान की चेतना सघन रूप व्यक्त हुई, तो बेंद्र की कविता में राश्ट्रीयता, परंपरानुराग, रहस्य, वैयिक्कता आदि नवोदय के सभी लक्षण प्रकट हुए। इनके अलावा नवोदय युग के साहित्यकारों में बी.एम. श्रीकांतैय्या और के. वी. पुट्टपा भी खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। दरअसल नवोदय आंदोलन की शुरुआत ही श्रीकांतैय्या के अनुवादों से हुई। इसके बाद नवोदय आंदोलन में शिवराम कारंथ, यू.आर. अनंतमूर्ति, लंकेश, भैरप्पा जैसे कई अग्रणी साहित्यकार जुड़ गए। गिरीश कारनाड और खंबार जैसे नाटककारों ने अपने निरंतर नवाचार और प्रयोगधर्मिता से इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। शिवराम कारंथ नवोदय आंदोलन के सर्वाधिक प्रभावी रचनाकार थे। उन्होंने कन्नड़ संस्कृति और साहित्य को दूर तक प्रभावित किया। कारंथ ने यथार्थवादी लेखन की कन्नड़ में जो परंपरा डाली, वो अभी तक जारी है। उनके लेखन से कन्नड़ के कई साहित्यकार प्रभावित हुए। कन्नड़ के विख्यात कथाकार यू.आर. अनंतमूर्ति ने एक जगह लिखा है कि ``इसी समय मैंने अपने महान् उपन्यासकारों में एक कारंथ का चोमना डुडी पढ़ा। यह अपनी जमीन को वापस चाहने वाले अछूत की त्रासद दास्तान है। अब तब मैं जिन रूमानी कहानियों का दीवाना था, वे मुझे बकवास लगने लगीं। मैंने जाना कि अगर अपने आसपास दिखने वाले यथार्थ को इतनी सुंदर कहानी में ढाला जा सकता है, तो फिर मुझे सिर्फ उन चीजों को बारीकी से देखने-परखने की जरूरत है। मेरे अग्रज, जो कारंथ की क्रांतिकारी विचारधारा से नफरत करते थे, वे भी उनकी लेखकीय कला की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते थे और उनके बारे में मुग्ध मन से बातें करते थे।´´
गत सदी के चौथे दशक में आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य पर मार्क्र्सवाद का गहरा प्रभाव हुआ। कन्नड़ साहित्य में भी प्रगतिवादी लेखन की नयी धारा शुरू हुई। इस धारा का नेतृत्व कन्नड़ में ए.एन. कृश्णराव ने किया। इसमें शामिल अन्य साहित्यकारों में टी.आर. सुब्बाराव, कटि्टमणि, निरंजन आदि प्रमुख हैं। प्रगतिवादी आंदोलन से ही आगे चलकर कन्नड़ में दो धाराएं-बंद्या और दलित साहित्य विकसित हुईं। दलित साहित्य में वंचित-दमित जातियों के कन्नड़भाशी साहित्यकारों ने हिस्सेदारी की। इस धारा के साहित्यकारों पर मराठी का विशेष प्रभाव था, क्योंकि मराठी में दलित साहित्य की समृद्ध परंपरा पहले से थी। यू.आर. अनंतमूर्ति और उनके वामपंथी तेवर वाले साहित्यकारों ने बंद्या साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन लेखकों ने राजनीतिक समझ के साथ अपने समय और समाज के यथार्थ को चित्रित किया। अनंतमूर्ति के घटश्राद्ध, संस्कार और भारतीपुर जैस उपन्यासों ने यथार्थ के कई नए आयाम उद्घाटित किए। आगे चलकर चंद्रषेखर पाटिल ने बंद्या और सिद्धलिंगैया ने दलित साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्पष्ट है कि आधुनिक कन्नड़ साहित्य के सरोकार, चेतना, वस्तु आदि भी कमाबेश वहीं हैं, जो सभी आधुनिक भाषाओं के हैं। यह अवश्य़ है कि कन्नड़ की अपनी परंपरा और क्षेत्रीय जरूरतों के अनुसार इनका विकास अलग तरह से हुआ है।
Friday, 15 August 2008
गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक का वैशिष्ट्य
आजादी के बाद के सपनों के पराभव और मोहभंग की कन्नड़ में रचित नाट्यकृति तुगलक का आधुनिक भारतीय नाटक साहित्य में खास महत्व है। यह कृति उस समय लिखी गई जब आधुनिक भारतीय नाटक साहित्य में ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विषयों पर पुनरुत्थान मूलक नाटक लेखन का जोर था। हिंदी में जयशंकर प्रसाद, सेठ गोविंददास, हरिकृष्ण प्रेमी आदि नाटककार इतिहास और मिथों का नाट्य रूपांतरण कर रहे थे। उनका उद्देश्य भारतीय अतीत की भव्य और महान छवि गढ़ने का था। गिरीश कारनाड ने ऐसे समय में इतिहास में अपने समय और समाज के द्वंद्व और चिंता को विन्यस्त किया। यह बाद में हिंदी सहित कई आधुनिक भारतीय भाशाओं में भी लोकप्रिय हुई।
तुगलक में इतिहास या मिथक के रूपक में अपने समय और समाज की विन्यस्त करने का गिरीश कारनाड की पद्धति भी इस तरह के और आधुनिक भारतीय नाटकों की तुलना में खास तरह की है। इस नाटक की खास बात यह है कि इसमें हमारा समय और समाज है, लेकिन यह इतिहास को कहीं भी विकृत नहीं करता। पहला राजा भी इसी तरह का नाटक है, लेकिन उसमें आरोपण इतना वर्चस्वकारी है कि मिथक विकृत हो जाता है। गिरीश कारनाड इतिहास पर अपने समय और समाज के द्वंद्व और चिंता का आरोपण इतने सूक्ष्म ढंग से करते हैं कि इससे मुहम्मद बिन तुगलक का ऐतिहासिक चरित्र और समय, दोनों ही अप्रभावित रहते हैं। कल्पना का पुट इस नाटक में है, लेकिन यह इतिहास के ज्ञात तथ्यों पर भारी नहीं पड़ती।
अपनी रंग योजना के लिहाज से भी तुगलक एक विशिष्ट रचना है। अपनी अन्य समकालीन आधुनिक भारतीय नाट्य रचनाओं से अलग इसमें मंच, संगीत, प्रकाश आदि को निर्देशकीय सूझबूझ और कल्पना पर छोड़ा गया है। इस नाटक में रंग निर्देश बहुत कम हैं। निर्देशक को पूरी छूट दी गई है कि वह इस नाटक का मंचन प्रयोगधर्मी ढंग से कर सके। इब्राहिम अलकाजी ने अपनी कल्पना और सूझबूझ से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के मुक्ताकाशी मंच पर इसका मंचन किया था। उन्होंने इसमें यथार्थवादी और प्रयोगवादी, दोनों प्रकार की शैलियां प्रयुक्त कीं। उन्होंने इसके लिए मुगलकालीन स्थापत्य विशेषज्ञों और ग्रंथों का भी सहयोग लिया।
आधुनिक भारतीय नाटकों में तुगलक इस अर्थ में भी खास है कि इसमें भव्य और महान कथानक है। इस महानता और भव्यता को सम्मूर्त करने के लिए नाटककार ने सभी कोशिशं की हैं। उसने मंच स्थापत्य इस तरह का रखा है कि यह भव्यता उससे व्यक्त होती है। नाटककार ने कथानक की भव्यता और महानता बरकरार रखने के लिए खास प्रकार की अभिजात उर्दू का प्रयोग किया है। इस नाटक की भाषा में मुगल दरबारों की रवायतों और अदब-कायदों का इस्तेमाल हुआ है। नाटककार और इसके निर्देशक ने इस संबंध में पर्याप्त शोध कार्य किया है।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि आधुनिक भारतीय नाटक साहित्य में अपनी कतिपय खास विशेषताओं के कारण तुगलक का अलग और महत्वपूर्ण स्थान है।
तुगलक में इतिहास या मिथक के रूपक में अपने समय और समाज की विन्यस्त करने का गिरीश कारनाड की पद्धति भी इस तरह के और आधुनिक भारतीय नाटकों की तुलना में खास तरह की है। इस नाटक की खास बात यह है कि इसमें हमारा समय और समाज है, लेकिन यह इतिहास को कहीं भी विकृत नहीं करता। पहला राजा भी इसी तरह का नाटक है, लेकिन उसमें आरोपण इतना वर्चस्वकारी है कि मिथक विकृत हो जाता है। गिरीश कारनाड इतिहास पर अपने समय और समाज के द्वंद्व और चिंता का आरोपण इतने सूक्ष्म ढंग से करते हैं कि इससे मुहम्मद बिन तुगलक का ऐतिहासिक चरित्र और समय, दोनों ही अप्रभावित रहते हैं। कल्पना का पुट इस नाटक में है, लेकिन यह इतिहास के ज्ञात तथ्यों पर भारी नहीं पड़ती।
अपनी रंग योजना के लिहाज से भी तुगलक एक विशिष्ट रचना है। अपनी अन्य समकालीन आधुनिक भारतीय नाट्य रचनाओं से अलग इसमें मंच, संगीत, प्रकाश आदि को निर्देशकीय सूझबूझ और कल्पना पर छोड़ा गया है। इस नाटक में रंग निर्देश बहुत कम हैं। निर्देशक को पूरी छूट दी गई है कि वह इस नाटक का मंचन प्रयोगधर्मी ढंग से कर सके। इब्राहिम अलकाजी ने अपनी कल्पना और सूझबूझ से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के मुक्ताकाशी मंच पर इसका मंचन किया था। उन्होंने इसमें यथार्थवादी और प्रयोगवादी, दोनों प्रकार की शैलियां प्रयुक्त कीं। उन्होंने इसके लिए मुगलकालीन स्थापत्य विशेषज्ञों और ग्रंथों का भी सहयोग लिया।
आधुनिक भारतीय नाटकों में तुगलक इस अर्थ में भी खास है कि इसमें भव्य और महान कथानक है। इस महानता और भव्यता को सम्मूर्त करने के लिए नाटककार ने सभी कोशिशं की हैं। उसने मंच स्थापत्य इस तरह का रखा है कि यह भव्यता उससे व्यक्त होती है। नाटककार ने कथानक की भव्यता और महानता बरकरार रखने के लिए खास प्रकार की अभिजात उर्दू का प्रयोग किया है। इस नाटक की भाषा में मुगल दरबारों की रवायतों और अदब-कायदों का इस्तेमाल हुआ है। नाटककार और इसके निर्देशक ने इस संबंध में पर्याप्त शोध कार्य किया है।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि आधुनिक भारतीय नाटक साहित्य में अपनी कतिपय खास विशेषताओं के कारण तुगलक का अलग और महत्वपूर्ण स्थान है।
Saturday, 9 August 2008
आधुनिक भारतीय नाटकों में इतिहास-मिथक
तुगलक आजादी के बाद के सपनों के पराभव और मोहभंग का रूपक है। इसमें अपने समय और समाज के द्वंद्व और चिंता को इतिहास में विन्यस्त किया गया है। इतिहास और मिथ के रूपक में अपने समय, समाज और व्यक्ति के द्वंद्व और चिंता को व्यक्त करने वाली नाट्य रचनाएं आधुनिक भारतीय भाषाओं कई हुई हैं। धर्मवीर भारती ने अपने गीति नाट्य अंधा युग (1954 ई.) में मिथक के माध्यम से अपने समय चिंताओं का उजागर किया है। इसमें महाभारत के अंतिम अठारहवें दिन की घटना की पुनर्रचना है। इसके माध्यम से युद्धोत्रर निराशा और पराजय से पैदा हुए माहौल में मानव मूल्यों के ध्वंस को रेखांकित किया गया है। इस नाटक में मिथक महत्वपूर्ण नहीं है- इसमें महत्वपूर्ण हमारे समय और समाज का युग बोध है। मोहन राकेश का नाटक आषाढ़ का एक दिन (1954 ई.) भी इतिहास-मिथक मूलक नाट्य कृति है। इसमें मोहन राकेश ने संस्कृत कवि और नाटककार के कालिदास के जीवन को आधार बनाया है। इस नाटक में राज्याश्रय और रचनाकर्म के आधुनिक संबंध की जटिलता को उजागर किया गया है। यह कालिदास के चरित्र पर एकाग्र नाटक है, लेकिन यहां कालिदास प्रतीक है। स्वयं लेखक के शब्दों में ``आषाढ़ का एक दिन में कालिदास का जैसा भी चित्र है, वह उसकी रचनाओं में समाहित उसके व्यक्तित्व से बहुत हटकर नहीं है। हां, आधुनिक प्रतीक के निर्वाह की दृष्टि से उसमें थोड़ा परिवर्तन अवश्य किया गया है। यह इसलिए कि कालिदास मेरे लिए एक व्यक्ति नहीं, हमारी सृजनात्मक शक्तियों का प्रतीक है। नाटक में यह प्रतीक अंतर्द्वद्व को संकेतिक करने के लिए है, जो किसी भी काल में सृजनशील प्रतिभा आंदोलित करता है। मोहन राकेश का दूसरा नाटक लहरों का राजहंस भी इतिहास पर आधारित है। भगवान बुद्ध के छोटे भाई नंद के जीवन से संबंधित इस नाटक को उन्होंने अष्वघोष के काव्य सौंदरनंद के आधार पर गढ़ा है। इस नाटक में जीवन के प्रति राग-विराग के शाश्वत द्वंद्व को इतिहास के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। मोहन राकेश के अपने स्वयं के शब्दों में ``यहां नंद और सुंदरी की कथा एक आश्रय मात्र है, क्योंकि मुझे लगा कि इसे समय में प्रक्षेपित किया जा सकता है। नाटक का मूल द्वंद्व उस अर्थ में यहां भी आधुनिक है जिस अर्थ में आषाढ़ का एक दिन।´´ जगदीशचंद माथुर का कोणार्क (1951 ई.) यों तो प्रसाद परंपरा का नाटक हैं, लेकिन यह उससे हट कर भी है। इसमें केवल भारतीय अतीत की भव्य और शौर्यमूलक प्रस्तुति नहीं है, जो प्रसाद नाटकों की मुख्य विषेशता है। जगदीशचंद माथुर इस नाटक में कोणार्क निर्माता उत्कल नरेश नरसिंह देव और उनके समय की घटनाओं के माध्यम से सामान्य जनता के अधिकारों की बात उठाते हैं। आजादी के बाद नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में, जो अवधारणात्मक अलगाव आ गया है, उसकी कुछ अनुगूंज भी इस नाटक में सुनाई पड़ती है। सुरेंद्र वर्मा का नाटक आठवां सर्ग (1976 ई.) भी इसी तरह का है। इसमें कालिदास के महाकाव्य कुमार संभव के उद्दाम शृगार युक्त आठवें सर्ग को आधार बनाया गया है। नाटककार इस रचना में इतिहास-मिथक के बहाने श्लीलता-अश्लीलता और सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे सार्वभौमिक सवालों से रूबरू होता है। नंदकिशोर आचार्य के एकाधिक नाटकों में इतिहास-मिथक का प्रयोग हुआ है। देहांतर (1987) उनका इस लिहाज से चर्चित नाटक है। इसमें प्रयुक्त मिथ का उपयोग गिरीष कारनाड ने भी अपने ययाति नामक नाटक में किया है। नंदकिशोर आचार्य ययाति, शर्मिष्ठा और पुरु जैसे पात्रों के माध्यम से इस नाटक में हमारे समय के मनुष्य की जटिल मानसिकता और कुंठा पर रोशनी डालते हैं। गुलाम बादशाह (1992 ई.) नंदकिशोर आचार्य का इतिहास केंद्रित नाटक है। इस नाटक में भी तुगलक की ही तरह दिल्ली सल्तनत के समय और समाज को आधार बनाया गया है। यह मुस्लिम शासक बलवन के आखिरी दिनों की घटनाओं पर आधारित है। यह नाटक विख्यात रंगकर्मी फैजल अल्काजी के शब्दों में ``जितना बलबन के अंतर्द्वद्व और उसके आखिरी दिनों का नाटक है, उतना ही आज के राजनीतिक परिदृश्य का भी। राजनीति पर कुछ परिवारों की कुंडली लपेट, चुनिंदा गुट, शासक और शासित के बीच गहरा अंतराल, भूला दिए गए पूर्व नायक और राजनीति की जरूरत बन चुके गंदे हाथ, ये सब अतीत के ही नहीं, आज की राजनीति के भी केंद्रीय प्रकरण हैं।´´
Sunday, 3 August 2008
तुगलक का हिंदी नाटक पहला राजा से साम्य-वैषम्य
भाषायी भिन्नता के बावजूद आधुनिक भारतीय साहित्यकारों की चिंताए, सरोकार और द्वंद्व कमोबेश एक जैसे हैं। नेहरूयुगीन मोहभंग के यथार्थ को 1964 में तुगलक में कन्नड़ रंगकर्मी और नाटककार गिरीश कारनाड ने मध्यकालीन मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन तुगलक के रूपक प्रस्तुत किया, तो 1969 में इसी विषय पर, इसी पद्धति से हिंदी नाटककार जगदीशचंद्र माथुर ने पहला राजा नाटक लिखा। खास बात यह है कि दोनों नाटकों में नेहरूयुगीन द्वंद्व और चिंता केन्द्र में है। कारनाड ने इसे मुहम्मद बिन तुगलक के ऐतिहासिक चरित्र के रूपक में प्रस्तुत किया है, जबकि माथुर ने इसे महाभारत के राजधर्मानुशासन पर्व में वर्णित पृथु के मिथक व्यक्तित्व में रूपांतरित किया है। नाटकों के साम्य-वैषम्य पर विचार करने से पहले हमें नाटक पहला राजा से परिचित हो लेना चाहिए।
पहला राजा माथुर का अंतिम नाटक है। यह अपनी प्रयोगधर्मिता तथा युगीन समस्याओं के विन्यास के लिए प्रसिद्ध है। पहला राजा में नेहरूयुगीन लोकतंत्र की समस्याओं को लिया गया है, जो आज और अधिक जटिल हो गई हैं। बच्चनसिंह के अनुसार इस नाटक में ``जवाहरलाल नेहरू लक्षणावृत्ति से स्वतंत्र भारत के पहले राजा कहे जा सकते हैं। पृथु की अनेक विषेशताएं नेहरू से मिलती-जुलती हैं। अत: पृथु का कथानक नेहरूयुगीन समस्याओं को उठाने के लिए वस्तुनिष्ठ समीकरण बन जाता है। पहला राजा के केन्द्रीय पात्र पृथु की कथा महाभारत के राजधर्मानुशासन पर्व से ली गई है। इसके कथानक का ताना-बाना बुनने के लिए वेद, भागवत पुराण, हड़प्पा मोहन जोदड़ो की सभ्यता से अपेक्षित सूत्रों को भी लिया गया है। पृथु का मिथक, जिसमें पृथ्वी के दुहे जाने की कथा है, से सिद्ध होता है कि वह नियमों में बंधा हुआ प्रथम प्रजा वत्सल राजा था। इंद्रनाथ मदान के अनुसार इसके ``माध्यम से नेहरू युग की आधुनिकता का पहला दौर उजागर होने लगता है। योजनाओं का प्रारंभ, भारत, चीन-युद्ध, मंत्रियों के शडयंत्र, घाटे का बजट, पिछड़ी जातियों की समस्याएं, संविधान, पूंजीवाद, जनता का शोषण और अन्य नेहरू युगीन समस्याओं की अनुगूंजें नाटक में आरंभ से अंत तक मिलती है।´´ यह कहा गया है कि पृथु की कथा पर आधुनिकता का प्रक्षेपण इतना गहरा है कि पृथु अतीत का पृथु नहीं मालूम पड़ता। पहले ही कहा गया है कि पृथु-कथा माथुर के भीतर उमड़ती हुई समस्याओं के लिए वस्तुनिश्ठ समीकरण है। पृथु कुलूत देश से चलकर ब्रह्मावर्त पहुंचता है। उसके साथ अनार्य मित्र कवश भी है। ऋषियों-मुनियों ने बेन के शरीर मंथन का नाटक कर पृथु को भुजा पुत्र ठहराया और कवश को जंघापुत्र अथाZत एक को क्षत्रिय और दूसरे को शूद्र। पृथु के पूर्ववर्ती राजा का वध ऋिशयों ने ही किया था। इससे पता चलता है कि ब्राह्मण उस समय अत्यधिक ‘ाक्तिषाली थे। ऋषियों ने संविधान बनाया और पृथु उससे प्रतिबद्ध था। वह ऋिश-मुनियों के यज्ञ की रक्षा करता था। माथुर ऋिशयों की पवित्रता और सदाचार का मिथक तोड़ते हैं। नाटककार पृथु के महिमामंडित व्यक्तित्व की जगह पृथ्वी को समतल करने तथा उत्पादन बढ़ाने वाले व्यक्तित्व पर अधिक बल देता है। कृषि और सिंचाई व्यवस्था पर नेहरू ने भी जोर दिया था। आरंभ में नाटककार ने लिखा भी है-``लेकिन नाटक में पृथु कुछ और भी है। वह विभिन्न दुविधाओं को खिंचावों का बिंदु है। हिमालय का पुत्र, जो प्रकृति की निष्छल क्रोड़ में खो जाना चाहता है, आर्य युवक जो पुरुशार्थ और शौर्य का पुंज है, निशाद किन्नर एवं अन्य आर्येतर जातियों का बंधु, जो एक समीकृत संस्कृति का स्वप्न देखता है, दारिद्र्य का शत्रु और निर्माण का नियोजक, जिसे चकवर्ती और अवतार बनने के लिए मजबूर किया जाता है--- और संकेत नहीं दूंगा कि वह कौन है?´´ आशय स्पष्ट है कि नेहरू ने एक मिली-जुली संस्कृति के निर्माण का सपना देखा था, गरीबी दूर करने का संकल्प किया था, नदियों से नहरें निकाली थीं, बांध बनवाए थे। लेकिन पृथु का अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व भी है। उसकी महत्वाकांक्षा कवश और उर्वी को अलग कर देती है।
भिन्न भाषाओं में होने के बावजूद तुगलक और पहला राजा में कुछ समानताएं हैं, जो इस प्रकार हैं :
1. दोनों नाटक आजादी के बाद के नेहरूयुगीन मोहभंग के यथार्थ और द्वंद्व पर एकाग्र हैं।
2. दोनों नाटक अपने समय और समाज के यथार्थ से सीधे मुठभेड़ के बजाय रूपक का सहारा लेते हैं।
3. दोनों नाटक चरित्रप्रधान हैं। गिराष कारनाड के तुगलक में केन्द्रीय चरित्र मध्यकालीन चर्चित और विवादास्पद मुस्लिम शासक मुहम्मद बिना तुगलक है, जबकि पहला राजा में केन्द्रीय चरित्र महाभारत के राजधर्मानुशासन पर्व में वर्णित प्रथम प्रजावत्सल शासक पृथु को बनाया गया है।
4. दोनों नाटक प्रयोगधर्मी हैं- दोनों की रंग योजना यथार्थवादी की जगह प्रयोगधर्मी है। दोनों में मंच परिकल्पना, प्रकाश आदि संबंधी रंग निर्देष निर्देशकीय कल्पना और सूझबूझ पर आधारित हैं।
उक्त वर्णित समानताओं के बावजूद दोनों नाटकों में पर्याप्त अंतर है। इनकी असमानताएं निम्नानुसार है:
1. गिरीश कारनाड अपने नाटक में अपने समय और समाज के यथार्थ से मुठभेड़ के लिए इतिहास के रूपक का सहारा लेते हैं, जबकि पहला राजा में जगदीशचंद्र माथुर ने इसके लिए मिथक का प्रयोग किया है।
2. गिरीष कारनाड का केन्द्रीय चरित्र मुहम्मद बिन तुगलक एक ऐतिहासिक चरित्र है। कारनाड उसमें अपने समय और समाज का प्रक्षेपण तो करते हैं, लेकिन वे उसके व्यक्तित्व की ऐतिहासिकता से बहुत छेड़छाड़ नहीं करते। कारनाड ने इसके लिए पर्याप्त शोध की है। पहला राजा का पृथु मिथकीय चरित्र है, लेकिन उस पर प्रक्षेपण इतना सघन और व्यापक है कि वह पृथु नहीं रहता।
3. तुगलक भव्य और महान कथानक पर आधारित है। इसके अनुसार इसकी रंग योजना-मंच स्थापत्य, संगीत आदि भी भव्य रखे गए हैं। मिथकीय आधार के बावजूद पहला राजा में यह भव्यता और महानता नहीं है।
4. तुगलक को नेहरूयुगीन यथार्थ का रूपक कहा गया है। इसका विवेचन-विश्लेशण भी इसी तरह हुआ है, जबकि पहला राजा स्वयं जगदीषचंद्र माथुर के अनुसार रूपक नहीं, अन्योक्ति है।
5.तुगलक का केन्द्रीय चरित्र मुहम्मद बिन तुगलक एक विख्यात और चर्चित ऐतिहासिक चरित्र है। दर्शको-पाठकों को इसे समझने में कोई मुश्किल नहीं होती। इसके विपरित पृथु को समझने में दर्शक -पाठक असुविधा अनुभव करता है। यह एक अल्पज्ञात मिथकीय चरित्र है।
6. तुगलक एक सफल और लोकप्रिय नाटक है, जबकि पहला राजा को वैसी सफलता और लोकप्रियता नहीं मिली। तुगलक की सफलता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसके कई भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुए हैं। पहला राजा का दायरा अपेक्षाकृत छोटा, हिंदी तक सीमित है।
7. तुगलक के नाटककार गिरीश कारनाड को रंगकर्म और अभिनय का लंबा अनुभव है। यह अनुभव तुगलक की रंग योजना में झलकता है, जबकि पहला राजा की रंग योजना एक रंगकर्मी के बजाय नाटककार की रंग योजना है।
8. तुगलक की सबसे बड़ी और सम्मोहक खासियत उसकी भाशा है। मुस्लिम दरबारी अदब-कायदों की बारीकियों से सज्जित यह भाषा दर्शकों को बांधती है। इसके विपरित पहला राजा की भाषा संस्कृतनिष्ठ ठोस-ठस हिंदी है। इसमें प्रवाह नहीं है। इसको आत्मसात करने में मुश्किल होती है।
पहला राजा माथुर का अंतिम नाटक है। यह अपनी प्रयोगधर्मिता तथा युगीन समस्याओं के विन्यास के लिए प्रसिद्ध है। पहला राजा में नेहरूयुगीन लोकतंत्र की समस्याओं को लिया गया है, जो आज और अधिक जटिल हो गई हैं। बच्चनसिंह के अनुसार इस नाटक में ``जवाहरलाल नेहरू लक्षणावृत्ति से स्वतंत्र भारत के पहले राजा कहे जा सकते हैं। पृथु की अनेक विषेशताएं नेहरू से मिलती-जुलती हैं। अत: पृथु का कथानक नेहरूयुगीन समस्याओं को उठाने के लिए वस्तुनिष्ठ समीकरण बन जाता है। पहला राजा के केन्द्रीय पात्र पृथु की कथा महाभारत के राजधर्मानुशासन पर्व से ली गई है। इसके कथानक का ताना-बाना बुनने के लिए वेद, भागवत पुराण, हड़प्पा मोहन जोदड़ो की सभ्यता से अपेक्षित सूत्रों को भी लिया गया है। पृथु का मिथक, जिसमें पृथ्वी के दुहे जाने की कथा है, से सिद्ध होता है कि वह नियमों में बंधा हुआ प्रथम प्रजा वत्सल राजा था। इंद्रनाथ मदान के अनुसार इसके ``माध्यम से नेहरू युग की आधुनिकता का पहला दौर उजागर होने लगता है। योजनाओं का प्रारंभ, भारत, चीन-युद्ध, मंत्रियों के शडयंत्र, घाटे का बजट, पिछड़ी जातियों की समस्याएं, संविधान, पूंजीवाद, जनता का शोषण और अन्य नेहरू युगीन समस्याओं की अनुगूंजें नाटक में आरंभ से अंत तक मिलती है।´´ यह कहा गया है कि पृथु की कथा पर आधुनिकता का प्रक्षेपण इतना गहरा है कि पृथु अतीत का पृथु नहीं मालूम पड़ता। पहले ही कहा गया है कि पृथु-कथा माथुर के भीतर उमड़ती हुई समस्याओं के लिए वस्तुनिश्ठ समीकरण है। पृथु कुलूत देश से चलकर ब्रह्मावर्त पहुंचता है। उसके साथ अनार्य मित्र कवश भी है। ऋषियों-मुनियों ने बेन के शरीर मंथन का नाटक कर पृथु को भुजा पुत्र ठहराया और कवश को जंघापुत्र अथाZत एक को क्षत्रिय और दूसरे को शूद्र। पृथु के पूर्ववर्ती राजा का वध ऋिशयों ने ही किया था। इससे पता चलता है कि ब्राह्मण उस समय अत्यधिक ‘ाक्तिषाली थे। ऋषियों ने संविधान बनाया और पृथु उससे प्रतिबद्ध था। वह ऋिश-मुनियों के यज्ञ की रक्षा करता था। माथुर ऋिशयों की पवित्रता और सदाचार का मिथक तोड़ते हैं। नाटककार पृथु के महिमामंडित व्यक्तित्व की जगह पृथ्वी को समतल करने तथा उत्पादन बढ़ाने वाले व्यक्तित्व पर अधिक बल देता है। कृषि और सिंचाई व्यवस्था पर नेहरू ने भी जोर दिया था। आरंभ में नाटककार ने लिखा भी है-``लेकिन नाटक में पृथु कुछ और भी है। वह विभिन्न दुविधाओं को खिंचावों का बिंदु है। हिमालय का पुत्र, जो प्रकृति की निष्छल क्रोड़ में खो जाना चाहता है, आर्य युवक जो पुरुशार्थ और शौर्य का पुंज है, निशाद किन्नर एवं अन्य आर्येतर जातियों का बंधु, जो एक समीकृत संस्कृति का स्वप्न देखता है, दारिद्र्य का शत्रु और निर्माण का नियोजक, जिसे चकवर्ती और अवतार बनने के लिए मजबूर किया जाता है--- और संकेत नहीं दूंगा कि वह कौन है?´´ आशय स्पष्ट है कि नेहरू ने एक मिली-जुली संस्कृति के निर्माण का सपना देखा था, गरीबी दूर करने का संकल्प किया था, नदियों से नहरें निकाली थीं, बांध बनवाए थे। लेकिन पृथु का अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व भी है। उसकी महत्वाकांक्षा कवश और उर्वी को अलग कर देती है।
भिन्न भाषाओं में होने के बावजूद तुगलक और पहला राजा में कुछ समानताएं हैं, जो इस प्रकार हैं :
1. दोनों नाटक आजादी के बाद के नेहरूयुगीन मोहभंग के यथार्थ और द्वंद्व पर एकाग्र हैं।
2. दोनों नाटक अपने समय और समाज के यथार्थ से सीधे मुठभेड़ के बजाय रूपक का सहारा लेते हैं।
3. दोनों नाटक चरित्रप्रधान हैं। गिराष कारनाड के तुगलक में केन्द्रीय चरित्र मध्यकालीन चर्चित और विवादास्पद मुस्लिम शासक मुहम्मद बिना तुगलक है, जबकि पहला राजा में केन्द्रीय चरित्र महाभारत के राजधर्मानुशासन पर्व में वर्णित प्रथम प्रजावत्सल शासक पृथु को बनाया गया है।
4. दोनों नाटक प्रयोगधर्मी हैं- दोनों की रंग योजना यथार्थवादी की जगह प्रयोगधर्मी है। दोनों में मंच परिकल्पना, प्रकाश आदि संबंधी रंग निर्देष निर्देशकीय कल्पना और सूझबूझ पर आधारित हैं।
उक्त वर्णित समानताओं के बावजूद दोनों नाटकों में पर्याप्त अंतर है। इनकी असमानताएं निम्नानुसार है:
1. गिरीश कारनाड अपने नाटक में अपने समय और समाज के यथार्थ से मुठभेड़ के लिए इतिहास के रूपक का सहारा लेते हैं, जबकि पहला राजा में जगदीशचंद्र माथुर ने इसके लिए मिथक का प्रयोग किया है।
2. गिरीष कारनाड का केन्द्रीय चरित्र मुहम्मद बिन तुगलक एक ऐतिहासिक चरित्र है। कारनाड उसमें अपने समय और समाज का प्रक्षेपण तो करते हैं, लेकिन वे उसके व्यक्तित्व की ऐतिहासिकता से बहुत छेड़छाड़ नहीं करते। कारनाड ने इसके लिए पर्याप्त शोध की है। पहला राजा का पृथु मिथकीय चरित्र है, लेकिन उस पर प्रक्षेपण इतना सघन और व्यापक है कि वह पृथु नहीं रहता।
3. तुगलक भव्य और महान कथानक पर आधारित है। इसके अनुसार इसकी रंग योजना-मंच स्थापत्य, संगीत आदि भी भव्य रखे गए हैं। मिथकीय आधार के बावजूद पहला राजा में यह भव्यता और महानता नहीं है।
4. तुगलक को नेहरूयुगीन यथार्थ का रूपक कहा गया है। इसका विवेचन-विश्लेशण भी इसी तरह हुआ है, जबकि पहला राजा स्वयं जगदीषचंद्र माथुर के अनुसार रूपक नहीं, अन्योक्ति है।
5.तुगलक का केन्द्रीय चरित्र मुहम्मद बिन तुगलक एक विख्यात और चर्चित ऐतिहासिक चरित्र है। दर्शको-पाठकों को इसे समझने में कोई मुश्किल नहीं होती। इसके विपरित पृथु को समझने में दर्शक -पाठक असुविधा अनुभव करता है। यह एक अल्पज्ञात मिथकीय चरित्र है।
6. तुगलक एक सफल और लोकप्रिय नाटक है, जबकि पहला राजा को वैसी सफलता और लोकप्रियता नहीं मिली। तुगलक की सफलता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसके कई भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुए हैं। पहला राजा का दायरा अपेक्षाकृत छोटा, हिंदी तक सीमित है।
7. तुगलक के नाटककार गिरीश कारनाड को रंगकर्म और अभिनय का लंबा अनुभव है। यह अनुभव तुगलक की रंग योजना में झलकता है, जबकि पहला राजा की रंग योजना एक रंगकर्मी के बजाय नाटककार की रंग योजना है।
8. तुगलक की सबसे बड़ी और सम्मोहक खासियत उसकी भाशा है। मुस्लिम दरबारी अदब-कायदों की बारीकियों से सज्जित यह भाषा दर्शकों को बांधती है। इसके विपरित पहला राजा की भाषा संस्कृतनिष्ठ ठोस-ठस हिंदी है। इसमें प्रवाह नहीं है। इसको आत्मसात करने में मुश्किल होती है।
Monday, 28 July 2008
भारतीय परिप्रेक्ष्य में आधुनिक कन्नड़ साहित्य
कन्नड़ साहित्य भारतीय साहित्य का अभिन्न अंग है। इसका विकास क्षेत्रीय जरूरतों के तहत अलग ढंग से हुआ है, लेकिन संपूर्ण आधुनिक भारतीय साहित्य से बहुत अलग नहीं है। इसके सरोकार, चिंताएं और आग्रह कमोबेश वही हैं, जो दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्य के हैं। कन्नड़ का प्राचीन साहित्य अपने पृथक् वैशिष्ट्य के बावजूद अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य की तरह संस्कृत से प्रभावित है। कन्नड़ में आधुनिक साहित्य की शुरुआत औपनिवेषिक शासन के दौरान हुई। संचार के साधनों के विकास और उसमें भी खास तौर पर छापाखाने के आगमन और अनुवादों में बढ़ोतरी के कारण भिन्न भाषाओं के साहित्यों के बीच आदान-प्रदान और संवाद बढ़ा। अंग्रेजी संपर्क के कारण भारतीय भाषाओं के साहित्य के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। इस सबसे कन्नड़ में अस्मिता की चेतना आई और यह सबसे पहले शब्द कोश और व्याकरण ग्रंथों की रचना में व्यक्त हुई। इसी दौरान कन्नड़ में संस्कृत और अंग्रेजी ग्रंथों के अनुवाद भी हुए। कन्नड़ की आरंभिक आधुनिक साहित्यकारों में मुदन्ना, पुटन्ना और गुलवादी वेंकट राव प्रमुख हैं। मंगेश राय ने कन्नड़ में पहली कहानी लिखी और लिखी, जबकि वेंकटराव ने इंदिरा नामक पहला सामाजिक उपन्यास लिखा। 1890 में कर्नाटक विद्यावर्द्धक संघ और 1915 में कन्नड़ साहित्य परिषद की स्थापनाएं हुईं, जिससे कन्नड़ में आधुनिक साहित्यिक चेतना का प्रसार हुआ।
हिंदी सहित सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य में पुनरुत्थान, समाज सुधार, वैज्ञानिक चेतना और ज्ञानोदय के रूप में जो नवजागरण शुरू हुआ, उसने कन्नड़ में नवोदय के रूप लिया। मास्ति वेंकटेश आय्यंगर ने इस दौरान कथा साहित्य में, जबकि डी.आर. बेंद्रे ने कविता में नवजीवन का संचार किया। ये दोनों साहित्यकार कन्नड़ साहित्य में आधुनिक चेतना का प्रसार करने वाले सिद्ध हुए। मास्ति वेंकटेश की रचनाओं में पुनरुत्थान की चेतना सघन रूप व्यक्त हुई, तो बेंद्र की कविता में राश्ट्रीयता, परंपरानुराग, रहस्य, वैयिक्कता आदि नवोदय के सभी लक्षण प्रकट हुए। इनके अलावा नवोदय युग के साहित्यकारों में बी.म. श्रीकांतैय्या और के.वी. पुट्टपा भी खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। दरअसल नवोदय आंदोलन की शुरुआत ही श्रीकांतैय्या के अनुवादों से हुई। इसके बाद नवोदय आंदोलन में शिवराम कारंथ, यू.आर. अनंतमूर्ति, लंकेश, भैरप्पा जैसे कई अग्रणी साहित्यकार जुड़ गए। गिरीश कारनाड और खंबार जैसे नाटककारों ने अपने निरंतर नवाचार और प्रयोगधर्मिता से इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। शिवराम कारंथ नवोदय आंदोलन के सर्वाधिक प्रभावी रचनाकार थे। उन्होंने कन्नड़ संस्कृति और साहित्य को दूर तक प्रभावित किया। कारंथ ने यथार्थवादी लेखन की कन्नड़ में जो परंपरा डाली, वो अभी तक जारी है। उनके लेखन से कन्नड़ के कई साहित्यकार प्रभावित हुए। कन्नड़ के विख्यात कथाकार यू.आर. अनंतमूर्ति ने एक जगह लिखा है कि ``इसी समय मैंने अपने महान् उपन्यासकारों में एक कारंथ का चोमना डुडी पढ़ा। यह अपनी जमीन को वापस चाहने वाले अछूत की त्रासद दास्तान है। अब तब मैं जिन रूमानी कहानियों का दीवाना था, वे मुझे बकवास लगने लगीं। मैंने जाना कि अगर अपने आसपास दिखने वाले यथार्थ को इतनी सुंदर कहानी में ढाला जा सकता है, तो फिर मुझे सिर्फ उन चीजों को बारीकी से देखने-परखने की जरूरत है। मेरे अग्रज, जो कारंथ की क्रांतिकारी विचारधारा से नफरत करते थे, वे भी उनकी लेखकीय कला की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते थे और उनके बारे में मुग्ध मन से बातें करते थे।´´
गत सदी के चौथे दशक में आधुनिक भारतीय भाशाओं के साहित्य पर मार्क्र्सवाद का गहरा प्रभाव हुआ। कन्नड़ साहित्य में भी प्रगतिवादी लेखन की नयी धारा शुरू हुई। इस धारा का नेतृत्व कन्नड़ में ए.एन. कृश्णराव ने किया। इसमें शामिल अन्य साहित्यकारों में टी.आर. सुब्बाराव, कटि्टमणि, निरंजन आदि प्रमुख हैं। प्रगतिवादी आंदोलन से ही आगे चलकर कन्नड़ में दो धाराएं-बंद्या और दलित साहित्य विकसित हुईं। दलित साहित्य में वंचित-दमित जातियों के कन्नड़भाषी साहित्यकारों ने हिस्सेदारी की। इस धारा के साहित्यकारों पर मराठी का विशेष प्रभाव था, क्योंकि मराठी में दलित साहित्य की समृद्ध परंपरा पहले से थी। यूण्आरण् अनंतमूर्ति और उनके वामपंथी तेवर वाले साहित्यकारों ने बंद्या साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन लेखकों ने राजनीतिक समझ के साथ अपने समय और समाज के यथार्थ को चित्रित किया। अनंतमूर्ति के घटश्राद्ध, संस्कार और भारतीपुर जैस उपन्यासों ने यथार्थ के कई नए आयाम उद्घाटित किए। आगे चलकर चंद्रशेखर पाटिल ने बंद्या और सिद्धलिंगैया ने दलित साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्पष्ट है कि आधुनिक कन्नड़ साहित्य के सरोकार, चेतना, वस्तु आदि भी कमाबेश वहीं हैं, जो सभी आधुनिक भाषाओं के हैं। यह अवश्य है कि कन्नड़ की अपनी परंपरा और क्षेत्रीय जरूरतों के अनुसार इनका विकास अलग तरह से हुआ है।
हिंदी सहित सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य में पुनरुत्थान, समाज सुधार, वैज्ञानिक चेतना और ज्ञानोदय के रूप में जो नवजागरण शुरू हुआ, उसने कन्नड़ में नवोदय के रूप लिया। मास्ति वेंकटेश आय्यंगर ने इस दौरान कथा साहित्य में, जबकि डी.आर. बेंद्रे ने कविता में नवजीवन का संचार किया। ये दोनों साहित्यकार कन्नड़ साहित्य में आधुनिक चेतना का प्रसार करने वाले सिद्ध हुए। मास्ति वेंकटेश की रचनाओं में पुनरुत्थान की चेतना सघन रूप व्यक्त हुई, तो बेंद्र की कविता में राश्ट्रीयता, परंपरानुराग, रहस्य, वैयिक्कता आदि नवोदय के सभी लक्षण प्रकट हुए। इनके अलावा नवोदय युग के साहित्यकारों में बी.म. श्रीकांतैय्या और के.वी. पुट्टपा भी खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। दरअसल नवोदय आंदोलन की शुरुआत ही श्रीकांतैय्या के अनुवादों से हुई। इसके बाद नवोदय आंदोलन में शिवराम कारंथ, यू.आर. अनंतमूर्ति, लंकेश, भैरप्पा जैसे कई अग्रणी साहित्यकार जुड़ गए। गिरीश कारनाड और खंबार जैसे नाटककारों ने अपने निरंतर नवाचार और प्रयोगधर्मिता से इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। शिवराम कारंथ नवोदय आंदोलन के सर्वाधिक प्रभावी रचनाकार थे। उन्होंने कन्नड़ संस्कृति और साहित्य को दूर तक प्रभावित किया। कारंथ ने यथार्थवादी लेखन की कन्नड़ में जो परंपरा डाली, वो अभी तक जारी है। उनके लेखन से कन्नड़ के कई साहित्यकार प्रभावित हुए। कन्नड़ के विख्यात कथाकार यू.आर. अनंतमूर्ति ने एक जगह लिखा है कि ``इसी समय मैंने अपने महान् उपन्यासकारों में एक कारंथ का चोमना डुडी पढ़ा। यह अपनी जमीन को वापस चाहने वाले अछूत की त्रासद दास्तान है। अब तब मैं जिन रूमानी कहानियों का दीवाना था, वे मुझे बकवास लगने लगीं। मैंने जाना कि अगर अपने आसपास दिखने वाले यथार्थ को इतनी सुंदर कहानी में ढाला जा सकता है, तो फिर मुझे सिर्फ उन चीजों को बारीकी से देखने-परखने की जरूरत है। मेरे अग्रज, जो कारंथ की क्रांतिकारी विचारधारा से नफरत करते थे, वे भी उनकी लेखकीय कला की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते थे और उनके बारे में मुग्ध मन से बातें करते थे।´´
गत सदी के चौथे दशक में आधुनिक भारतीय भाशाओं के साहित्य पर मार्क्र्सवाद का गहरा प्रभाव हुआ। कन्नड़ साहित्य में भी प्रगतिवादी लेखन की नयी धारा शुरू हुई। इस धारा का नेतृत्व कन्नड़ में ए.एन. कृश्णराव ने किया। इसमें शामिल अन्य साहित्यकारों में टी.आर. सुब्बाराव, कटि्टमणि, निरंजन आदि प्रमुख हैं। प्रगतिवादी आंदोलन से ही आगे चलकर कन्नड़ में दो धाराएं-बंद्या और दलित साहित्य विकसित हुईं। दलित साहित्य में वंचित-दमित जातियों के कन्नड़भाषी साहित्यकारों ने हिस्सेदारी की। इस धारा के साहित्यकारों पर मराठी का विशेष प्रभाव था, क्योंकि मराठी में दलित साहित्य की समृद्ध परंपरा पहले से थी। यूण्आरण् अनंतमूर्ति और उनके वामपंथी तेवर वाले साहित्यकारों ने बंद्या साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन लेखकों ने राजनीतिक समझ के साथ अपने समय और समाज के यथार्थ को चित्रित किया। अनंतमूर्ति के घटश्राद्ध, संस्कार और भारतीपुर जैस उपन्यासों ने यथार्थ के कई नए आयाम उद्घाटित किए। आगे चलकर चंद्रशेखर पाटिल ने बंद्या और सिद्धलिंगैया ने दलित साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्पष्ट है कि आधुनिक कन्नड़ साहित्य के सरोकार, चेतना, वस्तु आदि भी कमाबेश वहीं हैं, जो सभी आधुनिक भाषाओं के हैं। यह अवश्य है कि कन्नड़ की अपनी परंपरा और क्षेत्रीय जरूरतों के अनुसार इनका विकास अलग तरह से हुआ है।
Monday, 21 July 2008
भारतीय साहित्य की पहचान
भारतीय साहित्य की कोई एकरूप पहचान गढ़ने से पहले इसके वैविध्य को समझ लेना बहुत जरूरी है। सदियों से यहां विभिन्न धर्मों-संप्रदायों, संस्कृतियों और भाषाओं के लोग परस्पर सहभाव के साथ रहते आए हैं। इस सहभाव से जो अंतर्क्रिया और संवाद हुए हैं उससे इस वैविध्य में एकता के कुछ अंतर्सूत्र भी बने हैं। सदियों पुरानी यहां की अलग-अलग भाषाओं के साहित्य अलग-अलग तरह से विकसित हुए, लेकिन परस्पर संवाद और अंतर्क्रिया के कारण उनमें भारतीयता का तत्व सब जगह मौजूद है। आरंभिक काल में संस्कृत के कारण यह एकता बनी रही, तो आधनिक काल में संचार साधनों के विकास और अनुवादों की लोकप्रियता ने इसको बढ़ावा दिया है। डॉ.सर्वपल्ली राधाकृश्णन ने 1954 में कहा था कि भारतीय साहित्य एक है, यद्यपि यह बहुत-सी भाषाओं में लिखा जाता है। सुनीतिकुमार चटर्जी ने अपनी पुस्तक लैंगवेजस एंड लिटरेचर्स ऑफ इंडिया में भारतीय साहित्य के वैविध्य और एकता को अच्छी तरह से समझा है। उनके अनुसार भारतीय साहित्य एकवचन नहीं, बल्कि बहुवचन है। दरअसल अलग-अलग भारतीय भाशाओं में अपनी तरह से अलग-अलग ढंग से विकसित साहित्य ही भारतीय साहित्य है। इसकी समवेत पहचान में अलग-अलग भाषाओं की अपनी पहचानें सुरक्षित हैं।
आरंभिक भारतीय साहित्य संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल और कन्नड़ में मिलता है। इन भाशाओं के लेखकों ने अपनी-अपनी विशिष्ट सामाजिक-ऐतिहासिक पृश्ठभूमि में रचना कर्म किया। फिर भी, जहां तक विचार और सरोकारों की आवृत्ति का प्रष्न है, तो सबके संदर्भ सूत्र लगभग समान हैं। यह माना जाता है कि वेदों की रचना स्वयं ईष्वर ने की है और इनका मानव आख्याता ईष्वरीय संदेश को संप्रेिशत करने का निमित्त मात्र था। ऋग्वेद इस प्रकार का प्रथम ज्ञात ग्रंथ है, जिसमें ईष वंदना के मंत्र संकलित हैं, जो विभिन्न देवताओं को संबोधित है। ऋग्वेद में और उसके बाद के यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद में मनुश्य के वे प्रारंभिक प्रयास दिखाई देते हैं, जो उसने विराट विष्व में अपनी स्थिति को समझने और किसी अज्ञात के साथ संवाद स्थापित करने की संभावना रचने के लिए किए। ब्राह्मण गंथ 11 हैं, जिनमें वैदिक मंत्रों की व्याख्या है। इनमें केवल धार्मिक चिंतन ही नहीं है, बल्कि दार्शनिक, व्याकरणिक, व्युत्पत्ति विषयक तथा छंद विषयक ज्ञान भी समाहित है। आरण्यक ग्रंथ तीन हैं जिनमें कार्मकांडों या अनुश्ठानों का वर्णन है। ये ग्रंथ वेदों में निहित ज्ञान के अन्वेशण के संक्रमण काल का प्रतिनिधित्व करते हैं। उपनिशद भी महत्वपूर्ण हैं। उपनिशद शब्द का अर्थ है `आदेष प्राप्ति के लिए श्रद्धा के साथ अपने गुरु के निकट बैठना।´ मुख्य उपनिशद 13 हैं और इनकी विशयवस्तु मुख्यत: आध्याित्मक है, जो जीवन, मृत्यु, अमरत्व, सुख, सत्य, ईष्वर और जीवन का उद्गम जैसे चिरंतन प्रष्नों का उत्तर पाने की मनुश्य की लालसा को प्रदर्षित करती हैं। श्रुति ग्रंथ वे हैं, जिनका वाचन और श्रवण किया जाता है यानि जिन्हें बोला और सुना जाता है। स्मृति ग्रंथ स्मरण के लिए हैं। स्मृति पाठों को इस अर्थ में प्राचीन परंपरा से भिन्न माना जाता है कि इनका श्रेय मानवीय सृजन को दिया गया है। इनकी विशय-वस्तु विविध और व्यापक है ये तथा षिक्षा, छंद, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिश, अनुश्ठान तथा कल्प जैसे विशयों पर केिन्द्रत है। स्मृति साहित्य का पाठ छह वेदांगों में निहित है। ये वेदांग वेदों के तुल्य ही माने गए हैं और इनमें रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्य तथा पुराण ‘ाामिल हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय पुराण भागवत पुराण है, जो कृश्ण की जीवन गाथा पर केिन्द्रत है। उत्तर वैदिक युग की संस्कृत कविता अपनी प्रकृति में नैतिक, शृंगार और संन्यास विशयक है। इन कविताओं की रचना राजाओं के संरक्षण में हुई। आचार्य भरत का नाट्यषास्त्र नाट्य कलाओं पर लिखा गया सैद्धांतिक ग्रंथ है। उस समय लिखे गए अधिकतर नाटकों का कथ्य भावुकतापूर्ण प्रेम या नाटकीय शौर्य था। इनका नायक देवता के समान होता था और ये नाटक विष्व में ‘ाांति और समृिद्ध की कामना के साथ प्रारंभ और समाप्त होते थे। नाटकों के स्रोत मुख्य रूप से वेद, पुराण और इतिहास होेते थे तथा पात्रों का चयन समाज के विभिन्न वर्गों में से किया जाता था। भास और कालिदास जैसे नाटककारों द्वारा लिखे गए प्रेम और शौर्य के नाटकों के अलावा शूद्रक जैसे कुछ नाटककारों ने सामाजिक व्यंग्य-हास्यपरक नाटक भी लिखे, जबकि विषाखदत्त जैसे अन्य नाटककारों ने राजनीतिक शडयंत्रों आर राजदरबारों के जीवन को नाटक का विशय बनाया। इस दौरान प्रचलित अन्य साहित्य रूपों में महाकाव्य, लघु काव्य, अभिलेख, आख्यायिका, चंपू आदि प्रमुख हैं। संस्कृत साहित्य की भाशा थी तो प्राकृत दैनंदिन संवाद और व्यापार की भाशा थी। प्राकृत का प्रयोग बौद्ध जैन और लौकिक साहित्य किया गया था। इस युग में एक अन्य भाशा अपभ्रंष थी, जिसका प्रयोग मुख्यत: जैन साहित्य में हुआ।
तमिल साहित्य का प्राचीन काल संगमयुग के नाम से ख्यात है। इसका प्राचीनतम ज्ञात ग्रंथ है तोल्लकिप्पयम´ जो तमिल व्याकरण पद्धति पर प्रबंध रचना है। प्रेम और युद्ध के संगम काव्य की परिकल्पना लौकिक वातावरण में की गई थी, जहां प्रकृति के साथ मनुश्य की भावनाओं तथा अनुभवों के संबंधों का अन्वेशण किया गया है। प्राचीन तमिल साहित्य का अगला चरण उपदेषात्मक चरण है, जिसमें जैन धर्म और बुद्ध धर्म का प्रभाव पर्याप्त है। इस काल की सर्वाधिक प्रमुख कृति तिरुक्कुरुल है। तमिल का भक्ति साहित्य नायनार कहे जाने वाले शैव संतों और आलवार कहे जाने वाले वैश्णव संतों द्वारा गाए गए भक्ति गीतों के विषाल संयोजन में बना हुआ है। प्राचीन कन्नड़ साहित्य संस्कृत, प्राकृत, वैदिक और जैन गाथाओं तथा रामायण और महाभारत की कथाओं से प्रभावित था। कन्नड़ की प्राचीनतम ज्ञात कृति कविराजमार्गम´ है और तमिल की प्रथम कृति की तरह यह भी अलंकार, व्याकरण, भाशा, छंदषास्त्र की कृति है, जिसमें तत्कालीन समाज, धर्म और संस्कृति के संबंध में भी विचार किया गया हैं। रामायण और महाभारत के प्रभाव में कन्नड़ में बड़े कथा काव्यों की रचना भी हुई। इसमें स्रोत ग्रंथों से चर्चित कथाएं ली गई और फिर उन्हें स्थानीय संदर्भो में रखा गया था। इस युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कन्नड़ लेखक पम्पा, पोन्ना, और रन्ना थे।
ग्यारहवीं शताब्दी से भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक परिवर्तन शुरू हुए। ये विविध प्रकार के राजनैतिक और सामाजिक परिवर्तन विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और भाशाओं के बीच परस्पर संवाद के युग का सूत्रपात करते हैं। भारतीय साहित्य के इस युग का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू आधुनिक भारतीय भाशाओं का विकास है। आधुनिक भारतीय भाशाओं के अस्तित्व में आने और विकसित हो जाने के बाद अगली छह-सात शतािब्दयों तक उनमें विषिश्ट प्रकार के साहित्य का विकास हुआ। यह युग विदेषी आक्रमणों, सांस्कृतिक संपर्कों, विस्थापनों और स्थानांतरणों, धर्मांतरणों और सामाजिक-आर्थिक संबंधों में बदलावों का युग था। अधिकांष मध्ययुगीन भारतीय साहित्य में रामायण, महाभारत, पुराण-कथाओं, मिथकों और पुरागाथाओं में अनुवाद, रूपांतरण और पुनर्लेखन हुआ। अपने नए रूपों में ये पाठ अपने भाषायी क्षेत्र की स्थानीय परंपराओं को प्रतिबििम्बत करते थे। तमिल में कम्बन द्वारा रचित रामायण तेलुगु में नन्नइया रचित महाभारत इसके उदाहरण हैं।
सभी भारतीय भाशाओं में लोकतत्व भी हमेषा मौजूद रहा है। मैथिली, मणिपुरी राजस्थानी और नेपाली जैसी भाशाओं में यह साफ तौर पर देखा जा सकता है। नाट्य लेखन और मंचन की परंपरा भी स्थानीय भाशाओं में लगातार फलती-फूलती रही। उदाहरण के लिए गुजरात और राजस्थान को रखा जा सकता है, जहां अभिनय की स्थानीय ‘ौलियों और लोक रंगमंच में भवई और ख्याल जैसे नाट्य रूप विकसित हुए। इन नाट्य प्रस्तुतियों की सहकला के रूप में साहिित्यक पाठों की रचना हुई। उदाहरण के लिए मलयालम में अट्टक्कथाएं हैं, जो कथकली प्रदर्शनों के पूरक के रूप में तैयार हुईं। मनुश्य और ईष्वर के बीच एक नए प्रकार का संवाद बनने से समूचे देष में विभिन्न भाशाओं में कविताओं की रचना हुईं। नए मत के प्रतिपादक आचायोZं और भक्त कवियों ने भगवदगीता और पुराणों पर टीकाएं भी लिखीं। जैसे कि मराठी में संत ज्ञानेष्वर ने भगवदगीता के आधार पर ज्ञानेष्वरी टीका लिखी और असमिया में पद्मपुराण की रचना हुई। इस युग में महिला संत कवियों की रचनाएं भी सामने आईं, जिनमें कष्मीर में लालदेद और हब्बा खातून, तेलुगु में मुद्दुपरानी और कन्नड़ में अक्कमहादेवी और राजस्थानी में मीरा के नाम प्रमुख हैं। संत कवियों द्वारा धार्मिक आस्था को एक नए मुहावरे में अभिव्यक्त किए जाने से ``साहित्य और विचारधारा के बीच एक नया रोचक संबंध स्थापित हुआ। संत कवियों के प्रेम और मानवता के जीवंत संदेष क्षेत्र, भाशा और वर्ग की सीमाओं के पार फैल गए।´´ बुद्ध और जैन धर्मों का प्रभाव बना रहा मगर मुगलों और पुर्तगालियों के आगमन के साथ इसमें इस्लाम और ईसाई मतों का प्रभाव भी जुड़ गया। युद्धों के कारण राजनीतिक क्षेत्रों और सीमाओं में निरंतर बदलाव का युग था इसलिए इस समय जिस एक नयी विधा का विकास शुरू हुआ वह था काव्य में इतिहास लेखन। जैसा कि असम के बुरांजी और राजस्थान में युद्धों पर लिखे गए रासो काव्य में दिखाई देता है। भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू का विकास मुस्लिम सेनाओं, आव्रजनों, सूफियों, व्यापारियों, यात्रियों उपनिवेषियों के आगमन के साथ शुरू हुआ, जो अपने साथ अरबी, फारसी और विषिश्ट साहिित्यक परंपराएं लेकर आए थे। एषिया और यूरोप में आने वाने विभिन्न जातीय, सामाजिक और भाशाई समूहों की संस्कृतियां स्थानीय समुदायों को निकट संपर्क में आईं और इस अंत: संपर्क ने न केवल नई साहिित्यक परंपराओं को जन्म दिया बल्कि संप्रेशण और साहिित्यक अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में एक समान भाशा के विकास को भी बढ़ावा दिया। उर्दू, अरबी, फारसी ने तत्कालीन साहित्य को गजल, मसनवी और कसीदा जैसी नयी विधाएं दीं। इस समय दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में सामान्य लोगों की संप्रेशण की भाशा खड़ी बोली थी। यही भाशा बाद में एक प्रमुख साहिित्यक भाशा के रूप में विकसित हुई। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में इस तरह भारत एक बहुभािशक समाज था और इसकी विभिन्न भाशाओं में लिखित और वाचिक साहिित्यक परंपराएं बन गई थीं। 1800 तक भारत में प्रिंटिंग प्रेस का युग पूरी तरह प्रतििश्ठत हो चुका था। यह संप्रेशण के नये दौर की ‘ाुरुआत थी। प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना ने भारत में कुछ अन्य महत्वपूर्ण बदलावों को भी संभव किया। अभी तक विद्वान लेखकों की अभिव्यक्ति का माध्यम या तो संस्कृत थी या फारसी, या फिर, द्वितीय चुनाव के रूप में उनकी अपनी क्षेत्रीय भाशाएं। प्रिंटिंग प्रेस ने जल्दी ही स्थानीय इलाकों में पहुंच बनानी ‘ाुरू कर दी और जिन भाशाओं का व्यापक पाठक वर्ग था उन्हें महत्व मिलने लगा। विभिन्न भारतीय भाशाओं में बाइबिल के अनुवादों ने गद्य-लेखन को प्रोत्साहित किया। अठारहवीं ‘ाताब्दी के चौथे दषक तक अखबार और पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार होने लगा। इससे पत्रकारिता का विकास हुआ और अब तक अपेक्षित गद्य-विधा चलन में आ गई। मैकाले की षिक्षा नीति के अमल में आने के बाद भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अंग्रेजी भाशा ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी। इसका प्रकट उद्देष्य भारतीयों का ऐसा वर्ग पैदा करना था जो रंग और रूप में भारतीय हो, लेकिन जिसके आचार-विचार अंग्रेजों जैसे हों। उन्नीसवीं सदी के अंत तक अंग्रेजी ने पूरी तरह फारसी की जगह ले ली और वह सत्ता तथा षिक्षा की नई भाशा बन गई। धीरे-धीरे तमाम भारतीय भाशाओं की साहिित्यक अभिव्यक्तियों में अंग्रेजी का असर दिखाई देने लगा और कुछ भारतीय अंग्रेजी में साहित्य कर्म भी करने लगे। ऐसे आरंभिक लोगों हेनरी डेरोजियो, माइकेल मधुसूदन दत्त आदि प्रमुख थे।
अंग्रेजों के प्रति भारतीय जनसाधारण के भीतर, जो नफरत और गुस्सा था, वो 1857 में विद्रोह के रूप में फूटा। विद्रोह असफल रहा, लेकिन इससे औपनिवेषक ‘ाासन के प्रति जनसाधारण में असंतोश और असहमति अब मुखर रूप लेने लगी। यह सभी भारतीय भाशाओं के साहित्य में भी व्यक्त हुईं। बकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंद मठ (1882) में आया देषभक्तिपूर्ण गीत वंदेमातरम् आगामी दिनों में समूचे देष के स्वतंत्रता सेनानियों का राश्ट्रगीत बना। उन्नीसवीं सदी के दौरान ही बहुत से सामाजिक और धार्मिक सुधारवादी आंदोलनों को चलाने वाली संस्थाओं, जैसे ब्रह्म समाज, रामकृश्ण मिषन और आर्य समाज का गठन हुआ। बीसवीं सदी की ‘ाुरुआत तक पिष्चमी और अंग्रेजी साहित्य से जीवंत और निरंतर संपर्क से प्रेरित भारतीय साहित्य ने नए विशयों और मुद्दों को शामिल करना शुरू कर दिया। तमाम भाशाओं में अनुवाद उपलब्ध हो गए। सभी मुख्य भाशाओं की साहिित्यक अभिव्यक्ति बदल गई। अभिव्यक्ति की मुख्य विधा के रूप में कविता की जगह उपन्यास, निबंध और कहानियों ने ले ली। कविता में रोमांस और शौर्य गीतों को लोकप्रियता मिली। इस वक्त अंग्रेजी में भारतीय लेखन को खासा महत्व प्राप्त हुआ और यह ऐसा माध्यम बन गया जिसे कुषलता और दक्षता के साथ-साथ बरता जाना था। भारतीय साहित्य की पहुंच पिष्चम तक हुई। स्वामी विवेकानंद, टैगोर, रवींन्द्रनाथ, श्री अरविंद, गांधी, नेहरु और दूसरे लोगों ने पिष्चमी जगत में औपनिवेषिक सत्ता के विरुद्ध अपने विचार प्रचारित किए और उन्हें समर्थन भी मिला। किसी न किसी रूप में अधिकांष लेखक स्वतंत्रता आंदोलन में ‘ाामिल थे। सभी भारतीय भाशाओं में इस समय का साहित्य लोगों की सुधारवादी चेतना को व्यक्त कर रहा था। साहित्य ने राजनीतिक-सामाजिक दमन के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई। राश्ट्रवादी आंदोलन ने बहुत से लेखकों को अपनी भािशक और वैयक्तिक पहचान और अतीत के प्रति जागरूक किया।
यूरोपीय स्वच्छंदतावाद का गहरा और व्यापक प्रभाव इस दौरान भारतीय साहित्य पर भी हुआ। यह हिंदी के छायावाद और कन्नड़ के नवोदय जैसे काव्यांदोलनों देखा जा सकता है। प्रगतिषील लेखक संघ की पहली बैठक 1936 में लखनऊ में हुई। प्रेमचंद इसके अध्यक्ष बनाए गए। इस आंदोलन के समाजवादी और समानतावादी सरोकारों ने बीसवीं शताब्दी के भारतीय साहित्य को प्रभावित किया। समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में आर्थिक शोषण और दमन, वर्ग-सरोकार और वंचितों के प्रति लगाव साहित्य के विशय बने। इप्टा इसी गहमागहमी की उपज था। कुछ बुिद्धजीवियों, वैज्ञानिकों और कलाकारों द्वारा बम्बई में ‘ाुरू किया गया यह जन नाट्य आंदोलन थोडे़ ही वक्त में समूचे देष में फैल गया। देष को स्वाधीनता मिली, लेकिन भारत विभाजन ने इसका सुख खंडित कर दिया। इसके साथ ही तेलंगाना आंदोलन 1946 में प्रारंभ हुआ, जो अगले लगभग पांच वशोZं तक चलता रहा। 1947 में स्वाधीनता-प्राप्ति के साथ भारतीय साहित्य में एक नया मोड़ आता है। भारतीय साहित्य के इस नए अध्याय की पृश्ठभूमि में तीन धाराएं मोटे तौर पर मौजूद हैं- राश्ट्रवादी लेखन की धारा, जो सीधे तौर पर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सेदारी करती थी और साहिित्यकता की ज्यादा परवाह किए बिना राजनीतिक आजादी के लिए तड़प और जोष पैदा करने का काम कर रही थी। दूसरी धारा रोमांटिक लेखन की थी। इसका उद्भव पिष्चम में हुआ था और यह अंग्रेजी साहित्य से हमारे संपर्क के जरिए जहां तक पहुंची थी। तीसरी धारा प्रगतिवादी लेखन की थी जो मुख्यत: स्वच्छंदतावादी लेखन को नकारते हुए उभरी थी। राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वाधीनता की बजाए यह धारा आर्थिक शोषण से मुक्ति को प्रमुखता देती थी। इस धारा को सबसे लंबा जीवन मिला और यह अब भी गतिमान है। आजादी मिलने के साथ विभाजन का गहरा घाव भी लगा था। उर्दू, हिंदी और पंजाबी साहित्य में भारत-विभाजन की पीड़ा खास तौर से दर्ज की गई। हिंसा, घृणा, धार्मिक उन्माद और तमाम तरह के शोषणों के विरुद्ध समूचे भारतीय साहित्य ने संघशZ छेड़ा। भारतीय लोकमानस ने आजादी के लिए किए गए बलिदानों को देखते हुए उससे बड़ी उम्मीदें बांध रखी थीं। स्वतंत्र भारत में शुरू की गई पंचवर्षीय योजनाओं ने इन उम्मीदों को और बढ़ाया। जब उम्मीदें पूरी नहीं हुई, आदषZ, त्याग और बलिदानों की नींव पर खड़ी की गई इमारत में स्वार्थपरता, बेईमानी और भ्रश्टाचार का बोलबाला हो गया तो मोहभंग की स्थिति आई। उपन्यासों, कविताओं और नाटकों में मोहभंग का स्वर विषेश रूप से मुखरित हुआ। बीसवीं शताब्दी के आठवें दषक से भारतीय साहित्य में फिर एक नए दौर की शुरुआत होती है। भारतीय साहित्य में अब अिस्मतावादी आवाजें सुनाई पड़ रही हैं। नारीवादी लेखन और दलित लेखन इनमें मुख्य हैं। इनके जरिए साहित्य में बिलकुल अछूते, नए विशयों का प्रवेश होता है। मराठी क्षेत्र में पैदा हुआ दलित आंदोलन शीघ्र ही गुजराती, कन्नड़, तमिल, तेलगु, हिंदी, पंजाबी और उिड़या आदि भाशा क्षेत्रों में फैल गया है। अब दलित साहित्यकार पारंपरिक सौंदर्य शस्त्र की परवाह न करते हुए रोजमर्रा की अपरिश्कृत भाशा में साहित्य रचना कर रहे हैं। स्त्रियां भी अब साहित्य में अपने पहचान के लिए सक्रिय हैं। वे साहित्य की सभी विधाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। भूमंडलीकरण और बाजारीकरण के वर्तमान दौर ने भारतीय साहित्य को प्रभावित किया है। नव साम्राज्यवाद और नव उपनिवेशवाद के खतरों को भारतीय साहित्यकार महसूस कर रहे हैं, उनका सशक्त प्रतिरोध भी रच रहे हैं।
आरंभिक भारतीय साहित्य संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल और कन्नड़ में मिलता है। इन भाशाओं के लेखकों ने अपनी-अपनी विशिष्ट सामाजिक-ऐतिहासिक पृश्ठभूमि में रचना कर्म किया। फिर भी, जहां तक विचार और सरोकारों की आवृत्ति का प्रष्न है, तो सबके संदर्भ सूत्र लगभग समान हैं। यह माना जाता है कि वेदों की रचना स्वयं ईष्वर ने की है और इनका मानव आख्याता ईष्वरीय संदेश को संप्रेिशत करने का निमित्त मात्र था। ऋग्वेद इस प्रकार का प्रथम ज्ञात ग्रंथ है, जिसमें ईष वंदना के मंत्र संकलित हैं, जो विभिन्न देवताओं को संबोधित है। ऋग्वेद में और उसके बाद के यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद में मनुश्य के वे प्रारंभिक प्रयास दिखाई देते हैं, जो उसने विराट विष्व में अपनी स्थिति को समझने और किसी अज्ञात के साथ संवाद स्थापित करने की संभावना रचने के लिए किए। ब्राह्मण गंथ 11 हैं, जिनमें वैदिक मंत्रों की व्याख्या है। इनमें केवल धार्मिक चिंतन ही नहीं है, बल्कि दार्शनिक, व्याकरणिक, व्युत्पत्ति विषयक तथा छंद विषयक ज्ञान भी समाहित है। आरण्यक ग्रंथ तीन हैं जिनमें कार्मकांडों या अनुश्ठानों का वर्णन है। ये ग्रंथ वेदों में निहित ज्ञान के अन्वेशण के संक्रमण काल का प्रतिनिधित्व करते हैं। उपनिशद भी महत्वपूर्ण हैं। उपनिशद शब्द का अर्थ है `आदेष प्राप्ति के लिए श्रद्धा के साथ अपने गुरु के निकट बैठना।´ मुख्य उपनिशद 13 हैं और इनकी विशयवस्तु मुख्यत: आध्याित्मक है, जो जीवन, मृत्यु, अमरत्व, सुख, सत्य, ईष्वर और जीवन का उद्गम जैसे चिरंतन प्रष्नों का उत्तर पाने की मनुश्य की लालसा को प्रदर्षित करती हैं। श्रुति ग्रंथ वे हैं, जिनका वाचन और श्रवण किया जाता है यानि जिन्हें बोला और सुना जाता है। स्मृति ग्रंथ स्मरण के लिए हैं। स्मृति पाठों को इस अर्थ में प्राचीन परंपरा से भिन्न माना जाता है कि इनका श्रेय मानवीय सृजन को दिया गया है। इनकी विशय-वस्तु विविध और व्यापक है ये तथा षिक्षा, छंद, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिश, अनुश्ठान तथा कल्प जैसे विशयों पर केिन्द्रत है। स्मृति साहित्य का पाठ छह वेदांगों में निहित है। ये वेदांग वेदों के तुल्य ही माने गए हैं और इनमें रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्य तथा पुराण ‘ाामिल हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय पुराण भागवत पुराण है, जो कृश्ण की जीवन गाथा पर केिन्द्रत है। उत्तर वैदिक युग की संस्कृत कविता अपनी प्रकृति में नैतिक, शृंगार और संन्यास विशयक है। इन कविताओं की रचना राजाओं के संरक्षण में हुई। आचार्य भरत का नाट्यषास्त्र नाट्य कलाओं पर लिखा गया सैद्धांतिक ग्रंथ है। उस समय लिखे गए अधिकतर नाटकों का कथ्य भावुकतापूर्ण प्रेम या नाटकीय शौर्य था। इनका नायक देवता के समान होता था और ये नाटक विष्व में ‘ाांति और समृिद्ध की कामना के साथ प्रारंभ और समाप्त होते थे। नाटकों के स्रोत मुख्य रूप से वेद, पुराण और इतिहास होेते थे तथा पात्रों का चयन समाज के विभिन्न वर्गों में से किया जाता था। भास और कालिदास जैसे नाटककारों द्वारा लिखे गए प्रेम और शौर्य के नाटकों के अलावा शूद्रक जैसे कुछ नाटककारों ने सामाजिक व्यंग्य-हास्यपरक नाटक भी लिखे, जबकि विषाखदत्त जैसे अन्य नाटककारों ने राजनीतिक शडयंत्रों आर राजदरबारों के जीवन को नाटक का विशय बनाया। इस दौरान प्रचलित अन्य साहित्य रूपों में महाकाव्य, लघु काव्य, अभिलेख, आख्यायिका, चंपू आदि प्रमुख हैं। संस्कृत साहित्य की भाशा थी तो प्राकृत दैनंदिन संवाद और व्यापार की भाशा थी। प्राकृत का प्रयोग बौद्ध जैन और लौकिक साहित्य किया गया था। इस युग में एक अन्य भाशा अपभ्रंष थी, जिसका प्रयोग मुख्यत: जैन साहित्य में हुआ।
तमिल साहित्य का प्राचीन काल संगमयुग के नाम से ख्यात है। इसका प्राचीनतम ज्ञात ग्रंथ है तोल्लकिप्पयम´ जो तमिल व्याकरण पद्धति पर प्रबंध रचना है। प्रेम और युद्ध के संगम काव्य की परिकल्पना लौकिक वातावरण में की गई थी, जहां प्रकृति के साथ मनुश्य की भावनाओं तथा अनुभवों के संबंधों का अन्वेशण किया गया है। प्राचीन तमिल साहित्य का अगला चरण उपदेषात्मक चरण है, जिसमें जैन धर्म और बुद्ध धर्म का प्रभाव पर्याप्त है। इस काल की सर्वाधिक प्रमुख कृति तिरुक्कुरुल है। तमिल का भक्ति साहित्य नायनार कहे जाने वाले शैव संतों और आलवार कहे जाने वाले वैश्णव संतों द्वारा गाए गए भक्ति गीतों के विषाल संयोजन में बना हुआ है। प्राचीन कन्नड़ साहित्य संस्कृत, प्राकृत, वैदिक और जैन गाथाओं तथा रामायण और महाभारत की कथाओं से प्रभावित था। कन्नड़ की प्राचीनतम ज्ञात कृति कविराजमार्गम´ है और तमिल की प्रथम कृति की तरह यह भी अलंकार, व्याकरण, भाशा, छंदषास्त्र की कृति है, जिसमें तत्कालीन समाज, धर्म और संस्कृति के संबंध में भी विचार किया गया हैं। रामायण और महाभारत के प्रभाव में कन्नड़ में बड़े कथा काव्यों की रचना भी हुई। इसमें स्रोत ग्रंथों से चर्चित कथाएं ली गई और फिर उन्हें स्थानीय संदर्भो में रखा गया था। इस युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कन्नड़ लेखक पम्पा, पोन्ना, और रन्ना थे।
ग्यारहवीं शताब्दी से भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक परिवर्तन शुरू हुए। ये विविध प्रकार के राजनैतिक और सामाजिक परिवर्तन विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और भाशाओं के बीच परस्पर संवाद के युग का सूत्रपात करते हैं। भारतीय साहित्य के इस युग का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू आधुनिक भारतीय भाशाओं का विकास है। आधुनिक भारतीय भाशाओं के अस्तित्व में आने और विकसित हो जाने के बाद अगली छह-सात शतािब्दयों तक उनमें विषिश्ट प्रकार के साहित्य का विकास हुआ। यह युग विदेषी आक्रमणों, सांस्कृतिक संपर्कों, विस्थापनों और स्थानांतरणों, धर्मांतरणों और सामाजिक-आर्थिक संबंधों में बदलावों का युग था। अधिकांष मध्ययुगीन भारतीय साहित्य में रामायण, महाभारत, पुराण-कथाओं, मिथकों और पुरागाथाओं में अनुवाद, रूपांतरण और पुनर्लेखन हुआ। अपने नए रूपों में ये पाठ अपने भाषायी क्षेत्र की स्थानीय परंपराओं को प्रतिबििम्बत करते थे। तमिल में कम्बन द्वारा रचित रामायण तेलुगु में नन्नइया रचित महाभारत इसके उदाहरण हैं।
सभी भारतीय भाशाओं में लोकतत्व भी हमेषा मौजूद रहा है। मैथिली, मणिपुरी राजस्थानी और नेपाली जैसी भाशाओं में यह साफ तौर पर देखा जा सकता है। नाट्य लेखन और मंचन की परंपरा भी स्थानीय भाशाओं में लगातार फलती-फूलती रही। उदाहरण के लिए गुजरात और राजस्थान को रखा जा सकता है, जहां अभिनय की स्थानीय ‘ौलियों और लोक रंगमंच में भवई और ख्याल जैसे नाट्य रूप विकसित हुए। इन नाट्य प्रस्तुतियों की सहकला के रूप में साहिित्यक पाठों की रचना हुई। उदाहरण के लिए मलयालम में अट्टक्कथाएं हैं, जो कथकली प्रदर्शनों के पूरक के रूप में तैयार हुईं। मनुश्य और ईष्वर के बीच एक नए प्रकार का संवाद बनने से समूचे देष में विभिन्न भाशाओं में कविताओं की रचना हुईं। नए मत के प्रतिपादक आचायोZं और भक्त कवियों ने भगवदगीता और पुराणों पर टीकाएं भी लिखीं। जैसे कि मराठी में संत ज्ञानेष्वर ने भगवदगीता के आधार पर ज्ञानेष्वरी टीका लिखी और असमिया में पद्मपुराण की रचना हुई। इस युग में महिला संत कवियों की रचनाएं भी सामने आईं, जिनमें कष्मीर में लालदेद और हब्बा खातून, तेलुगु में मुद्दुपरानी और कन्नड़ में अक्कमहादेवी और राजस्थानी में मीरा के नाम प्रमुख हैं। संत कवियों द्वारा धार्मिक आस्था को एक नए मुहावरे में अभिव्यक्त किए जाने से ``साहित्य और विचारधारा के बीच एक नया रोचक संबंध स्थापित हुआ। संत कवियों के प्रेम और मानवता के जीवंत संदेष क्षेत्र, भाशा और वर्ग की सीमाओं के पार फैल गए।´´ बुद्ध और जैन धर्मों का प्रभाव बना रहा मगर मुगलों और पुर्तगालियों के आगमन के साथ इसमें इस्लाम और ईसाई मतों का प्रभाव भी जुड़ गया। युद्धों के कारण राजनीतिक क्षेत्रों और सीमाओं में निरंतर बदलाव का युग था इसलिए इस समय जिस एक नयी विधा का विकास शुरू हुआ वह था काव्य में इतिहास लेखन। जैसा कि असम के बुरांजी और राजस्थान में युद्धों पर लिखे गए रासो काव्य में दिखाई देता है। भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू का विकास मुस्लिम सेनाओं, आव्रजनों, सूफियों, व्यापारियों, यात्रियों उपनिवेषियों के आगमन के साथ शुरू हुआ, जो अपने साथ अरबी, फारसी और विषिश्ट साहिित्यक परंपराएं लेकर आए थे। एषिया और यूरोप में आने वाने विभिन्न जातीय, सामाजिक और भाशाई समूहों की संस्कृतियां स्थानीय समुदायों को निकट संपर्क में आईं और इस अंत: संपर्क ने न केवल नई साहिित्यक परंपराओं को जन्म दिया बल्कि संप्रेशण और साहिित्यक अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में एक समान भाशा के विकास को भी बढ़ावा दिया। उर्दू, अरबी, फारसी ने तत्कालीन साहित्य को गजल, मसनवी और कसीदा जैसी नयी विधाएं दीं। इस समय दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में सामान्य लोगों की संप्रेशण की भाशा खड़ी बोली थी। यही भाशा बाद में एक प्रमुख साहिित्यक भाशा के रूप में विकसित हुई। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में इस तरह भारत एक बहुभािशक समाज था और इसकी विभिन्न भाशाओं में लिखित और वाचिक साहिित्यक परंपराएं बन गई थीं। 1800 तक भारत में प्रिंटिंग प्रेस का युग पूरी तरह प्रतििश्ठत हो चुका था। यह संप्रेशण के नये दौर की ‘ाुरुआत थी। प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना ने भारत में कुछ अन्य महत्वपूर्ण बदलावों को भी संभव किया। अभी तक विद्वान लेखकों की अभिव्यक्ति का माध्यम या तो संस्कृत थी या फारसी, या फिर, द्वितीय चुनाव के रूप में उनकी अपनी क्षेत्रीय भाशाएं। प्रिंटिंग प्रेस ने जल्दी ही स्थानीय इलाकों में पहुंच बनानी ‘ाुरू कर दी और जिन भाशाओं का व्यापक पाठक वर्ग था उन्हें महत्व मिलने लगा। विभिन्न भारतीय भाशाओं में बाइबिल के अनुवादों ने गद्य-लेखन को प्रोत्साहित किया। अठारहवीं ‘ाताब्दी के चौथे दषक तक अखबार और पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार होने लगा। इससे पत्रकारिता का विकास हुआ और अब तक अपेक्षित गद्य-विधा चलन में आ गई। मैकाले की षिक्षा नीति के अमल में आने के बाद भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अंग्रेजी भाशा ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी। इसका प्रकट उद्देष्य भारतीयों का ऐसा वर्ग पैदा करना था जो रंग और रूप में भारतीय हो, लेकिन जिसके आचार-विचार अंग्रेजों जैसे हों। उन्नीसवीं सदी के अंत तक अंग्रेजी ने पूरी तरह फारसी की जगह ले ली और वह सत्ता तथा षिक्षा की नई भाशा बन गई। धीरे-धीरे तमाम भारतीय भाशाओं की साहिित्यक अभिव्यक्तियों में अंग्रेजी का असर दिखाई देने लगा और कुछ भारतीय अंग्रेजी में साहित्य कर्म भी करने लगे। ऐसे आरंभिक लोगों हेनरी डेरोजियो, माइकेल मधुसूदन दत्त आदि प्रमुख थे।
अंग्रेजों के प्रति भारतीय जनसाधारण के भीतर, जो नफरत और गुस्सा था, वो 1857 में विद्रोह के रूप में फूटा। विद्रोह असफल रहा, लेकिन इससे औपनिवेषक ‘ाासन के प्रति जनसाधारण में असंतोश और असहमति अब मुखर रूप लेने लगी। यह सभी भारतीय भाशाओं के साहित्य में भी व्यक्त हुईं। बकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंद मठ (1882) में आया देषभक्तिपूर्ण गीत वंदेमातरम् आगामी दिनों में समूचे देष के स्वतंत्रता सेनानियों का राश्ट्रगीत बना। उन्नीसवीं सदी के दौरान ही बहुत से सामाजिक और धार्मिक सुधारवादी आंदोलनों को चलाने वाली संस्थाओं, जैसे ब्रह्म समाज, रामकृश्ण मिषन और आर्य समाज का गठन हुआ। बीसवीं सदी की ‘ाुरुआत तक पिष्चमी और अंग्रेजी साहित्य से जीवंत और निरंतर संपर्क से प्रेरित भारतीय साहित्य ने नए विशयों और मुद्दों को शामिल करना शुरू कर दिया। तमाम भाशाओं में अनुवाद उपलब्ध हो गए। सभी मुख्य भाशाओं की साहिित्यक अभिव्यक्ति बदल गई। अभिव्यक्ति की मुख्य विधा के रूप में कविता की जगह उपन्यास, निबंध और कहानियों ने ले ली। कविता में रोमांस और शौर्य गीतों को लोकप्रियता मिली। इस वक्त अंग्रेजी में भारतीय लेखन को खासा महत्व प्राप्त हुआ और यह ऐसा माध्यम बन गया जिसे कुषलता और दक्षता के साथ-साथ बरता जाना था। भारतीय साहित्य की पहुंच पिष्चम तक हुई। स्वामी विवेकानंद, टैगोर, रवींन्द्रनाथ, श्री अरविंद, गांधी, नेहरु और दूसरे लोगों ने पिष्चमी जगत में औपनिवेषिक सत्ता के विरुद्ध अपने विचार प्रचारित किए और उन्हें समर्थन भी मिला। किसी न किसी रूप में अधिकांष लेखक स्वतंत्रता आंदोलन में ‘ाामिल थे। सभी भारतीय भाशाओं में इस समय का साहित्य लोगों की सुधारवादी चेतना को व्यक्त कर रहा था। साहित्य ने राजनीतिक-सामाजिक दमन के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई। राश्ट्रवादी आंदोलन ने बहुत से लेखकों को अपनी भािशक और वैयक्तिक पहचान और अतीत के प्रति जागरूक किया।
यूरोपीय स्वच्छंदतावाद का गहरा और व्यापक प्रभाव इस दौरान भारतीय साहित्य पर भी हुआ। यह हिंदी के छायावाद और कन्नड़ के नवोदय जैसे काव्यांदोलनों देखा जा सकता है। प्रगतिषील लेखक संघ की पहली बैठक 1936 में लखनऊ में हुई। प्रेमचंद इसके अध्यक्ष बनाए गए। इस आंदोलन के समाजवादी और समानतावादी सरोकारों ने बीसवीं शताब्दी के भारतीय साहित्य को प्रभावित किया। समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में आर्थिक शोषण और दमन, वर्ग-सरोकार और वंचितों के प्रति लगाव साहित्य के विशय बने। इप्टा इसी गहमागहमी की उपज था। कुछ बुिद्धजीवियों, वैज्ञानिकों और कलाकारों द्वारा बम्बई में ‘ाुरू किया गया यह जन नाट्य आंदोलन थोडे़ ही वक्त में समूचे देष में फैल गया। देष को स्वाधीनता मिली, लेकिन भारत विभाजन ने इसका सुख खंडित कर दिया। इसके साथ ही तेलंगाना आंदोलन 1946 में प्रारंभ हुआ, जो अगले लगभग पांच वशोZं तक चलता रहा। 1947 में स्वाधीनता-प्राप्ति के साथ भारतीय साहित्य में एक नया मोड़ आता है। भारतीय साहित्य के इस नए अध्याय की पृश्ठभूमि में तीन धाराएं मोटे तौर पर मौजूद हैं- राश्ट्रवादी लेखन की धारा, जो सीधे तौर पर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सेदारी करती थी और साहिित्यकता की ज्यादा परवाह किए बिना राजनीतिक आजादी के लिए तड़प और जोष पैदा करने का काम कर रही थी। दूसरी धारा रोमांटिक लेखन की थी। इसका उद्भव पिष्चम में हुआ था और यह अंग्रेजी साहित्य से हमारे संपर्क के जरिए जहां तक पहुंची थी। तीसरी धारा प्रगतिवादी लेखन की थी जो मुख्यत: स्वच्छंदतावादी लेखन को नकारते हुए उभरी थी। राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वाधीनता की बजाए यह धारा आर्थिक शोषण से मुक्ति को प्रमुखता देती थी। इस धारा को सबसे लंबा जीवन मिला और यह अब भी गतिमान है। आजादी मिलने के साथ विभाजन का गहरा घाव भी लगा था। उर्दू, हिंदी और पंजाबी साहित्य में भारत-विभाजन की पीड़ा खास तौर से दर्ज की गई। हिंसा, घृणा, धार्मिक उन्माद और तमाम तरह के शोषणों के विरुद्ध समूचे भारतीय साहित्य ने संघशZ छेड़ा। भारतीय लोकमानस ने आजादी के लिए किए गए बलिदानों को देखते हुए उससे बड़ी उम्मीदें बांध रखी थीं। स्वतंत्र भारत में शुरू की गई पंचवर्षीय योजनाओं ने इन उम्मीदों को और बढ़ाया। जब उम्मीदें पूरी नहीं हुई, आदषZ, त्याग और बलिदानों की नींव पर खड़ी की गई इमारत में स्वार्थपरता, बेईमानी और भ्रश्टाचार का बोलबाला हो गया तो मोहभंग की स्थिति आई। उपन्यासों, कविताओं और नाटकों में मोहभंग का स्वर विषेश रूप से मुखरित हुआ। बीसवीं शताब्दी के आठवें दषक से भारतीय साहित्य में फिर एक नए दौर की शुरुआत होती है। भारतीय साहित्य में अब अिस्मतावादी आवाजें सुनाई पड़ रही हैं। नारीवादी लेखन और दलित लेखन इनमें मुख्य हैं। इनके जरिए साहित्य में बिलकुल अछूते, नए विशयों का प्रवेश होता है। मराठी क्षेत्र में पैदा हुआ दलित आंदोलन शीघ्र ही गुजराती, कन्नड़, तमिल, तेलगु, हिंदी, पंजाबी और उिड़या आदि भाशा क्षेत्रों में फैल गया है। अब दलित साहित्यकार पारंपरिक सौंदर्य शस्त्र की परवाह न करते हुए रोजमर्रा की अपरिश्कृत भाशा में साहित्य रचना कर रहे हैं। स्त्रियां भी अब साहित्य में अपने पहचान के लिए सक्रिय हैं। वे साहित्य की सभी विधाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। भूमंडलीकरण और बाजारीकरण के वर्तमान दौर ने भारतीय साहित्य को प्रभावित किया है। नव साम्राज्यवाद और नव उपनिवेशवाद के खतरों को भारतीय साहित्यकार महसूस कर रहे हैं, उनका सशक्त प्रतिरोध भी रच रहे हैं।
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